भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९६ भक्तिसुधा अतः वह दृष्टादृष्टफलक है। शीतवातातुर पुरुष यदि गंगास्नान करे तो उससे जैसे अदृष्टमात्र ही फल होता है, दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है, वैसे ही राजसी, तामसी भक्तिमें सुखरूप दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है। गंगास्नान कर लेनेपर पुनः गंगामें क्रीड़ा करनेवालोंको जैसे दृष्टमात्र फल होता है, वैसे ही जीवन्मुक्तोंकी भक्ति दृष्टफलमात्रपर्यवसायिनी होती है— राजसी तामसी भक्तिरदृष्टफलमात्रभाक् । दृष्टादृष्टोभयफला मिश्रिता भक्तिरिष्यते ॥ शुद्धसत्त्वोद्भवाप्येवं साधकेष्वस्मदादिषु । दृष्टमात्रफला सा तु सिद्धेषु सनकादिषु ॥ दृष्टादृष्टफला भक्तिः सुखव्यक्तेर्विधेरपि । निदाघदूनदेहस्य गङ्गास्नानक्रिया यथा ॥ रजस्तमोऽभिभूतस्य दृष्टांशः प्रतिबध्यते । शीतवातातुरस्येव नादृष्टांशस्तु हीयते ॥ तथैव जीवन्मुक्तानामदृष्टांशो न विद्यते । स्नात्वा मुक्तवतां भूयो गङ्गायां क्रीडतां यथा ॥ तीव्र वातस्थित प्रदीप ज्वालाके समान रजस्तमोऽभिभूत शिशुपाल आदिकी स्वप्रकाशानन्दाकार भी मतिसन्तति सुख व्यक्त करानेवाली न हुई। प्रतिबन्धके नष्ट होनेपर सुखाभिव्यक्ति होती है। चित्तद्रुति होनेके कारण ही भक्ति होती है। उसके न होनेके कारण न तो वेन भक्त ही ठहरा, न उसे कुछ फल ही प्राप्त हुआ। शिशुपाल भगवान्की सत्ता मानता था, परंतु वेन भगवान्की सत्ता ही नहीं मानता था, वह नास्तिक था, इसलिये उसका भगवत्-सम्बन्ध ही नहीं हुआ, फिर चित्तद्रवता और भक्ति तो बहुत दूरकी बात है। सुखाभिव्यंजक होनेसे रजस्तमोविहीन भगवद्विषयक मति ही रति है। भगवद्विषयक मतिके समुच्छेदतारतम्यसे रतितारतम्य होता है। 'विरहे यादृशं दुःखं तादृशी दृश्यते रतिः।' मनुष्य और अधिकरणमात्रके भेदसे अनेक भेद होते हैं। उसमें भी वैकुण्ठ, मथुरा, द्वारका, वृन्दावन आदिके भेदसे तथा व्रज, वन, निकुंजादिके भेदसे प्रकाशभेद भी माना जाता है। पुनः शुद्ध, मिश्रित आदिके भेदसे अनेक भेद होते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि आदिमें जो विषय विस्तारसे कहे गये हैं, वे यहाँ सूत्रभूत कारिकाओंसे कहे गये हैं। विशेषतया वेदान्त, सांख्य, मीमांसादिशास्त्र एवं शास्त्राविरोधी युक्तियोंद्वारा सभी विषयोंका वर्णन किया गया है। अद्वैतसिद्धिकार श्रीमधुसूदनसरस्वतीमहाराजकी सिद्धान्ताविरोधिनी स्वारसिकी भक्ति थी, जैसा कि उन्होंने स्वयं ही गीताकी 'गूढार्थदीपिकासंग्रह' नामक टीकामें कहा है कि अद्वेष्टृत्व आदि गुण जैसे ज्ञानीके स्वभावसिद्ध होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन करना भी ज्ञानीका स्वभाव है—'अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' साधन, अभ्यास और परिपाकावस्थाके भेदसे 'तस्यैवाहं' मैं उसीका हूँ, 'ममैवासौ' वह मेरा ही है, 'सोऽहं' मैं वही हूँ—ये तीन तरहके भाव होते हैं। तीसरे भावके 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्', 'अहं ब्रह्म परं धाम', 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इत्यादि उदाहरण हैं। 'मामेकं शरणं व्रज' इत्यादि गीताके उपसंहारात्मक श्लोकका तात्पर्य भी अन्तिम भावना ही है। 'एकं' एक अद्वितीय त्रिविधभेदशून्य 'मां' मुझ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको 'शरणं' घटाकाशका महाकाशके समान, तरंगका जलराशिके समान आश्रय अथवा रक्षक निश्चित रूपसे जानो। 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति' इस श्रुतिके अनुसार प्रत्यगभिन्नता रूपसे विदित ब्रह्म ही अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचका अपनোদন करता है, इसीलिये वह रक्षक है। परब्रह्मकी प्रेमास्पदता परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न होनेपर ही प्रत्यक् आत्माकी पूर्णता एवं प्रत्यगात्मासे अभिन्न होनेसे परब्रह्मकी अपरोक्षता अनौपाधिक अनतिशय परप्रेमास्पदता सिद्ध होती है। यदि प्रत्यगात्मासे तटस्थ परमात्मा ठहरा तो उपर्युक्त बातें बन नहीं सकतीं। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) यह श्रुति प्रत्यगात्माके शेष रूपसे ही सबकी प्रेमास्पदता बतलाती है। अपने कल्याणके लिये भगवान्का भजन कड़वी गुडुचीके पान करनेके समान ही ठहरेगा,