भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०६ भक्तिसुधा भी समाज तथा राष्ट्रके हितमें नहीं प्रवृत्त होते हैं; किसी भी धार्मिक, सामाजिक कार्योंके अवसरपर केवल राम-नामका सहारा पकड़ते हैं। वे तो योग्यता और अवसरको न सोचकर एक सत्सिद्धान्तको केवल कलंकित ही करनेका प्रयत्न करते हैं। वैराग्यके स्थानमें राग, रागके स्थानमें वैराग्य, प्रवृत्तिके स्थानमें निवृत्ति और निवृत्तिके स्थानमें प्रवृत्ति अनुचित है, हानिकर है। नीकीहू फीकी लगत, बिन अवसरकी बात। जैसे बरनत युद्धमें, रस सिंगार न सुहात॥ परंतु यदि दूसरा उपाय दृष्टिगोचर ही न हो, तब तो सिवा भगवान्के सहारेके और चारा ही क्या है? इसीलिये तो जहाँ एक परमविश्वासी उच्चकोटिके भगवद्भक्तके लिये भगवद्भजन ही सर्वाभीष्टपूरक है, वैसे ही एक अत्यन्त आर्त या अर्थार्थी एवं सर्वसाधनविहीनका एकमात्र भगवान् ही सहारा है। तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य ज्ञानी भक्त स्वभावसे ही भगवान्को भजते हैं। जिज्ञासु ज्ञान- प्राप्त्यर्थ भगवान्को भजते हैं। अर्थार्थी, आर्त अपनी अर्थ-प्राप्ति और आर्तिनिवृत्तिके लिये परमेश्वरको भजते हैं। किसी भी कामनावाला व्यक्ति अपनी अभीष्टपूर्तिके लिये तत्तत् उपायोंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनकी सफलताके लिये परमेश्वरकी आराधना करता है। जिज्ञासु भगवच्चरण-पंकज- समर्पण-बुद्ध्या धर्मोंका अनुष्ठान करता है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करता है। आर्त, अर्थार्थी शास्त्रके अनुसार नैतिक, आर्थिक उपायोंका प्रयोग करता है, फिर भी 'मामनुस्मर युध्य च' (गीता ८।७)-के अनुसार अपने अस्त्र-शस्त्रबलका गर्व, बुद्धि और बाहुबलके घमण्डको छोड़कर, ईश्वरका आश्रयण करना पड़ता है; क्योंकि ईश्वरके अनुकूल होनेपर ही सम्पूर्ण लौकिक उपायोंकी सफलता होती है। भगवदुपेक्षित प्राणीके लिये सम्पूर्ण उपाय भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसीलिये माता-पिताके द्वारा अनेक उपचारोंसे लालन-पालन करते रहनेपर भी बालकोंकी मृत्यु देखी जाती है। चिकित्सकोंके अनेक उपचार करनेपर भी रोगी मरते दिखते हैं। अतएव— बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः। (श्रीमद्भा० ७।९।१९) मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजना॥ मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥ (रा०च०मा० ३।२।६-८; ५।२३।५-६) अतः साधन-सम्पन्नोंको भी श्रीभगवान्का आश्रयण आवश्यक है। फिर तो जो साधन-विहीन हैं, उनके लिये तो सिवा भगवान्के और सहारा ही क्या है? जैसे एक वीतराग तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य केवल भगवान्के ही सहारे रहता है, उसके सम्पूर्ण योगक्षेमका भगवान् ही निर्वाह करते हैं— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता ९।२२) अनन्य भावनासे भगवान्की आराधनामें तत्पर प्राणियोंका अप्राप्त-अभीष्टप्राप्तिरूप योग और प्राप्तरक्षणरूप क्षेम श्रीभगवान् ही पूरा करते हैं। वैसे ही साधन-विहीन विश्वासी आर्त-अर्थार्थीके भी एकमात्र भगवान् ही सहारा हैं। अतः उसके भी योग-क्षेमको भगवान् ही वहन करते हैं। परंतु भारतकी स्थिति तो आज उससे भी अधिक चिन्तनीय है। वह तो आज आत्माराम कृतकृत्य नहीं, निष्काम मुमुक्षु नहीं, साधन-सम्पन्न आर्त एवं अर्थार्थी नहीं, इतनेपर भी भगवद्विश्वासी नहीं अर्थात् आर्त-अर्थार्थी होनेपर भी आर्तिनिवृत्ति और अर्थप्राप्तिके लिये अपेक्षित साधनोंसे भी रहित है। ऐसी स्थितिमें भी निराश्रय निष्कपटभावसे भगवान्को पुकारनेसे काम चल सकता था, परंतु इस समय भगवान्से विश्वास