भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ (रा०च०मा० ७।११६।२) पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते ऐहि डरपति अति माया॥ (रा०च०मा० ७।११६।४-५) भक्तिपर मायाकृत उपद्रव व्यर्थ हो जाते हैं, इसीलिये उसे दिव्यमणि कहा है। ज्ञानपर उपद्रवोंके साफल्यकी सम्भावना होती है, इसीलिये उसे दीपक कहा है। श्रीभगवान्के शरण होकर उनमें आत्मसमर्पण करके प्राणी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। फिर तो उसके रक्षक भगवान् ही हो जाते हैं। यहाँ ज्ञानपक्षके पोषकोंका कहना है कि ज्ञान दीपक भी नहीं, मणि भी नहीं, अपितु दिव्य सूर्य है। उसके उदय होते ही अविद्या, अन्धकार और उसके उपद्रव एवं तत्सम्बन्धी उलूकादि सब मिट जाते हैं। अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचके मिटनेका दूसरा उपाय ही नहीं है। शरणागति, आत्मसमर्पण भी पूर्णरूपसे ज्ञान पक्षमें ही बनता है। ज्ञान बिना प्राणी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धितकका समर्पण कर सकता है, परंतु आत्माका तो समर्पण तभी बन सकता है, जब प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका बोध हो। जैसे घटाकाश महाकाशमें आत्मसमर्पण करता है, तरंग महासमुद्रमें आत्मसमर्पण करती है, वैसे ही जीवात्मा देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि अहंकारसे भिन्न चिदात्मरूपको शुद्धब्रह्ममें समर्पण कर देता है और तभी आश्रयत्वेन या संरक्षकत्वेन वरणरूप शरणागति प्राप्त होती है। इसी पक्षका समर्थन—'मामेकं शरणं व्रज।' (गीता १८।६६) 'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादिमें किया गया है। भगवत्स्वरूप प्रपत्ति या शरणागतिमें मायाकी निवृत्ति होती है, तभी समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। भगवान्की प्रीति, भक्ति परम कल्याणमयी होती है, इसमें सन्देह ही क्या? महानुभावोंने भक्ति और ज्ञानके साध्य, साधन और स्वरूपमें भेद कहा है। द्रवीभूत मनकी सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन पर- ब्रह्माकाराकारित मानसीवृत्ति भक्ति है और द्रवानपेक्ष मनकी निर्विकार परब्रह्माकार मानसीवृत्ति ज्ञान है। भगवद् गुणगणालंकृत ग्रन्थोंके श्रवण, मननसे भक्ति होती है, साधनसम्पन्न होकर शुद्ध-बुद्धमुक्तब्रह्मबोधक वेदान्त ग्रन्थोंके श्रवणसे ज्ञान होता है। भक्तिमें प्राणि- मात्रका अधिकार है। ज्ञानमें साधनचतुष्टयसम्पन्न उच्च अधिकारीका ही अधिकार है। ज्ञानका फल निर्विकार ब्रह्मात्मनाऽवस्थान और निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्के आकारसे आकारित मानसीवृत्तिरूपा भक्तिका फल भगवत्सायुज्यादिकी प्राप्ति है, परंतु साम्प्रदायिकोंकी दृष्टिमें तो भगवत्समीप्यादिकी प्राप्ति ही मुख्य फल है। भक्तिका फल भक्ति ही है, उससे बढ़कर कोई भी फल नहीं— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) भगवान्के गुणगणश्रवणमात्रसे समुद्रोन्मुख गंगा- प्रवाहके समान सर्वगुहाशायी भगवान्में गंगाजलके समान द्रवीभूत निर्मल मनकी वृत्तिसन्तति ही भक्ति है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम्॥ परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भक्तके द्रवीभूत मनपर व्यक्त होकर भक्तिपदसे कहे जाते हैं। कोमलचित्त प्राणी भक्तिका मुख्य अधिकारी है। यद्यपि साधनसे कठोर चित्तमें भी द्रवता होती है तथापि उसके लिये ज्ञान अच्छा है। ज्ञानी निर्गुण भक्तिके अतिरिक्त सगुण भक्ति भी करता है, परंतु उसको भक्तिका भगवत्प्रेमानन्दका रसास्वादनरूप दृष्ट ही फल है, मुक्तिरूप अदृष्ट फल तो ज्ञानसे ही उसे प्राप्त है। शिशुपालादि तामस, राजस भक्तोंको मुक्तिरूप अदृष्ट ही फल होता है, दृष्ट फल नहीं होता, परंतु भक्तको तो प्रेमानन्दमय दृष्ट फल और ज्ञानक्रमेण मुक्तिरूप अदृष्ट फल भी प्राप्त होता है। देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) शब्द-स्पर्शादि विषयोंके उपलम्भसे अनुमित होनेवाले श्रौतस्मार्तकर्मपरायण आन्तर-बाह्य करणोंकी सत्त्व (सत्त्वोपाधिक विष्णु किंवा सत्तामात्र परब्रह्म)- में जो स्वाभाविकी वृत्ति है, वही भक्ति है। अर्थात् श्रौतस्मार्त कर्मोंसे शुद्धनिर्मल बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणकी ब्रह्मप्रवणता या भगवत्परायणता ही भक्ति है। यह भक्ति अन्नमयादि पंचकोशोंको उसी तरह जला डालती है, जैसे भक्षित अन्नको जठराग्नि पचा डालती है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) निर्गुणब्रह्म या सगुणब्रह्ममें, तत्रापि काम, क्रोध, स्नेहसे, यथा कथंचित् मनकी उन्मुखता ही भक्ति है। श्रीव्रजांगनाओंने भगवद्वियोगाग्निसे स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीर, अन्नमयादि पाँचों कोशोंको जलाकर विशुद्ध परमानन्दरसात्मक ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। भक्तिके कुछ लक्षण सगुण, निर्गुणमें समान हैं। कुछ सगुण भक्तिमें ही पर्यवसित होते हैं। ज्ञानीको निर्गुण परब्रह्ममें तो स्वाभाविकी भक्ति होती ही है, साथ ही सगुण भक्ति भी होती है। इस आशयसे कहा गया है- तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) कुन्तीका कहना है कि हे देव! आप अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्ति-योगविधान करनेके लिये सगुण, साकारस्वरूप ग्रहण करते हैं। यद्यपि आपका निर्गुण, निराकार, निर्विकारस्वरूप समस्त प्राणियोंके निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है तथापि अनादि महामायाके प्रभावसे उसकी परमानन्दरसरूपता परप्रेमास्पदता तिरोहित-सी है। जैसे मधुर मिश्री भी पित्तदोषोपहत रसनावाले प्राणीको कटु प्रतीत होती है, वैसे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्गुणब्रह्ममें प्रेमकी कमी भासित होती है। इसीलिये विवेकी लोग यह चाहते हैं कि जैसे, अविवेकियोंको विषयोंमें, कामुकको कामिनीमें उत्कट प्रेम होता है, वैसे ही भगवान्में मनकी आसक्ति हो। इसीलिये कहा गया है कि- मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) कोटि-कोटि मुक्त-सिद्धोंमें भी नारायणपरायण दुर्लभ हैं। ज्ञानियोंमें भी प्रारब्ध कर्म अवशिष्ट रहनेके कारण दृश्य द्वैतदर्शनकालमें शुद्धचिदात्मतत्त्वकी पूर्ण रसात्मकताका अनुभव और निरतिशय प्रेम नहीं व्यक्त होता। इसीलिये सविशेष साकार स्वजनरूपसे प्रकट परमात्मतत्त्वमें शुद्ध भक्ति, प्रीतिकी अपेक्षा होती है। इसलिये ही ज्ञानी महानुभावोंका भी भगवान्के मधुर चरित्रों और मंगलमयी मूर्तिमें आकर्षण होता है, परंतु इतनेसे उनकी ज्ञाननिष्ठा या निर्गुण सिद्धान्तसे प्रच्युति मान लेना केवल बालकपन है। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥ (रा०च०मा० १।३३८।५) जहाँ यह बात कही गयी है, वहीं परम ब्रह्मनिष्ठ विदेहके मोह और ज्ञान-वैराग्यके शैथिल्यकी बात कही गयी है। वह केवल प्रभु रघुनाथके स्नेहकी महिमा है। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० २।२८६।८; १।२१६।५) इत्यादि वचनोंका भी यही तात्पर्य है कि केवल अन्तःकरणसे अनुभूत निर्गुणब्रह्मकी अपेक्षा दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्ममें विशिष्टसरसताकी अनुभूति होती है। जैसे आदित्यमण्डलका कोई केवल नेत्रसे अनुभव करता है, परंतु कोई दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रोंसे उसी आदित्यका अनुभव करता है। प्रथम अनुभवसे दूसरे अनुभवमें जैसे विशेषता होती है, वैसे ही केवल अन्तःकरणसे तत्त्वानुभवकी अपेक्षा
दिव्यलीलाशक्तियुक्त ब्रह्मतत्त्वमें विशिष्टमाधुर्यका अनुभव होता है; परंतु सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म- भावापन्न मुक्तको तो अभेदेन अनन्त, अखण्डरसात्मक वस्तुकी अनुभूति होती है। विवेकियोंका कहना है कि यदि पुष्पमें घ्राणशक्ति हो तब ही पुष्पके मनोरम सौगन्ध्यका पूर्णरूपसे आस्वादन किया जा सकता है। इस दृष्टिसे अत्यन्त अभेदमें ही अनन्त- रसकी अनुभूति होती है। फिर भी जीवन्मुक्तकालमें अन्तःकरणादि उपाधियाँ विद्यमान ही रहती हैं। अतः उसके द्वारा पूर्णरूपसे अपरिमितानन्दकी अनुभूति नहीं होती। दिव्यलीलाशक्तिके योगसे कहीं अधिक रसकी अनुभूति होती है। इसके सिवा रागानुगाप्रीतिके लिये सगुणब्रह्मकी उपासनाकी जाती है। इसीलिये मुक्ति आदिसे निरपेक्ष होकर, जीवन्मुक्त लोग भगवान्के सगुणरूपमें प्रेम करते हैं— अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ (रा०च०मा० ३।१३।१३) आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) आत्माराम एवं चिज्जडग्रन्थि जिनकी छूट गयी है, ऐसे मुनि भी उरुक्रम भगवान्में अहैतुकी भक्ति करते हैं। कृतकृत्य, पूर्णकाम, आप्तकाम, परम निष्काम होनेपर भी भगवान्के अद्भुतगुणोंके प्रभावसे भगवान्में आकर्षित होते हैं। यद्यपि पूर्णकामकी भक्तिमें प्रवृत्ति अनुचित ही जान पड़ती है तथापि भगवान्के अद्भुतगुण ही इस अनौचित्यका समाधान करते हैं। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में अद्वैतवादी ज्ञानीको भक्तिका प्रकार बतलाया गया है। 'यत्सुभक्तैरति- शयप्रीत्या कैतववर्जनात्, स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वाऽपि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽ त्यन्ततत्परैः।' सुभक्त ज्ञानी लोग फलानुसन्धानरूप कैतव (कपट)-से वर्जित होकर, परमतत्त्वकी आराधना करते हैं। अज्ञानीके लिये तो किसी-न-किसी फलकी कामना रहती ही है। जीवन्मुक्तकी भी भगवान्के भजनमें अभिरुचि यहाँ प्रश्न होता है कि जब प्रयोजनके बिना मन्दकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, फिर कृतकृत्य, जीवन्मुक्त [L4
भक्तिरसामृतास्वादन ६९१ द्वारा खिंच जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणारविन्द किंजल्क- मिश्रतुलसीदलमकरन्दके हृद्गत होते ही सनकादिकोंके निर्विकार मनमें भी क्षोभ हो गया। स्वसुखनिभृत- चेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽप्यजितरुचिरलीला- कृष्टसारस्तदीयम्। (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) स्वस्वरूपभूत परमानन्दसे भरपूर चित्तवाले तथा निरस्त समस्तद्वैतजाल श्रीशुकाचार्य भी भगवान्की लीलाओंपर मुग्ध होकर आकर्षित हो उठे। औरकी तो कौन कहे, स्वयं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान् ही अपने विचित्र सौन्दर्य, माधुर्यमें मुग्ध हो जाते हैं— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भगवान् अपनी अचिन्त्य, अद्भुतयोगमायाके बलसे भूषणोंको भी भूषित करनेवाले, मंगलमय श्रीअंगको धारण करते हैं, जिससे वे स्वयं मोहित हो जाते हैं, उन्हें स्वयं विस्मय होने लगता है। लोकपालकिरीटकोटिपीडितपादपीठ असाम्यातिशय प्रभु जिस समय श्रीमन्नन्दरानीके मणिमयस्तम्भों या प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही श्रीमूर्तिको देखते हैं, उस अपने ही सौन्दर्य-माधुर्यपर मुग्ध होकर, उसके परिरम्भणके लिये व्यग्र हो उठते हैं और उसमें असफल होनेपर श्रीअम्बाका वदन विलोककर रुदन करने लगते हैं— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ फिर योगीन्द्र मुनीन्द्रगण उसपर मुग्ध हो जायें, इसमें आश्चर्य ही क्या ? परंतु इससे ज्ञानकी न्यूनता नहीं होती; क्योंकि ज्ञान और ज्ञानी श्रीभक्ति महारानीको सदा पूजें, इसीमें तो उनकी बड़ाई है। योग्य पुत्रका यही कर्तव्य है। ऐसे ही पुत्रसे पुत्रवती युवती धन्य होती है। भक्तिरसामृतास्वादन श्रीभगवद्धर्मसे द्रुत शुद्ध हृदयमें प्रादुर्भूत निरुपम सुखसंविद्रूप, दुःखकी छायासे विनिर्मुक्त श्रीभक्तिका माहात्म्य यत्र-तत्र शास्त्रोंमें वर्णित है। सर्वाधिष्ठान, परमानन्दस्वरूप, औपनिषद परम पुरुषकी रसस्वरूपता 'रसो वै सः' इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। लौकिक आनन्दोंमें भी उसी रसस्वरूप भगवान्की आंशिक अभिव्यक्ति होती है। रसके विषय एवं आश्रयकी मलिनतासे शुद्ध रसमें भी मालिन्यकी प्रतीति होती है। भक्तिरसायनकारने कहा है—'किञ्च न्यूनाञ्च रसतां याति जाड्यविमिश्रणात्' (१।१३) अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्य ही द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणकी वृत्तिपर उपारूढ़ होकर भावरूपताको प्राप्तकर पीछे रसस्वरूप हो जाता है। लौकिक रस परमानन्दस्वरूप नहीं हो सकता, किंतु भक्तिरसमें अनवच्छिन्न- चिदानन्दघन भगवान्की स्फूर्ति होती है, अतः वह परमानन्दस्वरूप है। इसलिये जो लोग श्रीकृष्णविषयक रतिको रसरूप नहीं, भावरूप ही मानते हैं—क्योंकि देवताविषयक रति भावस्वरूपा ही होती है—उनका मत ठीक नहीं है; क्योंकि श्रीकृष्णभिन्नदेवताविषयक रति भावरूपा होती है। भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्द- स्वरूप हैं, अतः कृष्णविषयक रति रसरूपा ही होगी, भावरूपा नहीं। बल्कि कान्तादिविषयक रतिकी वैसी
६९२ भक्तिसुधा रसता पुष्ट नहीं होती, जैसी भगवद्विषयक रतिकी। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने कहा है कि—भगवद्विषयिणी रति परिपूर्णरसस्वरूप होनेके कारण क्षुद्रकान्तादिविषयक रतिसे वैसी ही बलवती है, जैसे खद्योतोंसे आदित्यप्रभा— परिपूर्णरसा क्षुद्ररसेभ्यो भगवद्रतिः। खद्योतेभ्य इवादित्यप्रभेव बलवत्तरा॥ (भक्तिरसा० उल्लो० २ कारि० ७७) विषय और आश्रय दोनों या दोनोंमेंसे एक यदि रसात्मक हो तो रति भी विशुद्ध रसस्वरूप होती है। विशेषतः समुद्वेलित सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररससारसर्वस्व भगवान् ही मनोवृत्तिमें विशिष्ट रसभावको प्राप्त करते हैं। जैसे रसमें रसोद्रेककी कल्पना होती है, वैसे ही यहाँ भी कल्पना की गयी है। भगवद्धृदयस्थ पूर्णानुराग-रससारसागर- समुद्भूत, निर्मल, निष्कलंक चन्द्रस्वरूपिणी श्रीवृष- भानुनन्दिनी राधारानी एवं श्रीराधारानीके हृदयमें विराजमान श्रीकृष्णविषयक प्रेमरससारसागर-समुद्भूत चन्द्ररूप व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं। अतः यहाँ प्रेम सदानन्दैकरसस्वरूप है; क्योंकि विषय-आश्रय दोनों ही रसस्वरूप हैं, जबकि अन्यत्र विषय-आश्रय आदि विजातीय होते हैं, रसस्वरूप नहीं। इसी तरह भगवान्की लीला, लीला करनेका स्थान, लीलापरिकर और उद्दीपनादि-सामग्री भी रसस्वरूप ही है। सच्चिदानन्द- रससारसरोवरसमुद्भूत सरोज, केसर, पराग एवं मकरन्दस्वरूप व्रज, व्रजसीमन्तिनीवृन्द, श्रीकृष्ण एवं उनकी प्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी सभी रसात्मक ही सिद्ध होते हैं— 'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चिद्- घनतामुपैति।' 'सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः॥' —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यह सारी बातें ब्रह्मवादमें ही बन सकती हैं, इसलिये ब्रह्मवित्तम श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भक्तिरसायन' ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही बनाया है। भक्तिरसामृतके रसिक अन्य महानुभावोंने भी कहा है कि मुक्त मुनि जिस फलको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परेशान रहते हैं, उसीको देवकीरूप वृक्षने फला, यशोदाने पकाया तथा गोपियोंने यथेष्ट उसका उपभोग किया। यशोदाकी मंगलमयी गोदमें चिदानन्दसरोवरसे नीलकमलके समान श्यामतेज प्रकट हुआ। अन्य भक्त कहते हैं—वह ऐसा फल था, जिसका भृंगोंने आघ्राण नहीं किया, वायुने जिसका सौगन्ध्य नहीं उड़ाया, जो जलमें उत्पन्न नहीं हुआ, लहरियोंके कणसे जो टकराया नहीं और कभी किसीने जिसे कहीं देखा नहीं। एक भक्त कहता है—निगम वनमें फल ढूँढ़ते- ढूँढ़ते यदि नितान्त खेदयुक्त हो गये हों तो इस उपदेशको सुनें—उपनिषदोंके परम तात्पर्यका विषय प्रत्यक्चैतन्या- भिन्न परब्रह्म गोपियोंके घरमें उलूखलसे बँधा पड़ा है। दूसरा भक्त कहता है—सखि! एक कौतुककी बात सुनो—श्रीमन्नन्दरायके प्रांगणमें धूलिधूसरित होकर वेदान्तसिद्धान्त थेई-थेई करके नृत्य करता हुआ मेरे द्वारा देखा गया है। एक अन्य भक्त कविने कहा है कि श्यामल मोहमयी मूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण मानो गोपांगनाओंके पुंजीभूत प्रेम ही हैं या यदुवंशियोंके मूर्तिमान् सौभाग्य हैं अथवा श्रुतियोंके गुप्तवित्त ब्रह्म हैं— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दसरसो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिव तद्दौजः समभवत्॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु बल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। गोधूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ पुञ्जीभूतं प्रेमगोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्।
एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्की सब अलंकारादि सामग्री रसस्वरूप ही है। सौरभ्यसे उनका उद्वर्तन (उबटन), स्नेहसे अभ्यंजन (मालिश), माधुर्य अथवा स्वांग तेजसे स्नान, लावण्यसे मार्जन, सौन्दर्यसे अनुलेपन और त्रैलोक्यलक्ष्मी (शोभा)-से शृंगार होता है। श्रीवृषभानुनन्दिनी भी महाभावस्वरूपा हैं। सखियोंके प्रणयरूप सद्गन्धसे उनका उबटन तथा कारुण्यामृतधारा-लावण्यामृतधारा-तारुण्यामृतधारासे स्नान होता है, लज्जारूप श्यामपट्टवस्त्र वे परिधान किये रहती हैं और उज्ज्वल कस्तूरीविरचित उनकी देह है एवं कम्प-अश्रु-पुलक-स्तम्भादि उनके अलंकारस्वरूप रत्न हैं। श्रीकृष्णका परिधानरूप पीताम्बर श्रीराधारानी एवं श्रीराधारानीके कज्जल, मृगमद, कर्णोत्पल, नीलाम्बर आदि श्रीकृष्ण ही हैं— श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥ शृंगार रसकी अंगिता और उज्ज्वलता अनौपचारिकरूपसे राधा-कृष्णमें ही बनती है। कृष्णविषयक काम, क्रोध, भयादिका भी पर्यवसान कृष्णप्राप्तिमें ही है। जैसे कोई दीपबुद्धिसे चिन्तामणि ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होता है तो उसे चिन्तामणिकी ही प्राप्ति होती है, वैसे ही जारादि भावनासे भी जो भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवृत्ति होती है, उससे भगवत्प्राप्ति ही होती है। लौकिक जारधर्म परलोकादिको नष्ट करता है और भगवान् पंचकोश, अविद्या, काम, कर्मादिको नष्ट करते हैं, इसलिये जार हैं— तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि संगताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।११, १५) —इत्यादि वचन इसमें प्रमाण हैं। यद्यपि अनिमि- त्ता भक्ति ही कोशको जीर्ण करती है तो भी सनिमित्ता भक्तिका पर्यवसान भी अनिमित्ता भक्तिमें ही होता है। यद्यपि अनिमित्ता पराभक्ति स्वतःसिद्ध है तो भी जैसे कच्चा आम, पके हुए आमका कारण होता है, वैसे ही अपरा भक्ति पराभक्तिका कारण होती है। ऐसा माननेपर ही— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३; ११।३।३१) —इत्यादि वचनोंकी संगति लगती है। प्रेम वाणीका विषय नहीं रसात्मक प्रेम रसस्वरूप ही है। कहा भी गया है कि प्रादुर्भावके समय जिसने जरा भी हेतुकी अपेक्षा नहीं की, जिसके स्वरूपमें अपराधपरम्परासे हानि एवं प्रणामपरम्परासे वृद्धि नहीं होती, जो अपने निजी रसास्वादके सामने अमृतास्वादको भी तुच्छ कर देता है और जो तीनों लोकके दुःखका विनाश करता है, उस महान् प्रेमको वाणीका विषय बनाकर ओछा क्यों किया जाय— प्रादुर्भावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि क्षीयेतापि न चापराधविधिना नत्या न यो वर्धते। पीयूषप्रतिवादनस्त्रिजगतीदुःखद्रुहः साम्प्रतं प्रेम्णास्तस्य गुरोः किमद्य करवै वाङ्निष्ठतालाघवम्॥ वाणीका विषय बनाते ही प्रेम या तो हल्का हो जाता है या अस्त हो जाता है। दो रसिकोंका प्रेम एक दीपकके समान है, जो उनके हृदयरूप गृहोंको निश्चल रूपसे प्रकाशित करता है। यदि इसे वाणीरूप दरवाजेसे बाहर कर दिया जाय तो या तो वह बुझ जाता है या मन्द हो जाता है— प्रेमा द्वयो रसिकयोरपि दीप एव हृद्देश्म भासयति निश्चलमेव भाति। द्वारादयं वदनतस्तु बहिष्कृतश्चे- न्निर्व्वाति शीघ्रमथवा लघुतामुपैति॥
६९४ भक्तिसुधा विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना मुक्ति चाहनेवाले परमविरक्त भी इस भक्तिकी कामना करते हैं- कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) इसलिये भक्तिका चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षमें पर्यवसान है। भक्तिरसायनकारके सिद्धान्तमें सगुण ब्रह्मके समान निर्गुण ब्रह्ममें भी भक्ति मानी गयी है। इसमें- 'देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥' 'लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) -यह वचन प्रमाण है। इसका निष्कृष्ट अर्थ यही है कि आनुश्रविक (वैदिक) कर्मोंसे आराध्य सत्त्व आदि गुणवाले देवताओंके मध्यमें सत्त्वोपाधिक विष्णुमें जो स्वाभाविकी मनोवृत्ति है, उसे निर्गुण भक्तियोग कहते हैं। यद्यपि वेद एवं तदनुकूल शास्त्रोंमें भगवान्के राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि जिन स्वरूपोंकी उपासना बतलायी है, उन सबकी भक्ति रसस्वरूप ही है तथापि सभी रस सरलतासे साक्षात् श्रीकृष्णमें ही संगत होते हैं। इसीलिये भक्तिरसायनकारने विशेषतया 'मुकुन्द' पद ग्रहण किया है-'परममिह मुकुन्दे भक्तियोगं वदन्ति।' भक्तिरसके आलम्बनविभाव सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर भगवान् ही हैं-यह आगे स्पष्ट किया जायगा। प्रेम-निरूपणके प्रसंगमें बतलाया गया है कि भगवद्धर्मसे द्रुतचित्तमें प्रविष्ट स्थिर- गोविन्दाकारता ही भक्ति है-'द्रुते चित्ते प्रविष्टा या गोविन्दाकारता स्थिरा। सा भक्तिरित्याभिहिता....॥' (भक्तिरसा० उल्ला० २ कारि० १) कर्म, उपासना, ज्ञानका अवगम करानेवाले सभी शास्त्रोंका तात्पर्य अन्तःकरणशुद्ध्यर्थ मलविक्षेप- निवृत्तिपूर्वक भगवदुपासना एवं भगवत्स्वरूपज्ञानद्वारा परमपुरुषार्थरूप भक्तिमें ही है। कहा भी है कि यदि द्रवावस्थापन्न चित्त नित्यबोधसुखात्मा विभु भगवान्को ग्रहण कर ले तो क्या अवशेष रह जाय?- 'भगवन्तं विभुं नित्यं पूर्ण बोधसुखात्मकम्। यद् गृह्णाति द्रुतं चित्तं किमन्यदवशिष्यते॥' (भक्ति० उल्ला० १ का० ३०) विषयमें चित्तकी कठोरता एवं भगवान्में द्रवता होनी चाहिये-'काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे।' आनन्दसे ही अखिल भूतनिकायका प्रादुर्भाव, आनन्दसे ही जीवन एवं आनन्दमें ही उपसंहार होता है-आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। (तैत्तिरीय० ३।६) अतः समस्त प्रपंच परमानन्द रसस्वरूप ही है, किंतु स्वप्नादि प्रपंचके समान बाध्य होनेके कारण भगवत्- स्फूर्ति होनेपर जब प्रपंच निवृत्त होता है, तब भगवद्रूप ही अवशेष रहता है। अध्यस्त पदार्थकी अधिष्ठान- ज्ञानसे निवृत्ति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि विषय- विषयक सभी प्रेम भगवान्में ही पर्यवसित होते हैं। भगवत्प्रेमके साधन भगवत्प्रेम प्राप्त करनेके लिये साधकको क्रमशः महापुरुषोंकी सेवा, उनके धर्ममें श्रद्धा, भगवद्- गुणश्रवणमें रति, स्वरूपप्राप्ति, प्रेमवृद्धि, भगवत्स्फूर्ति और भगवद्धर्मनिष्ठा आदि अपेक्षित होती है। आत्माराम, आप्तकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, महामुनीन्द्र भी भगवान्को भजते हैं- आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) कहा जा सकता है कि सर्वाधिष्ठान प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारद्वारा सभी प्रकारके भेदोंके मिट जानेपर जिनका चित्त आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण है, उन्हें अपनेसे भिन्न भगवान्की स्फूर्ति नहीं हो सकती। रागकी तो उनमें सम्भावना ही नहीं, फिर भक्ति तो अत्यन्त ही असम्भव है। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि उन्हें स्वारसिक प्रेमसे भेदका आहार्यज्ञान होता है (बाधकालिक इच्छाजन्यज्ञान आहार्यज्ञान कहा जाता है)। आहार्यज्ञानद्वारा राग एवं भक्ति हो
भक्तिरसामृतास्वादन ६९५
सकती है। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में बतलाया गया है कि भक्त लोग प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको जानकर अतिशयप्रीतिसे अभिसन्धिविहीन होकर आहार्यज्ञानद्वारा भेदभावकी कल्पना करके अत्यन्त तत्परतासे स्वभावतः भगवान्में स्वारसिकी भक्ति करते हैं— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्। स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ आहार्यज्ञानद्वारा व्यामोहप्रसक्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि भगवान् सत्यके भी सत्य हैं। जैसे अराजाको राजा बनानेवाला राजराज कहा जाता है, वैसे ही भगवान् असत्यको सत्य बनाते हैं अर्थात् पारमार्थिक सत्यकी अपेक्षा किंचित् न्यूनसत्ताका एक और सत्य माना जाता है, जो भजनोपयोगी है। अतः पारमार्थिक अद्वैत सिद्धान्त ज्यों-का-त्यों रहता है। कहा भी गया है कि पारमार्थिक अद्वैत ज्ञान होनेपर यदि भजनोपयोगी द्वैत मानकर भगवान्में भक्ति की जाती है तो ऐसी भक्ति सैकड़ों मुक्तियोंसे भी कहीं बहुत अच्छी है। प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मका विज्ञान होनेके पहले द्वैत बन्धनका कारण है, किंतु विज्ञानके बाद भेद- मोहके निवृत्त हो जानेपर भक्तिके लिये भावित द्वैत अद्वैतसे भी बहुत अच्छा है— पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं भावितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ गाढ़ानुराग आलिंगनादि-रसास्वादप्रवीण पतिव्रता नायिका जैसे रसविशेषविकासके लिये घूँघटकी ओटसे अपने प्रियतमका निरीक्षण करती है, वैसे ही तत्त्व- साक्षात्कारसम्पन्न अभेदानुभवी विद्वान् भी रसविशेष- विकासके लिये भेदभावसे ही भगवान्की समर्चा करना चाहते हैं— विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ कान्ताका प्रियतमके वक्षःस्थलपर विलासपूर्ण विहरण या पादयुगलकी सेवा, जैसे बराबर है, वैसे ही ज्ञानीकी तत्त्वनिष्ठा और भगवत्पूजा दोनों बराबर हैं— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विरहतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे प्रातिभासिक प्रपंचकी अपेक्षा घटादि सत्य एवं स्वकारण मृदादिकी अपेक्षा असत्य होते हैं या मृदादि भी अपने कारणकी अपेक्षा असत्य होते हैं, वैसे ही पारमार्थिक सत्ताकी अपेक्षा स्तरभेदसे कुछ न्यून सत्तावाला अपारमार्थिक सत्य है। यही सत्ता भगवल्लीला-परिकरकी है, इसलिये सिद्धान्ततः अद्वैत बना ही रहता है। चित्द्रुतिसे भक्तिमें भेद चित्तद्रुतिके कारण अनेक हैं। उन्हींके भेदसे भक्तिमें भेद होता है—'चित्तद्रुतेः कारणानां भेदाद्भक्तिस्तु भिद्यते।' शरीरसम्बन्ध-विशेषकी स्पृहा होनेपर सन्निधान-असन्निधान-भेदसे काम दो प्रकारका होता है। उससे द्रुत चित्तमें श्रीकृष्णनिष्ठता ही सम्भोग-विप्रलम्भाख्य रति है। इसी तरह क्रोध, स्नेह, हर्षादिजन्य चित्तद्रुतिमें भी रति जाननी चाहिये— कामजे द्वे रती शोकहासभीविस्मयास्तथा। उत्साहो युधि दाने च भगवद्विषया अमी॥ शृंगार, करुण, हास्य, प्रीति, भयानक, अद्भुत, युद्धवीर, दानवीर—ये सब व्यामिश्रणमें होते हैं। राजसी, तामसी भक्ति अदृष्ट फलमात्रवाली होती है। मिश्रित भक्ति दृष्टादृष्ट उभय फलवाली होती है। इसी तरह साधकोंकी विशेषतासे भक्ति शुद्धसत्त्वोद्भवा भी होती है। सनकादि सिद्धोंमें भक्ति दृष्टफल होती है। जैसे ग्रीष्मसन्तप्त पुरुषका गंगास्नान दृष्टादृष्टफलक होता है, वैसे ही वैधी भक्तिमें भी सुखाभिव्यक्ति होती है,
६९६ भक्तिसुधा अतः वह दृष्टादृष्टफलक है। शीतवातातुर पुरुष यदि गंगास्नान करे तो उससे जैसे अदृष्टमात्र ही फल होता है, दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है, वैसे ही राजसी, तामसी भक्तिमें सुखरूप दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है। गंगास्नान कर लेनेपर पुनः गंगामें क्रीड़ा करनेवालोंको जैसे दृष्टमात्र फल होता है, वैसे ही जीवन्मुक्तोंकी भक्ति दृष्टफलमात्रपर्यवसायिनी होती है— राजसी तामसी भक्तिरदृष्टफलमात्रभाक् । दृष्टादृष्टोभयफला मिश्रिता भक्तिरिष्यते ॥ शुद्धसत्त्वोद्भवाप्येवं साधकेष्वस्मदादिषु । दृष्टमात्रफला सा तु सिद्धेषु सनकादिषु ॥ दृष्टादृष्टफला भक्तिः सुखव्यक्तेर्विधेरपि । निदाघदूनदेहस्य गङ्गास्नानक्रिया यथा ॥ रजस्तमोऽभिभूतस्य दृष्टांशः प्रतिबध्यते । शीतवातातुरस्येव नादृष्टांशस्तु हीयते ॥ तथैव जीवन्मुक्तानामदृष्टांशो न विद्यते । स्नात्वा मुक्तवतां भूयो गङ्गायां क्रीडतां यथा ॥ तीव्र वातस्थित प्रदीप ज्वालाके समान रजस्तमोऽभिभूत शिशुपाल आदिकी स्वप्रकाशानन्दाकार भी मतिसन्तति सुख व्यक्त करानेवाली न हुई। प्रतिबन्धके नष्ट होनेपर सुखाभिव्यक्ति होती है। चित्तद्रुति होनेके कारण ही भक्ति होती है। उसके न होनेके कारण न तो वेन भक्त ही ठहरा, न उसे कुछ फल ही प्राप्त हुआ। शिशुपाल भगवान्की सत्ता मानता था, परंतु वेन भगवान्की सत्ता ही नहीं मानता था, वह नास्तिक था, इसलिये उसका भगवत्-सम्बन्ध ही नहीं हुआ, फिर चित्तद्रवता और भक्ति तो बहुत दूरकी बात है। सुखाभिव्यंजक होनेसे रजस्तमोविहीन भगवद्विषयक मति ही रति है। भगवद्विषयक मतिके समुच्छेदतारतम्यसे रतितारतम्य होता है। 'विरहे यादृशं दुःखं तादृशी दृश्यते रतिः।' मनुष्य और अधिकरणमात्रके भेदसे अनेक भेद होते हैं। उसमें भी वैकुण्ठ, मथुरा, द्वारका, वृन्दावन आदिके भेदसे तथा व्रज, वन, निकुंजादिके भेदसे प्रकाशभेद भी माना जाता है। पुनः शुद्ध, मिश्रित आदिके भेदसे अनेक भेद होते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि आदिमें जो विषय विस्तारसे कहे गये हैं, वे यहाँ सूत्रभूत कारिकाओंसे कहे गये हैं। विशेषतया वेदान्त, सांख्य, मीमांसादिशास्त्र एवं शास्त्राविरोधी युक्तियोंद्वारा सभी विषयोंका वर्णन किया गया है। अद्वैतसिद्धिकार श्रीमधुसूदनसरस्वतीमहाराजकी सिद्धान्ताविरोधिनी स्वारसिकी भक्ति थी, जैसा कि उन्होंने स्वयं ही गीताकी 'गूढार्थदीपिकासंग्रह' नामक टीकामें कहा है कि अद्वेष्टृत्व आदि गुण जैसे ज्ञानीके स्वभावसिद्ध होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन करना भी ज्ञानीका स्वभाव है—'अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' साधन, अभ्यास और परिपाकावस्थाके भेदसे 'तस्यैवाहं' मैं उसीका हूँ, 'ममैवासौ' वह मेरा ही है, 'सोऽहं' मैं वही हूँ—ये तीन तरहके भाव होते हैं। तीसरे भावके 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्', 'अहं ब्रह्म परं धाम', 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इत्यादि उदाहरण हैं। 'मामेकं शरणं व्रज' इत्यादि गीताके उपसंहारात्मक श्लोकका तात्पर्य भी अन्तिम भावना ही है। 'एकं' एक अद्वितीय त्रिविधभेदशून्य 'मां' मुझ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको 'शरणं' घटाकाशका महाकाशके समान, तरंगका जलराशिके समान आश्रय अथवा रक्षक निश्चित रूपसे जानो। 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति' इस श्रुतिके अनुसार प्रत्यगभिन्नता रूपसे विदित ब्रह्म ही अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचका अपनোদন करता है, इसीलिये वह रक्षक है। परब्रह्मकी प्रेमास्पदता परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न होनेपर ही प्रत्यक् आत्माकी पूर्णता एवं प्रत्यगात्मासे अभिन्न होनेसे परब्रह्मकी अपरोक्षता अनौपाधिक अनतिशय परप्रेमास्पदता सिद्ध होती है। यदि प्रत्यगात्मासे तटस्थ परमात्मा ठहरा तो उपर्युक्त बातें बन नहीं सकतीं। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) यह श्रुति प्रत्यगात्माके शेष रूपसे ही सबकी प्रेमास्पदता बतलाती है। अपने कल्याणके लिये भगवान्का भजन कड़वी गुडुचीके पान करनेके समान ही ठहरेगा,
भक्तिरसामृतास्वादन ६१७ क्योंकि स्वास्थ्यके लिये कड़वी गुडुची भी पी जाती है। फिर भगवान्में सातिशय ही प्रेम रहेगा निरतिशय नहीं, जब प्रत्यगात्माका स्वरूप भगवान्को माना जाता है, तभी भगवान्की निरुपाधिक परप्रेमास्पदता बन सकती है। 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इस श्रुतिने ब्रह्मकी अवेद्यतासे ही अपरोक्षता बतलायी है, जो कि प्रत्यगात्मासे भिन्न, तटस्थ ब्रह्मकी किसी तरह नहीं बन सकती। आत्मासे भिन्न पदार्थकी सिद्धि प्रमाणके अधीन ही होती है, स्वतः भासमान स्वारसिक अनतिशय प्रेमस्वरूप ही भगवान् हैं, इसीलिये श्रीशुकाचार्यने भगवान् श्रीकृष्णको सबका अन्तरात्मा बतलाया है— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इसीलिये ब्रह्मविद्वरिष्ठोंके भी चित्तमें हठात् उनकी स्फूर्ति होती है— यावन्निरञ्जनमजं पुरुषं जरन्तं सञ्चिन्तयामि सकले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः ॥ प्रकृत ग्रन्थकार श्रीमद्मधुसूदनसरस्वतीके भी निम्न- लिखित वचन हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्। पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत् किमपि तन्नीलं महो धावति॥२ अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥ इसी तरह श्रीशुक, सनकादि, शंकर, सुरेश्वर, पद्मपाद, चित्सुख, सर्वज्ञात्म, श्रीधरस्वामी आदि सहस्रों ब्रह्मविद्वरिष्ठोंको भी वैसा ही अकैटव प्रेम था। भगवान्ने स्वयं ही श्रीमुखसे 'एकभक्तिर्विशिष्यते' इन शब्दोंसे उपर्युक्त अर्थोंका समर्थन किया है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' इत्यादि श्रुतियोंने किसीको भी अनात्मा समझनेको अनर्थकारक माना है, फिर भगवान्को अनात्मा समझनेकी बात ही क्या? प्रेममें व्यवधान सहनकी क्षमता नहीं होती, इसीलिये दूरमें या व्यवहितमें स्वाभाविक स्वारसिक अकैटव प्रेम नहीं होता। इसीलिये भगवान्को सर्वान्तर परम सन्निहित या प्रत्यगात्मा कहा गया है— 'कैटवरहितं प्रेम न तिष्ठति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे भवति को जीवति॥' —यह प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्में अभेद श्रीअचिन्त्यकल्याणगुणगणाकर भूमा भगवान्की अघटितघटनापटीयसी सदसद्विलक्षणा, समस्त आश्चार्योंकी एकमात्र निवासभूमि, अनन्तशक्तिकी केन्द्रभूता मायाके प्रवाहमें पड़े हुए प्रपंचमें सूक्ष्म विचार करनेपर बुद्धिमानोंके लिये क्रमशः आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व ठहरता है। कोई आत्माको अणुपरिमाण, कोई मध्यम परिमाण तथा कोई विभु मानते हैं। विभुत्ववादियोंमें भी कोई आत्माको अचित्, कोई १. जिसके हाथोंमें वंशी सुशोभित है, जो नवनीरदसुन्दर है, पीताम्बर पहने है, जिसके होठ बिम्बाफलके समान लाल-लाल हैं, जिसका मुखमण्डल पूर्णचन्द्रके सदृश और जिसके नेत्र कमलवत् हैं, उस कृष्णसे परे कोई तत्त्व हो तो मैं उसे नहीं जानता। २. ध्यानके अभ्याससे जिनका चित्त वशमें हो गया है, वे योगी यदि उस निर्गुण और निष्क्रिय परमज्योतिको देखते हैं तो देखा करें। हमारे नेत्रोंको तो कालिन्दीतटविहारी नीले तेजवाला साँवरा ही सुख पहुँचाता रहे।
६९८ भक्तिसुधा चित्परिणामी, कोई चिदचित्, कोई असंग और चित्स्वरूप मानते हैं। कोई वादी क्लेश, कर्म, विपाक एवं आशयसे अपरामृष्ट विशिष्ट आत्माकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभावता मानते हैं। यद्यपि इसीमें सद्वितीयता, चिदचिद्विशिष्टता, चिदचिद्भिन्नाभिन्नता रूप तीसरे पक्षमें भी स्वाभाविक भेदाभेद, औपाधिक भेदाभेद, अचिन्त्य भेदाभेद पक्ष और शुद्धाद्वैत, अद्वैतपक्ष भी होते हैं तथापि भक्तिरसायनकार अद्वैत सिद्धान्तानुसारी हैं। परमार्थतया भोक्ताकी आत्मा भगवान् ही हैं, ऐसा औपनिषद सिद्धान्त है। 'श्रीमद्भागवत' में भी कहा गया है कि वस्तुभूत तत्त्व वही है। सर्वविध भेदशून्य, स्वप्रकाश, अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वज्ञ तत्त्व कहते हैं। देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत परिच्छेदशून्य होनेसे वही ज्ञान अनन्त, अवेद्य होकर अपरोक्ष होनेसे स्वप्रकाश, अद्वितीय होनेके कारण सर्वोपद्रवविवर्जित होनेसे परमानन्दस्वरूप और त्रिकालाबाध्य होनेसे परम सत्य है। वही निरतिशय बृहत् होनेसे ब्रह्म, आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा, अचिन्त्य, अनन्त
कहनेपर घटत्वावच्छिन्नप्रतियोगितानिरूपक निषेधकी ही अवगति होती है। दूसरी बात यह है कि ज्योतिष्मान् आदित्यस्थानीय भगवान्से यदि ज्योतिःस्थानीय ब्रह्म न्यून माना जाय तो वह ब्रह्म ही नहीं। 'बृहि वृद्धौ' धातुसे 'मनिन्' प्रत्यय होनेपर ब्रह्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है बड़ा (बृहत्)। संकोचक प्रमाण न होने तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस श्रुतिमें 'अनन्त' पद समभिव्याहारसे यही सिद्ध होता है कि निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। अतिशयताकी कल्पना करते- करते जहाँ वाचस्पतिकी मति भी परिश्रान्त हो जाय, इसके बाद निरतिशय बृहत्ता सिद्ध हो सकती है, अतः भगवान् हों या श्रीकृष्ण जिसकी निरतिशय बृहत्ता मानी जाय, वही ब्रह्म है। यहाँ इतनी विशेषता और समझ लेनी चाहिये कि उपर्युक्त मतमें आदित्यस्थानीय ज्योतिष्मान् भगवान्की किरणस्वरूप ज्योतिःप्रदेशमें अविद्यमानता रहेगी, अतः देशकृत परिच्छेद होनेसे अनन्तता नहीं बन सकती। हमारे मतमें भगवान् या श्रीकृष्णकी सर्वविध परिच्छेदशून्यता होनेके कारण निरतिशय बृहत्ता बन सकती है और अनुपचरित अद्वयता, अनन्तता, ब्रह्मता भी सम्पन्न हो सकती है।
निर्गुण और सगुणका स्वरूप
इसी तरह कहा जाता है कि 'भगवान् निर्गुण हैं' इस कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान्में प्राकृत गुणगण नहीं हैं। जैसे 'अकाय' का अभिप्राय प्राकृत कायराहित्यमात्र है, अप्राकृत काय तो उनके है ही। वैसे ही 'निर्गुण' शब्द अप्राकृत गुणगणका निषेधक नहीं है। यह भी ठीक नहीं, क्योंकि फिर तो निष्क्रियत्व, अव्रणत्व आदि शब्दोंका भी ऐसा ही अर्थ किया जायगा। फिर तो भगवान्में अप्राकृत क्रिया एवं अप्राकृत व्रण मानना पड़ेगा। यदि कहा जाय कि सगुण शब्द भी निर्गुणके समान आता है, अतः 'निर्गुण' पदका अर्थ प्राकृतगुणरहित किया जाता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि निष्क्रियत्वके समान सक्रियत्व शब्द भी आता है, अतः उपर्युक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा। इसलिये वस्तुतः निर्गुण ही भगवान् अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे अप्राकृत गुणगणोंको स्वीकार करते हैं, अतः वे सगुण कहे जाते हैं— 'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम्।' यद्यपि कहा जाता है कि हो सकता है कि धनवान् पुरुष धननिरपेक्ष हो, किंतु निर्धनकी धननिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है। इसी तरह सगुण भगवान् भले ही गुणनिरपेक्ष हों, किंतु निर्गुणकी गुणनिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है तथापि यह भी ठीक नहीं, क्योंकि भगवान्में गुण न तो कुछ अतिशयताका आधान कर सकते हैं, न कुछ विशेषता ही कर सकते हैं। अनाप्तकाम निर्धनको भले ही धनकी अपेक्षा हो, किंतु आप्तकाम, आत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम, निर्गुण भगवान् गुणनिरपेक्ष रहें, इसमें क्या आश्चर्य ? नित्य निरतिशय बृहद् ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्में गुणगणमहत्त्वातिशयका आधान, नित्य निरतिशय अनन्त आनन्दस्वरूपमें आनन्दातिशयका आधान तथा नित्यनिरस्तसमस्तानर्थ ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्में अनर्थ निर्वहण भी नहीं कर सकते। पर इन तीनोंको छोड़कर गुणका कोई चौथा उपयोग है नहीं, अतः गुणनिरपेक्ष निर्गुण भगवान् ही गुणोंकी गुणत्वसिद्धिके लिये उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। कौस्तुभमणिकी शोभाके लिये ही भगवान्ने उसे अपने श्रीकण्ठमें धारण कर रखा है—'कण्ठं च कौस्तुभमणेरधि- भूषणार्थम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२६) किन्हीं लोगोंका यह मत कि निराकारमें प्रेमास्पदता होती ही नहीं, यह अत्यन्त अज्ञानमूलक है, क्योंकि सगुणप्राप्तिजन्य सुख भी निराकार ही है, फिर उसमें प्रेम कैसे होता है ? श्रीधरस्वामी आदिकोंने भी 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' (श्रीमद्भा० १।२।११) इस श्लोकमें ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्में कुछ भी विलक्षणता नहीं मानी। ऐसा मानना न केवल निर्मूल है, अपितु शास्त्र तथा युक्तिविरुद्ध भी है। कुछ लोगोंका कहना है कि नारदजीको आकाशसे
उतरते हुए देखकर जब वे दूर थे, तब द्वारकावासियोंने कल्पना की कि यह कोई महातेजःपुंज है। कुछ और समीप आनेपर शरीरवान् प्राणी समझा और अधिक समीप आनेपर अवयवकी स्पष्ट प्रतीतिसे कोई पुरुष है ऐसा जाना। अधिक निकट होनेपर उन्हें नारदजीका स्पष्ट ज्ञान हुआ— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) इसी तरह दूर रहनेपर ब्रह्म और समीप होनेपर परमात्मा और अत्यन्त समीप होनेपर भगवान्का ज्ञान होता है। किंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि सर्वान्तरतम ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्में सामीप्य- असामीप्य निबन्धन तारतम्य नहीं हो सकता। अतः निष्कर्ष यह निकला कि एक ही नित्य, निरतिशय बृहत्तम ब्रह्म आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा और गुणगणसेव्य होनेसे भगवान् कहा जाता है। सकल सच्छास्त्रतात्पर्यगोचर, अशेषविशेषातीत, निर्गुण, निराकार, सच्चिदानन्दघन अपनी अचिन्त्य, मंगलमय, दिव्यशक्तिसे अनन्तकल्याणगुणगणाकर, अनन्तकोटि- कन्दर्पसुन्दर, शक्रशतकोटिविलासशाली, नभःशत- कोटिमहाविस्तारशाली, वायुशतकोटिविपुलबलशाली, रविशतकोटिप्रखरप्रकाशशाली, शशिशतकोटिसुशीतल, कालशतकोटिदुस्तर, अमितकोटितीर्थपावनाभिधान, मेरु- शतकोटिनिश्चल, समुद्रशतकोटिगम्भीर, कामधेनुशत- कोटिकामपूरक, शारदाशतकोटिज्ञानप्रद, विधिशतकोटि- सृष्टिनिपुण, विष्णुशतकोटिपालक, रुद्रशतकोटिसंहारक, धनदकोटिशतैश्वर्यसम्पन्न, मायाकोटिशत-अघटित- घटनापटीयान्, शेषशतकोटिधारक, भगवान्की अनन्त- कोटि आदित्यगणोंकी प्रकाशप्राखर्यादिमेंसे भी वैसे ही उपमा नहीं दी जा सकती, जैसे कि अनन्तकोटि खद्योतोंसे आदित्यकी उपमा। इसीलिये अशेष- विशेषातीत, अनन्तकल्याणगुणगणाकर भगवान्की स्तुतिमें ब्रह्मादिकोंका भी असामर्थ्य सुना जाता है। भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी भक्तकल्पपादप भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी ही हैं। सर्वशास्त्रतात्पर्यविषय कर्म-उपासना-तत्त्वज्ञानादि- समाराध्य भगवान् ही मुक्तोपसृप्य हैं, यह तत्तत्स्थलोंमें कहा ही गया है—'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये', (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठ० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३), 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४), 'आत्मक्रीड आत्मरतिः' (मुण्डक० ३।१।४) इत्यादि श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें मुमुक्षु और भक्तोंके लिये भगवच्छरणागति ही बतलायी गयी है। उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विध लिंगोंद्वारा 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५), 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य रसात्मक, प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्ममें ही पर्यवसित होता है। अन्य विषयक अनुरागाधीन विषयता, प्रेमकी गौणता तथा अनन्यविषयक अनुरागाधीन विषयता ही प्रेमकी
वहाँ स्वात्मानन्द ही अभिव्यक्त होता है। विषयनिबन्धन एवं वृत्तिरोधके क्षणिक होनेसे सुखको वैषयिक, क्षणिक आदि कहा जाता है। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्तिरीय० २।९) इत्यादि श्रुतियोंद्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमूलक परिणामके कारण दुःखसे अमिश्रित सुख होनेसे ब्रह्मात्म सुख प्राप्ति कही गयी है। इसीलिये आत्मा ही रस है, ऐसा सिद्धान्त है। यहाँपर आनन्द शब्दसे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म ही विवक्षित है; क्योंकि उसीमें उपक्रमोपसंहारादिद्वारा रसात्मताबोधक वचनोंका तात्पर्य निश्चित होता है। अग्निके अंश विस्फुलिंगके समान या सिन्धुके अंश बिन्दुके समान विशिष्ट, सोपाधिक, चिदाभास, चित्प्रतिबिम्ब, चित्कण या समवच्छिन्न जीव निरतिशय रसरूप नहीं; क्योंकि वहाँ पूर्णानन्दता तिरोहित है। तटस्थ परब्रह्मपरमात्मा भी निरतिशय सुखरूप नहीं, क्योंकि यदि वह प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप न हुआ तो साक्षादपरोक्ष भी नहीं रहेगा, फिर उसकी स्वप्रकाशानन्द- रसरूपता तो अत्यन्त दूर है। इसलिये न चाहनेपर भी प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी ही रसरूपता माननी पड़ेगी। भगवान्की तीन शक्तियाँ किन्हीं लोगोंने सच्चिदानन्दघन भगवान्की स्वरूपशक्ति, तटस्थशक्ति और बहिरंगशक्ति—ये तीन शक्तियाँ मानी हैं। स्वरूपशक्तिमें भी वे सन्धिनीशक्ति, संवित्शक्ति और ह्लादिनीशक्तिके भेदसे तीन शक्तियाँ मानते हैं। इस पक्षमें भी यह बात बन जाती है; क्योंकि अचिदात्मक मायाकी बहिरंगता और सोपाधिक जीवकी तटस्थता तो स्पष्ट ही है। सन्धिनी आदि तीनों शक्तियाँ सच्चिदानन्दकी स्वरूपभूता ही हैं। यद्यपि स्वप्रकाश सत् ही चित्, अत्यन्ताबाध्य चित् ही सत्, सर्वोपद्रवविवर्जित सच्चित् ही आनन्द, अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश आनन्द ही सच्चित् है, इस तरह स्वरूपमें कुछ भी भेद नहीं है, अतः उसमें जब शक्तिकी ही कल्पना नहीं की जा सकती, तब फिर उसके तीन भेदकी तो बात ही क्या ? तथापि अचिन्त्य अनिर्वाच्य, भगवदीय दिव्यलीलाशक्तिके योगसे लीलाविशेष विकासके लिये उक्त भेदोंका उपपादन किया जा सकता है। जैसे जलराशिकी अपेक्षा फेन बहिरंग और तरंग तटस्थ (फेनकी अपेक्षा अन्तरंग होते हुए भी स्वरूपकी अपेक्षा बहिरंग होनेसे तरंगमें तटस्थता है।) और स्वरूपभूत होनेसे माधुर्य ही मुख्य अन्तरंग है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धु भगवान्में भोग्य जड़ प्रपंच मूलभूत माया बहिरंग, चिल्लक्षण जीव तटस्थ और स्वरूपभूत माधुर्यादि अन्तरंगभाव शक्तिशब्दसे भी कहे जाते हैं। सत्त्व सन्धायक है, अतः उसमें सन्धिनी, चित्प्रकाशक है, अतः उसमें संवित् और आनन्द आह्लादक है, अतः उसमें आह्लादिनी शक्तिकी कल्पना होती है। प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी रसरूपता माननेपर ही यह सब कल्पना बन सकती है। रससिन्धुका बिन्दु भी रसस्वरूप ही है। किंतु परमानन्दताके आवृत्त होनेसे वह अल्पानन्द एवं साकांक्ष होता है। इसी तरह सोपाधिक आत्मा भी रसस्वरूप होकर रसप्रेप्सु होता है। इसीलिये शास्त्रोंने इस तत्त्वका निरूपण किया है। वेदान्तवेद्य, निर्विशेष भगवद्रूप ही रसस्थायीसे विशिष्ट होकर वर्णित होता है। भगवद्गुणगणश्रवणजन्य मानस वृत्तिकी द्रवतामें भगवदाकारता प्रविष्ट होनेपर विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारीके संयोगसे रसरूपता होती है। यहाँ भगवान् ही आलम्बन-विभाव, तुलसी-चन्दनादि उद्दीपन- विभाव, नेत्रविक्रियादि अनुभाव और निर्वेदादि व्यभिचारी भावसे त्यज्यमान भगवदाकारतारूप रस स्थायी भाव ही परमानन्द-साक्षात्कारात्मक प्रादुर्भूत होता है। वही भक्तियोग एवं दुःखासंसृष्ट सुखरूप परम पुरुषार्थ है। यदि स्वभावतः कठिन लाक्षा तापक अग्नि आदि द्रव्यके सम्बन्धसे जलके समान द्रुत हो जाय और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे छान ली जाय, फिर उसमें कोई रंग छोड़ दिया जाय तो वह रंग उस लाक्षाके सर्वांशमें प्रविष्ट होकर स्थिर हो जाता है। फिर कठोर या द्रुत होनेपर कभी भी रंग लाक्षासे पृथक् नहीं होता, वैसे ही भगवद्भावनासे भावित द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणमें भगवान्के प्रविष्ट होनेपर अन्यवस्तुग्रहणकालमें भी भगवान्का भान होता ही है। प्रपंचभानसहित भगवद्भानका
उदाहरण है— खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्। सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४१) प्रपंचमिथ्यात्वभानसहित भगवद्भानका उदाहरण 'तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपम्'। (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) आदि हैं। प्रपंचभानरहित भगवद्भानका उदाहरण है— प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१८) विशेषतः विप्रलम्भ शृंगारमें द्रवावस्थाप्रविष्ट आलम्बनमय ही समस्त वस्तुओंका भान होता है। इसका उदाहरण है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यंङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य । हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः ॥ (अमरूशतक) इसी तरह भगवद्विषयक काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक, दया आदि तापक भावोंमेंसे किसीके भी सम्पर्कसे चित्तरूप लाक्षा गंगाजलप्रवाहके समान द्रुत हो और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे वह क्षालित हो (छान ली जाय) तो फिर उसमें सर्वांशप्रविष्ट परमानन्द- स्वरूप भगवान् स्थायी भाव बनकर रसस्वरूप हो जाते हैं। द्रवावस्थामें प्रविष्ट विषयाकारता (भगवदाकारता)- के कभी भी पृथक् न होनेके कारण वहाँ मुख्य स्थायी शब्दका प्रयोग होता है। ऐसा होनेपर ही कर्तुमकर्तुं अन्यथाकर्तुंसमर्थ भगवान् भी यदि स्वयं वहाँसे हटना चाहें तो नहीं हट सकते, उनकी सर्वशक्तिमत्ता भी कुण्ठित हो जाती है। इसीलिये कहा गया है— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) यहाँ 'प्रणय' शब्दसे द्रवावस्था ही विवक्षित है। ऐसे अन्तःकरणसे चाहनेपर भी भगवान् नहीं निकल सकते। इसीको लक्ष्य करके भक्त उनसे कहता है कि यदि हृदयसे निकल जाओ तो आपका पुरुषार्थ जानूँ—'हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते।' ब्रजसीमन्तिनीजन अपने हृदयसे भगवान्को निकालना चाहती हैं, पर सफल नहीं होतीं। निश्चित करती हैं कि अब उनसे सख्य नहीं करेंगी, फिर भी उनकी चर्चाको दुस्त्यज समझती हैं। किसी सखीने भगवान्की चर्चा छेड़ दी तो दूसरी सखीने तत्काल रोककर कहा— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् यदि हमारी प्यारी सखी (राधा)-को क्षणमात्र भी सुखी देखना चाहती हो तो मोहनकी चर्चा न कर कोई और कथा सुनाओ। यह देखकर किसी मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि योगीन्द्र, मुनीन्द्र धारणा, ध्यान आदिके द्वारा विषयोंसे मनको हटाकर भगवान्में लगाना चाहते हैं और मन हट-हटकर विषयोंमें चला जाता है; किंतु यह मुग्धा मनको भगवान्से हटाकर विषयोंमें लगाना चाहती है। जिन भगवान्की क्षणमात्र स्फूर्तिका लिये योगी सदा उत्कण्ठित रहा करते हैं, यह मुग्धा उनको हृदयसे निकालकर बाहर करना चाहती है— प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनो धित्सति बालासौ विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः । यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति ॥ बिम्बप्रतिबिम्बभाव यदि कहा जाय कि फिर तो आलम्बन और स्थायीभाव एक ही हो गया तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि व्यवहारसिद्ध ईश-जीवके भेदके समान ही
बिम्बप्रतिबिम्बके भावका भेद यहाँ भी है। बिम्ब ही मनकी द्रवावस्थामें पड़कर प्रतिबिम्ब कहा जाता है। 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रपंचकी आनन्दात्मक ब्रह्मैक्योत्पादन निमित्तिकता सिद्ध होती है। कान्तादि विषय भी कारणानन्दरूप ही हैं, मायाकृत आवरण और विक्षेपके कारण उनकी अखण्डानन्दरूपसे प्रतीति नहीं होती। अकार्योंका भी कार्याकाररूपसे भान होता है— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद् विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (श्रीमद्भा० २।९।३३) अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है स्वप्रकाशस्वरूपसे भासमान चैतन्य ही अज्ञात है, जड नहीं। जडके स्वतः आभासमान होनेसे वहाँ आवरणकी कोई अपेक्षा ही नहीं है। कान्तादिविषयक भानोंके प्रामाण्यके लिये अज्ञात कान्ताद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक आवरणके हट जानेपर कान्ताद्यवच्छिन्न- रूपसे परमानन्दरूप उपादान चैतन्यरूपका ही भान होता है, किंतु अनवच्छिन्न स्वरूपका भान नहीं हुआ, इसीलिये सद्योमुक्ति या स्वप्रकाशत्व-भंगकी प्रसक्ति नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही द्रुत अन्तःकरणकी वृत्तिमें उपारूढ़ होकर स्थायी भाव और रसस्वरूप हो जाता है। कान्तादि लौकिक रस भी परमानन्दरूप ही है। फिर भी जड़के सम्पर्कसे उसमें न्यूनता है। भक्तिमें अनवच्छिन्न चिदानन्दघन भगवान्का स्फुरण होनेसे उसकी परमानन्दरूपता स्फुट ही है। जो लोग कहते हैं कि 'रसः ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् रसस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करके ही यह जीव आनन्दित होता है, इस वाक्यमें अयं पदार्थकर्तृक लाभकर्म ही रस शब्दसे कहा गया है। भगनावरण चैतन्य ही अयं पदार्थ है और वही कर्म भी, फिर कर्ता और कर्म दोनोंकी एकरूपता हो गयी। किंतु यह ठीक नहीं, क्योंकि सावरणचैतन्य 'अयम्' पदार्थ (कर्ता) और निरावरणचैतन्य कर्म पदार्थ है, इस औपाधिक भेदके माननेसे कोई भेद नहीं आता। यदि कहा जाय कि स्वप्रकाशवादमें आवरणभंगसे ही आनन्द प्राप्त हो जायगा, रसको पाकर आनन्दित होता है, यह कहना व्यर्थ है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्यकी आवरणभंगमात्रसे ही रसरूपता हो जानेपर भी तत्तदवच्छिन्न चैतन्योंमें तत्तदवच्छेदकगत दोष- गुणोंके मिश्रणसे आवरणभंगमात्रसे ही आनन्दप्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिये विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभावके संयोगसे अभिव्यक्त स्थायीभाव ही सभ्य और अभिनेयका भेद हटाकर सभ्यमें ही रहता हुआ परमानन्द-साक्षात्कारद्वारा रसस्वरूप हो जाता है, यही रसज्ञोंकी मर्यादा है। तात्पर्य यह कि सभी शास्त्रोंके महातात्पर्य-विषय परमात्मामें ही सच्चिदादि, रसानन्दादि शब्दोंकी साक्षात् प्रवृत्ति है तो भी जैसे विषयविशेषमें सत्ता शब्द या चैतन्य शब्द प्रयुक्त होता है, वैसे ही रसानन्दादि शब्दोंका भी विषयविशेषमें प्रयोग हो सकता है। इससे सिद्ध हुआ कि स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चैतन्यमें ही रस शब्दका प्रयोग होता है। जबतक अन्तःकरणवृत्तिकी सात्त्विकी द्रवता नहीं होती, तबतक रस, आनन्दादिकी अनुभूति भी नहीं होती। इसीलिये उपेक्ष्य एवं द्वेष्य विषयोंमें भग्नावरण चैतन्य रहनेपर भी आनन्दका अनुभव नहीं होता। इसीलिये यह भी कहा जा सकता है कि यह रससिन्धुबिन्दुस्थानीय सोपाधिक जीव अनवच्छिन्न रससिन्धु स्थानीय परमात्माको या स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण तदंशभूत चित्को पाकर आनन्दित होता है। फिर तो 'सावरण अनावरण होकर आनन्दित होता है' यह भी कहना चाहिये था, 'रसको पाकर आनन्दित होता है' यह कहना व्यर्थ ही रहा। यह पक्ष भी ठीक नहीं। नित्य प्राप्त, विस्मृत ग्रैवेयक और मिथ्या सर्पादिकोंमें प्रेप्सा-परिजहीर्षा देखी जाती है
और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर लाभ-परिहार-प्रयोग भी देखा जाता है। इसी तरह आवरणभंगसे प्रेप्सा निवृत्ति होनेपर प्राप्तिव्यवहार भी हो सकता है। प्राकृत पंचकोशातीत स्वरूप लक्षणलक्षित प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही रस है। उसीको पूर्ण या अंशरूपसे पाकर यह सोपाधिक जीव आनन्दित होता है। 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- जीवन्ति॥', (बृहदारण्यक० ४।३।३२) 'एष ह्येवा- नन्दयति' इत्यादि श्रुतियाँ लौकिक आनन्दको भी रसस्वरूप परमात्माका ही अंश बतला रही हैं। साधारण अब्रह्मवित् पुरुषोंको अनवच्छिन्न ब्रह्मात्मक रसकी प्राप्ति तो होती नहीं, अतः यथायोग्य ही सम्बन्ध लगाना चाहिये। 'रसो वै सः', 'रसो ह्येव' इन दोनों श्रुतियोंमें अनवच्छिन्न स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चिदात्मक पारिभाषिक तदंशभूत ही रस लिया जाता है। द्रवत्व स्थायीभावानापेक्ष महावाक्यजन्य अपरोक्ष ब्रह्माकारवृत्तिमें आवरण-भंगसे अनवच्छिन्न ब्रह्मरूपसे ही रसका लाभ होता है। इसी तरह कान्ताद्यवच्छिन्नरूपसे उपादान ब्रह्मचैतन्यकी भी स्थायी भावापत्ति होनेपर पारिभाषिकावच्छिन्न रसका लाभ होता है। इसलिये उत्तरमीमांसामें रसशास्त्र गतार्थ नहीं, किंतु स्थायीभावादिविशिष्ट रसके प्रतिपादनके लिये रसशास्त्र पृथक् अपेक्षित है। आचार्य श्रीमधुसूदनजी सरस्वती— व्यक्तित्व एवं कृतित्व 'भक्तिरसायन' का आस्वादन कराया जा चुका है। उसके रचयिता श्रीस्वामी मधुसूदनसरस्वतीजीके सम्बन्धमें भी कुछ जान लेना चाहिये। ऐसा कोई ग्रन्थ अपेक्षित था, जिसमें ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही भक्तितत्त्वका वर्णन किया गया हो। इसी न्यूनताकी पूर्ति श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भगवद्भक्तिरसायन' बनाकर की। इनका जन्म पूर्व बंगालमें फरीदपुरके पास कोटालीपाड़ा ग्राममें श्रीरामचन्द्र भट्टाचार्यके वंशमें हुआ था। इनके पिताका नाम पुरन्दर मिश्र और इनका नाम कमलनयन था। इन्होंने नवद्वीपमें श्रीहरिराम तर्कवागीशसे न्यायशास्त्रका अध्ययन किया था। श्रीविश्वेश्वरसरस्वतीसे संन्यास-दीक्षा ग्रहणकर बहुत दिनतक काशीमें निवास किया था। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकी रामायणकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें नहीं हो रही थी। किसी विद्वान्ने उन्हें सलाह दी कि यदि श्रीमधुसूदनसरस्वती इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा करें तो सभी विद्वान् आपकी रामायणका आदर करेंगे। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपनी रामायण श्रीमधुसूदन- सरस्वतीके पास भेज दी। छः महीनेतक जब रामायण नहीं लौटी, तब श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपना शिष्य रामायण ले आनेके लिये भेजा। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने ग्रन्थका अभिनन्दन करते हुए ऊपर निम्नलिखित श्लोक लिख दिया— आनन्दकानने ह्यस्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः। कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥ कभी श्रीमधुसूदनसरस्वती श्रीवृन्दावनधाम पधारे। वहाँ एक ब्राह्मण बहुत दिनसे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तप कर रहा था। उसे स्वप्नमें भगवान्ने आदेश दिया कि मधुसूदनसरस्वतीके पास जाओ, वहाँ दर्शन होगा। वह ब्राह्मण श्रीमधुसूदनसरस्वतीके पास जाकर देखता है कि भगवान् उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खा रहे हैं। उसने स्वयं उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खाना चाहा, पर श्रीमधुसूदनसरस्वतीने मना किया कि 'संन्यासीका अन्न निषिद्ध है।' उस ब्राह्मणने कहा कि 'मैं तो भगवान्का प्रसाद लेना चाहता हूँ, संन्यासीका अन्न नहीं।' इनके द्वारा बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थ हैं—(१) अद्वैतसिद्धि, (२) वेदान्तकल्पलता, (३) अद्वैततत्त्वरक्षण, (४) श्रीमद्भागवत टीका, (५) श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्या—गूढार्थदीपिका, (६) संक्षेप शारीरिक व्याख्या सारसंग्रह, (७) सिद्धान्तबिन्दु, (८) शिवमहिम्नस्तोत्रकी हरिहरपरा टीका, (९) बोपदेवकृत हरिलीलाकी टीका, (१०) भगवद्भक्ति- रसायन। इस अन्तिम ग्रन्थके प्रथम उल्लासकी टीका स्वयं ग्रन्थकारने की है। यद्यपि शेष दो उल्लासोंकी
क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०५ टीका भी अन्य विद्वानोंने लिखी है, किंतु ग्रन्थकार- सिद्धान्तके भक्तद्वारा टीका लिखी जाय, इसकी आवश्यकता थी। भगवान् भूतभावन विश्वनाथकी कृपासे वेदान्तितिलक श्रीदामोदरशास्त्रीने विविध शास्त्रोंके तात्पर्यको अभिव्यक्त करनेवाली, ग्रन्थकार- सिद्धान्तका सर्वथा अनुसरण करनेवाली 'भक्तिरस- स्रोतस्विनी' नामक टीका और टिप्पणी बनायी। वह विद्वानोंको आनन्दित करनेवाली होगी, ऐसी आशा है। क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? विविध शंकाओंके युक्तियुक्त शास्त्रोक्त समाधान एक बार एक सज्जनने प्रश्न किया और कहा—'आज चार मुखके ब्रह्मा, छः मुखके षडानन, हजार मुखके शेष भी यदि कहें कि माला जपनेसे सुख-शान्ति होगी तो भी दुनिया इस बातको नहीं मान सकती, जबकि पूजा-पाठ और माला-जप होते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट ही गया, काशीविश्वनाथको पलायन करना ही पड़ा। आज भी सब देशोंकी अपेक्षा यहाँ अधिक धर्म होता है, यहाँ लाखों साधु अपना समय निरन्तर भजनमें ही लगाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों गृहस्थ भी भजन करते हैं। बड़े-बड़े मठ-मन्दिर करोड़ोंकी सम्पत्तियोंसे भरपूर हैं। गणितज्ञोंने गम्भीर विवेचन करके यह निश्चय कर लिया है कि हर एक व्यक्तिके पीछे पौने तीन घण्टेका भजन पड़ता है। इस तरह प्रति व्यक्तिके पीछे दो आनेकी आय और उसमेंसे डेढ़ पैसाका दान पड़ता है। इस तरह सम्पूर्ण देशोंकी अपेक्षा यहाँका धर्म, दान और भजन अधिक है। यदि इनका सदुपयोग हो (धर्मादिकी सम्पत्तियोंका सदुपयोग हो) तो कितनी ही यूनिवर्सिटियाँ चल सकती हैं। आजकी दुनिया धर्मसे ऊब गयी है, अतः आज 'टन-टन', 'पों- पों' से काम नहीं चलेगा। लोगोंको धार्मिक बननेका उपदेश करनेके पहले वर्तमान स्वरूप और उसके परिष्कारकी ओर ध्यान देना होगा।' वस्तुतः ऐसी अनेकों शंकाओंका मूल कारण है, अपने धर्म, कर्म, सभ्यता एवं संस्कृतिसे सम्बन्ध रखनेवाले शास्त्रोंका अध्ययन न करना, उसके विपरीत इतिहासों, साहित्योंका अभ्यास और विपरीत वातावरणमें पलना। जब धर्मके स्वरूपपर हम विचार करते हैं तो मालूम होता है कि धर्म केवल माला जपना ही नहीं बतलाता, किंतु वह तो अधिकारानुसार सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सब प्रकारके कर्तव्योंको सोच-समझकर यथायोग्य काम करनेको कहता है। अतः इस प्रश्नका अवकाश ही नहीं रहता कि जब घरमें आग लगी हो तो पानी ढूँढ़कर बुझानेका प्रयत्न करना चाहिये, केवल 'राम- राम' कहनेसे काम नहीं चल सकता। परंतु यहाँ भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि घरमें आग लगनेपर 'राम-राम' कहते बैठे रहना सबसे हो भी नहीं सकता। जब 'राम-राम' जपते हुए भी जल, अन्न, वस्त्रकी आवश्यकता प्रतीत होती है तो घरकी आग बुझाये बिना रहा भी कैसे जा सकता है? हाँ, आग बुझानेके लिये अन्यान्य उपायोंको काममें लाते हुए यदि 'राम-राम' कहता रहेगा तो ईश्वर-कृपासे आग शीघ्र ही बुझ भी सकती है। विपरीत भावनासे, प्रचण्ड वायुसे आग अधिक उत्तेजित भी हो सकती है, परंतु जिसे पूर्ण विश्वास है, वह 'राम-राम' के सहारे भोजन- पानादिकी भी परवाह नहीं करता। जिसके मनमें घरमें आग लगनेपर भी नामका भाव दिखायी देता है, उसकी आग भगवत्कृपासे अवश्य बुझ जायेगी। परंतु वैसी धारणा और योग्यता न होनेपर भी जो भोजन-पान-व्यवहारादि कार्योंमें तत्पर रहते हुए
७०६ भक्तिसुधा भी समाज तथा राष्ट्रके हितमें नहीं प्रवृत्त होते हैं; किसी भी धार्मिक, सामाजिक कार्योंके अवसरपर केवल राम-नामका सहारा पकड़ते हैं। वे तो योग्यता और अवसरको न सोचकर एक सत्सिद्धान्तको केवल कलंकित ही करनेका प्रयत्न करते हैं। वैराग्यके स्थानमें राग, रागके स्थानमें वैराग्य, प्रवृत्तिके स्थानमें निवृत्ति और निवृत्तिके स्थानमें प्रवृत्ति अनुचित है, हानिकर है। नीकीहू फीकी लगत, बिन अवसरकी बात। जैसे बरनत युद्धमें, रस सिंगार न सुहात॥ परंतु यदि दूसरा उपाय दृष्टिगोचर ही न हो, तब तो सिवा भगवान्के सहारेके और चारा ही क्या है? इसीलिये तो जहाँ एक परमविश्वासी उच्चकोटिके भगवद्भक्तके लिये भगवद्भजन ही सर्वाभीष्टपूरक है, वैसे ही एक अत्यन्त आर्त या अर्थार्थी एवं सर्वसाधनविहीनका एकमात्र भगवान् ही सहारा है। तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य ज्ञानी भक्त स्वभावसे ही भगवान्को भजते हैं। जिज्ञासु ज्ञान- प्राप्त्यर्थ भगवान्को भजते हैं। अर्थार्थी, आर्त अपनी अर्थ-प्राप्ति और आर्तिनिवृत्तिके लिये परमेश्वरको भजते हैं। किसी भी कामनावाला व्यक्ति अपनी अभीष्टपूर्तिके लिये तत्तत् उपायोंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनकी सफलताके लिये परमेश्वरकी आराधना करता है। जिज्ञासु भगवच्चरण-पंकज- समर्पण-बुद्ध्या धर्मोंका अनुष्ठान करता है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करता है। आर्त, अर्थार्थी शास्त्रके अनुसार नैतिक, आर्थिक उपायोंका प्रयोग करता है, फिर भी 'मामनुस्मर युध्य च' (गीता ८।७)-के अनुसार अपने अस्त्र-शस्त्रबलका गर्व, बुद्धि और बाहुबलके घमण्डको छोड़कर, ईश्वरका आश्रयण करना पड़ता है; क्योंकि ईश्वरके अनुकूल होनेपर ही सम्पूर्ण लौकिक उपायोंकी सफलता होती है। भगवदुपेक्षित प्राणीके लिये सम्पूर्ण उपाय भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसीलिये माता-पिताके द्वारा अनेक उपचारोंसे लालन-पालन करते रहनेपर भी बालकोंकी मृत्यु देखी जाती है। चिकित्सकोंके अनेक उपचार करनेपर भी रोगी मरते दिखते हैं। अतएव— बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः। (श्रीमद्भा० ७।९।१९) मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजना॥ मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥ (रा०च०मा० ३।२।६-८; ५।२३।५-६) अतः साधन-सम्पन्नोंको भी श्रीभगवान्का आश्रयण आवश्यक है। फिर तो जो साधन-विहीन हैं, उनके लिये तो सिवा भगवान्के और सहारा ही क्या है? जैसे एक वीतराग तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य केवल भगवान्के ही सहारे रहता है, उसके सम्पूर्ण योगक्षेमका भगवान् ही निर्वाह करते हैं— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता ९।२२) अनन्य भावनासे भगवान्की आराधनामें तत्पर प्राणियोंका अप्राप्त-अभीष्टप्राप्तिरूप योग और प्राप्तरक्षणरूप क्षेम श्रीभगवान् ही पूरा करते हैं। वैसे ही साधन-विहीन विश्वासी आर्त-अर्थार्थीके भी एकमात्र भगवान् ही सहारा हैं। अतः उसके भी योग-क्षेमको भगवान् ही वहन करते हैं। परंतु भारतकी स्थिति तो आज उससे भी अधिक चिन्तनीय है। वह तो आज आत्माराम कृतकृत्य नहीं, निष्काम मुमुक्षु नहीं, साधन-सम्पन्न आर्त एवं अर्थार्थी नहीं, इतनेपर भी भगवद्विश्वासी नहीं अर्थात् आर्त-अर्थार्थी होनेपर भी आर्तिनिवृत्ति और अर्थप्राप्तिके लिये अपेक्षित साधनोंसे भी रहित है। ऐसी स्थितिमें भी निराश्रय निष्कपटभावसे भगवान्को पुकारनेसे काम चल सकता था, परंतु इस समय भगवान्से विश्वास
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उठ गया है। गिरते समय प्राणीके हाथ-पाँव यद्यपि स्वभावसे ही किसी सहारेको टटोलने लगते हैं और दुनियाके सम्पूर्ण सहारोंके कमजोर होनेपर, एकमात्र भगवान्का ही बल रह जाता है। अतः स्वाभाविक रूपसे भगवान्का आश्रयण ही शेष रह जाता है। फिर भी जब ब्रह्मा, शेष आदिके कहनेपर भी भगवान्के पुकारनेमें विश्वास न हो तो इसे राष्ट्रका दुर्भाग्य ही समझना चाहिये। रहा यह कि जप, पाठ, पूजा करते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट गया, विश्वनाथ भाग गये, हिन्दू जातिका सर्वस्व लुट गया; फिर ईश्वर या धर्मको पुकारनेसे क्या लाभ ? परंतु यदि ठण्डे दिलसे विचार करें तो इस शंकाका कुछ भी महत्त्व नहीं है। पहले तो यह सोचना चाहिये कि क्या किसी उपायके कभी असफल हो जानेमात्रसे, सर्वदाके लिये उसे व्यर्थ और बेकाम समझ लेना उचित है ? क्या कभी वायुयानके फेल हो जाने या किसी यन्त्रके कल- पुर्जोंके बेकार हो जानेपर सर्वदाके लिये उनको बेकार समझ लिया जाता है ? देखते तो यह हैं कि बार- बार वायुयानों, मोटरों, रेलों तथा अन्यान्य यन्त्रोंके बेकार या हानिकारक होनेपर भी उनका निर्माण और संचालन बन्द नहीं हुआ। बड़े-बड़े आविष्कारक वैज्ञानिक बार-बार विफल होनेपर भी प्रयत्नका पीछा नहीं छोड़ते, फिर लाखों सफलताके भी तो उदाहरण विद्यमान हैं, फिर उनके आधारपर विश्वास ही क्यों न किया जाय ? असफलताका कारण कोई त्रुटि ही समझी जाती है। किसी यन्त्रके एक छिद्र या कीलोंकी गड़बड़ी या कमी-वेशीसे वह व्यर्थ या हानिकारक हो सकता है। इसी तरह जो कार्य-कारण-भाव अपौरुषेय अतएव भ्रम-प्रमादादि स्पर्शसे शून्य, प्रामाणिक शास्त्रसे सिद्ध है, कतिपयस्थलीय व्यभिचारदर्शनमात्रसे उसका विघटन नहीं समझा जा सकता। जैसे वैज्ञानिक- निर्दिष्ट पद्धतिसे विपरीत किंचित् भी उलट-फेर होनेपर यन्त्र-संचालन और निर्माण व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक समझे जाते हैं, वैसे ही शास्त्र-निर्दिष्ट पद्धतिमें किंचित् भी गड़बड़ी होनेपर जप, पाठ, पूजा आदि धर्म बेकार या हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेमात्रसे ही उन शास्त्रोंका अप्रामाण्य या उन जप, पाठ, पूजाओंमें सर्वदाके लिये अश्रद्धा कदापि उचित नहीं। जब अनेक स्थलोंमें वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धतिसे काम करनेपर सफलता देखी जा चुकी है, तब तो स्पष्ट ही है कि जहाँ कहीं यन्त्रोंकी विफलता या हानिकारकता देखी जाय, वहाँ संचालन, निर्माणमें ही कर्तृ-क्रियादिकी विगुणता या अन्यान्य किसी प्रकारकी त्रुटिकी ही फल-बलसे कल्पना करना उचित है। इसी तरह जप, पाठ, पूजा आदि किन्हीं भी प्रामाणिक शास्त्रोक्त उपायोंको जब अनेक स्थलोंमें सफल होते देख रहे हैं तो कतिपय स्थलोंमें व्यर्थता देखकर फल-बलसे ही उनके अनुष्ठानमें या साधनोंमें या कर्ताओंमें अवश्य ही किसी प्रकारकी त्रुटि समझ लेनी चाहिये। चिकित्सकोंके शास्त्रोक्त अनेक उपाय कहीं व्यर्थ हो जाते हैं, साथ ही कहीं हानिकारक भी साबित होते हैं तो भी वे उपाय सर्वदा व्यर्थ और सर्वदाके लिये हानिकारक हैं, यह समझना भारी भूल है। किंतु यही समझना उचित है कि जब यह अनेक स्थलोंमें सफल होते हैं तो प्रयोक्ता या प्रयोगकी ही कोई त्रुटि होनेसे कहीं विफल होते हैं। इस तरह सहजहीमें समझा जा सकता है कि जब अनेक जगह पूजा, पाठ, जप आदिकी सफलता प्रत्यक्ष ही देखी जाती है, फिर भी कहीं सोमनाथ आदि स्थलोंमें यदि पूजादिकी व्यर्थता हुई तो इससे प्रयोक्ताओं या प्रयोगोंमें ही त्रुटिकी कल्पना कर लेनी चाहिये, न कि पूजादि उपायोंको ही सर्वदाके लिये व्यर्थ और हानिकारक मान लेना चाहिये। अध्यक्षों और पूजकोंके अत्याचारों, अनाचारों और मन्दिरोंके अपचारोंसे मूर्तिमेंसे देव-तत्त्व हट जाता है। अनुष्ठानोंमें, मन्त्रोच्चारणमें किसी तरहकी गड़बड़ी या अनुष्ठाताओंके आचार- विचारोंमें गड़बड़ीसे अनुष्ठान व्यर्थ और हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेसे ही सब अनुष्ठान वैसे ही नहीं समझे जा सकते। इसके सिवा जैसे दो मल्लोंके