भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 723

पाश्चात्य विद्वान् भी उद्विग्न हो रहे हैं, वे लोग भी धर्म और ईश्वरकी आवश्यकता समझ रहे हैं। परंतु भारतीयोंको आज भी नवीन सभ्यताका ही स्वप्न दीखता है। संसारमें कोई चीज पुरानी या नयी होनेसे ही आदरणीय नहीं होती; किंतु उसके गुणागुणकी ओर अच्छी तरहसे ध्यान देना चाहिये— ‘सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।’ पृथ्वी, आकाश, वायु और आत्मा पुराने ही हैं; परंतु क्या इतनेसे ही ये सब हेय हैं? भोजन करके भूख मिटाने और पानी पीकर प्यास मिटानेकी पद्धति पुरानी ही है, फिर भी क्या त्याज्य है? रोग, विपत्ति नवीन होनेपर भी क्या आदरणीय है? यदि नहीं, तब तो अनादि अपौरुषेय वेदादि सच्छास्त्रोंद्वारा प्रदर्शित मार्गसे लौकिक-पारलौकिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करना ही उचित है। जो मार्ग शास्त्रोक्त न भी हो, फिर भी शास्त्रके अविरुद्ध हो तो काममें लाया जा सकता है। वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्रके अध्ययन-अध्यापनका प्रचार होनेपर सब तरहकी समस्याओंका समाधान हो जाता है। कोई भी मार्ग, यदि वह परिणाममें हानिकारक न हो, तभी स्वीकृत होना चाहिये। जिस विषसंयुक्त भोजनसे अन्तमें मौतके मुँहमें पड़ना पड़े, फिर भले ही उससे तात्कालिक तुष्टि, पुष्टि, क्षुन्निवृत्ति भी हो तो क्या लाभ ? जिस शास्त्र या धर्म-विरुद्ध उपायसे तात्कालिक लाभ भी हो; परंतु यदि अन्तमें पतन हो तो उससे क्या लाभ ? इसीलिये तो बुद्धिमानोंने अनर्थानुबन्ध, अकर्मानुबन्ध, अननुबन्ध अर्थको छोड़कर अर्थानुबन्ध और धर्मानुबन्ध अर्थको ही श्रेष्ठ समझा है। धर्मोल्लंघन करके प्राप्त किये गये अर्थको अनादरणीय बतलाया है। अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्। अनुल्लङ्घ्य सतां मार्गं यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ‘दूसरोंको सन्ताप न पहुँचाकर, खलोंके घर न जाकर, सज्जनोंका मार्गलंघन न करके जो थोड़ी भी चीज है, वही बहुत बड़ी समझनी चाहिये। अतिक्लेशेन ये ह्यर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च। शत्रूणां प्रणिपातेन मा च तेषु मनः कृथाः ॥ ‘अतिक्लेशसे, धर्मोल्लंघनसे, शत्रुप्रणिपातसे जो अर्थ मिलता हो, उसमें कभी भी मन न लगाना चाहिये।’ आस्तिकों, शास्त्रज्ञोंका यह आग्रह नहीं कि कोई नवीन मार्ग सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय उत्थानके लिये न ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई सरल- सुगम-निर्विघ्न उपाय प्राप्त होता हो तो शास्त्रोक्त मार्गकी कठिनाईका अनुभव क्यों करें ? ‘अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्।’ ‘यदि गृहकोणमें मधु मिल जाय तो मधुके लिये पर्वतपर क्यों जाया जाय ?’ परंतु यदि शास्त्रविरुद्ध मार्गसे परिणाममें पतन और नरकादि दुःख भोगना पड़े, तब तो उसकी उपेक्षा उचित ही है। यही अध्यात्मवादी आस्तिकोंकी भौतिकवादियोंसे विशेषता है। भौतिकवादी सामाजिक या वैयक्तिक अभ्युत्थानके मार्गका निर्धारण करते हुए धार्मिक-आध्यात्मिकके हानि-लाभकी चिन्ता नहीं रखते। अध्यात्मवादी, धर्मवादी लोग भी पूर्णरूपसे राष्ट्रीय, सामाजिक अभ्युत्थानका प्रयत्न करते हैं; परंतु सर्वदा यह ध्यान रखते हैं कि उसी उपायका अवलम्बन किया जाय, जिससे लाभकी अपेक्षा परिणाममें हानि न हो और परलोक न बिगड़े।