भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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उपयोग किया। व्यापारनिपुणको संग्राममें, संग्रामनिपुणको व्यापारमें लगा दिया, जिसका फल व्यापारमें हानि और संग्राममें पराजय हुई।' इसी तरह हमने अर्थ- काम-सम्पादनमें चतुर प्रारब्धको धर्म, मोक्षमें लगा दिया; धर्म-मोक्ष-सम्पादनमें चतुर पुरुषार्थको अर्थ- काममें नियुक्त कर दिया है। इसीलिये दोनोंके विषयमें गड़बड़ी हो रही है। वस्तु और अवसरका दुरुपयोग होनेसे हानियोंका ठिकाना नहीं रहता। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और ईश्वर बड़ी उत्तम चीज हैं, परंतु इन्हींका दुरुपयोग करनेसे अनर्थ हो सकता है। ईश्वर और धर्मके सहारे सामाजिक, लौकिक विचारणीय स्थितिकी उपेक्षा बुरी है। समाज-राष्ट्रके हितका प्रश्न आनेपर वैराग्य और विश्वमिथ्यात्व भावनाका प्राधान्य खतरनाक है; जब कि भोजन-पानादिसे वैसा उत्कट वैराग्य नहीं है। आज कितने ही व्यक्ति तो साधुओंको धर्म- संस्कृतिके रक्षणमें अप्रवृत्त देखकर उन्हें कोसते हैं। कितने ऐसे भी हैं, जो दुनियाके अनर्थ करनेमें, प्रपंच रचनेमें किंचित् भी संकोच नहीं करते; परंतु धर्म- संस्कृतिके रक्षणार्थ उद्योगको प्रपंच ही मानते हैं। राष्ट्र और विश्वकी शान्तिको असम्भव और तदर्थ प्रयत्न करनेवालोंको सर्वथा स्वार्थपरायण ही सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं। विशेषतः गृहस्थों और युवकोंका कार्यकालमें वैराग्य, असमर्थोंका कार्यमें राग होना हानिकारक है। आज भी शास्त्र और धर्मको सरपंच मानकर, शास्त्र और धर्मका प्रसार करते हुए, उसीके आधारपर यदि संगठन किया जाय तो सम्पूर्ण अनर्थ दूर हो सकता है। परंतु शास्त्र जाननेवाले और धर्ममें प्रेम रखनेवाले इस ओरसे अत्यन्त अपरिचित और विमुख हो रहे हैं। शास्त्र और धर्मसे अपरिचित ही उच्छृंखल मार्गसे संघटन करना और विश्वकी समस्या हल करना चाहते हैं। दूसरेके गुणोंको न देखकर दोषोंका ही दर्शन करते हैं। अपने दोषोंका बिलकुल चिन्तन न करके गुण ही देखना चाहते हैं। शास्त्रज्ञ धार्मिक जन शास्त्रोक्त-मार्गके अनुसार चलकर राष्ट्र या संसारका पथप्रदर्शन नहीं करना चाहते। शास्त्र और धर्मके रहस्य और महत्त्वको न समझनेवाले लोग, धर्मों और शास्त्रोंमें आमूलचूल परिवर्तन करना चाहते हैं। वे श्रौतस्मार्तवर्णाश्रम- धर्मकी बातोंको आज अनावश्यक समझते हैं। भगवदाराधनामें अपेक्षित परम मांगलिक घण्टा- शंख-निनादको 'टन-टन', 'पों-पों' कहकर प्रहसन करते हैं। मठाधीश, मन्दिराधिपति, जागीरदार, सन्त- महन्त अपने द्रव्योंको धर्मकार्यमें, संस्कृत विद्यालय, पुस्तकालय तथा धर्म-प्रचार कार्यमें नहीं लगाना चाहते तो दूसरे उन सबको छीनकर सत्कार, पूजा आदिको हटाकर या साधारण करके स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं। विधवाश्रम, हरिजन फण्ड, अनाथालय तथा अस्पतालमें सब कुछ लगाना चाहते हैं। यदि आस्तिक अपनी माता, बहनोंको सावित्री, सीता-जैसी साध्वी बनानेका प्रयत्न नहीं करते तो दूसरे लोग विलायती लेडी बनानेमें सफल होना ही चाहते हैं। हम इतना ही कहना चाहते हैं कि समय रहते लोगोंको सावधान हो जाना चाहिये। लोग बड़े गर्वके साथ कहते हैं कि 'अब गत शताब्दियोंके दिन लद गये। आजके वैज्ञानिक युगमें पुराने जमानेके सड़े- गले नियमोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्यको चाहिये कि दुनियाके परिवर्तनके साथ ही अपने- आपको परिवर्तित करते चलें। देश-कालकी परिस्थितिके अनुसार धर्म, कर्म और शास्त्रका निर्माण होना चाहिये।' इन लोगोंकी बातोंपर ध्यान दिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह विचार भी अब पुराने होते जा रहे हैं; तथापि जैसे सावनके अन्धेको ग्रीष्ममें भी हरियालीकी ही प्रतीति होती है, वैसे ही आजके लोगोंकी धारणा है। जिन विचारों और आचारोंको पाश्चात्य लोग भी छोड़ रहे हैं, भारतके नक्काल आज भी उन्हींकी नकल उतारनेमें तथा पाश्चात्योंकी भद्दी नकल उतारनेमें परेशान हैं। धार्मिकता, आध्यात्मिकतासे शून्य वैज्ञानिक-सभ्यताके दुष्परिणामसे