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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

६९४ भक्तिसुधा विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना मुक्ति चाहनेवाले परमविरक्त भी इस भक्तिकी कामना करते हैं- कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) इसलिये भक्तिका चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षमें पर्यवसान है। भक्तिरसायनकारके सिद्धान्तमें सगुण ब्रह्मके समान निर्गुण ब्रह्ममें भी भक्ति मानी गयी है। इसमें- 'देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥' 'लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३२; ३।२९।१२) -यह वचन प्रमाण है। इसका निष्कृष्ट अर्थ यही है कि आनुश्रविक (वैदिक) कर्मोंसे आराध्य सत्त्व आदि गुणवाले देवताओंके मध्यमें सत्त्वोपाधिक विष्णुमें जो स्वाभाविकी मनोवृत्ति है, उसे निर्गुण भक्तियोग कहते हैं। यद्यपि वेद एवं तदनुकूल शास्त्रोंमें भगवान्‌के राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि जिन स्वरूपोंकी उपासना बतलायी है, उन सबकी भक्ति रसस्वरूप ही है तथापि सभी रस सरलतासे साक्षात् श्रीकृष्णमें ही संगत होते हैं। इसीलिये भक्तिरसायनकारने विशेषतया 'मुकुन्द' पद ग्रहण किया है-'परममिह मुकुन्दे भक्तियोगं वदन्ति।' भक्तिरसके आलम्बनविभाव सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर भगवान् ही हैं-यह आगे स्पष्ट किया जायगा। प्रेम-निरूपणके प्रसंगमें बतलाया गया है कि भगवद्धर्मसे द्रुतचित्तमें प्रविष्ट स्थिर- गोविन्दाकारता ही भक्ति है-'द्रुते चित्ते प्रविष्टा या गोविन्दाकारता स्थिरा। सा भक्तिरित्याभिहिता....॥' (भक्तिरसा० उल्ला० २ कारि० १) कर्म, उपासना, ज्ञानका अवगम करानेवाले सभी शास्त्रोंका तात्पर्य अन्तःकरणशुद्ध्यर्थ मलविक्षेप- निवृत्तिपूर्वक भगवदुपासना एवं भगवत्स्वरूपज्ञानद्वारा परमपुरुषार्थरूप भक्तिमें ही है। कहा भी है कि यदि द्रवावस्थापन्न चित्त नित्यबोधसुखात्मा विभु भगवान्‌को ग्रहण कर ले तो क्या अवशेष रह जाय?- 'भगवन्तं विभुं नित्यं पूर्ण बोधसुखात्मकम्। यद् गृह्णाति द्रुतं चित्तं किमन्यदवशिष्यते॥' (भक्ति० उल्ला० १ का० ३०) विषयमें चित्तकी कठोरता एवं भगवान्‌में द्रवता होनी चाहिये-'काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे।' आनन्दसे ही अखिल भूतनिकायका प्रादुर्भाव, आनन्दसे ही जीवन एवं आनन्दमें ही उपसंहार होता है-आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। (तैत्तिरीय० ३।६) अतः समस्त प्रपंच परमानन्द रसस्वरूप ही है, किंतु स्वप्नादि प्रपंचके समान बाध्य होनेके कारण भगवत्- स्फूर्ति होनेपर जब प्रपंच निवृत्त होता है, तब भगवद्रूप ही अवशेष रहता है। अध्यस्त पदार्थकी अधिष्ठान- ज्ञानसे निवृत्ति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि विषय- विषयक सभी प्रेम भगवान्‌में ही पर्यवसित होते हैं। भगवत्प्रेमके साधन भगवत्प्रेम प्राप्त करनेके लिये साधकको क्रमशः महापुरुषोंकी सेवा, उनके धर्ममें श्रद्धा, भगवद्- गुणश्रवणमें रति, स्वरूपप्राप्ति, प्रेमवृद्धि, भगवत्स्फूर्ति और भगवद्धर्मनिष्ठा आदि अपेक्षित होती है। आत्माराम, आप्तकाम, पूर्णकाम, परमनिष्काम, महामुनीन्द्र भी भगवान्‌को भजते हैं- आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) कहा जा सकता है कि सर्वाधिष्ठान प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मके साक्षात्कारद्वारा सभी प्रकारके भेदोंके मिट जानेपर जिनका चित्त आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण है, उन्हें अपनेसे भिन्न भगवान्‌की स्फूर्ति नहीं हो सकती। रागकी तो उनमें सम्भावना ही नहीं, फिर भक्ति तो अत्यन्त ही असम्भव है। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि उन्हें स्वारसिक प्रेमसे भेदका आहार्यज्ञान होता है (बाधकालिक इच्छाजन्यज्ञान आहार्यज्ञान कहा जाता है)। आहार्यज्ञानद्वारा राग एवं भक्ति हो

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सकती है। 'त्रिपुरसुन्दरीरहस्य' में बतलाया गया है कि भक्त लोग प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको जानकर अतिशयप्रीतिसे अभिसन्धिविहीन होकर आहार्यज्ञानद्वारा भेदभावकी कल्पना करके अत्यन्त तत्परतासे स्वभावतः भगवान्‌में स्वारसिकी भक्ति करते हैं— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्। स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ आहार्यज्ञानद्वारा व्यामोहप्रसक्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि भगवान् सत्यके भी सत्य हैं। जैसे अराजाको राजा बनानेवाला राजराज कहा जाता है, वैसे ही भगवान् असत्यको सत्य बनाते हैं अर्थात् पारमार्थिक सत्यकी अपेक्षा किंचित् न्यूनसत्ताका एक और सत्य माना जाता है, जो भजनोपयोगी है। अतः पारमार्थिक अद्वैत सिद्धान्त ज्यों-का-त्यों रहता है। कहा भी गया है कि पारमार्थिक अद्वैत ज्ञान होनेपर यदि भजनोपयोगी द्वैत मानकर भगवान्‌में भक्ति की जाती है तो ऐसी भक्ति सैकड़ों मुक्तियोंसे भी कहीं बहुत अच्छी है। प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मका विज्ञान होनेके पहले द्वैत बन्धनका कारण है, किंतु विज्ञानके बाद भेद- मोहके निवृत्त हो जानेपर भक्तिके लिये भावित द्वैत अद्वैतसे भी बहुत अच्छा है— पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥ द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं भावितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ गाढ़ानुराग आलिंगनादि-रसास्वादप्रवीण पतिव्रता नायिका जैसे रसविशेषविकासके लिये घूँघटकी ओटसे अपने प्रियतमका निरीक्षण करती है, वैसे ही तत्त्व- साक्षात्कारसम्पन्न अभेदानुभवी विद्वान् भी रसविशेष- विकासके लिये भेदभावसे ही भगवान्‌की समर्चा करना चाहते हैं— विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्चनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ कान्ताका प्रियतमके वक्षःस्थलपर विलासपूर्ण विहरण या पादयुगलकी सेवा, जैसे बराबर है, वैसे ही ज्ञानीकी तत्त्वनिष्ठा और भगवत्पूजा दोनों बराबर हैं— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विरहतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे प्रातिभासिक प्रपंचकी अपेक्षा घटादि सत्य एवं स्वकारण मृदादिकी अपेक्षा असत्य होते हैं या मृदादि भी अपने कारणकी अपेक्षा असत्य होते हैं, वैसे ही पारमार्थिक सत्ताकी अपेक्षा स्तरभेदसे कुछ न्यून सत्तावाला अपारमार्थिक सत्य है। यही सत्ता भगवल्लीला-परिकरकी है, इसलिये सिद्धान्ततः अद्वैत बना ही रहता है। चित्द्रुतिसे भक्तिमें भेद चित्तद्रुतिके कारण अनेक हैं। उन्हींके भेदसे भक्तिमें भेद होता है—'चित्तद्रुतेः कारणानां भेदाद्भक्तिस्तु भिद्यते।' शरीरसम्बन्ध-विशेषकी स्पृहा होनेपर सन्निधान-असन्निधान-भेदसे काम दो प्रकारका होता है। उससे द्रुत चित्तमें श्रीकृष्णनिष्ठता ही सम्भोग-विप्रलम्भाख्य रति है। इसी तरह क्रोध, स्नेह, हर्षादिजन्य चित्तद्रुतिमें भी रति जाननी चाहिये— कामजे द्वे रती शोकहासभीविस्मयास्तथा। उत्साहो युधि दाने च भगवद्विषया अमी॥ शृंगार, करुण, हास्य, प्रीति, भयानक, अद्भुत, युद्धवीर, दानवीर—ये सब व्यामिश्रणमें होते हैं। राजसी, तामसी भक्ति अदृष्ट फलमात्रवाली होती है। मिश्रित भक्ति दृष्टादृष्ट उभय फलवाली होती है। इसी तरह साधकोंकी विशेषतासे भक्ति शुद्धसत्त्वोद्भवा भी होती है। सनकादि सिद्धोंमें भक्ति दृष्टफल होती है। जैसे ग्रीष्मसन्तप्त पुरुषका गंगास्नान दृष्टादृष्टफलक होता है, वैसे ही वैधी भक्तिमें भी सुखाभिव्यक्ति होती है,

६९६ भक्तिसुधा अतः वह दृष्टादृष्टफलक है। शीतवातातुर पुरुष यदि गंगास्नान करे तो उससे जैसे अदृष्टमात्र ही फल होता है, दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है, वैसे ही राजसी, तामसी भक्तिमें सुखरूप दृष्टांश प्रतिबद्ध हो जाता है। गंगास्नान कर लेनेपर पुनः गंगामें क्रीड़ा करनेवालोंको जैसे दृष्टमात्र फल होता है, वैसे ही जीवन्मुक्तोंकी भक्ति दृष्टफलमात्रपर्यवसायिनी होती है— राजसी तामसी भक्तिरदृष्टफलमात्रभाक् । दृष्टादृष्टोभयफला मिश्रिता भक्तिरिष्यते ॥ शुद्धसत्त्वोद्भवाप्येवं साधकेष्वस्मदादिषु । दृष्टमात्रफला सा तु सिद्धेषु सनकादिषु ॥ दृष्टादृष्टफला भक्तिः सुखव्यक्तेर्विधेरपि । निदाघदूनदेहस्य गङ्गास्नानक्रिया यथा ॥ रजस्तमोऽभिभूतस्य दृष्टांशः प्रतिबध्यते । शीतवातातुरस्येव नादृष्टांशस्तु हीयते ॥ तथैव जीवन्मुक्तानामदृष्टांशो न विद्यते । स्नात्वा मुक्तवतां भूयो गङ्गायां क्रीडतां यथा ॥ तीव्र वातस्थित प्रदीप ज्वालाके समान रजस्तमोऽभिभूत शिशुपाल आदिकी स्वप्रकाशानन्दाकार भी मतिसन्तति सुख व्यक्त करानेवाली न हुई। प्रतिबन्धके नष्ट होनेपर सुखाभिव्यक्ति होती है। चित्तद्रुति होनेके कारण ही भक्ति होती है। उसके न होनेके कारण न तो वेन भक्त ही ठहरा, न उसे कुछ फल ही प्राप्त हुआ। शिशुपाल भगवान्की सत्ता मानता था, परंतु वेन भगवान्की सत्ता ही नहीं मानता था, वह नास्तिक था, इसलिये उसका भगवत्-सम्बन्ध ही नहीं हुआ, फिर चित्तद्रवता और भक्ति तो बहुत दूरकी बात है। सुखाभिव्यंजक होनेसे रजस्तमोविहीन भगवद्विषयक मति ही रति है। भगवद्विषयक मतिके समुच्छेदतारतम्यसे रतितारतम्य होता है। 'विरहे यादृशं दुःखं तादृशी दृश्यते रतिः।' मनुष्य और अधिकरणमात्रके भेदसे अनेक भेद होते हैं। उसमें भी वैकुण्ठ, मथुरा, द्वारका, वृन्दावन आदिके भेदसे तथा व्रज, वन, निकुंजादिके भेदसे प्रकाशभेद भी माना जाता है। पुनः शुद्ध, मिश्रित आदिके भेदसे अनेक भेद होते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि आदिमें जो विषय विस्तारसे कहे गये हैं, वे यहाँ सूत्रभूत कारिकाओंसे कहे गये हैं। विशेषतया वेदान्त, सांख्य, मीमांसादिशास्त्र एवं शास्त्राविरोधी युक्तियोंद्वारा सभी विषयोंका वर्णन किया गया है। अद्वैतसिद्धिकार श्रीमधुसूदनसरस्वतीमहाराजकी सिद्धान्ताविरोधिनी स्वारसिकी भक्ति थी, जैसा कि उन्होंने स्वयं ही गीताकी 'गूढार्थदीपिकासंग्रह' नामक टीकामें कहा है कि अद्वेष्टृत्व आदि गुण जैसे ज्ञानीके स्वभावसिद्ध होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन करना भी ज्ञानीका स्वभाव है—'अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' साधन, अभ्यास और परिपाकावस्थाके भेदसे 'तस्यैवाहं' मैं उसीका हूँ, 'ममैवासौ' वह मेरा ही है, 'सोऽहं' मैं वही हूँ—ये तीन तरहके भाव होते हैं। तीसरे भावके 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्', 'अहं ब्रह्म परं धाम', 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इत्यादि उदाहरण हैं। 'मामेकं शरणं व्रज' इत्यादि गीताके उपसंहारात्मक श्लोकका तात्पर्य भी अन्तिम भावना ही है। 'एकं' एक अद्वितीय त्रिविधभेदशून्य 'मां' मुझ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मको 'शरणं' घटाकाशका महाकाशके समान, तरंगका जलराशिके समान आश्रय अथवा रक्षक निश्चित रूपसे जानो। 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति' इस श्रुतिके अनुसार प्रत्यगभिन्नता रूपसे विदित ब्रह्म ही अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचका अपनোদন करता है, इसीलिये वह रक्षक है। परब्रह्मकी प्रेमास्पदता परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न होनेपर ही प्रत्यक् आत्माकी पूर्णता एवं प्रत्यगात्मासे अभिन्न होनेसे परब्रह्मकी अपरोक्षता अनौपाधिक अनतिशय परप्रेमास्पदता सिद्ध होती है। यदि प्रत्यगात्मासे तटस्थ परमात्मा ठहरा तो उपर्युक्त बातें बन नहीं सकतीं। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) यह श्रुति प्रत्यगात्माके शेष रूपसे ही सबकी प्रेमास्पदता बतलाती है। अपने कल्याणके लिये भगवान्का भजन कड़वी गुडुचीके पान करनेके समान ही ठहरेगा,

भक्तिरसामृतास्वादन ६१७ क्योंकि स्वास्थ्यके लिये कड़वी गुडुची भी पी जाती है। फिर भगवान्‌में सातिशय ही प्रेम रहेगा निरतिशय नहीं, जब प्रत्यगात्माका स्वरूप भगवान्‌को माना जाता है, तभी भगवान्‌की निरुपाधिक परप्रेमास्पदता बन सकती है। 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इस श्रुतिने ब्रह्मकी अवेद्यतासे ही अपरोक्षता बतलायी है, जो कि प्रत्यगात्मासे भिन्न, तटस्थ ब्रह्मकी किसी तरह नहीं बन सकती। आत्मासे भिन्न पदार्थकी सिद्धि प्रमाणके अधीन ही होती है, स्वतः भासमान स्वारसिक अनतिशय प्रेमस्वरूप ही भगवान् हैं, इसीलिये श्रीशुकाचार्यने भगवान् श्रीकृष्णको सबका अन्तरात्मा बतलाया है— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इसीलिये ब्रह्मविद्वरिष्ठोंके भी चित्तमें हठात् उनकी स्फूर्ति होती है— यावन्निरञ्जनमजं पुरुषं जरन्तं सञ्चिन्तयामि सकले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः ॥ प्रकृत ग्रन्थकार श्रीमद्मधुसूदनसरस्वतीके भी निम्न- लिखित वचन हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्। पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत् किमपि तन्नीलं महो धावति॥२ अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥ इसी तरह श्रीशुक, सनकादि, शंकर, सुरेश्वर, पद्मपाद, चित्सुख, सर्वज्ञात्म, श्रीधरस्वामी आदि सहस्रों ब्रह्मविद्वरिष्ठोंको भी वैसा ही अकैटव प्रेम था। भगवान्‌ने स्वयं ही श्रीमुखसे 'एकभक्तिर्विशिष्यते' इन शब्दोंसे उपर्युक्त अर्थोंका समर्थन किया है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' इत्यादि श्रुतियोंने किसीको भी अनात्मा समझनेको अनर्थकारक माना है, फिर भगवान्‌को अनात्मा समझनेकी बात ही क्या? प्रेममें व्यवधान सहनकी क्षमता नहीं होती, इसीलिये दूरमें या व्यवहितमें स्वाभाविक स्वारसिक अकैटव प्रेम नहीं होता। इसीलिये भगवान्‌को सर्वान्तर परम सन्निहित या प्रत्यगात्मा कहा गया है— 'कैटवरहितं प्रेम न तिष्ठति मानुषे लोके। यदि भवति कस्य विरहो विरहे भवति को जीवति॥' —यह प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌में अभेद श्रीअचिन्त्यकल्याणगुणगणाकर भूमा भगवान्‌की अघटितघटनापटीयसी सदसद्विलक्षणा, समस्त आश्चार्योंकी एकमात्र निवासभूमि, अनन्तशक्तिकी केन्द्रभूता मायाके प्रवाहमें पड़े हुए प्रपंचमें सूक्ष्म विचार करनेपर बुद्धिमानोंके लिये क्रमशः आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व ठहरता है। कोई आत्माको अणुपरिमाण, कोई मध्यम परिमाण तथा कोई विभु मानते हैं। विभुत्ववादियोंमें भी कोई आत्माको अचित्, कोई १. जिसके हाथोंमें वंशी सुशोभित है, जो नवनीरदसुन्दर है, पीताम्बर पहने है, जिसके होठ बिम्बाफलके समान लाल-लाल हैं, जिसका मुखमण्डल पूर्णचन्द्रके सदृश और जिसके नेत्र कमलवत् हैं, उस कृष्णसे परे कोई तत्त्व हो तो मैं उसे नहीं जानता। २. ध्यानके अभ्याससे जिनका चित्त वशमें हो गया है, वे योगी यदि उस निर्गुण और निष्क्रिय परमज्योतिको देखते हैं तो देखा करें। हमारे नेत्रोंको तो कालिन्दीतटविहारी नीले तेजवाला साँवरा ही सुख पहुँचाता रहे।

६९८ भक्तिसुधा चित्परिणामी, कोई चिदचित्, कोई असंग और चित्स्वरूप मानते हैं। कोई वादी क्लेश, कर्म, विपाक एवं आशयसे अपरामृष्ट विशिष्ट आत्माकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभावता मानते हैं। यद्यपि इसीमें सद्वितीयता, चिदचिद्विशिष्टता, चिदचिद्भिन्नाभिन्नता रूप तीसरे पक्षमें भी स्वाभाविक भेदाभेद, औपाधिक भेदाभेद, अचिन्त्य भेदाभेद पक्ष और शुद्धाद्वैत, अद्वैतपक्ष भी होते हैं तथापि भक्तिरसायनकार अद्वैत सिद्धान्तानुसारी हैं। परमार्थतया भोक्ताकी आत्मा भगवान् ही हैं, ऐसा औपनिषद सिद्धान्त है। 'श्रीमद्भागवत' में भी कहा गया है कि वस्तुभूत तत्त्व वही है। सर्वविध भेदशून्य, स्वप्रकाश, अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वज्ञ तत्त्व कहते हैं। देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत परिच्छेदशून्य होनेसे वही ज्ञान अनन्त, अवेद्य होकर अपरोक्ष होनेसे स्वप्रकाश, अद्वितीय होनेके कारण सर्वोपद्रवविवर्जित होनेसे परमानन्दस्वरूप और त्रिकालाबाध्य होनेसे परम सत्य है। वही निरतिशय बृहत् होनेसे ब्रह्म, आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा, अचिन्त्य, अनन्त

कहनेपर घटत्वावच्छिन्नप्रतियोगितानिरूपक निषेधकी ही अवगति होती है। दूसरी बात यह है कि ज्योतिष्मान् आदित्यस्थानीय भगवान्‌से यदि ज्योतिःस्थानीय ब्रह्म न्यून माना जाय तो वह ब्रह्म ही नहीं। 'बृहि वृद्धौ' धातुसे 'मनिन्' प्रत्यय होनेपर ब्रह्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है बड़ा (बृहत्)। संकोचक प्रमाण न होने तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस श्रुतिमें 'अनन्त' पद समभिव्याहारसे यही सिद्ध होता है कि निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। अतिशयताकी कल्पना करते- करते जहाँ वाचस्पतिकी मति भी परिश्रान्त हो जाय, इसके बाद निरतिशय बृहत्ता सिद्ध हो सकती है, अतः भगवान् हों या श्रीकृष्ण जिसकी निरतिशय बृहत्ता मानी जाय, वही ब्रह्म है। यहाँ इतनी विशेषता और समझ लेनी चाहिये कि उपर्युक्त मतमें आदित्यस्थानीय ज्योतिष्मान् भगवान्‌की किरणस्वरूप ज्योतिःप्रदेशमें अविद्यमानता रहेगी, अतः देशकृत परिच्छेद होनेसे अनन्तता नहीं बन सकती। हमारे मतमें भगवान् या श्रीकृष्णकी सर्वविध परिच्छेदशून्यता होनेके कारण निरतिशय बृहत्ता बन सकती है और अनुपचरित अद्वयता, अनन्तता, ब्रह्मता भी सम्पन्न हो सकती है।

निर्गुण और सगुणका स्वरूप

इसी तरह कहा जाता है कि 'भगवान् निर्गुण हैं' इस कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान्‌में प्राकृत गुणगण नहीं हैं। जैसे 'अकाय' का अभिप्राय प्राकृत कायराहित्यमात्र है, अप्राकृत काय तो उनके है ही। वैसे ही 'निर्गुण' शब्द अप्राकृत गुणगणका निषेधक नहीं है। यह भी ठीक नहीं, क्योंकि फिर तो निष्क्रियत्व, अव्रणत्व आदि शब्दोंका भी ऐसा ही अर्थ किया जायगा। फिर तो भगवान्‌में अप्राकृत क्रिया एवं अप्राकृत व्रण मानना पड़ेगा। यदि कहा जाय कि सगुण शब्द भी निर्गुणके समान आता है, अतः 'निर्गुण' पदका अर्थ प्राकृतगुणरहित किया जाता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि निष्क्रियत्वके समान सक्रियत्व शब्द भी आता है, अतः उपर्युक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा। इसलिये वस्तुतः निर्गुण ही भगवान् अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे अप्राकृत गुणगणोंको स्वीकार करते हैं, अतः वे सगुण कहे जाते हैं— 'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम्।' यद्यपि कहा जाता है कि हो सकता है कि धनवान् पुरुष धननिरपेक्ष हो, किंतु निर्धनकी धननिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है। इसी तरह सगुण भगवान् भले ही गुणनिरपेक्ष हों, किंतु निर्गुणकी गुणनिरपेक्षता अत्यन्त असम्भव है तथापि यह भी ठीक नहीं, क्योंकि भगवान्‌में गुण न तो कुछ अतिशयताका आधान कर सकते हैं, न कुछ विशेषता ही कर सकते हैं। अनाप्तकाम निर्धनको भले ही धनकी अपेक्षा हो, किंतु आप्तकाम, आत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम, निर्गुण भगवान् गुणनिरपेक्ष रहें, इसमें क्या आश्चर्य ? नित्य निरतिशय बृहद् ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्‌में गुणगणमहत्त्वातिशयका आधान, नित्य निरतिशय अनन्त आनन्दस्वरूपमें आनन्दातिशयका आधान तथा नित्यनिरस्तसमस्तानर्थ ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्‌में अनर्थ निर्वहण भी नहीं कर सकते। पर इन तीनोंको छोड़कर गुणका कोई चौथा उपयोग है नहीं, अतः गुणनिरपेक्ष निर्गुण भगवान् ही गुणोंकी गुणत्वसिद्धिके लिये उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। कौस्तुभमणिकी शोभाके लिये ही भगवान्‌ने उसे अपने श्रीकण्ठमें धारण कर रखा है—'कण्ठं च कौस्तुभमणेरधि- भूषणार्थम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२६) किन्हीं लोगोंका यह मत कि निराकारमें प्रेमास्पदता होती ही नहीं, यह अत्यन्त अज्ञानमूलक है, क्योंकि सगुणप्राप्तिजन्य सुख भी निराकार ही है, फिर उसमें प्रेम कैसे होता है ? श्रीधरस्वामी आदिकोंने भी 'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्' (श्रीमद्भा० १।२।११) इस श्लोकमें ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्‌में कुछ भी विलक्षणता नहीं मानी। ऐसा मानना न केवल निर्मूल है, अपितु शास्त्र तथा युक्तिविरुद्ध भी है। कुछ लोगोंका कहना है कि नारदजीको आकाशसे

उतरते हुए देखकर जब वे दूर थे, तब द्वारकावासियोंने कल्पना की कि यह कोई महातेजःपुंज है। कुछ और समीप आनेपर शरीरवान् प्राणी समझा और अधिक समीप आनेपर अवयवकी स्पष्ट प्रतीतिसे कोई पुरुष है ऐसा जाना। अधिक निकट होनेपर उन्हें नारदजीका स्पष्ट ज्ञान हुआ— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) इसी तरह दूर रहनेपर ब्रह्म और समीप होनेपर परमात्मा और अत्यन्त समीप होनेपर भगवान्का ज्ञान होता है। किंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि सर्वान्तरतम ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्में सामीप्य- असामीप्य निबन्धन तारतम्य नहीं हो सकता। अतः निष्कर्ष यह निकला कि एक ही नित्य, निरतिशय बृहत्तम ब्रह्म आत्माओंकी भी आत्मा होनेसे परमात्मा और गुणगणसेव्य होनेसे भगवान् कहा जाता है। सकल सच्छास्त्रतात्पर्यगोचर, अशेषविशेषातीत, निर्गुण, निराकार, सच्चिदानन्दघन अपनी अचिन्त्य, मंगलमय, दिव्यशक्तिसे अनन्तकल्याणगुणगणाकर, अनन्तकोटि- कन्दर्पसुन्दर, शक्रशतकोटिविलासशाली, नभःशत- कोटिमहाविस्तारशाली, वायुशतकोटिविपुलबलशाली, रविशतकोटिप्रखरप्रकाशशाली, शशिशतकोटिसुशीतल, कालशतकोटिदुस्तर, अमितकोटितीर्थपावनाभिधान, मेरु- शतकोटिनिश्चल, समुद्रशतकोटिगम्भीर, कामधेनुशत- कोटिकामपूरक, शारदाशतकोटिज्ञानप्रद, विधिशतकोटि- सृष्टिनिपुण, विष्णुशतकोटिपालक, रुद्रशतकोटिसंहारक, धनदकोटिशतैश्वर्यसम्पन्न, मायाकोटिशत-अघटित- घटनापटीयान्, शेषशतकोटिधारक, भगवान्की अनन्त- कोटि आदित्यगणोंकी प्रकाशप्राखर्यादिमेंसे भी वैसे ही उपमा नहीं दी जा सकती, जैसे कि अनन्तकोटि खद्योतोंसे आदित्यकी उपमा। इसीलिये अशेष- विशेषातीत, अनन्तकल्याणगुणगणाकर भगवान्की स्तुतिमें ब्रह्मादिकोंका भी असामर्थ्य सुना जाता है। भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी भक्तकल्पपादप भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी ही हैं। सर्वशास्त्रतात्पर्यविषय कर्म-उपासना-तत्त्वज्ञानादि- समाराध्य भगवान् ही मुक्तोपसृप्य हैं, यह तत्तत्स्थलोंमें कहा ही गया है—'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये', (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठ० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३), 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४), 'आत्मक्रीड आत्मरतिः' (मुण्डक० ३।१।४) इत्यादि श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें मुमुक्षु और भक्तोंके लिये भगवच्छरणागति ही बतलायी गयी है। उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विध लिंगोंद्वारा 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५), 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य रसात्मक, प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्ममें ही पर्यवसित होता है। अन्य विषयक अनुरागाधीन विषयता, प्रेमकी गौणता तथा अनन्यविषयक अनुरागाधीन विषयता ही प्रेमकी

वहाँ स्वात्मानन्द ही अभिव्यक्त होता है। विषयनिबन्धन एवं वृत्तिरोधके क्षणिक होनेसे सुखको वैषयिक, क्षणिक आदि कहा जाता है। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्तिरीय० २।९) इत्यादि श्रुतियोंद्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमूलक परिणामके कारण दुःखसे अमिश्रित सुख होनेसे ब्रह्मात्म सुख प्राप्ति कही गयी है। इसीलिये आत्मा ही रस है, ऐसा सिद्धान्त है। यहाँपर आनन्द शब्दसे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म ही विवक्षित है; क्योंकि उसीमें उपक्रमोपसंहारादिद्वारा रसात्मताबोधक वचनोंका तात्पर्य निश्चित होता है। अग्निके अंश विस्फुलिंगके समान या सिन्धुके अंश बिन्दुके समान विशिष्ट, सोपाधिक, चिदाभास, चित्प्रतिबिम्ब, चित्कण या समवच्छिन्न जीव निरतिशय रसरूप नहीं; क्योंकि वहाँ पूर्णानन्दता तिरोहित है। तटस्थ परब्रह्मपरमात्मा भी निरतिशय सुखरूप नहीं, क्योंकि यदि वह प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप न हुआ तो साक्षादपरोक्ष भी नहीं रहेगा, फिर उसकी स्वप्रकाशानन्द- रसरूपता तो अत्यन्त दूर है। इसलिये न चाहनेपर भी प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी ही रसरूपता माननी पड़ेगी। भगवान्‌की तीन शक्तियाँ किन्हीं लोगोंने सच्चिदानन्दघन भगवान्‌की स्वरूपशक्ति, तटस्थशक्ति और बहिरंगशक्ति—ये तीन शक्तियाँ मानी हैं। स्वरूपशक्तिमें भी वे सन्धिनीशक्ति, संवित्शक्ति और ह्लादिनीशक्तिके भेदसे तीन शक्तियाँ मानते हैं। इस पक्षमें भी यह बात बन जाती है; क्योंकि अचिदात्मक मायाकी बहिरंगता और सोपाधिक जीवकी तटस्थता तो स्पष्ट ही है। सन्धिनी आदि तीनों शक्तियाँ सच्चिदानन्दकी स्वरूपभूता ही हैं। यद्यपि स्वप्रकाश सत् ही चित्, अत्यन्ताबाध्य चित् ही सत्, सर्वोपद्रवविवर्जित सच्चित् ही आनन्द, अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश आनन्द ही सच्चित् है, इस तरह स्वरूपमें कुछ भी भेद नहीं है, अतः उसमें जब शक्तिकी ही कल्पना नहीं की जा सकती, तब फिर उसके तीन भेदकी तो बात ही क्या ? तथापि अचिन्त्य अनिर्वाच्य, भगवदीय दिव्यलीलाशक्तिके योगसे लीलाविशेष विकासके लिये उक्त भेदोंका उपपादन किया जा सकता है। जैसे जलराशिकी अपेक्षा फेन बहिरंग और तरंग तटस्थ (फेनकी अपेक्षा अन्तरंग होते हुए भी स्वरूपकी अपेक्षा बहिरंग होनेसे तरंगमें तटस्थता है।) और स्वरूपभूत होनेसे माधुर्य ही मुख्य अन्तरंग है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धु भगवान्‌में भोग्य जड़ प्रपंच मूलभूत माया बहिरंग, चिल्लक्षण जीव तटस्थ और स्वरूपभूत माधुर्यादि अन्तरंगभाव शक्तिशब्दसे भी कहे जाते हैं। सत्त्व सन्धायक है, अतः उसमें सन्धिनी, चित्प्रकाशक है, अतः उसमें संवित् और आनन्द आह्लादक है, अतः उसमें आह्लादिनी शक्तिकी कल्पना होती है। प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परब्रह्मकी रसरूपता माननेपर ही यह सब कल्पना बन सकती है। रससिन्धुका बिन्दु भी रसस्वरूप ही है। किंतु परमानन्दताके आवृत्त होनेसे वह अल्पानन्द एवं साकांक्ष होता है। इसी तरह सोपाधिक आत्मा भी रसस्वरूप होकर रसप्रेप्सु होता है। इसीलिये शास्त्रोंने इस तत्त्वका निरूपण किया है। वेदान्तवेद्य, निर्विशेष भगवद्रूप ही रसस्थायीसे विशिष्ट होकर वर्णित होता है। भगवद्गुणगणश्रवणजन्य मानस वृत्तिकी द्रवतामें भगवदाकारता प्रविष्ट होनेपर विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारीके संयोगसे रसरूपता होती है। यहाँ भगवान् ही आलम्बन-विभाव, तुलसी-चन्दनादि उद्दीपन- विभाव, नेत्रविक्रियादि अनुभाव और निर्वेदादि व्यभिचारी भावसे त्यज्यमान भगवदाकारतारूप रस स्थायी भाव ही परमानन्द-साक्षात्कारात्मक प्रादुर्भूत होता है। वही भक्तियोग एवं दुःखासंसृष्ट सुखरूप परम पुरुषार्थ है। यदि स्वभावतः कठिन लाक्षा तापक अग्नि आदि द्रव्यके सम्बन्धसे जलके समान द्रुत हो जाय और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे छान ली जाय, फिर उसमें कोई रंग छोड़ दिया जाय तो वह रंग उस लाक्षाके सर्वांशमें प्रविष्ट होकर स्थिर हो जाता है। फिर कठोर या द्रुत होनेपर कभी भी रंग लाक्षासे पृथक् नहीं होता, वैसे ही भगवद्भावनासे भावित द्रवावस्थापन्न अन्तःकरणमें भगवान्‌के प्रविष्ट होनेपर अन्यवस्तुग्रहणकालमें भी भगवान्‌का भान होता ही है। प्रपंचभानसहित भगवद्भानका

उदाहरण है— खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्। सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४१) प्रपंचमिथ्यात्वभानसहित भगवद्भानका उदाहरण 'तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपम्'। (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) आदि हैं। प्रपंचभानरहित भगवद्भानका उदाहरण है— प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१८) विशेषतः विप्रलम्भ शृंगारमें द्रवावस्थाप्रविष्ट आलम्बनमय ही समस्त वस्तुओंका भान होता है। इसका उदाहरण है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यंङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य । हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः ॥ (अमरूशतक) इसी तरह भगवद्विषयक काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक, दया आदि तापक भावोंमेंसे किसीके भी सम्पर्कसे चित्तरूप लाक्षा गंगाजलप्रवाहके समान द्रुत हो और सैकड़ों पर्तके चीनांशुकसे वह क्षालित हो (छान ली जाय) तो फिर उसमें सर्वांशप्रविष्ट परमानन्द- स्वरूप भगवान् स्थायी भाव बनकर रसस्वरूप हो जाते हैं। द्रवावस्थामें प्रविष्ट विषयाकारता (भगवदाकारता)- के कभी भी पृथक् न होनेके कारण वहाँ मुख्य स्थायी शब्दका प्रयोग होता है। ऐसा होनेपर ही कर्तुमकर्तुं अन्यथाकर्तुंसमर्थ भगवान् भी यदि स्वयं वहाँसे हटना चाहें तो नहीं हट सकते, उनकी सर्वशक्तिमत्ता भी कुण्ठित हो जाती है। इसीलिये कहा गया है— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) यहाँ 'प्रणय' शब्दसे द्रवावस्था ही विवक्षित है। ऐसे अन्तःकरणसे चाहनेपर भी भगवान् नहीं निकल सकते। इसीको लक्ष्य करके भक्त उनसे कहता है कि यदि हृदयसे निकल जाओ तो आपका पुरुषार्थ जानूँ—'हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते।' ब्रजसीमन्तिनीजन अपने हृदयसे भगवान्‌को निकालना चाहती हैं, पर सफल नहीं होतीं। निश्चित करती हैं कि अब उनसे सख्य नहीं करेंगी, फिर भी उनकी चर्चाको दुस्त्यज समझती हैं। किसी सखीने भगवान्‌की चर्चा छेड़ दी तो दूसरी सखीने तत्काल रोककर कहा— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् यदि हमारी प्यारी सखी (राधा)-को क्षणमात्र भी सुखी देखना चाहती हो तो मोहनकी चर्चा न कर कोई और कथा सुनाओ। यह देखकर किसी मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि योगीन्द्र, मुनीन्द्र धारणा, ध्यान आदिके द्वारा विषयोंसे मनको हटाकर भगवान्‌में लगाना चाहते हैं और मन हट-हटकर विषयोंमें चला जाता है; किंतु यह मुग्धा मनको भगवान्‌से हटाकर विषयोंमें लगाना चाहती है। जिन भगवान्‌की क्षणमात्र स्फूर्तिका लिये योगी सदा उत्कण्ठित रहा करते हैं, यह मुग्धा उनको हृदयसे निकालकर बाहर करना चाहती है— प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनो धित्सति बालासौ विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः । यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति ॥ बिम्बप्रतिबिम्बभाव यदि कहा जाय कि फिर तो आलम्बन और स्थायीभाव एक ही हो गया तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि व्यवहारसिद्ध ईश-जीवके भेदके समान ही

बिम्बप्रतिबिम्बके भावका भेद यहाँ भी है। बिम्ब ही मनकी द्रवावस्थामें पड़कर प्रतिबिम्ब कहा जाता है। 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रपंचकी आनन्दात्मक ब्रह्मैक्योत्पादन निमित्तिकता सिद्ध होती है। कान्तादि विषय भी कारणानन्दरूप ही हैं, मायाकृत आवरण और विक्षेपके कारण उनकी अखण्डानन्दरूपसे प्रतीति नहीं होती। अकार्योंका भी कार्याकाररूपसे भान होता है— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद् विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (श्रीमद्भा० २।९।३३) अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है स्वप्रकाशस्वरूपसे भासमान चैतन्य ही अज्ञात है, जड नहीं। जडके स्वतः आभासमान होनेसे वहाँ आवरणकी कोई अपेक्षा ही नहीं है। कान्तादिविषयक भानोंके प्रामाण्यके लिये अज्ञात कान्ताद्यवच्छिन्न चैतन्यविषयक आवरणके हट जानेपर कान्ताद्यवच्छिन्न- रूपसे परमानन्दरूप उपादान चैतन्यरूपका ही भान होता है, किंतु अनवच्छिन्न स्वरूपका भान नहीं हुआ, इसीलिये सद्योमुक्ति या स्वप्रकाशत्व-भंगकी प्रसक्ति नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही द्रुत अन्तःकरणकी वृत्तिमें उपारूढ़ होकर स्थायी भाव और रसस्वरूप हो जाता है। कान्तादि लौकिक रस भी परमानन्दरूप ही है। फिर भी जड़के सम्पर्कसे उसमें न्यूनता है। भक्तिमें अनवच्छिन्न चिदानन्दघन भगवान्‌का स्फुरण होनेसे उसकी परमानन्दरूपता स्फुट ही है। जो लोग कहते हैं कि 'रसः ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् रसस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करके ही यह जीव आनन्दित होता है, इस वाक्यमें अयं पदार्थकर्तृक लाभकर्म ही रस शब्दसे कहा गया है। भगनावरण चैतन्य ही अयं पदार्थ है और वही कर्म भी, फिर कर्ता और कर्म दोनोंकी एकरूपता हो गयी। किंतु यह ठीक नहीं, क्योंकि सावरणचैतन्य 'अयम्' पदार्थ (कर्ता) और निरावरणचैतन्य कर्म पदार्थ है, इस औपाधिक भेदके माननेसे कोई भेद नहीं आता। यदि कहा जाय कि स्वप्रकाशवादमें आवरणभंगसे ही आनन्द प्राप्त हो जायगा, रसको पाकर आनन्दित होता है, यह कहना व्यर्थ है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्यकी आवरणभंगमात्रसे ही रसरूपता हो जानेपर भी तत्तदवच्छिन्न चैतन्योंमें तत्तदवच्छेदकगत दोष- गुणोंके मिश्रणसे आवरणभंगमात्रसे ही आनन्दप्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिये विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभावके संयोगसे अभिव्यक्त स्थायीभाव ही सभ्य और अभिनेयका भेद हटाकर सभ्यमें ही रहता हुआ परमानन्द-साक्षात्कारद्वारा रसस्वरूप हो जाता है, यही रसज्ञोंकी मर्यादा है। तात्पर्य यह कि सभी शास्त्रोंके महातात्पर्य-विषय परमात्मामें ही सच्चिदादि, रसानन्दादि शब्दोंकी साक्षात् प्रवृत्ति है तो भी जैसे विषयविशेषमें सत्ता शब्द या चैतन्य शब्द प्रयुक्त होता है, वैसे ही रसानन्दादि शब्दोंका भी विषयविशेषमें प्रयोग हो सकता है। इससे सिद्ध हुआ कि स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चैतन्यमें ही रस शब्दका प्रयोग होता है। जबतक अन्तःकरणवृत्तिकी सात्त्विकी द्रवता नहीं होती, तबतक रस, आनन्दादिकी अनुभूति भी नहीं होती। इसीलिये उपेक्ष्य एवं द्वेष्य विषयोंमें भग्नावरण चैतन्य रहनेपर भी आनन्दका अनुभव नहीं होता। इसीलिये यह भी कहा जा सकता है कि यह रससिन्धुबिन्दुस्थानीय सोपाधिक जीव अनवच्छिन्न रससिन्धु स्थानीय परमात्माको या स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण तदंशभूत चित्‌को पाकर आनन्दित होता है। फिर तो 'सावरण अनावरण होकर आनन्दित होता है' यह भी कहना चाहिये था, 'रसको पाकर आनन्दित होता है' यह कहना व्यर्थ ही रहा। यह पक्ष भी ठीक नहीं। नित्य प्राप्त, विस्मृत ग्रैवेयक और मिथ्या सर्पादिकोंमें प्रेप्सा-परिजहीर्षा देखी जाती है

और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर लाभ-परिहार-प्रयोग भी देखा जाता है। इसी तरह आवरणभंगसे प्रेप्सा निवृत्ति होनेपर प्राप्तिव्यवहार भी हो सकता है। प्राकृत पंचकोशातीत स्वरूप लक्षणलक्षित प्रत्यगभिन्न ब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही रस है। उसीको पूर्ण या अंशरूपसे पाकर यह सोपाधिक जीव आनन्दित होता है। 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- जीवन्ति॥', (बृहदारण्यक० ४।३।३२) 'एष ह्येवा- नन्दयति' इत्यादि श्रुतियाँ लौकिक आनन्दको भी रसस्वरूप परमात्माका ही अंश बतला रही हैं। साधारण अब्रह्मवित् पुरुषोंको अनवच्छिन्न ब्रह्मात्मक रसकी प्राप्ति तो होती नहीं, अतः यथायोग्य ही सम्बन्ध लगाना चाहिये। 'रसो वै सः', 'रसो ह्येव' इन दोनों श्रुतियोंमें अनवच्छिन्न स्थायी अवच्छिन्न भग्नावरण चिदात्मक पारिभाषिक तदंशभूत ही रस लिया जाता है। द्रवत्व स्थायीभावानापेक्ष महावाक्यजन्य अपरोक्ष ब्रह्माकारवृत्तिमें आवरण-भंगसे अनवच्छिन्न ब्रह्मरूपसे ही रसका लाभ होता है। इसी तरह कान्ताद्यवच्छिन्नरूपसे उपादान ब्रह्मचैतन्यकी भी स्थायी भावापत्ति होनेपर पारिभाषिकावच्छिन्न रसका लाभ होता है। इसलिये उत्तरमीमांसामें रसशास्त्र गतार्थ नहीं, किंतु स्थायीभावादिविशिष्ट रसके प्रतिपादनके लिये रसशास्त्र पृथक् अपेक्षित है। आचार्य श्रीमधुसूदनजी सरस्वती— व्यक्तित्व एवं कृतित्व 'भक्तिरसायन' का आस्वादन कराया जा चुका है। उसके रचयिता श्रीस्वामी मधुसूदनसरस्वतीजीके सम्बन्धमें भी कुछ जान लेना चाहिये। ऐसा कोई ग्रन्थ अपेक्षित था, जिसमें ब्रह्मवादके अनुरोधसे ही भक्तितत्त्वका वर्णन किया गया हो। इसी न्यूनताकी पूर्ति श्रीमधुसूदनसरस्वतीने 'भगवद्भक्तिरसायन' बनाकर की। इनका जन्म पूर्व बंगालमें फरीदपुरके पास कोटालीपाड़ा ग्राममें श्रीरामचन्द्र भट्टाचार्यके वंशमें हुआ था। इनके पिताका नाम पुरन्दर मिश्र और इनका नाम कमलनयन था। इन्होंने नवद्वीपमें श्रीहरिराम तर्कवागीशसे न्यायशास्त्रका अध्ययन किया था। श्रीविश्वेश्वरसरस्वतीसे संन्यास-दीक्षा ग्रहणकर बहुत दिनतक काशीमें निवास किया था। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीकी रामायणकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें नहीं हो रही थी। किसी विद्वान्ने उन्हें सलाह दी कि यदि श्रीमधुसूदनसरस्वती इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा करें तो सभी विद्वान् आपकी रामायणका आदर करेंगे। श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपनी रामायण श्रीमधुसूदन- सरस्वतीके पास भेज दी। छः महीनेतक जब रामायण नहीं लौटी, तब श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने अपना शिष्य रामायण ले आनेके लिये भेजा। श्रीमधुसूदनसरस्वतीने ग्रन्थका अभिनन्दन करते हुए ऊपर निम्नलिखित श्लोक लिख दिया— आनन्दकानने ह्यस्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः। कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥ कभी श्रीमधुसूदनसरस्वती श्रीवृन्दावनधाम पधारे। वहाँ एक ब्राह्मण बहुत दिनसे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तप कर रहा था। उसे स्वप्नमें भगवान्ने आदेश दिया कि मधुसूदनसरस्वतीके पास जाओ, वहाँ दर्शन होगा। वह ब्राह्मण श्रीमधुसूदनसरस्वतीके पास जाकर देखता है कि भगवान् उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खा रहे हैं। उसने स्वयं उनकी भिक्षामेंसे अन्न निकालकर खाना चाहा, पर श्रीमधुसूदनसरस्वतीने मना किया कि 'संन्यासीका अन्न निषिद्ध है।' उस ब्राह्मणने कहा कि 'मैं तो भगवान्का प्रसाद लेना चाहता हूँ, संन्यासीका अन्न नहीं।' इनके द्वारा बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थ हैं—(१) अद्वैतसिद्धि, (२) वेदान्तकल्पलता, (३) अद्वैततत्त्वरक्षण, (४) श्रीमद्भागवत टीका, (५) श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्या—गूढार्थदीपिका, (६) संक्षेप शारीरिक व्याख्या सारसंग्रह, (७) सिद्धान्तबिन्दु, (८) शिवमहिम्नस्तोत्रकी हरिहरपरा टीका, (९) बोपदेवकृत हरिलीलाकी टीका, (१०) भगवद्भक्ति- रसायन। इस अन्तिम ग्रन्थके प्रथम उल्लासकी टीका स्वयं ग्रन्थकारने की है। यद्यपि शेष दो उल्लासोंकी

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०५ टीका भी अन्य विद्वानोंने लिखी है, किंतु ग्रन्थकार- सिद्धान्तके भक्तद्वारा टीका लिखी जाय, इसकी आवश्यकता थी। भगवान् भूतभावन विश्वनाथकी कृपासे वेदान्तितिलक श्रीदामोदरशास्त्रीने विविध शास्त्रोंके तात्पर्यको अभिव्यक्त करनेवाली, ग्रन्थकार- सिद्धान्तका सर्वथा अनुसरण करनेवाली 'भक्तिरस- स्रोतस्विनी' नामक टीका और टिप्पणी बनायी। वह विद्वानोंको आनन्दित करनेवाली होगी, ऐसी आशा है। क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? विविध शंकाओंके युक्तियुक्त शास्त्रोक्त समाधान एक बार एक सज्जनने प्रश्न किया और कहा—'आज चार मुखके ब्रह्मा, छः मुखके षडानन, हजार मुखके शेष भी यदि कहें कि माला जपनेसे सुख-शान्ति होगी तो भी दुनिया इस बातको नहीं मान सकती, जबकि पूजा-पाठ और माला-जप होते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट ही गया, काशीविश्वनाथको पलायन करना ही पड़ा। आज भी सब देशोंकी अपेक्षा यहाँ अधिक धर्म होता है, यहाँ लाखों साधु अपना समय निरन्तर भजनमें ही लगाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों गृहस्थ भी भजन करते हैं। बड़े-बड़े मठ-मन्दिर करोड़ोंकी सम्पत्तियोंसे भरपूर हैं। गणितज्ञोंने गम्भीर विवेचन करके यह निश्चय कर लिया है कि हर एक व्यक्तिके पीछे पौने तीन घण्टेका भजन पड़ता है। इस तरह प्रति व्यक्तिके पीछे दो आनेकी आय और उसमेंसे डेढ़ पैसाका दान पड़ता है। इस तरह सम्पूर्ण देशोंकी अपेक्षा यहाँका धर्म, दान और भजन अधिक है। यदि इनका सदुपयोग हो (धर्मादिकी सम्पत्तियोंका सदुपयोग हो) तो कितनी ही यूनिवर्सिटियाँ चल सकती हैं। आजकी दुनिया धर्मसे ऊब गयी है, अतः आज 'टन-टन', 'पों- पों' से काम नहीं चलेगा। लोगोंको धार्मिक बननेका उपदेश करनेके पहले वर्तमान स्वरूप और उसके परिष्कारकी ओर ध्यान देना होगा।' वस्तुतः ऐसी अनेकों शंकाओंका मूल कारण है, अपने धर्म, कर्म, सभ्यता एवं संस्कृतिसे सम्बन्ध रखनेवाले शास्त्रोंका अध्ययन न करना, उसके विपरीत इतिहासों, साहित्योंका अभ्यास और विपरीत वातावरणमें पलना। जब धर्मके स्वरूपपर हम विचार करते हैं तो मालूम होता है कि धर्म केवल माला जपना ही नहीं बतलाता, किंतु वह तो अधिकारानुसार सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सब प्रकारके कर्तव्योंको सोच-समझकर यथायोग्य काम करनेको कहता है। अतः इस प्रश्नका अवकाश ही नहीं रहता कि जब घरमें आग लगी हो तो पानी ढूँढ़कर बुझानेका प्रयत्न करना चाहिये, केवल 'राम- राम' कहनेसे काम नहीं चल सकता। परंतु यहाँ भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि घरमें आग लगनेपर 'राम-राम' कहते बैठे रहना सबसे हो भी नहीं सकता। जब 'राम-राम' जपते हुए भी जल, अन्न, वस्त्रकी आवश्यकता प्रतीत होती है तो घरकी आग बुझाये बिना रहा भी कैसे जा सकता है? हाँ, आग बुझानेके लिये अन्यान्य उपायोंको काममें लाते हुए यदि 'राम-राम' कहता रहेगा तो ईश्वर-कृपासे आग शीघ्र ही बुझ भी सकती है। विपरीत भावनासे, प्रचण्ड वायुसे आग अधिक उत्तेजित भी हो सकती है, परंतु जिसे पूर्ण विश्वास है, वह 'राम-राम' के सहारे भोजन- पानादिकी भी परवाह नहीं करता। जिसके मनमें घरमें आग लगनेपर भी नामका भाव दिखायी देता है, उसकी आग भगवत्कृपासे अवश्य बुझ जायेगी। परंतु वैसी धारणा और योग्यता न होनेपर भी जो भोजन-पान-व्यवहारादि कार्योंमें तत्पर रहते हुए

७०६ भक्तिसुधा भी समाज तथा राष्ट्रके हितमें नहीं प्रवृत्त होते हैं; किसी भी धार्मिक, सामाजिक कार्योंके अवसरपर केवल राम-नामका सहारा पकड़ते हैं। वे तो योग्यता और अवसरको न सोचकर एक सत्सिद्धान्तको केवल कलंकित ही करनेका प्रयत्न करते हैं। वैराग्यके स्थानमें राग, रागके स्थानमें वैराग्य, प्रवृत्तिके स्थानमें निवृत्ति और निवृत्तिके स्थानमें प्रवृत्ति अनुचित है, हानिकर है। नीकीहू फीकी लगत, बिन अवसरकी बात। जैसे बरनत युद्धमें, रस सिंगार न सुहात॥ परंतु यदि दूसरा उपाय दृष्टिगोचर ही न हो, तब तो सिवा भगवान्‌के सहारेके और चारा ही क्या है? इसीलिये तो जहाँ एक परमविश्वासी उच्चकोटिके भगवद्भक्तके लिये भगवद्भजन ही सर्वाभीष्टपूरक है, वैसे ही एक अत्यन्त आर्त या अर्थार्थी एवं सर्वसाधनविहीनका एकमात्र भगवान् ही सहारा है। तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य ज्ञानी भक्त स्वभावसे ही भगवान्‌को भजते हैं। जिज्ञासु ज्ञान- प्राप्त्यर्थ भगवान्‌को भजते हैं। अर्थार्थी, आर्त अपनी अर्थ-प्राप्ति और आर्तिनिवृत्तिके लिये परमेश्वरको भजते हैं। किसी भी कामनावाला व्यक्ति अपनी अभीष्टपूर्तिके लिये तत्तत् उपायोंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनकी सफलताके लिये परमेश्वरकी आराधना करता है। जिज्ञासु भगवच्चरण-पंकज- समर्पण-बुद्ध्या धर्मोंका अनुष्ठान करता है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करता है। आर्त, अर्थार्थी शास्त्रके अनुसार नैतिक, आर्थिक उपायोंका प्रयोग करता है, फिर भी 'मामनुस्मर युध्य च' (गीता ८।७)-के अनुसार अपने अस्त्र-शस्त्रबलका गर्व, बुद्धि और बाहुबलके घमण्डको छोड़कर, ईश्वरका आश्रयण करना पड़ता है; क्योंकि ईश्वरके अनुकूल होनेपर ही सम्पूर्ण लौकिक उपायोंकी सफलता होती है। भगवदुपेक्षित प्राणीके लिये सम्पूर्ण उपाय भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसीलिये माता-पिताके द्वारा अनेक उपचारोंसे लालन-पालन करते रहनेपर भी बालकोंकी मृत्यु देखी जाती है। चिकित्सकोंके अनेक उपचार करनेपर भी रोगी मरते दिखते हैं। अतएव— बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः। (श्रीमद्भा० ७।९।१९) मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजना॥ मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥ (रा०च०मा० ३।२।६-८; ५।२३।५-६) अतः साधन-सम्पन्नोंको भी श्रीभगवान्‌का आश्रयण आवश्यक है। फिर तो जो साधन-विहीन हैं, उनके लिये तो सिवा भगवान्‌के और सहारा ही क्या है? जैसे एक वीतराग तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य केवल भगवान्‌के ही सहारे रहता है, उसके सम्पूर्ण योगक्षेमका भगवान् ही निर्वाह करते हैं— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता ९।२२) अनन्य भावनासे भगवान्‌की आराधनामें तत्पर प्राणियोंका अप्राप्त-अभीष्टप्राप्तिरूप योग और प्राप्तरक्षणरूप क्षेम श्रीभगवान् ही पूरा करते हैं। वैसे ही साधन-विहीन विश्वासी आर्त-अर्थार्थीके भी एकमात्र भगवान् ही सहारा हैं। अतः उसके भी योग-क्षेमको भगवान् ही वहन करते हैं। परंतु भारतकी स्थिति तो आज उससे भी अधिक चिन्तनीय है। वह तो आज आत्माराम कृतकृत्य नहीं, निष्काम मुमुक्षु नहीं, साधन-सम्पन्न आर्त एवं अर्थार्थी नहीं, इतनेपर भी भगवद्विश्वासी नहीं अर्थात् आर्त-अर्थार्थी होनेपर भी आर्तिनिवृत्ति और अर्थप्राप्तिके लिये अपेक्षित साधनोंसे भी रहित है। ऐसी स्थितिमें भी निराश्रय निष्कपटभावसे भगवान्‌को पुकारनेसे काम चल सकता था, परंतु इस समय भगवान्‌से विश्वास

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०७

उठ गया है। गिरते समय प्राणीके हाथ-पाँव यद्यपि स्वभावसे ही किसी सहारेको टटोलने लगते हैं और दुनियाके सम्पूर्ण सहारोंके कमजोर होनेपर, एकमात्र भगवान्‌का ही बल रह जाता है। अतः स्वाभाविक रूपसे भगवान्‌का आश्रयण ही शेष रह जाता है। फिर भी जब ब्रह्मा, शेष आदिके कहनेपर भी भगवान्‌के पुकारनेमें विश्वास न हो तो इसे राष्ट्रका दुर्भाग्य ही समझना चाहिये। रहा यह कि जप, पाठ, पूजा करते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट गया, विश्वनाथ भाग गये, हिन्दू जातिका सर्वस्व लुट गया; फिर ईश्वर या धर्मको पुकारनेसे क्या लाभ ? परंतु यदि ठण्डे दिलसे विचार करें तो इस शंकाका कुछ भी महत्त्व नहीं है। पहले तो यह सोचना चाहिये कि क्या किसी उपायके कभी असफल हो जानेमात्रसे, सर्वदाके लिये उसे व्यर्थ और बेकाम समझ लेना उचित है ? क्या कभी वायुयानके फेल हो जाने या किसी यन्त्रके कल- पुर्जोंके बेकार हो जानेपर सर्वदाके लिये उनको बेकार समझ लिया जाता है ? देखते तो यह हैं कि बार- बार वायुयानों, मोटरों, रेलों तथा अन्यान्य यन्त्रोंके बेकार या हानिकारक होनेपर भी उनका निर्माण और संचालन बन्द नहीं हुआ। बड़े-बड़े आविष्कारक वैज्ञानिक बार-बार विफल होनेपर भी प्रयत्नका पीछा नहीं छोड़ते, फिर लाखों सफलताके भी तो उदाहरण विद्यमान हैं, फिर उनके आधारपर विश्वास ही क्यों न किया जाय ? असफलताका कारण कोई त्रुटि ही समझी जाती है। किसी यन्त्रके एक छिद्र या कीलोंकी गड़बड़ी या कमी-वेशीसे वह व्यर्थ या हानिकारक हो सकता है। इसी तरह जो कार्य-कारण-भाव अपौरुषेय अतएव भ्रम-प्रमादादि स्पर्शसे शून्य, प्रामाणिक शास्त्रसे सिद्ध है, कतिपयस्थलीय व्यभिचारदर्शनमात्रसे उसका विघटन नहीं समझा जा सकता। जैसे वैज्ञानिक- निर्दिष्ट पद्धतिसे विपरीत किंचित् भी उलट-फेर होनेपर यन्त्र-संचालन और निर्माण व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक समझे जाते हैं, वैसे ही शास्त्र-निर्दिष्ट पद्धतिमें किंचित् भी गड़बड़ी होनेपर जप, पाठ, पूजा आदि धर्म बेकार या हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेमात्रसे ही उन शास्त्रोंका अप्रामाण्य या उन जप, पाठ, पूजाओंमें सर्वदाके लिये अश्रद्धा कदापि उचित नहीं। जब अनेक स्थलोंमें वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धतिसे काम करनेपर सफलता देखी जा चुकी है, तब तो स्पष्ट ही है कि जहाँ कहीं यन्त्रोंकी विफलता या हानिकारकता देखी जाय, वहाँ संचालन, निर्माणमें ही कर्तृ-क्रियादिकी विगुणता या अन्यान्य किसी प्रकारकी त्रुटिकी ही फल-बलसे कल्पना करना उचित है। इसी तरह जप, पाठ, पूजा आदि किन्हीं भी प्रामाणिक शास्त्रोक्त उपायोंको जब अनेक स्थलोंमें सफल होते देख रहे हैं तो कतिपय स्थलोंमें व्यर्थता देखकर फल-बलसे ही उनके अनुष्ठानमें या साधनोंमें या कर्ताओंमें अवश्य ही किसी प्रकारकी त्रुटि समझ लेनी चाहिये। चिकित्सकोंके शास्त्रोक्त अनेक उपाय कहीं व्यर्थ हो जाते हैं, साथ ही कहीं हानिकारक भी साबित होते हैं तो भी वे उपाय सर्वदा व्यर्थ और सर्वदाके लिये हानिकारक हैं, यह समझना भारी भूल है। किंतु यही समझना उचित है कि जब यह अनेक स्थलोंमें सफल होते हैं तो प्रयोक्ता या प्रयोगकी ही कोई त्रुटि होनेसे कहीं विफल होते हैं। इस तरह सहजहीमें समझा जा सकता है कि जब अनेक जगह पूजा, पाठ, जप आदिकी सफलता प्रत्यक्ष ही देखी जाती है, फिर भी कहीं सोमनाथ आदि स्थलोंमें यदि पूजादिकी व्यर्थता हुई तो इससे प्रयोक्ताओं या प्रयोगोंमें ही त्रुटिकी कल्पना कर लेनी चाहिये, न कि पूजादि उपायोंको ही सर्वदाके लिये व्यर्थ और हानिकारक मान लेना चाहिये। अध्यक्षों और पूजकोंके अत्याचारों, अनाचारों और मन्दिरोंके अपचारोंसे मूर्तिमेंसे देव-तत्त्व हट जाता है। अनुष्ठानोंमें, मन्त्रोच्चारणमें किसी तरहकी गड़बड़ी या अनुष्ठाताओंके आचार- विचारोंमें गड़बड़ीसे अनुष्ठान व्यर्थ और हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेसे ही सब अनुष्ठान वैसे ही नहीं समझे जा सकते। इसके सिवा जैसे दो मल्लोंके

७०८ भक्तिसुधा युद्धमें प्रबल मल्लकी विजय, दुर्बलका पराभव होता है, वैसे ही किसी अनर्थको दूर करनेके लिये किये गये पुरुषार्थसे, अनर्थके जनकभूत प्रारब्ध कर्मसे संघर्ष होता है। यदि पिछले अनर्थारम्भक कर्मोंकी प्रबलता रही और अनर्थ-निवारक वर्तमान पुरुषार्थ कमजोर रहा तो पुरुषार्थकी व्यर्थता हो जाती है; परंतु यदि अनर्थारम्भक प्रारब्ध कर्मोंसे पुरुषार्थ प्रबल हुआ तो अवश्य ही सफलता मिलती है। भेद यही है कि प्रारब्ध कर्म अब घटाये-बढ़ाये नहीं जा सकते, पुरुषार्थ बढ़ाया जा सकता है। अतः पुरुषार्थसे कभी भी निराश होनेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी अनुष्ठान, पूजन, भजन यदि तीव्र संवेगसे शुद्ध प्रयोक्ताद्वारा सुचारु रूपसे किया जाय तो वह अवश्य सफल होता है। जहाँ कहीं विफलता होती है, वहाँ उपर्युक्त त्रुटियोंकी ही कल्पना उचित है। अनुष्ठानादिमें अविश्वास उचित नहीं है। नैयायिकोंने भी शास्त्रोंके कुछ कर्मोंकी विफलता देखकर उनमें कर्तृ-क्रियादि वैगुण्यकी ही कल्पना की है। जो कहा जाता है कि ‘सोमनाथ आदिके मन्दिर तोड़नेवालोंको कुछ भी दण्ड न मिला’ सो ठीक ही है। एक बार काशीके एक योग्य विद्वान्‌ने मुझसे कहा कि ‘आज दुर्गाजीकी चाँदीकी आँखोंको चोर चुरा ले गये। महाराज! यदि दुर्गाजीसे अपने ही आँखकी रक्षा न हुई, तब वे हम सबकी रक्षा कैसे कर सकेंगी?’ किसी एक और व्यक्तिने शिवजीपर चढ़े हुए अक्षत या फलोंको ले जाती हुई मूषिकाको देखकर यह समझ लिया था कि ‘मूर्तिपूजा व्यर्थ है, मूर्तिमें देवत्व नहीं है।’ ऐसी बातोंपर विचार करनेसे विदित होता है कि यह कितनी मोटी दृष्टिकी बात है। व्यापक परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र ही रहता है, सम्पूर्ण विश्व उन्हींमें रहता है। सोना, उठना, बैठना सम्पूर्ण कर्म उन्हींमें होता है। जिस तरह गर्भस्थ बालककी सम्पूर्ण चेष्टाएँ माँके गर्भमें ही होती हैं, फिर भी माता कुपित नहीं होती। वैसे ही जीवोंकी अनेक हलचलें उसी परमात्मामें होती हैं, ‘क्षमाशील परमात्मा सबको ही सहन करता है।’ उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) ब्रह्माजी कहते हैं—‘हे अधोक्षज! गर्भगत बालकके पादोत्क्षेपणको जननी क्या अपराध मानती है? यदि नहीं तो अस्तिनास्ति व्यपदेशसे भूषित यह सम्पूर्ण विश्व क्या आपकी कुक्षिसे बाहर है?’ भगवद्ध्यानके प्रभावसे एक ज्ञानी प्राणी भी देहाभिमानशून्य होता है। उसके एक बाहुमें कोई कण्टक चुभाता है, दूसरे बाहुमें कोई चन्दन-लिम्पन करता है। वह उतना उदार, सहनशील एवं देहाभिमानशून्य होता है कि न अनुकूलाचरणवालोंपर प्रहृष्ट हो, न प्रतिकूलाचरणवालोंपर कुपित हो; फिर भी अपने-अपने कर्तव्यके अनुसार ही उन सबको यथासमय फल मिलता है। जब एक देहवाले भगवद्भक्त ज्ञानीकी ऐसी स्थिति है, तब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान्‌का तो कहना ही क्या है। उसके तो अपरिगणित देह हैं और वह महाज्ञानी सर्वत्र असंग और अभिमानशून्य है। वह किसीके सम्मान या अपमानमें किस तरह क्षुब्ध हो सकता है? भावुक लोग शास्त्रोंके आज्ञानुसार उसकी अनन्तानन्त प्रतिमाओंका निर्माणकर मन्त्रोंसे आवाहन, प्रतिष्ठापनादिद्वारा उसकी आराधना करते हैं और अपने कर्मके अनुसार ही यथाकाल फल पाते हैं। शास्त्रके अनुसार मन्त्रों एवं आराधनाओंके अनुसार पूजा-ग्रहण करने और फल देनेके लिये ही भगवान्‌का उन मूर्तियोंमें प्राकट्य होता है। कोई उन मूर्तियोंका अपमान करके भगवान्‌का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। जिस तरह सूर्यपर निष्ठीवन करनेसे वह सूर्यपर न जाकर अपने ही ऊपर पड़ेगा, आकाशपर मुष्टिप्रहार या तलवारका चलाना बेकार है, वैसे ही भगवान्‌पर प्रहार या उनकी मूर्तियोंका तोड़ना बेकार

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा? [पृ. ७०९]

है। अनन्त मूर्तियोंमें रहनेवाले भगवान् विश्वमूर्ति एवं अमूर्ति भगवान् इतने उदार और क्षमाशील तो हैं ही कि मूर्ति तोड़नेवालोंके कर्म ही उन्हें फल देते हैं। साधारण व्यक्ति जैसे असहिष्णु कोई भी शासक नहीं होते, फिर परमेश्वरकी तो बात ही दूसरी है। किन्हीं कर्मोंके फल अवसरके अनुसार ही होते हैं। 'ओडायर' की हत्या करनेवाला व्यक्ति तत्काल ही पकड़ लिया गया था; परंतु तत्क्षण ही उसे फाँसी नहीं दी गयी, न गोलीसे उड़ाया गया। बाकायदे न्यायालयमें न्याय हुआ। फिर दण्ड निश्चित हुआ। यथाकाल दण्ड दिया गया। जब प्राकृत शासकोंमें भी इतनी सहिष्णुता और काल-प्रतीक्षा होती है, तब फिर परमेश्वर ही सहिष्णु और कालप्रतीक्षक क्यों न हों? सम्राट्, स्वराट्, विराट् या गवर्नर, कमिश्नर आदि कोई भी अपने अपमान करनेवाले व्यक्तिको स्वयं पकड़ने या तत्क्षण दण्ड देनेमें नहीं प्रवृत्त होते, किंतु उनके कर्मचारी लोग ही उसे पकड़नेमें प्रवृत्त होते हैं। वे ही न्यायाध्यक्षका न्याय पाकर यथाकाल दण्ड देते हैं। इसी तरह ईश्वरकी मूर्तियोंका अपमान करनेवालोंको तत्क्षण ही परमेश्वर दण्ड नहीं देता; किंतु उसके कर्मचारी ही यथाकाल दण्ड देते हैं। कितने ही अज्ञ कहा करते हैं कि 'यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् हो तो मैं उसे गाली देता हूँ, उसकी मूर्तिको तोड़ता हूँ, मेरे सामने आये या मेरा मुँह बन्द कर दे।' परंतु सोचना यह चाहिये कि यदि बड़े-बड़े तपस्वी युगयुगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंकी तपस्याके पश्चात् उसका दर्शन पाते हैं, अनन्त तपस्याओंसे उसका अस्तित्व निर्णय कर पाते हैं, फिर वह इन अज्ञोंके कहनेमात्रसे कैसे प्रकट हो या उनके कथनानुसार उनका मुँह कैसे बन्द करे? क्या किसी सम्राट्को ऐसा कहनेपर वह प्रवृत्त होगा? वस्तुतः जैसे सावधान पुरुष उन्मादी या बालककी बातोंपर ध्यान न देकर उसपर कृपा ही करता है, वैसे परमेश्वर भी कृपा ही करते हैं, ‘जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥’ (रा०च०मा० ७।१।५) द्वित, त्रित आदि महर्षियोंने किसी यज्ञमें भगवान्‌को प्रकट करनेकी प्रतिज्ञा कर ली; परंतु जब भगवान् प्रकट हुए, तब वे शाप देनेको प्रस्तुत हुए, इसपर ऋषियोंने समझाया कि वे प्रभु भक्तिसे ही प्रकट हो सकते हैं, अहंकारसे नहीं। अतः ऐसा करना साहस है। हिरण्यकशिपु आदिको भी मारनेके लिये भगवान्‌का प्रह्लादकी भावनासे प्राकट्य हुआ— सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ (रा०च०मा० २।२६५।५) इसके अतिरिक्त वे भगवान्‌के नित्यपार्षद हैं, भगवान्‌की लीलाके अंग होकर ही उनका जन्म था। इसलिये उनके लिये भगवान्‌का प्राकट्य ठीक है; परंतु साधारण जन्तुओंके लिये तो वैसा ही होगा, जैसे मच्छरको मारनेके लिये तोपका दागना। जिन कीटोंको भगवान्‌की कोई भी शक्ति पूर्ण दण्ड दे सकती है, उनके कहनेसे भगवान्‌का प्रकट होना अत्यन्त ही अनुपयुक्त है। इसलिये मूर्तिभंजकोंको दण्ड देनेके लिये भगवान्‌का प्राकट्य नहीं हुआ और न कोई चमत्कारपूर्ण तात्कालिक घटना घटी। चींटी, मूषिका आदिकी प्रवृत्ति अज्ञानपूर्विका होती है, चौरादिमें भी अज्ञानकी ही बहुलता है। अतः उनकी स्थिति क्षम्य ही है; किंतु विद्वेषाभिनिविष्टचेष्टाओंको यथाकाल दण्ड भोगना पड़ा ही। सुना जाता है, औरंगजेबने मरते समय अपने पुत्रको पत्र लिखकर अपना दुःख बड़े दैन्यपूर्ण शब्दोंमें निवेदन किया और सोमनाथके मन्दिरको तोड़नेवाला महमूद गजनवी मरनेके समय अपने सामने सोने-चाँदीका ढेर लगवाकर (जिसे वह लूट लाया था) खूब रोया था। कहीं-कहीं लोगोंको बहुत सन्देह हो जाता है, जब वे देखते हैं कि अत्याचारी प्रसन्न हैं और सदाचारी धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं। परंतु यह निश्चय रखना चाहिये कि जैसे विषवृक्षमें विषका ही फल लगता है, अमृतफल नहीं; वैसे ही पापसे दुःख ही होगा, सुख नहीं; पुण्यसे सुख ही होगा, दुःख नहीं। हाँ, विलम्ब हो सकता है। कोई भी बीज अपना फल

७१० भक्तिसुधा देनेमें कुछ काल ले सकता है: परंतु यह कभी नहीं हो सकता कि विषवृक्षमें अमृतका फल लगे। कोई प्राणी चैत्रमें भले ही मटर या चना बोता हो, परंतु यदि उसने कार्तिकमें गेहूँ बोया है तो उसे चैत्रमें काटनेको तो गेहूँ ही मिलेगा। इसी तरह कोई प्राणी भले ही अधर्म-अत्याचार कर रहा हो: मूर्ति तोड़कर, शास्त्र- धर्म तोड़कर पाप करता हो: परंतु इस समय फल तो वही भोगनेको मिलेगा जैसा कर्म पहले कर चुका है। हाँ, उग्र पापों और पुण्योंका फल जल्दी मिलता है; परंतु वह भी कुछ तो अवसरकी प्रतीक्षा करता ही है। त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैस्त्रिभिर्दिनैः। अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते ॥ (हितोपदेश १२८) इसीलिये नल, राम, युधिष्ठिरादि धर्मनिष्ठ होते हुए भी दुःखी थे। रावण, दुर्योधनादि विपरीतगामी होनेपर भी सुखी थे। परंतु अन्तमें उन्हें अपने पापोंका भी फल भोगना पड़ा ही। राम, युधिष्ठिरादि सुखी हुए, रावणादिका सर्वनाश हो गया। सौ लख पूत सवा लख नाती। तेहि रावन के दिया न बाती ॥ ऐसे ही औरंगजेब आदिकी भी पूर्वजन्मकी तपस्या थी, उसीके प्रभावसे उन लोगोंका उतना तेज और वैभव था। जबतक उसकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक उनका पराभव असम्भव था। सामान्यतः यही होता है कि तपस्यासे राज्य और राज्यसे नरक होता है। जब प्राणी पीड़ित, पददलित, उच्छोषित, विताड़ित होता है, तब उसे न्याय, धर्म और ईश्वर सूझता है। ऐसा होते ही कुछ उन्नति और प्रभुता होती है; बस, उसी समय अपने-आपको सँभालना बुद्धिमानी है। अधिकारकी कुर्सी मिलते ही न्याय, धर्म और ईश्वरको भूल जाते हैं। नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ (रा०च०मा० १।६०।८) बस, उसी समय रावण, औरंगजेब-जैसी प्रवृत्ति होने लगती है। परमेश्वरीय दण्ड उन्हें मिलता है; परंतु न्यायकारी परमेश्वर कालकी प्रतीक्षा करके ही—शुभकर्मोंका फल भोग लेनेपर ही उन्हें अशुभ कर्मोंका फल प्रदान करते हैं। श्रीहनुमान्ने रावणके विचित्र वैभवको देखकर यही निश्चय किया कि 'अहो ! यदि इसमें अधर्म बलवान् न होता तो यह शक्रसहित समस्त लोकपालोंका स्वामी ही होनेयोग्य था'— यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः। स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ लोकपाल भयभीत होकर इसके भ्रुकुटीका ही विलोकन करते रहते हैं— कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥ (रा०च०मा० ५।२०।७) हनुमान्जीने समझाया कि रावण ! तुमने बहुत कुछ सत्कर्म किया है, उसका फल तुम्हें प्राप्त है— उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ (रा०च०मा० ६।२०।३-४) परंतु अब अधर्मके फलभोगका समय आ रहा है, सावधान हो जाओ। तात्पर्य यही कि अत्याचारीको भी अपने असत्कर्मोंका फलभोग मिलता है, अवसर पाकर सत्कर्मोंका भी फल मिलता है। ऐसे ही धर्मात्माको भी पिछले प्रारब्ध—तीव्रतम अधर्मका भी फल भोगना पड़ता है। जो कहा जाता है कि भारत 'धर्म-धर्म' चिल्लाता है तो भी उसका पतन-ही-पतन दृष्टिगोचर होता है। दूसरे देश धर्मका नाम भी नहीं लेते, फिर भी हमपर शासन कर रहे हैं। परंतु यह भी अविचारित-रमणीय बात है। 'दूरके ढोल सुहावने लगते हैं।' यह हम कह चुके हैं कि जहाँ भी कहीं उन्नति देखो, वहाँ उसके मूलभूत धर्मकी कल्पना कर लेनी चाहिये। विषवृक्षमें अमृतफल कदापि नहीं लगता। जहाँ धर्मकी चर्चा नहीं, वहाँ ऐसी-ऐसी भयानक विपत्तियाँ आती हैं कि नगर-के-नगर ज्वालामुखियोंमें जल जाते हैं। कभी-कभी बड़े-बड़े देश-के-देश अकस्मात् धरातलमें विलीन हो जाते हैं,

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७११

कभी समुद्रकी गोदमें दिखायी देते हैं। कभी भयानक संग्रामोंसे आपसमें ही कट मरते हैं, शान्तिकी दृष्टिसे आज भी भारतमें और देशोंकी अपेक्षा गनीमत है। आध्यात्मिकता और धार्मिकताका ही फल है कि आज भी यहाँ लूट-खसोटकर दूसरोंकी सम्पत्तियोंको आत्मसात् करनेमें संकोच है। यहाँकी सभ्यता- संस्कृति आज भी बची है। संसारमें हजारों संस्कृतियाँ उत्पन्न होकर मिट गयीं; परंतु प्राचीनतम भारतीय संस्कृति आज भी सुरक्षित है। आज भी भौतिक दृष्टिमें कितने ही बढ़े- चढ़े देशोंके समझदार विद्वान् भारतसे बहुत कुछ आशा कर रहे हैं। कितने ही पाश्चात्य विद्वान् शान्ति-सुखके लिये बराबर भारतकी शरण आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त आज तो ऐसा कोई भी राष्ट्र और समूह नहीं है, जो धर्म या ईश्वरको किसी-न-किसी रूपमें न स्वीकार करता हो। धर्मवादिनी, ईश्वरवादिनी संस्थाओंको गैरकानूनी करार देनेवालों, ईश्वर और धर्मको साम्यविरोधी समझकर अपने देशसे निकल जानेका आदेश देनेवालोंने भी आज परमेश्वरको पुकारना प्रारम्भ किया है। लाखों वैज्ञानिक, हजारों विज्ञानशालाएँ जिनके आज्ञानुसार सफल प्रयोगोंमें तत्पर हैं, उन लोगोंने भी अस्त्र-शस्त्र, संगठन-बल, बाहु-बल, बौद्ध-बलसे सम्पन्न होकर भी आज परमेश्वरको पुकारनेमें अपना और अपने राष्ट्रका कल्याण समझना आरम्भ कर दिया है। ऐसी स्थितिमें भारतको आज धर्म और माला-जपकी आवश्यकता न प्रतीत हो, यह आश्चर्य है। जो कहा जाता है कि यहाँ आज भी धर्मके नामपर सब देशोंसे अधिक धन और समयका व्यय होता है, सो अवश्य ठीक है। परंतु सदुपयोग, दुरुपयोग नामकी भी तो कोई वस्तु है। यह स्पष्ट ही है कि अधिकतर धन और समयका धर्मके नामपर अपव्यय होता है। अपरिगणित धर्मादेकी सम्पत्तियोंका दुरुपयोग हो ही रहा है। यदि धर्मके यथार्थ स्वरूपका प्राकट्य या सच्छास्त्रोंके प्रचारसे अविद्यानिरसनमें उनका उपयोग हो तो सचमुच लाभ हो सकता है। तात्पर्य यह है कि शास्त्रके अनुसार शुद्ध भावनासे ही किया गया जप, तप, धर्मानुष्ठान लाभदायक होता है। अन्यथा देखते ही हैं कि धुन्धुने बहुत कालतक अनन्त तप किया था, परंतु भावना वेदादि शास्त्रों और धर्मके विरोधकी थी, इसीलिये उस तपका भी अन्तिम पर्यवसान उत्तम नहीं हुआ। सदुपयोगसे एक पैसेका भी दान लाभदायक होता है, दुरुपयोगसे हानिकारक होता है। एक पैसा दान देकर कोई रूई खरीदकर बत्ती-निर्माणकर ठाकुरजीकी आरती करता है; कोई एक पैसा पाकर बंसी खरीदकर मत्स्य मारता है। कोई अरबपति अहंकारसे प्रतिष्ठामात्रके लिये लाखोंका दान कर सकता है। बाह्य प्रयोजन उससे अधिक सम्पन्न हो सकते हैं। परंतु भावनाकी विशेषता उस दानमें नहीं है। एक वृद्धा गरीबनी श्रद्धासे अपने अर्ध सेटक अन्नसे छटाँक अन्नका दान करती है। भावनाकी दृष्टिसे अरबपतिके लक्षदानसे इस छटाँक दानका महत्त्व कहीं अधिक है। आज जहाँ साँपकी चर्बी, मछलीके तेलको घृतरूपमें विक्रय करके करोड़ों रुपयोंका लाभ प्राप्त कर लेनेपर लाखोंका दान किया भी गया तो वह कितने महत्त्वका हो सकता है ? उस दानको लेनेवालों, खानेवालोंकी क्या दशा होगी ? इसके अतिरिक्त आज दानके नामपर पापमयी संस्थाएँ भी तो चल रही हैं, जहाँसे नास्तिकोंका सृजन होता है, जहाँसे नास्तिकता तथा तन्मूलक धर्मका प्रचार होता है—ऐसी भी संस्थाएँ दान और धर्मके ही नामपर चल रही हैं। इस प्रकारके दान और धर्मसे देशको सुख-शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? अर्थ-काम-परायण संसार अर्थ-कामके सम्पादनमें तो अपना सम्पूर्ण पुरुषार्थ लगा देता है, परंतु धर्म और मोक्षको दैव या प्रारब्धपर छोड़ देता है। जितनी सावधानी और चतुरता है, सब अर्थ- काममें ही उपयुक्त की जा रही है। 'एक राजाके दो मन्त्री थे, एक व्यापार कार्यमें दक्ष, दूसरा संग्राममें दक्ष था; परंतु अनभिज्ञतावश राजाने उनका विपरीत

७१२ भक्तिसुधा

उपयोग किया। व्यापारनिपुणको संग्राममें, संग्रामनिपुणको व्यापारमें लगा दिया, जिसका फल व्यापारमें हानि और संग्राममें पराजय हुई।' इसी तरह हमने अर्थ- काम-सम्पादनमें चतुर प्रारब्धको धर्म, मोक्षमें लगा दिया; धर्म-मोक्ष-सम्पादनमें चतुर पुरुषार्थको अर्थ- काममें नियुक्त कर दिया है। इसीलिये दोनोंके विषयमें गड़बड़ी हो रही है। वस्तु और अवसरका दुरुपयोग होनेसे हानियोंका ठिकाना नहीं रहता। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और ईश्वर बड़ी उत्तम चीज हैं, परंतु इन्हींका दुरुपयोग करनेसे अनर्थ हो सकता है। ईश्वर और धर्मके सहारे सामाजिक, लौकिक विचारणीय स्थितिकी उपेक्षा बुरी है। समाज-राष्ट्रके हितका प्रश्न आनेपर वैराग्य और विश्वमिथ्यात्व भावनाका प्राधान्य खतरनाक है; जब कि भोजन-पानादिसे वैसा उत्कट वैराग्य नहीं है। आज कितने ही व्यक्ति तो साधुओंको धर्म- संस्कृतिके रक्षणमें अप्रवृत्त देखकर उन्हें कोसते हैं। कितने ऐसे भी हैं, जो दुनियाके अनर्थ करनेमें, प्रपंच रचनेमें किंचित् भी संकोच नहीं करते; परंतु धर्म- संस्कृतिके रक्षणार्थ उद्योगको प्रपंच ही मानते हैं। राष्ट्र और विश्वकी शान्तिको असम्भव और तदर्थ प्रयत्न करनेवालोंको सर्वथा स्वार्थपरायण ही सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं। विशेषतः गृहस्थों और युवकोंका कार्यकालमें वैराग्य, असमर्थोंका कार्यमें राग होना हानिकारक है। आज भी शास्त्र और धर्मको सरपंच मानकर, शास्त्र और धर्मका प्रसार करते हुए, उसीके आधारपर यदि संगठन किया जाय तो सम्पूर्ण अनर्थ दूर हो सकता है। परंतु शास्त्र जाननेवाले और धर्ममें प्रेम रखनेवाले इस ओरसे अत्यन्त अपरिचित और विमुख हो रहे हैं। शास्त्र और धर्मसे अपरिचित ही उच्छृंखल मार्गसे संघटन करना और विश्वकी समस्या हल करना चाहते हैं। दूसरेके गुणोंको न देखकर दोषोंका ही दर्शन करते हैं। अपने दोषोंका बिलकुल चिन्तन न करके गुण ही देखना चाहते हैं। शास्त्रज्ञ धार्मिक जन शास्त्रोक्त-मार्गके अनुसार चलकर राष्ट्र या संसारका पथप्रदर्शन नहीं करना चाहते। शास्त्र और धर्मके रहस्य और महत्त्वको न समझनेवाले लोग, धर्मों और शास्त्रोंमें आमूलचूल परिवर्तन करना चाहते हैं। वे श्रौतस्मार्तवर्णाश्रम- धर्मकी बातोंको आज अनावश्यक समझते हैं। भगवदाराधनामें अपेक्षित परम मांगलिक घण्टा- शंख-निनादको 'टन-टन', 'पों-पों' कहकर प्रहसन करते हैं। मठाधीश, मन्दिराधिपति, जागीरदार, सन्त- महन्त अपने द्रव्योंको धर्मकार्यमें, संस्कृत विद्यालय, पुस्तकालय तथा धर्म-प्रचार कार्यमें नहीं लगाना चाहते तो दूसरे उन सबको छीनकर सत्कार, पूजा आदिको हटाकर या साधारण करके स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं। विधवाश्रम, हरिजन फण्ड, अनाथालय तथा अस्पतालमें सब कुछ लगाना चाहते हैं। यदि आस्तिक अपनी माता, बहनोंको सावित्री, सीता-जैसी साध्वी बनानेका प्रयत्न नहीं करते तो दूसरे लोग विलायती लेडी बनानेमें सफल होना ही चाहते हैं। हम इतना ही कहना चाहते हैं कि समय रहते लोगोंको सावधान हो जाना चाहिये। लोग बड़े गर्वके साथ कहते हैं कि 'अब गत शताब्दियोंके दिन लद गये। आजके वैज्ञानिक युगमें पुराने जमानेके सड़े- गले नियमोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्यको चाहिये कि दुनियाके परिवर्तनके साथ ही अपने- आपको परिवर्तित करते चलें। देश-कालकी परिस्थितिके अनुसार धर्म, कर्म और शास्त्रका निर्माण होना चाहिये।' इन लोगोंकी बातोंपर ध्यान दिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह विचार भी अब पुराने होते जा रहे हैं; तथापि जैसे सावनके अन्धेको ग्रीष्ममें भी हरियालीकी ही प्रतीति होती है, वैसे ही आजके लोगोंकी धारणा है। जिन विचारों और आचारोंको पाश्चात्य लोग भी छोड़ रहे हैं, भारतके नक्काल आज भी उन्हींकी नकल उतारनेमें तथा पाश्चात्योंकी भद्दी नकल उतारनेमें परेशान हैं। धार्मिकता, आध्यात्मिकतासे शून्य वैज्ञानिक-सभ्यताके दुष्परिणामसे

पाश्चात्य विद्वान् भी उद्विग्न हो रहे हैं, वे लोग भी धर्म और ईश्वरकी आवश्यकता समझ रहे हैं। परंतु भारतीयोंको आज भी नवीन सभ्यताका ही स्वप्न दीखता है। संसारमें कोई चीज पुरानी या नयी होनेसे ही आदरणीय नहीं होती; किंतु उसके गुणागुणकी ओर अच्छी तरहसे ध्यान देना चाहिये— ‘सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।’ पृथ्वी, आकाश, वायु और आत्मा पुराने ही हैं; परंतु क्या इतनेसे ही ये सब हेय हैं? भोजन करके भूख मिटाने और पानी पीकर प्यास मिटानेकी पद्धति पुरानी ही है, फिर भी क्या त्याज्य है? रोग, विपत्ति नवीन होनेपर भी क्या आदरणीय है? यदि नहीं, तब तो अनादि अपौरुषेय वेदादि सच्छास्त्रोंद्वारा प्रदर्शित मार्गसे लौकिक-पारलौकिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करना ही उचित है। जो मार्ग शास्त्रोक्त न भी हो, फिर भी शास्त्रके अविरुद्ध हो तो काममें लाया जा सकता है। वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्रके अध्ययन-अध्यापनका प्रचार होनेपर सब तरहकी समस्याओंका समाधान हो जाता है। कोई भी मार्ग, यदि वह परिणाममें हानिकारक न हो, तभी स्वीकृत होना चाहिये। जिस विषसंयुक्त भोजनसे अन्तमें मौतके मुँहमें पड़ना पड़े, फिर भले ही उससे तात्कालिक तुष्टि, पुष्टि, क्षुन्निवृत्ति भी हो तो क्या लाभ ? जिस शास्त्र या धर्म-विरुद्ध उपायसे तात्कालिक लाभ भी हो; परंतु यदि अन्तमें पतन हो तो उससे क्या लाभ ? इसीलिये तो बुद्धिमानोंने अनर्थानुबन्ध, अकर्मानुबन्ध, अननुबन्ध अर्थको छोड़कर अर्थानुबन्ध और धर्मानुबन्ध अर्थको ही श्रेष्ठ समझा है। धर्मोल्लंघन करके प्राप्त किये गये अर्थको अनादरणीय बतलाया है। अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्। अनुल्लङ्घ्य सतां मार्गं यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ‘दूसरोंको सन्ताप न पहुँचाकर, खलोंके घर न जाकर, सज्जनोंका मार्गलंघन न करके जो थोड़ी भी चीज है, वही बहुत बड़ी समझनी चाहिये। अतिक्लेशेन ये ह्यर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च। शत्रूणां प्रणिपातेन मा च तेषु मनः कृथाः ॥ ‘अतिक्लेशसे, धर्मोल्लंघनसे, शत्रुप्रणिपातसे जो अर्थ मिलता हो, उसमें कभी भी मन न लगाना चाहिये।’ आस्तिकों, शास्त्रज्ञोंका यह आग्रह नहीं कि कोई नवीन मार्ग सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय उत्थानके लिये न ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई सरल- सुगम-निर्विघ्न उपाय प्राप्त होता हो तो शास्त्रोक्त मार्गकी कठिनाईका अनुभव क्यों करें ? ‘अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्।’ ‘यदि गृहकोणमें मधु मिल जाय तो मधुके लिये पर्वतपर क्यों जाया जाय ?’ परंतु यदि शास्त्रविरुद्ध मार्गसे परिणाममें पतन और नरकादि दुःख भोगना पड़े, तब तो उसकी उपेक्षा उचित ही है। यही अध्यात्मवादी आस्तिकोंकी भौतिकवादियोंसे विशेषता है। भौतिकवादी सामाजिक या वैयक्तिक अभ्युत्थानके मार्गका निर्धारण करते हुए धार्मिक-आध्यात्मिकके हानि-लाभकी चिन्ता नहीं रखते। अध्यात्मवादी, धर्मवादी लोग भी पूर्णरूपसे राष्ट्रीय, सामाजिक अभ्युत्थानका प्रयत्न करते हैं; परंतु सर्वदा यह ध्यान रखते हैं कि उसी उपायका अवलम्बन किया जाय, जिससे लाभकी अपेक्षा परिणाममें हानि न हो और परलोक न बिगड़े।