भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 708

६९८ भक्तिसुधा चित्परिणामी, कोई चिदचित्, कोई असंग और चित्स्वरूप मानते हैं। कोई वादी क्लेश, कर्म, विपाक एवं आशयसे अपरामृष्ट विशिष्ट आत्माकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभावता मानते हैं। यद्यपि इसीमें सद्वितीयता, चिदचिद्विशिष्टता, चिदचिद्भिन्नाभिन्नता रूप तीसरे पक्षमें भी स्वाभाविक भेदाभेद, औपाधिक भेदाभेद, अचिन्त्य भेदाभेद पक्ष और शुद्धाद्वैत, अद्वैतपक्ष भी होते हैं तथापि भक्तिरसायनकार अद्वैत सिद्धान्तानुसारी हैं। परमार्थतया भोक्ताकी आत्मा भगवान् ही हैं, ऐसा औपनिषद सिद्धान्त है। 'श्रीमद्भागवत' में भी कहा गया है कि वस्तुभूत तत्त्व वही है। सर्वविध भेदशून्य, स्वप्रकाश, अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वज्ञ तत्त्व कहते हैं। देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत परिच्छेदशून्य होनेसे वही ज्ञान अनन्त, अवेद्य होकर अपरोक्ष होनेसे स्वप्रकाश, अद्वितीय होनेके कारण सर्वोपद्रवविवर्जित होनेसे परमानन्दस्वरूप और त्रिकालाबाध्य होनेसे परम सत्य है। वही निरतिशय बृहत् होनेसे ब्रह्म, आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा, अचिन्त्य, अनन्त