भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 704

६९४ भक्तिसुधा विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना मुक्ति चाहनेवाले परमविरक्त भी इस भक्तिकी कामना करते हैं- कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) इसलिये भक्तिका चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षमें पर्यवसान है। भक्तिरसायनकारके सिद्धान्तमें सगुण ब्रह्मके समान निर्गुण ब्रह्ममें भी भक्ति मानी गयी है। इसमें- 'देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥' 'लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) -यह वचन प्रमाण है। इसका निष्कृष्ट अर्थ यही है कि आनुश्रविक (वैदिक) कर्मोंसे आराध्य सत्त्व आदि गुणवाले देवताओंके मध्यमें सत्त्वोपाधिक विष्णुमें जो स्वाभाविकी मनोवृत्ति है, उसे निर्गुण भक्तियोग कहते हैं। यद्यपि वेद एवं तदनुकूल शास्त्रोंमें भगवान्‌के राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि जिन स्वरूपोंकी उपासना बतलायी है, उन सबकी भक्ति रसस्वरूप ही है तथापि सभी रस सरलतासे साक्षात् श्रीकृष्णमें ही संगत होते हैं। इसीलिये भक्तिरसायनकारने विशेषतया 'मुकुन्द' पद ग्रहण किया है-'परममिह मुकुन्दे भक्तियोगं वदन्ति।' भक्तिरसके आलम्बनविभाव सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर भगवान् ही हैं-यह आगे स्पष्ट किया जायगा। प्रेम-निरूपणके प्रसंगमें बतलाया गया है कि भगवद्धर्मसे द्रुतचित्तमें प्रविष्ट स्थिर- गोविन्दाकारता ही भक्ति है-'द्रुते चित्ते प्रविष्टा या गोविन्दाकारता स्थिरा। सा भक्तिरित्याभिहिता....॥' (भक्तिरसा० उल्ला० २ कारि० १) कर्म, उपासना, ज्ञानका अवगम करानेवाले सभी शास्त्रोंका तात्पर्य अन्तःकरणशुद्ध्यर्थ मलविक्षेप- निवृत्तिपूर्वक भगवदुपासना एवं भगवत्स्वरूपज्ञानद्वारा परमपुरुषार्थरूप भक्तिमें ही है। कहा भी है कि यदि द्रवावस्थापन्न चित्त नित्यबोधसुखात्मा विभु भगवान्‌को ग्रहण कर ले तो क्या अवशेष रह जाय?- 'भगवन्तं विभुं नित्यं पूर्ण बोधसुखात्मकम्। यद् गृह्णाति द्रुतं चित्तं किमन्यदवशिष्यते॥' (भक्ति० उल्ला० १ का० ३०) विषयमें चित्तकी कठोरता एवं भगवान्‌में द्रवता होनी चाहिये-'काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे।' आनन्दसे ही अखिल भूतनिकायका प्रादुर्भाव, आनन्दसे ही जीवन एवं आनन्दमें ही उपसंहार होता है-आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। (तैत्तिरीय० ३।६) अतः समस्त प्रपंच परमानन्द रसस्वरूप ही है, किंतु स्वप्नादि प्रपंचके समान बाध्य होनेके कारण भगवत्- स्फूर्ति होनेपर जब प्रपंच निवृत्त होता है, तब भगवद्रूप ही अवशेष रहता है। अध्यस्त पदार्थकी अधिष्ठान- ज्ञानसे निवृत्ति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि विषय- विषयक सभी प्रेम भगवान्‌में ही पर्यवसित होते हैं। भगवत्प्रेमके साधन भगवत्प्रेम प्राप्त करनेके लिये साधकको क्रमशः महापुरुषोंकी सेवा, उनके धर्ममें श्रद्धा, भगवद्- गुणश्रवणमें रति, स्वरूपप्राप्ति, प्रेमवृद्धि, भगवत्स्फूर्ति और भगवद्धर्मनिष्ठा आदि अपेक्षित होती है। आत्माराम, आप्तकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, महामुनीन्द्र भी भगवान्‌को भजते हैं- आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) कहा जा सकता है कि सर्वाधिष्ठान प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारद्वारा सभी प्रकारके भेदोंके मिट जानेपर जिनका चित्त आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण है, उन्हें अपनेसे भिन्न भगवान्‌की स्फूर्ति नहीं हो सकती। रागकी तो उनमें सम्भावना ही नहीं, फिर भक्ति तो अत्यन्त ही असम्भव है। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि उन्हें स्वारसिक प्रेमसे भेदका आहार्यज्ञान होता है (बाधकालिक इच्छाजन्यज्ञान आहार्यज्ञान कहा जाता है)। आहार्यज्ञानद्वारा राग एवं भक्ति हो