भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

कहनेपर घटत्वावच्छिन्नप्रतियोगितानिरूपक निषेधकी ही अवगति होती है। दूसरी बात यह है कि ज्योतिष्मान् आदित्यस्थानीय भगवान्‌से यदि ज्योतिःस्थानीय ब्रह्म न्यून माना जाय तो वह ब्रह्म ही नहीं। 'बृहि वृद्धौ' धातुसे 'मनिन्' प्रत्यय होनेपर ब्रह्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है बड़ा (बृहत्)। संकोचक प्रमाण न होने तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस श्रुतिमें 'अनन्त' पद समभिव्याहारसे यही सिद्ध होता है कि निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। अतिशयताकी कल्पना करते- करते जहाँ वाचस्पतिकी मति भी परिश्रान्त हो जाय, इसके बाद निरतिशय बृहत्ता सिद्ध हो सकती है, अतः भगवान् हों या श्रीकृष्ण जिसकी निरतिशय बृहत्ता मानी जाय, वही ब्रह्म है। यहाँ इतनी विशेषता और समझ लेनी चाहिये कि उपर्युक्त मतमें आदित्यस्थानीय ज्योतिष्मान् भगवान्‌की किरणस्वरूप ज्योतिःप्रदेशमें अविद्यमानता रहेगी, अतः देशकृत परिच्छेद होनेसे अनन्तता नहीं बन सकती। हमारे मतमें भगवान् या श्रीकृष्णकी सर्वविध परिच्छेदशून्यता होनेके कारण निरतिशय बृहत्ता बन सकती है और अनुपचरित अद्वयता, अनन्तता, ब्रह्मता भी सम्पन्न हो सकती है।

निर्गुण और सगुणका स्वरूप

इसी तरह कहा जाता है कि 'भगवान् निर्गुण हैं' इस कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान्‌में प्राकृत गुणगण नहीं हैं। जैसे 'अकाय' का अभिप्राय प्राकृत कायराहित्यमात्र है, अप्राकृत काय तो उनके है ही। वैसे ही 'निर्गुण' शब्द अप्राकृत गुणगणका निषेधक नहीं है। यह भी ठीक नहीं, क्योंकि फिर तो निष्क्रियत्व, अव्रणत्व आदि शब्दोंका भी ऐसा ही अर्थ किया जायगा। फिर तो भगवान्‌में अप्राकृत क्रिया एवं अप्राकृत व्रण मानना पड़ेगा। यदि कहा जाय कि सगुण शब्द भी निर्गुणके समान आता है, अतः 'निर्गुण' पदका अर्थ प्राकृतगुणरहित किया जाता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि निष्क्रियत्वके समान सक्रियत्व शब्द भी आता है, अतः उपर्युक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा। इसलिये वस्तुतः निर्गुण ही भगवान् अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे अप्राकृत गुणगणोंको स्वीकार करते हैं, अतः वे सगुण कहे जाते हैं— 'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम्।' यद्यपि कहा जाता है कि हो सकता है कि धनवान् पुरुष धननिरपेक्ष हो, किंतु निर्धनकी धननिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है। इसी तरह सगुण भगवान् भले ही गुणनिरपेक्ष हों, किंतु निर्गुणकी गुणनिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है तथापि यह भी ठीक नहीं, क्योंकि भगवान्‌में गुण न तो कुछ अतिशयताका आधान कर सकते हैं, न कुछ विशेषता ही कर सकते हैं। अनाप्तकाम निर्धनको भले ही धनकी अपेक्षा हो, किंतु आप्तकाम, आत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम, निर्गुण भगवान् गुणनिरपेक्ष रहें, इसमें क्या आश्चर्य ? नित्य निरतिशय बृहद् ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्‌में गुणगणमहत्त्वातिशयका आधान, नित्य निरतिशय अनन्त आनन्दस्वरूपमें आनन्दातिशयका आधान तथा नित्यनिरस्तसमस्तानर्थ ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्‌में अनर्थ निर्वहण भी नहीं कर सकते। पर इन तीनोंको छोड़कर गुणका कोई चौथा उपयोग है नहीं, अतः गुणनिरपेक्ष निर्गुण भगवान् ही गुणोंकी गुणत्वसिद्धिके लिये उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। कौस्तुभमणिकी शोभाके लिये ही भगवान्‌ने उसे अपने श्रीकण्ठमें धारण कर रखा है—'कण्ठं च कौस्तुभमणेरधि- भूषणार्थम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२६) किन्हीं लोगोंका यह मत कि निराकारमें प्रेमास्पदता होती ही नहीं, यह अत्यन्त अज्ञानमूलक है, क्योंकि सगुणप्राप्तिजन्य सुख भी निराकार ही है, फिर उसमें प्रेम कैसे होता है ? श्रीधरस्वामी आदिकोंने भी 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' (श्रीमद्भा० १।२।११) इस श्लोकमें ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्‌में कुछ भी विलक्षणता नहीं मानी। ऐसा मानना न केवल निर्मूल है, अपितु शास्त्र तथा युक्तिविरुद्ध भी है। कुछ लोगोंका कहना है कि नारदजीको आकाशसे