भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 712, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदाहरण है— खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्। सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४१) प्रपंचमिथ्यात्वभानसहित भगवद्भानका उदाहरण 'तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपम्'। (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) आदि हैं। प्रपंचभानरहित भगवद्भानका उदाहरण है— प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१८) विशेषतः विप्रलम्भ शृंगारमें द्रवावस्थाप्रविष्ट आलम्बनमय ही समस्त वस्तुओंका भान होता है। इसका उदाहरण है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यंङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य । हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः ॥ (अमरूशतक) इसी तरह भगवद्विषयक काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक, दया आदि तापक भावोंमेंसे किसीके भी सम्पर्कसे चित्तरूप लाक्षा गंगाजलप्रवाहके समान द्रुत हो और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे वह क्षालित हो (छान ली जाय) तो फिर उसमें सर्वांशप्रविष्ट परमानन्द- स्वरूप भगवान् स्थायी भाव बनकर रसस्वरूप हो जाते हैं। द्रवावस्थामें प्रविष्ट विषयाकारता (भगवदाकारता)- के कभी भी पृथक् न होनेके कारण वहाँ मुख्य स्थायी शब्दका प्रयोग होता है। ऐसा होनेपर ही कर्तुमकर्तुं अन्यथाकर्तुंसमर्थ भगवान् भी यदि स्वयं वहाँसे हटना चाहें तो नहीं हट सकते, उनकी सर्वशक्तिमत्ता भी कुण्ठित हो जाती है। इसीलिये कहा गया है— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) यहाँ 'प्रणय' शब्दसे द्रवावस्था ही विवक्षित है। ऐसे अन्तःकरणसे चाहनेपर भी भगवान् नहीं निकल सकते। इसीको लक्ष्य करके भक्त उनसे कहता है कि यदि हृदयसे निकल जाओ तो आपका पुरुषार्थ जानूँ—'हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते।' ब्रजसीमन्तिनीजन अपने हृदयसे भगवान्को निकालना चाहती हैं, पर सफल नहीं होतीं। निश्चित करती हैं कि अब उनसे सख्य नहीं करेंगी, फिर भी उनकी चर्चाको दुस्त्यज समझती हैं। किसी सखीने भगवान्की चर्चा छेड़ दी तो दूसरी सखीने तत्काल रोककर कहा— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् यदि हमारी प्यारी सखी (राधा)-को क्षणमात्र भी सुखी देखना चाहती हो तो मोहनकी चर्चा न कर कोई और कथा सुनाओ। यह देखकर किसी मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि योगीन्द्र, मुनीन्द्र धारणा, ध्यान आदिके द्वारा विषयोंसे मनको हटाकर भगवान्में लगाना चाहते हैं और मन हट-हटकर विषयोंमें चला जाता है; किंतु यह मुग्धा मनको भगवान्से हटाकर विषयोंमें लगाना चाहती है। जिन भगवान्की क्षणमात्र स्फूर्तिका लिये योगी सदा उत्कण्ठित रहा करते हैं, यह मुग्धा उनको हृदयसे निकालकर बाहर करना चाहती है— प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनो धित्सति बालासौ विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः । यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति ॥ बिम्बप्रतिबिम्बभाव यदि कहा जाय कि फिर तो आलम्बन और स्थायीभाव एक ही हो गया तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि व्यवहारसिद्ध ईश-जीवके भेदके समान ही