भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७११
कभी समुद्रकी गोदमें दिखायी देते हैं। कभी भयानक संग्रामोंसे आपसमें ही कट मरते हैं, शान्तिकी दृष्टिसे आज भी भारतमें और देशोंकी अपेक्षा गनीमत है। आध्यात्मिकता और धार्मिकताका ही फल है कि आज भी यहाँ लूट-खसोटकर दूसरोंकी सम्पत्तियोंको आत्मसात् करनेमें संकोच है। यहाँकी सभ्यता- संस्कृति आज भी बची है। संसारमें हजारों संस्कृतियाँ उत्पन्न होकर मिट गयीं; परंतु प्राचीनतम भारतीय संस्कृति आज भी सुरक्षित है। आज भी भौतिक दृष्टिमें कितने ही बढ़े- चढ़े देशोंके समझदार विद्वान् भारतसे बहुत कुछ आशा कर रहे हैं। कितने ही पाश्चात्य विद्वान् शान्ति-सुखके लिये बराबर भारतकी शरण आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त आज तो ऐसा कोई भी राष्ट्र और समूह नहीं है, जो धर्म या ईश्वरको किसी-न-किसी रूपमें न स्वीकार करता हो। धर्मवादिनी, ईश्वरवादिनी संस्थाओंको गैरकानूनी करार देनेवालों, ईश्वर और धर्मको साम्यविरोधी समझकर अपने देशसे निकल जानेका आदेश देनेवालोंने भी आज परमेश्वरको पुकारना प्रारम्भ किया है। लाखों वैज्ञानिक, हजारों विज्ञानशालाएँ जिनके आज्ञानुसार सफल प्रयोगोंमें तत्पर हैं, उन लोगोंने भी अस्त्र-शस्त्र, संगठन-बल, बाहु-बल, बौद्ध-बलसे सम्पन्न होकर भी आज परमेश्वरको पुकारनेमें अपना और अपने राष्ट्रका कल्याण समझना आरम्भ कर दिया है। ऐसी स्थितिमें भारतको आज धर्म और माला-जपकी आवश्यकता न प्रतीत हो, यह आश्चर्य है। जो कहा जाता है कि यहाँ आज भी धर्मके नामपर सब देशोंसे अधिक धन और समयका व्यय होता है, सो अवश्य ठीक है। परंतु सदुपयोग, दुरुपयोग नामकी भी तो कोई वस्तु है। यह स्पष्ट ही है कि अधिकतर धन और समयका धर्मके नामपर अपव्यय होता है। अपरिगणित धर्मादेकी सम्पत्तियोंका दुरुपयोग हो ही रहा है। यदि धर्मके यथार्थ स्वरूपका प्राकट्य या सच्छास्त्रोंके प्रचारसे अविद्यानिरसनमें उनका उपयोग हो तो सचमुच लाभ हो सकता है। तात्पर्य यह है कि शास्त्रके अनुसार शुद्ध भावनासे ही किया गया जप, तप, धर्मानुष्ठान लाभदायक होता है। अन्यथा देखते ही हैं कि धुन्धुने बहुत कालतक अनन्त तप किया था, परंतु भावना वेदादि शास्त्रों और धर्मके विरोधकी थी, इसीलिये उस तपका भी अन्तिम पर्यवसान उत्तम नहीं हुआ। सदुपयोगसे एक पैसेका भी दान लाभदायक होता है, दुरुपयोगसे हानिकारक होता है। एक पैसा दान देकर कोई रूई खरीदकर बत्ती-निर्माणकर ठाकुरजीकी आरती करता है; कोई एक पैसा पाकर बंसी खरीदकर मत्स्य मारता है। कोई अरबपति अहंकारसे प्रतिष्ठामात्रके लिये लाखोंका दान कर सकता है। बाह्य प्रयोजन उससे अधिक सम्पन्न हो सकते हैं। परंतु भावनाकी विशेषता उस दानमें नहीं है। एक वृद्धा गरीबनी श्रद्धासे अपने अर्ध सेटक अन्नसे छटाँक अन्नका दान करती है। भावनाकी दृष्टिसे अरबपतिके लक्षदानसे इस छटाँक दानका महत्त्व कहीं अधिक है। आज जहाँ साँपकी चर्बी, मछलीके तेलको घृतरूपमें विक्रय करके करोड़ों रुपयोंका लाभ प्राप्त कर लेनेपर लाखोंका दान किया भी गया तो वह कितने महत्त्वका हो सकता है ? उस दानको लेनेवालों, खानेवालोंकी क्या दशा होगी ? इसके अतिरिक्त आज दानके नामपर पापमयी संस्थाएँ भी तो चल रही हैं, जहाँसे नास्तिकोंका सृजन होता है, जहाँसे नास्तिकता तथा तन्मूलक धर्मका प्रचार होता है—ऐसी भी संस्थाएँ दान और धर्मके ही नामपर चल रही हैं। इस प्रकारके दान और धर्मसे देशको सुख-शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? अर्थ-काम-परायण संसार अर्थ-कामके सम्पादनमें तो अपना सम्पूर्ण पुरुषार्थ लगा देता है, परंतु धर्म और मोक्षको दैव या प्रारब्धपर छोड़ देता है। जितनी सावधानी और चतुरता है, सब अर्थ- काममें ही उपयुक्त की जा रही है। 'एक राजाके दो मन्त्री थे, एक व्यापार कार्यमें दक्ष, दूसरा संग्राममें दक्ष था; परंतु अनभिज्ञतावश राजाने उनका विपरीत