भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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उतरते हुए देखकर जब वे दूर थे, तब द्वारकावासियोंने कल्पना की कि यह कोई महातेजःपुंज है। कुछ और समीप आनेपर शरीरवान् प्राणी समझा और अधिक समीप आनेपर अवयवकी स्पष्ट प्रतीतिसे कोई पुरुष है ऐसा जाना। अधिक निकट होनेपर उन्हें नारदजीका स्पष्ट ज्ञान हुआ— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) इसी तरह दूर रहनेपर ब्रह्म और समीप होनेपर परमात्मा और अत्यन्त समीप होनेपर भगवान्का ज्ञान होता है। किंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि सर्वान्तरतम ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्में सामीप्य- असामीप्य निबन्धन तारतम्य नहीं हो सकता। अतः निष्कर्ष यह निकला कि एक ही नित्य, निरतिशय बृहत्तम ब्रह्म आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा और गुणगणसेव्य होनेसे भगवान् कहा जाता है। सकल सच्छास्त्रतात्पर्यगोचर, अशेषविशेषातीत, निर्गुण, निराकार, सच्चिदानन्दघन अपनी अचिन्त्य, मंगलमय, दिव्यशक्तिसे अनन्तकल्याणगुणगणाकर, अनन्तकोटि- कन्दर्पसुन्दर, शक्रशतकोटिविलासशाली, नभःशत- कोटिमहाविस्तारशाली, वायुशतकोटिविपुलबलशाली, रविशतकोटिप्रखरप्रकाशशाली, शशिशतकोटिसुशीतल, कालशतकोटिदुस्तर, अमितकोटितीर्थपावनाभिधान, मेरु- शतकोटिनिश्चल, समुद्रशतकोटिगम्भीर, कामधेनुशत- कोटिकामपूरक, शारदाशतकोटिज्ञानप्रद, विधिशतकोटि- सृष्टिनिपुण, विष्णुशतकोटिपालक, रुद्रशतकोटिसंहारक, धनदकोटिशतैश्वर्यसम्पन्न, मायाकोटिशत-अघटित- घटनापटीयान्, शेषशतकोटिधारक, भगवान्की अनन्त- कोटि आदित्यगणोंकी प्रकाशप्राखर्यादिमेंसे भी वैसे ही उपमा नहीं दी जा सकती, जैसे कि अनन्तकोटि खद्योतोंसे आदित्यकी उपमा। इसीलिये अशेष- विशेषातीत, अनन्तकल्याणगुणगणाकर भगवान्की स्तुतिमें ब्रह्मादिकोंका भी असामर्थ्य सुना जाता है। भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी भक्तकल्पपादप भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी ही हैं। सर्वशास्त्रतात्पर्यविषय कर्म-उपासना-तत्त्वज्ञानादि- समाराध्य भगवान् ही मुक्तोपसृप्य हैं, यह तत्तत्स्थलोंमें कहा ही गया है—'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये', (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठ० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३), 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४), 'आत्मक्रीड आत्मरतिः' (मुण्डक० ३।१।४) इत्यादि श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें मुमुक्षु और भक्तोंके लिये भगवच्छरणागति ही बतलायी गयी है। उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विध लिंगोंद्वारा 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५), 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य रसात्मक, प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्ममें ही पर्यवसित होता है। अन्य विषयक अनुरागाधीन विषयता, प्रेमकी गौणता तथा अनन्यविषयक अनुरागाधीन विषयता ही प्रेमकी