भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर लाभ-परिहार-प्रयोग भी देखा जाता है। इसी तरह आवरणभंगसे प्रेप्सा निवृत्ति होनेपर प्राप्तिव्यवहार भी हो सकता है। प्राकृत पंचकोशातीत स्वरूप लक्षणलक्षित प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही रस है। उसीको पूर्ण या अंशरूपसे पाकर यह सोपाधिक जीव आनन्दित होता है। 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- जीवन्ति॥', (बृहदारण्यक० ४।३।३२) 'एष ह्येवा- नन्दयति' इत्यादि श्रुतियाँ लौकिक आनन्दको भी रसस्वरूप परमात्माका ही अंश बतला रही हैं। साधारण अब्रह्मवित् पुरुषोंको अनवच्छिन्न ब्रह्मात्मक रसकी प्राप्ति तो होती नहीं, अतः यथायोग्य ही सम्बन्ध लगाना चाहिये। 'रसो वै सः', 'रसो ह्येव' इन दोनों श्रुतियोंमें अनवच्छिन्न स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चिदात्मक पारिभाषिक तदंशभूत ही रस लिया जाता है। द्रवत्व स्थायीभावानापेक्ष महावाक्यजन्य अपरोक्ष ब्रह्माकारवृत्तिमें आवरण-भंगसे अनवच्छिन्न ब्रह्मरूपसे ही रसका लाभ होता है। इसी तरह कान्ताद्यवच्छिन्नरूपसे उपादान ब्रह्मचैतन्यकी भी स्थायी भावापत्ति होनेपर पारिभाषिकावच्छिन्न रसका लाभ होता है। इसलिये उत्तरमीमांसामें रसशास्त्र गतार्थ नहीं, किंतु स्थायीभावादिविशिष्ट रसके प्रतिपादनके लिये रसशास्त्र पृथक् अपेक्षित है। आचार्य श्रीमधुसूदनजी सरस्वती— व्यक्तित्व एवं कृतित्व 'भक्तिरसायन' का आस्वादन कराया जा चुका है। उसके रचयिता श्रीस्वामी मधुसूदनसरस्वतीजीके सम्बन्धमें भी कुछ जान लेना चाहिये। ऐसा कोई ग्रन्थ अपेक्षित था, जिसमें ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही भक्तितत्त्वका वर्णन किया गया हो। इसी न्यूनताकी पूर्ति श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भगवद्भक्तिरसायन' बनाकर की। इनका जन्म पूर्व बंगालमें फरीदपुरके पास कोटालीपाड़ा ग्राममें श्रीरामचन्द्र भट्टाचार्यके वंशमें हुआ था। इनके पिताका नाम पुरन्दर मिश्र और इनका नाम कमलनयन था। इन्होंने नवद्वीपमें श्रीहरिराम तर्कवागीशसे न्यायशास्त्रका अध्ययन किया था। श्रीविश्वेश्वरसरस्वतीसे संन्यास-दीक्षा ग्रहणकर बहुत दिनतक काशीमें निवास किया था। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकी रामायणकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें नहीं हो रही थी। किसी विद्वान्ने उन्हें सलाह दी कि यदि श्रीमधुसूदनसरस्वती इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा करें तो सभी विद्वान् आपकी रामायणका आदर करेंगे। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपनी रामायण श्रीमधुसूदन- सरस्वतीके पास भेज दी। छः महीनेतक जब रामायण नहीं लौटी, तब श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपना शिष्य रामायण ले आनेके लिये भेजा। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने ग्रन्थका अभिनन्दन करते हुए ऊपर निम्नलिखित श्लोक लिख दिया— आनन्दकानने ह्यस्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः। कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥ कभी श्रीमधुसूदनसरस्वती श्रीवृन्दावनधाम पधारे। वहाँ एक ब्राह्मण बहुत दिनसे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तप कर रहा था। उसे स्वप्नमें भगवान्ने आदेश दिया कि मधुसूदनसरस्वतीके पास जाओ, वहाँ दर्शन होगा। वह ब्राह्मण श्रीमधुसूदनसरस्वतीके पास जाकर देखता है कि भगवान् उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खा रहे हैं। उसने स्वयं उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खाना चाहा, पर श्रीमधुसूदनसरस्वतीने मना किया कि 'संन्यासीका अन्न निषिद्ध है।' उस ब्राह्मणने कहा कि 'मैं तो भगवान्का प्रसाद लेना चाहता हूँ, संन्यासीका अन्न नहीं।' इनके द्वारा बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थ हैं—(१) अद्वैतसिद्धि, (२) वेदान्तकल्पलता, (३) अद्वैततत्त्वरक्षण, (४) श्रीमद्भागवत टीका, (५) श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्या—गूढार्थदीपिका, (६) संक्षेप शारीरिक व्याख्या सारसंग्रह, (७) सिद्धान्तबिन्दु, (८) शिवमहिम्नस्तोत्रकी हरिहरपरा टीका, (९) बोपदेवकृत हरिलीलाकी टीका, (१०) भगवद्भक्ति- रसायन। इस अन्तिम ग्रन्थके प्रथम उल्लासकी टीका स्वयं ग्रन्थकारने की है। यद्यपि शेष दो उल्लासोंकी