भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भक्तिरसामृतास्वादन ६१७ क्योंकि स्वास्थ्यके लिये कड़वी गुडुची भी पी जाती है। फिर भगवान्‌में सातिशय ही प्रेम रहेगा निरतिशय नहीं, जब प्रत्यगात्माका स्वरूप भगवान्‌को माना जाता है, तभी भगवान्‌की निरुपाधिक परप्रेमास्पदता बन सकती है। 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इस श्रुतिने ब्रह्मकी अवेद्यतासे ही अपरोक्षता बतलायी है, जो कि प्रत्यगात्मासे भिन्न, तटस्थ ब्रह्मकी किसी तरह नहीं बन सकती। आत्मासे भिन्न पदार्थकी सिद्धि प्रमाणके अधीन ही होती है, स्वतः भासमान स्वारसिक अनतिशय प्रेमस्वरूप ही भगवान् हैं, इसीलिये श्रीशुकाचार्यने भगवान् श्रीकृष्णको सबका अन्तरात्मा बतलाया है— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इसीलिये ब्रह्मविद्वरिष्ठोंके भी चित्तमें हठात् उनकी स्फूर्ति होती है— यावन्निरञ्जनमजं पुरुषं जरन्तं सञ्चिन्तयामि सकले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः ॥ प्रकृत ग्रन्थकार श्रीमद्मधुसूदनसरस्वतीके भी निम्न- लिखित वचन हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्। पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत् किमपि तन्नीलं महो धावति॥२ अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥ इसी तरह श्रीशुक, सनकादि, शंकर, सुरेश्वर, पद्मपाद, चित्सुख, सर्वज्ञात्म, श्रीधरस्वामी आदि सहस्रों ब्रह्मविद्वरिष्ठोंको भी वैसा ही अकैटव प्रेम था। भगवान्‌ने स्वयं ही श्रीमुखसे 'एकभक्तिर्विशिष्यते' इन शब्दोंसे उपर्युक्त अर्थोंका समर्थन किया है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' इत्यादि श्रुतियोंने किसीको भी अनात्मा समझनेको अनर्थकारक माना है, फिर भगवान्‌को अनात्मा समझनेकी बात ही क्या? प्रेममें व्यवधान सहनकी क्षमता नहीं होती, इसीलिये दूरमें या व्यवहितमें स्वाभाविक स्वारसिक अकैटव प्रेम नहीं होता। इसीलिये भगवान्‌को सर्वान्तर परम सन्निहित या प्रत्यगात्मा कहा गया है— 'कैटवरहितं प्रेम न तिष्ठति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे भवति को जीवति॥' —यह प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌में अभेद श्रीअचिन्त्यकल्याणगुणगणाकर भूमा भगवान्‌की अघटितघटनापटीयसी सदसद्विलक्षणा, समस्त आश्चार्योंकी एकमात्र निवासभूमि, अनन्तशक्तिकी केन्द्रभूता मायाके प्रवाहमें पड़े हुए प्रपंचमें सूक्ष्म विचार करनेपर बुद्धिमानोंके लिये क्रमशः आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व ठहरता है। कोई आत्माको अणुपरिमाण, कोई मध्यम परिमाण तथा कोई विभु मानते हैं। विभुत्ववादियोंमें भी कोई आत्माको अचित्, कोई १. जिसके हाथोंमें वंशी सुशोभित है, जो नवनीरदसुन्दर है, पीताम्बर पहने है, जिसके होठ बिम्बाफलके समान लाल-लाल हैं, जिसका मुखमण्डल पूर्णचन्द्रके सदृश और जिसके नेत्र कमलवत् हैं, उस कृष्णसे परे कोई तत्त्व हो तो मैं उसे नहीं जानता। २. ध्यानके अभ्याससे जिनका चित्त वशमें हो गया है, वे योगी यदि उस निर्गुण और निष्क्रिय परमज्योतिको देखते हैं तो देखा करें। हमारे नेत्रोंको तो कालिन्दीतटविहारी नीले तेजवाला साँवरा ही सुख पहुँचाता रहे।