भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०५ टीका भी अन्य विद्वानोंने लिखी है, किंतु ग्रन्थकार- सिद्धान्तके भक्तद्वारा टीका लिखी जाय, इसकी आवश्यकता थी। भगवान् भूतभावन विश्वनाथकी कृपासे वेदान्तितिलक श्रीदामोदरशास्त्रीने विविध शास्त्रोंके तात्पर्यको अभिव्यक्त करनेवाली, ग्रन्थकार- सिद्धान्तका सर्वथा अनुसरण करनेवाली 'भक्तिरस- स्रोतस्विनी' नामक टीका और टिप्पणी बनायी। वह विद्वानोंको आनन्दित करनेवाली होगी, ऐसी आशा है। क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? विविध शंकाओंके युक्तियुक्त शास्त्रोक्त समाधान एक बार एक सज्जनने प्रश्न किया और कहा—'आज चार मुखके ब्रह्मा, छः मुखके षडानन, हजार मुखके शेष भी यदि कहें कि माला जपनेसे सुख-शान्ति होगी तो भी दुनिया इस बातको नहीं मान सकती, जबकि पूजा-पाठ और माला-जप होते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट ही गया, काशीविश्वनाथको पलायन करना ही पड़ा। आज भी सब देशोंकी अपेक्षा यहाँ अधिक धर्म होता है, यहाँ लाखों साधु अपना समय निरन्तर भजनमें ही लगाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों गृहस्थ भी भजन करते हैं। बड़े-बड़े मठ-मन्दिर करोड़ोंकी सम्पत्तियोंसे भरपूर हैं। गणितज्ञोंने गम्भीर विवेचन करके यह निश्चय कर लिया है कि हर एक व्यक्तिके पीछे पौने तीन घण्टेका भजन पड़ता है। इस तरह प्रति व्यक्तिके पीछे दो आनेकी आय और उसमेंसे डेढ़ पैसाका दान पड़ता है। इस तरह सम्पूर्ण देशोंकी अपेक्षा यहाँका धर्म, दान और भजन अधिक है। यदि इनका सदुपयोग हो (धर्मादिकी सम्पत्तियोंका सदुपयोग हो) तो कितनी ही यूनिवर्सिटियाँ चल सकती हैं। आजकी दुनिया धर्मसे ऊब गयी है, अतः आज 'टन-टन', 'पों- पों' से काम नहीं चलेगा। लोगोंको धार्मिक बननेका उपदेश करनेके पहले वर्तमान स्वरूप और उसके परिष्कारकी ओर ध्यान देना होगा।' वस्तुतः ऐसी अनेकों शंकाओंका मूल कारण है, अपने धर्म, कर्म, सभ्यता एवं संस्कृतिसे सम्बन्ध रखनेवाले शास्त्रोंका अध्ययन न करना, उसके विपरीत इतिहासों, साहित्योंका अभ्यास और विपरीत वातावरणमें पलना। जब धर्मके स्वरूपपर हम विचार करते हैं तो मालूम होता है कि धर्म केवल माला जपना ही नहीं बतलाता, किंतु वह तो अधिकारानुसार सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सब प्रकारके कर्तव्योंको सोच-समझकर यथायोग्य काम करनेको कहता है। अतः इस प्रश्नका अवकाश ही नहीं रहता कि जब घरमें आग लगी हो तो पानी ढूँढ़कर बुझानेका प्रयत्न करना चाहिये, केवल 'राम- राम' कहनेसे काम नहीं चल सकता। परंतु यहाँ भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि घरमें आग लगनेपर 'राम-राम' कहते बैठे रहना सबसे हो भी नहीं सकता। जब 'राम-राम' जपते हुए भी जल, अन्न, वस्त्रकी आवश्यकता प्रतीत होती है तो घरकी आग बुझाये बिना रहा भी कैसे जा सकता है? हाँ, आग बुझानेके लिये अन्यान्य उपायोंको काममें लाते हुए यदि 'राम-राम' कहता रहेगा तो ईश्वर-कृपासे आग शीघ्र ही बुझ भी सकती है। विपरीत भावनासे, प्रचण्ड वायुसे आग अधिक उत्तेजित भी हो सकती है, परंतु जिसे पूर्ण विश्वास है, वह 'राम-राम' के सहारे भोजन- पानादिकी भी परवाह नहीं करता। जिसके मनमें घरमें आग लगनेपर भी नामका भाव दिखायी देता है, उसकी आग भगवत्कृपासे अवश्य बुझ जायेगी। परंतु वैसी धारणा और योग्यता न होनेपर भी जो भोजन-पान-व्यवहारादि कार्योंमें तत्पर रहते हुए