भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 713, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिम्बप्रतिबिम्बके भावका भेद यहाँ भी है। बिम्ब ही मनकी द्रवावस्थामें पड़कर प्रतिबिम्ब कहा जाता है। 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रपंचकी आनन्दात्मक ब्रह्मैक्योत्पादन निमित्तिकता सिद्ध होती है। कान्तादि विषय भी कारणानन्दरूप ही हैं, मायाकृत आवरण और विक्षेपके कारण उनकी अखण्डानन्दरूपसे प्रतीति नहीं होती। अकार्योंका भी कार्याकाररूपसे भान होता है— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद् विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (श्रीमद्भा० २।९।३३) अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है स्वप्रकाशस्वरूपसे भासमान चैतन्य ही अज्ञात है, जड नहीं। जडके स्वतः आभासमान होनेसे वहाँ आवरणकी कोई अपेक्षा ही नहीं है। कान्तादिविषयक भानोंके प्रामाण्यके लिये अज्ञात कान्ताद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक आवरणके हट जानेपर कान्ताद्यवच्छिन्न- रूपसे परमानन्दरूप उपादान चैतन्यरूपका ही भान होता है, किंतु अनवच्छिन्न स्वरूपका भान नहीं हुआ, इसीलिये सद्योमुक्ति या स्वप्रकाशत्व-भंगकी प्रसक्ति नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही द्रुत अन्तःकरणकी वृत्तिमें उपारूढ़ होकर स्थायी भाव और रसस्वरूप हो जाता है। कान्तादि लौकिक रस भी परमानन्दरूप ही है। फिर भी जड़के सम्पर्कसे उसमें न्यूनता है। भक्तिमें अनवच्छिन्न चिदानन्दघन भगवान्का स्फुरण होनेसे उसकी परमानन्दरूपता स्फुट ही है। जो लोग कहते हैं कि 'रसः ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् रसस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करके ही यह जीव आनन्दित होता है, इस वाक्यमें अयं पदार्थकर्तृक लाभकर्म ही रस शब्दसे कहा गया है। भगनावरण चैतन्य ही अयं पदार्थ है और वही कर्म भी, फिर कर्ता और कर्म दोनोंकी एकरूपता हो गयी। किंतु यह ठीक नहीं, क्योंकि सावरणचैतन्य 'अयम्' पदार्थ (कर्ता) और निरावरणचैतन्य कर्म पदार्थ है, इस औपाधिक भेदके माननेसे कोई भेद नहीं आता। यदि कहा जाय कि स्वप्रकाशवादमें आवरणभंगसे ही आनन्द प्राप्त हो जायगा, रसको पाकर आनन्दित होता है, यह कहना व्यर्थ है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्यकी आवरणभंगमात्रसे ही रसरूपता हो जानेपर भी तत्तदवच्छिन्न चैतन्योंमें तत्तदवच्छेदकगत दोष- गुणोंके मिश्रणसे आवरणभंगमात्रसे ही आनन्दप्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिये विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभावके संयोगसे अभिव्यक्त स्थायीभाव ही सभ्य और अभिनेयका भेद हटाकर सभ्यमें ही रहता हुआ परमानन्द-साक्षात्कारद्वारा रसस्वरूप हो जाता है, यही रसज्ञोंकी मर्यादा है। तात्पर्य यह कि सभी शास्त्रोंके महातात्पर्य-विषय परमात्मामें ही सच्चिदादि, रसानन्दादि शब्दोंकी साक्षात् प्रवृत्ति है तो भी जैसे विषयविशेषमें सत्ता शब्द या चैतन्य शब्द प्रयुक्त होता है, वैसे ही रसानन्दादि शब्दोंका भी विषयविशेषमें प्रयोग हो सकता है। इससे सिद्ध हुआ कि स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चैतन्यमें ही रस शब्दका प्रयोग होता है। जबतक अन्तःकरणवृत्तिकी सात्त्विकी द्रवता नहीं होती, तबतक रस, आनन्दादिकी अनुभूति भी नहीं होती। इसीलिये उपेक्ष्य एवं द्वेष्य विषयोंमें भग्नावरण चैतन्य रहनेपर भी आनन्दका अनुभव नहीं होता। इसीलिये यह भी कहा जा सकता है कि यह रससिन्धुबिन्दुस्थानीय सोपाधिक जीव अनवच्छिन्न रससिन्धु स्थानीय परमात्माको या स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण तदंशभूत चित्को पाकर आनन्दित होता है। फिर तो 'सावरण अनावरण होकर आनन्दित होता है' यह भी कहना चाहिये था, 'रसको पाकर आनन्दित होता है' यह कहना व्यर्थ ही रहा। यह पक्ष भी ठीक नहीं। नित्य प्राप्त, विस्मृत ग्रैवेयक और मिथ्या सर्पादिकोंमें प्रेप्सा-परिजहीर्षा देखी जाती है