भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ स्वात्मानन्द ही अभिव्यक्त होता है। विषयनिबन्धन एवं वृत्तिरोधके क्षणिक होनेसे सुखको वैषयिक, क्षणिक आदि कहा जाता है। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्तिरीय० २।९) इत्यादि श्रुतियोंद्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमूलक परिणामके कारण दुःखसे अमिश्रित सुख होनेसे ब्रह्मात्म सुख प्राप्ति कही गयी है। इसीलिये आत्मा ही रस है, ऐसा सिद्धान्त है। यहाँपर आनन्द शब्दसे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म ही विवक्षित है; क्योंकि उसीमें उपक्रमोपसंहारादिद्वारा रसात्मताबोधक वचनोंका तात्पर्य निश्चित होता है। अग्निके अंश विस्फुलिंगके समान या सिन्धुके अंश बिन्दुके समान विशिष्ट, सोपाधिक, चिदाभास, चित्प्रतिबिम्ब, चित्कण या समवच्छिन्न जीव निरतिशय रसरूप नहीं; क्योंकि वहाँ पूर्णानन्दता तिरोहित है। तटस्थ परब्रह्मपरमात्मा भी निरतिशय सुखरूप नहीं, क्योंकि यदि वह प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप न हुआ तो साक्षादपरोक्ष भी नहीं रहेगा, फिर उसकी स्वप्रकाशानन्द- रसरूपता तो अत्यन्त दूर है। इसलिये न चाहनेपर भी प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी ही रसरूपता माननी पड़ेगी। भगवान्की तीन शक्तियाँ किन्हीं लोगोंने सच्चिदानन्दघन भगवान्की स्वरूपशक्ति, तटस्थशक्ति और बहिरंगशक्ति—ये तीन शक्तियाँ मानी हैं। स्वरूपशक्तिमें भी वे सन्धिनीशक्ति, संवित्शक्ति और ह्लादिनीशक्तिके भेदसे तीन शक्तियाँ मानते हैं। इस पक्षमें भी यह बात बन जाती है; क्योंकि अचिदात्मक मायाकी बहिरंगता और सोपाधिक जीवकी तटस्थता तो स्पष्ट ही है। सन्धिनी आदि तीनों शक्तियाँ सच्चिदानन्दकी स्वरूपभूता ही हैं। यद्यपि स्वप्रकाश सत् ही चित्, अत्यन्ताबाध्य चित् ही सत्, सर्वोपद्रवविवर्जित सच्चित् ही आनन्द, अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश आनन्द ही सच्चित् है, इस तरह स्वरूपमें कुछ भी भेद नहीं है, अतः उसमें जब शक्तिकी ही कल्पना नहीं की जा सकती, तब फिर उसके तीन भेदकी तो बात ही क्या ? तथापि अचिन्त्य अनिर्वाच्य, भगवदीय दिव्यलीलाशक्तिके योगसे लीलाविशेष विकासके लिये उक्त भेदोंका उपपादन किया जा सकता है। जैसे जलराशिकी अपेक्षा फेन बहिरंग और तरंग तटस्थ (फेनकी अपेक्षा अन्तरंग होते हुए भी स्वरूपकी अपेक्षा बहिरंग होनेसे तरंगमें तटस्थता है।) और स्वरूपभूत होनेसे माधुर्य ही मुख्य अन्तरंग है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धु भगवान्में भोग्य जड़ प्रपंच मूलभूत माया बहिरंग, चिल्लक्षण जीव तटस्थ और स्वरूपभूत माधुर्यादि अन्तरंगभाव शक्तिशब्दसे भी कहे जाते हैं। सत्त्व सन्धायक है, अतः उसमें सन्धिनी, चित्प्रकाशक है, अतः उसमें संवित् और आनन्द आह्लादक है, अतः उसमें आह्लादिनी शक्तिकी कल्पना होती है। प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी रसरूपता माननेपर ही यह सब कल्पना बन सकती है। रससिन्धुका बिन्दु भी रसस्वरूप ही है। किंतु परमानन्दताके आवृत्त होनेसे वह अल्पानन्द एवं साकांक्ष होता है। इसी तरह सोपाधिक आत्मा भी रसस्वरूप होकर रसप्रेप्सु होता है। इसीलिये शास्त्रोंने इस तत्त्वका निरूपण किया है। वेदान्तवेद्य, निर्विशेष भगवद्रूप ही रसस्थायीसे विशिष्ट होकर वर्णित होता है। भगवद्गुणगणश्रवणजन्य मानस वृत्तिकी द्रवतामें भगवदाकारता प्रविष्ट होनेपर विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारीके संयोगसे रसरूपता होती है। यहाँ भगवान् ही आलम्बन-विभाव, तुलसी-चन्दनादि उद्दीपन- विभाव, नेत्रविक्रियादि अनुभाव और निर्वेदादि व्यभिचारी भावसे त्यज्यमान भगवदाकारतारूप रस स्थायी भाव ही परमानन्द-साक्षात्कारात्मक प्रादुर्भूत होता है। वही भक्तियोग एवं दुःखासंसृष्ट सुखरूप परम पुरुषार्थ है। यदि स्वभावतः कठिन लाक्षा तापक अग्नि आदि द्रव्यके सम्बन्धसे जलके समान द्रुत हो जाय और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे छान ली जाय, फिर उसमें कोई रंग छोड़ दिया जाय तो वह रंग उस लाक्षाके सर्वांशमें प्रविष्ट होकर स्थिर हो जाता है। फिर कठोर या द्रुत होनेपर कभी भी रंग लाक्षासे पृथक् नहीं होता, वैसे ही भगवद्भावनासे भावित द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणमें भगवान्के प्रविष्ट होनेपर अन्यवस्तुग्रहणकालमें भी भगवान्का भान होता ही है। प्रपंचभानसहित भगवद्भानका