भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

भक्तिरसामृतास्वादन ६९५

सकती है। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में बतलाया गया है कि भक्त लोग प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको जानकर अतिशयप्रीतिसे अभिसन्धिविहीन होकर आहार्यज्ञानद्वारा भेदभावकी कल्पना करके अत्यन्त तत्परतासे स्वभावतः भगवान्‌में स्वारसिकी भक्ति करते हैं— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्। स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ आहार्यज्ञानद्वारा व्यामोहप्रसक्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि भगवान् सत्यके भी सत्य हैं। जैसे अराजाको राजा बनानेवाला राजराज कहा जाता है, वैसे ही भगवान् असत्यको सत्य बनाते हैं अर्थात् पारमार्थिक सत्यकी अपेक्षा किंचित् न्यूनसत्ताका एक और सत्य माना जाता है, जो भजनोपयोगी है। अतः पारमार्थिक अद्वैत सिद्धान्त ज्यों-का-त्यों रहता है। कहा भी गया है कि पारमार्थिक अद्वैत ज्ञान होनेपर यदि भजनोपयोगी द्वैत मानकर भगवान्‌में भक्ति की जाती है तो ऐसी भक्ति सैकड़ों मुक्तियोंसे भी कहीं बहुत अच्छी है। प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मका विज्ञान होनेके पहले द्वैत बन्धनका कारण है, किंतु विज्ञानके बाद भेद- मोहके निवृत्त हो जानेपर भक्तिके लिये भावित द्वैत अद्वैतसे भी बहुत अच्छा है— पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं भावितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ गाढ़ानुराग आलिंगनादि-रसास्वादप्रवीण पतिव्रता नायिका जैसे रसविशेषविकासके लिये घूँघटकी ओटसे अपने प्रियतमका निरीक्षण करती है, वैसे ही तत्त्व- साक्षात्कारसम्पन्न अभेदानुभवी विद्वान् भी रसविशेष- विकासके लिये भेदभावसे ही भगवान्‌की समर्चा करना चाहते हैं— विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ कान्ताका प्रियतमके वक्षःस्थलपर विलासपूर्ण विहरण या पादयुगलकी सेवा, जैसे बराबर है, वैसे ही ज्ञानीकी तत्त्वनिष्ठा और भगवत्पूजा दोनों बराबर हैं— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विरहतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे प्रातिभासिक प्रपंचकी अपेक्षा घटादि सत्य एवं स्वकारण मृदादिकी अपेक्षा असत्य होते हैं या मृदादि भी अपने कारणकी अपेक्षा असत्य होते हैं, वैसे ही पारमार्थिक सत्ताकी अपेक्षा स्तरभेदसे कुछ न्यून सत्तावाला अपारमार्थिक सत्य है। यही सत्ता भगवल्लीला-परिकरकी है, इसलिये सिद्धान्ततः अद्वैत बना ही रहता है। चित्द्रुतिसे भक्तिमें भेद चित्तद्रुतिके कारण अनेक हैं। उन्हींके भेदसे भक्तिमें भेद होता है—'चित्तद्रुतेः कारणानां भेदाद्भक्तिस्तु भिद्यते।' शरीरसम्बन्ध-विशेषकी स्पृहा होनेपर सन्निधान-असन्निधान-भेदसे काम दो प्रकारका होता है। उससे द्रुत चित्तमें श्रीकृष्णनिष्ठता ही सम्भोग-विप्रलम्भाख्य रति है। इसी तरह क्रोध, स्नेह, हर्षादिजन्य चित्तद्रुतिमें भी रति जाननी चाहिये— कामजे द्वे रती शोकहासभीविस्मयास्तथा। उत्साहो युधि दाने च भगवद्विषया अमी॥ शृंगार, करुण, हास्य, प्रीति, भयानक, अद्भुत, युद्धवीर, दानवीर—ये सब व्यामिश्रणमें होते हैं। राजसी, तामसी भक्ति अदृष्ट फलमात्रवाली होती है। मिश्रित भक्ति दृष्टादृष्ट उभय फलवाली होती है। इसी तरह साधकोंकी विशेषतासे भक्ति शुद्धसत्त्वोद्भवा भी होती है। सनकादि सिद्धोंमें भक्ति दृष्टफल होती है। जैसे ग्रीष्मसन्तप्त पुरुषका गंगास्नान दृष्टादृष्टफलक होता है, वैसे ही वैधी भक्तिमें भी सुखाभिव्यक्ति होती है,