भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पाश्चात्य विद्वान् भी उद्विग्न हो रहे हैं, वे लोग भी धर्म और ईश्वरकी आवश्यकता समझ रहे हैं। परंतु भारतीयोंको आज भी नवीन सभ्यताका ही स्वप्न दीखता है। संसारमें कोई चीज पुरानी या नयी होनेसे ही आदरणीय नहीं होती; किंतु उसके गुणागुणकी ओर अच्छी तरहसे ध्यान देना चाहिये— ‘सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।’ पृथ्वी, आकाश, वायु और आत्मा पुराने ही हैं; परंतु क्या इतनेसे ही ये सब हेय हैं? भोजन करके भूख मिटाने और पानी पीकर प्यास मिटानेकी पद्धति पुरानी ही है, फिर भी क्या त्याज्य है? रोग, विपत्ति नवीन होनेपर भी क्या आदरणीय है? यदि नहीं, तब तो अनादि अपौरुषेय वेदादि सच्छास्त्रोंद्वारा प्रदर्शित मार्गसे लौकिक-पारलौकिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करना ही उचित है। जो मार्ग शास्त्रोक्त न भी हो, फिर भी शास्त्रके अविरुद्ध हो तो काममें लाया जा सकता है। वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्रके अध्ययन-अध्यापनका प्रचार होनेपर सब तरहकी समस्याओंका समाधान हो जाता है। कोई भी मार्ग, यदि वह परिणाममें हानिकारक न हो, तभी स्वीकृत होना चाहिये। जिस विषसंयुक्त भोजनसे अन्तमें मौतके मुँहमें पड़ना पड़े, फिर भले ही उससे तात्कालिक तुष्टि, पुष्टि, क्षुन्निवृत्ति भी हो तो क्या लाभ ? जिस शास्त्र या धर्म-विरुद्ध उपायसे तात्कालिक लाभ भी हो; परंतु यदि अन्तमें पतन हो तो उससे क्या लाभ ? इसीलिये तो बुद्धिमानोंने अनर्थानुबन्ध, अकर्मानुबन्ध, अननुबन्ध अर्थको छोड़कर अर्थानुबन्ध और धर्मानुबन्ध अर्थको ही श्रेष्ठ समझा है। धर्मोल्लंघन करके प्राप्त किये गये अर्थको अनादरणीय बतलाया है। अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्। अनुल्लङ्घ्य सतां मार्गं यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ‘दूसरोंको सन्ताप न पहुँचाकर, खलोंके घर न जाकर, सज्जनोंका मार्गलंघन न करके जो थोड़ी भी चीज है, वही बहुत बड़ी समझनी चाहिये। अतिक्लेशेन ये ह्यर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च। शत्रूणां प्रणिपातेन मा च तेषु मनः कृथाः ॥ ‘अतिक्लेशसे, धर्मोल्लंघनसे, शत्रुप्रणिपातसे जो अर्थ मिलता हो, उसमें कभी भी मन न लगाना चाहिये।’ आस्तिकों, शास्त्रज्ञोंका यह आग्रह नहीं कि कोई नवीन मार्ग सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय उत्थानके लिये न ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई सरल- सुगम-निर्विघ्न उपाय प्राप्त होता हो तो शास्त्रोक्त मार्गकी कठिनाईका अनुभव क्यों करें ? ‘अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्।’ ‘यदि गृहकोणमें मधु मिल जाय तो मधुके लिये पर्वतपर क्यों जाया जाय ?’ परंतु यदि शास्त्रविरुद्ध मार्गसे परिणाममें पतन और नरकादि दुःख भोगना पड़े, तब तो उसकी उपेक्षा उचित ही है। यही अध्यात्मवादी आस्तिकोंकी भौतिकवादियोंसे विशेषता है। भौतिकवादी सामाजिक या वैयक्तिक अभ्युत्थानके मार्गका निर्धारण करते हुए धार्मिक-आध्यात्मिकके हानि-लाभकी चिन्ता नहीं रखते। अध्यात्मवादी, धर्मवादी लोग भी पूर्णरूपसे राष्ट्रीय, सामाजिक अभ्युत्थानका प्रयत्न करते हैं; परंतु सर्वदा यह ध्यान रखते हैं कि उसी उपायका अवलम्बन किया जाय, जिससे लाभकी अपेक्षा परिणाममें हानि न हो और परलोक न बिगड़े।
चतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन वेदान्तरससार मंगलाचरण जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः। दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः॥ वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श वेदशास्त्रार्थपरिशीलन-संस्कृतमानस महानुभावोंसे यह तिरोहित नहीं है कि प्राणियोंके चतुर्वर्गकी अविकलरूपसे प्राप्तिका अति सुन्दर पथ वेदोंने प्रदर्शित किया है। विशेषतः धर्म और ब्रह्मके बोधमें तो एकमात्र वेद ही प्रमाणभूत है। अतएव 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (जैमिनीयसूत्र १।१।२) (प्रवर्तक और निवर्तक वैदिक वाक्योंसे लक्षित, अनर्थ श्येनादिसे व्यावर्तित, अग्निहोत्र-दर्श-पौर्णमासादि अर्थ ही धर्म है), 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (गीता १६।२३), 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते' (गीता १६।२४), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृहदारण्यक० ३।९।२६), 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) इत्यादि श्रौत-स्मार्त वचनोंसे धर्म और ब्रह्मको वेदादिशास्त्रैकसमधिगम्य माना गया है। वेद अनादि-अविच्छिन्नसम्प्रदाय परम्परासे प्राप्त हैं। कोई भी पुरुष स्वातन्त्र्येण उनका निर्माण करनेवाला नहीं है। परमात्मा भी पूर्वकल्पीयवेदानुपूर्वी सापेक्ष ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वीका निर्माण करते हैं। अतः प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भपुरःसर निर्मातृत्व- रूप कर्तृत्व उन परमात्मामें भी नहीं है। अतः अपौरुषेय वेदोंका ही सकल पुंदोषशंकाकलंक- पंकसे असंस्पृष्ट होनेके कारण सर्वानपेक्ष (सर्वथा निरपेक्ष) प्रामाण्य है। अतएव परमेश्वरनिर्मितत्व वेदोंके प्रामाण्यका प्रयोजक नहीं है, अपितु परमेश्वरके स्वरूपादिकी सिद्धि ही वेदोंके अधीन है। अन्यथा वैदिक जिन- जिन युक्तियोंसे वेदकारको परमेश्वर या तदवतार मानकर तन्निर्मितत्वेन वेदोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे, उन्हीं-उन्हीं युक्तियोंसे भिन्न-भिन्न मतवादी भी अपने धर्मग्रन्थ-रचयिताको परमेश्वर सिद्ध करके उससे निर्मित अपने धर्मग्रन्थोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे। अस्तु, इन सब बातोंके कथनका आशय यही है कि वेदोंका धर्म और ब्रह्मस्वरूपके निर्णयमें अनपेक्ष प्रामाण्य है। कल्पसूत्र, स्मृत्यादि और अन्यान्य आर्षग्रन्थोंका प्रामाण्य वेदसापेक्ष ही है। अतएव वेदके साथ जिन वचनोंका विरोध होता है, उनका प्रामाण्य कभी भी स्वीकार नहीं किया जाता, चाहे वे वचन किसी भी आर्षग्रन्थके क्यों न हों। वेदोंमें अवान्तर अनेक भेदोंके होते हुए भी प्रधान रूपसे मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग हैं। शाखाभेद होनेसे उनमें अनेकता होनेपर भी विषय प्रायः सबका समान ही है। प्रायेण मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र साथ ही चलते हैं। यद्यपि उन सभीका महातात्पर्य सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद परिपूर्ण परमानन्दघन भगवान्में ही है, यथा 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) तथापि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, परमसूक्ष्म भगवत्तत्त्वकी उपलब्धि और उसमें स्थिति बहिर्मुख प्राणियोंके लिये कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है। अतः योग्यता-सम्पादनके लिये अनेक प्रकारके कर्म और उपासनाओंकी अत्यन्त आवश्यकता है। अतः वेदोंका अवान्तर तात्पर्य उनमें भी है। वेदोंके महातात्पर्यके विषयभूत परमानन्दघन भगवान्में ही सकल प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और प्रतीति होती है, अतः जैसे तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें जल ही भरपूर होता है, वैसे ही भोक्ता-भोग्य सकल प्रपंचके भीतर, बाहर, मध्यमें परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भरपूर हैं। किं बहुना एक आनन्द-सुधा-सिन्धु भगवान् ही अपनी
वेदान्तरससार ७१५ अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिके प्रभावसे नाना जैसे आनन्दस्वरूप चैतन्यात्मक ब्रह्मसे जड़ तथा दृश्य रूपमें प्रतीत होते हैं, यथा- 'आनन्दाद्धयेव दुःखात्मक प्रपंचका होना सम्मत है, वैसे ही खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि परमार्थसत्य परमात्मासे मिथ्या प्रपंचका प्रादुर्भाव जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीय० मानना युक्त है। इन विवेचनोंसे सिद्ध हुआ कि ३।६) 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' (छान्दो० परमानन्द स्वप्रकाश परमार्थसत्य भगवान्से दुःखात्मक, ६।२।३) इत्यादि। जडात्मक, मिथ्या अर्थात् अपरमार्थिक व्यवहारोपयोगी, ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और व्यावहारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है। जगत्की असच्चिदानन्दरूपता मायाकी अनिर्वचनीयता जैसे आनन्दस्वरूपसे दुःखात्मक प्रपंच प्रादुर्भूत जैसे अग्निकी दाहिका-शक्ति अग्निसे विलक्षण होता है, वैसे ही चैतन्यसे जड प्रपंचका प्रादुर्भाव होती है, वैसे ही त्रिकालाबाध्य सद्रूप ब्रह्मकी होता है। यह बात अभिन्ननिमित्तोपादान कारणवादियोंको प्रपंचोत्पादिनी शक्ति ब्रह्मसे विलक्षण है। अतः माननी पड़ती है और उसी तरह त्रिकालाबाध्य त्रिकालाबाध्यरूप सत्से विलक्षण उसकी शक्ति शुद्ध परमार्थ सत्य भगवान्से अनृतात्मक प्रपंचका प्रादुर्भाव सद्रूप अधिष्ठानके बोधसे बाधित होती है। साथ ही होता है, यह भी मानना चाहिये। क्वचिदपि कथंचिदपि (कहीं भी, किसी प्रकार भी) प्रपंच आनन्दसे उत्पन्न होनेवाला और आनन्दमें न प्रतीत होनेवाले अत्यन्त असत् खपुष्पादि (आकाश- विलीन होनेवाला है, यह उपर्युक्त श्रुतिसे स्पष्ट कुसुमादि)-से भी विलक्षण सत्की शक्ति है; क्योंकि सिद्ध होता है। जैसे समुद्रसे उत्पन्न और उसमें वही सकल प्रपंचकी जननी है। इस तरह जिससे विलीन होनेवाला तरंग समुद्र ही है, वैसे ही परमात्मा अपने-आपको सकल प्रपंचरूपसे व्यक्त आनन्दसे उत्पन्न और उसीमें विलीन होनेवाला करता है, परमात्मनिष्ठ वह शक्ति सत् और असत् प्रपंच भी आनन्दात्मक ही होना चाहिये तथा दोनोंसे विलक्षण है, अतएव उसको अनिर्वचनीय सर्वप्रकाशक चैतन्यघनसे उत्पन्न होनेवाला प्रपंच कहते हैं। चेतनात्मक ही होना चाहिये। परंतु प्रपंचमें दुःखरूपता इस शक्तिको ही 'माया', 'प्रकृति', 'अविद्या', और जड़ता सर्वानुभवसिद्ध एवं सर्वमान्य है, अतः 'अज्ञान' आदि शब्दोंसे कहा जाता है। जैसे कहना पड़ता है कि कारणगत अनिर्वचनीय शक्तिसे 'योगमायासमावृतः' (गीता ७।२५) इत्यादि वचनोंसे कार्यमें अनिर्वचनीय विलक्षणता होती है। इसी मायाद्वारा ज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मका आवरण कहा है, वास्ते यद्यपि स्पष्ट देखते हैं कि जलसे भिन्न बर्फ वैसे ही 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५)- और तन्तुसे भिन्न पट कोई पृथक् पदार्थ नहीं है तो इस वाक्यसे अज्ञानको भी आवरक कहा है। जैसे भी जल और तन्तुओंकी अपेक्षा उनमें (बर्फ और 'मायामेतां तरन्ति ते' (गीता ७।१४)- इस वाक्यमें पटमें) विलक्षणता अवश्य है। इसीलिये आनन्द मायाको तरण कहा है, वैसे ही 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं और स्वप्रकाशचैतन्यरूप परमात्मासे भिन्न (विलक्षण) येषां नाशितमात्मनः' (गीता ५।१६)- इस वचनसे जड़ और दुःखरूप प्रपंच उत्पन्न होता है। ज्ञानको अज्ञानका नाशक कहा है। अब यह देखना चाहिये कि दुःख तथा ज्ञानाभावरूप अज्ञान आवरणकर्तृत्व नहीं हो जडरूप प्रपंच सत्य है या मिथ्या? यदि पूर्वोक्त सकता, भावाभावके असमकालिक (एक कालमें न्यायसे विचार करें तो स्पष्ट विदित होगा कि कार्य अनवस्थित) होनेसे ज्ञानसे ज्ञानाभावरूप अज्ञानका और कारणमें अनिर्वचनीय विलक्षणता है। अतः नाश भी नहीं हो सकता, अतः अज्ञान सदसद्विलक्षण
७१६ भक्तिसुधा
मायाशक्तिरूप ही है। जैसे 'चित्', 'अचित्' इन दोनों शब्दोंसे चेतन और जड़ दोनों भावरूप ही गृहीत होते हैं, वैसे ही ज्ञान-अज्ञान इन दोनों शब्दोंसे परमात्मा और उसकी शक्ति अनिर्वचनीय माया गृहीत होती है। वह शक्ति जैसे सद्विलक्षण है, वैसे ही चित्से भी विलक्षण है, अतः 'अचित्' जड़ समझी जाती है। उसके द्वारा सच्चिदानन्दात्मक (सत्-चित्स्वरूप) तत्त्वका अनित्य जड प्रपंचरूपसे विवर्त होता है।
ज्ञानस्वरूपविमर्श
जैसे शक्तिकी स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अपने आधारभूत शक्तिमान्से ही सुलभ होते हैं, वैसे ही अचित्की स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अचित्के आधारभूत ही सुलभ होते हैं। यह स्पष्ट ही है कि अचित्की प्रवृत्ति और स्फूर्ति चित्से ही सम्भव है। यदि वह स्वतःप्रकाश हो, तब तो उसे अचित् ही नहीं कह सकते। ऐसे ही अज्ञानकी स्थिति, प्रवृत्ति और स्फूर्ति ज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही सम्भव है। अतएव 'मैं अज्ञ (अज्ञानी) हूँ' इस प्रकार अज्ञानका प्रकाश नित्य अखण्ड ज्ञानस्वरूप साक्षीसे ही होता है। यहाँ यह समझना चाहिये कि ज्ञान दो प्रकारका है। एक तो अन्तःकरणकी चैतन्यप्रतिबिम्बोपेत वृत्तिरूप, जो उत्पन्न होनेवाले और विनाशीरूपसे लोकमें शब्द-ज्ञान, स्पर्श-ज्ञानादिरूपसे प्रसिद्ध है और दूसरा स्वप्रकाश चैतन्यान्द ब्रह्मरूप, जो लौकिक ज्ञान और निद्रा-अज्ञानादिका भासक, कूटस्थरूप, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयो० २।१), 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहदारण्यक० ३।९।२८) इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। ब्रह्मरूप ज्ञान ही अचिच्छक्तिरूप अज्ञान एवं तत्कार्यरूप सकल प्रपंचको सत्त्व और प्रकाश देकर कार्यकारणक्षम बनाता है। इस तरह परमानन्द रसात्मक भगवान्से ही सत्ता, स्थिति, स्फूर्ति प्राप्त करके नीरस, असत्, स्फूर्तिरहित प्रपंच सरस, सत्य, स्फूर्तिमान्-सा प्रतीत हो रहा है। अतएव जैसे दहन-सामर्थ्यशून्य लौहपिण्डको अनित्य और सातिशय दहन-सामर्थ्य प्रदान करनेवाला, नित्यनिरतिशय दहन- सामर्थ्यसम्पन्न अग्नि दग्धाका भी दग्धा कहा जाता है और जैसे अनेक प्रान्ताधिपतियोंको राजा बनानेवाला सर्वाधिपति राजराज कहा जाता है, वैसे ही अनित्योंको नित्य, अचेतनोंको चेतन, असत्योंको सत्य बनानेवाले वेदान्त-वेद्य परमानन्द रसात्मक भगवान् नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य, सुखोंके सुख और रसोंके रस कहे जाते हैं। जैसे सर्वाधिपति राजराजसे निर्मित राजगण प्रजाकी अपेक्षा राजा होते हुए भी सम्राट्की अपेक्षा प्रजा ही हैं; वैसे ही नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य भगवान्से निर्मित व्यावहारिक नित्य, चेतन, सत्यपदार्थ प्रातिभासिक रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा चेतन, नित्य, सत्य होते हुए भी परमनित्य, सत्य, चैतन्यकी अपेक्षा अनित्य, असत्य, अचेतन ही हैं। जैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति-सिद्ध है तथापि क्षणिक पदार्थोंकी अपेक्षा वह स्थिर है, अतः उसको न्यायसिद्धान्तानुसार नित्य कहते हैं; जैसे उत्पत्ति- विनाशवाले, साभासवृत्तिरूप ज्ञान जड होते हुए भी घटादिकी अपेक्षा चेतन कहे जाते हैं, वैसे ही लोकसिद्ध मिथ्या रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा अबाध्य होनेके कारण रज्ज्वादि तथा घटादि भी सत्य कहे जाते हैं। इन्हीं आपेक्षिक नित्य-चेतन, सत्य, सरस पदार्थोंको वेदान्ती सकल सत्शास्त्रोंके महातात्पर्यका विषयीभूत, निखिल रसोंके समुद्गम-स्थान, भगवान्की अपेक्षा अनित्य, जड़, नीरस, दुःखरूप या व्यवहारोपयुक्त, व्यावहारिक नित्य, व्यावहारिक सत्य, व्यावहारिक चेतन अथवा व्यावहारिक सुख कहते हैं।
भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन
पारमार्थिक सत्य, चैतन्य, नित्य आनन्दरस- स्वरूप तो भगवान् ही हैं, इसी अभिप्रायसे 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनाम्' (कठ० २।२।१३), 'सत्यस्य सत्यम्' (बृहदारण्यक० २।३।६) इत्यादि श्रुति-वचन भगवान्को नित्य-
वेदान्तरससार ७१७ का-नित्य, सत्य-का-सत्य कहते हैं। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी भी अपने रामको प्राण-के-प्राण, जीव-के-जीव, सुख-के-सुख कहते हैं— आनँदहू के आनँद दाता॥ प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० १।२१७।२; २।२९०) जैसे घटाकाशका जीवन महाकाश और तरंगका जीवन समुद्र है, वैसे ही जीवके जीवन भगवान् हैं। अस्तु, इस तरह सिद्ध हुआ कि परमार्थतः सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्से भिन्न जो कुछ प्रतीत होता है, वह मिथ्या ही है। जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है, वैसे ही परमात्मामें प्रपंचका भ्रम है। यही सत्यसे मिथ्या पदार्थकी उत्पत्तिका प्रकार है। इसी सिद्धान्तको श्रीगोस्वामीजीने भी श्रीरामचरितमानसमें पुष्ट किया है— झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ (रा०च०मा० १।११२।१) अतः सिद्ध हुआ कि परमानन्दघन भगवान्से भिन्न होकर परमार्थ सत्य कोई भी पदार्थ नहीं है। जैसे वायु आदि क्रमसे आकाशके द्वारा ही समुद्भूत घटरूप उपाधिसे आकाशमें महाकाश और घटाकाश ये दो भेद हो जाते हैं, वैसे ही परमात्मासे समुद्भूत उपाधियोंके द्वारा चैतन्यानन्दघन भगवान्में ही जीव और परमेश्वर ये दो भेद हो जाते हैं। वस्तुतः घट, आकाशका कार्य होनेसे उससे पृथक् नहीं है। अतएव इस तथ्यको मर्मज्ञ विद्वान् तैत्तिरीयो- पनिषद्की विधासे जैसे घटरूप कार्यको पृथिव्यादि विलोमक्रमसे चरमोपादान आकाशरूप कारणमें प्रलीन करके, घटरूप उपाधिको आकाशमें बाधितकर घटाकाश और महाकाशके भेदको बाधित कर देते हैं; वैसे ही अधिष्ठानरूप, शुद्ध सत्यके बोधसे, सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय शक्ति एवं तत् कार्यरूप उपाधियोंको सद्रूप ब्रह्ममें ही बाधित करके, जीव और परमेश्वरके भेदका भी निराकरण कर देते हैं अर्थात् जैसे घटको पृथ्वीमें, पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें एवं वायुको आकाशमें लय करनेपर महाकाशसे भिन्न न घटरूप उपाधि रहता है और न घटोपहित घटाकाश ही रहता है, वैसे ही सुबालोपनिषदादिकी प्रक्रियासे आकाशको अहंतत्त्वमें, अहंतत्त्वको महत्तत्त्वमें और उसको अव्यक्तमें, अव्यक्तको सत्तत्त्वमें विलीन कर देनेपर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अज्ञानरूप उपाधि तथा इन उपाधियोंसे उपहित जीव, ये सभी अखण्डानन्द-रस भगवान् ही हो जाते हैं। भगवान्से भिन्न उनका कोई भी स्वरूप नहीं रहता। इसी वास्ते भगवती श्रुतिने कहा है—‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत’, ‘ऐतदात्म्यमिदꣳ सर्वं···· स आत्मा तत्त्वमसि’, (छान्दोग्य० ३।१४।१; ६।८।७) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (माण्डूक्य० २), ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (बृहदारण्यक० २।५।१९; १।४।१०) अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है, क्योंकि तज्ज, तल्ल, तदन है— स्वातिरिक्त सबका उत्पत्ति, लय और स्थितिस्थान है। ब्रह्मसे ही समस्त प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति एवं संहृति सम्भव है। यह सर्व दृश्य प्रपंच इस आत्माका स्वरूप ही है, ब्रह्म ही समस्त प्रपंचकी आत्मा है और ब्रह्म ही तुम हो। यह आत्मा ब्रह्म है। ‘अहं’ पद लक्ष्यार्थ प्रत्यगात्मा ब्रह्म ही है। किं बहुना ‘सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः’, (मुण्डक० २।१।२) ‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ (गीता १३।१५) अर्थात् चराचर सकल प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म ही है और जिस चराचर प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म है, वह चराचर प्रपंच भी ब्रह्म ही है। सर्वदृश्यरूप क्षेत्र और द्रष्टारूप क्षेत्रज्ञ—ये सभी भगवान् ही हैं। श्रीभगवान्की भी उक्ति है—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।’ (गीता १३।२) बाह्याभ्यन्तर कार्यकारण सब कुछ अज अव्यक्त ब्रह्म ही है। ‘अजायमानो बहुधा वि जायते’, (यजु० ३१।१९) ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘इन्द्रो मायाभिः
७१८ भक्तिसुधा पुरूरूप ईयते' (बृहदारण्यक० २।५।१९) अर्थात् अजायमान और एक ही परमतत्त्व मायासे बहुरूपमें जायमान-सा प्रतीत होता है। जो इस अजायमान अखण्डैकरस, अद्वितीय वस्तुमें वस्तुतः जायमानता और नानात्व देखता है. जो ब्रह्मकी निर्विकारकूटस्थता और अखण्डैकरसताका व्यापादन या उसे कलंकित करना चाहता है. वह प्राणी उसी अपराधसे पुनः- पुनः मृत्युको प्राप्त होता है। अतः इसे परमार्थतः एक रूपसे ही देखना चाहिये। 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥' (कठ० २।१।१०) अर्थात् जो भगवान्में थोड़ा भी भेदकी कल्पना करता है, उसे भय होता है। 'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। (तैत्तिरीय० २।७), द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥' (बृहदारण्यक० १।४।२) इतना ही नहीं, संसारमें ब्रह्म और धर्म, लोक एवं वेद, किं बहुना जिस किसी भी पदार्थको प्रभुसे भिन्न या पृथक् देखा जाता है, वह पदार्थ ही अपना घोर अपमान समझकर भिन्नदर्शीको परमार्थसे प्रच्युत कर देता है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' (बृहदारण्यक० २।४।६) प्रियतमका विप्रयोग किसीके लिये भी सह्य नहीं है। प्रेमकी पराकाष्ठा यही है कि प्रियतमसे वियुक्त होकर प्रेमी क्षणभर भी अपना जीवन न रख सके। श्रीव्रजांगनाओंका अपने प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगमें एक क्षण भी अनन्त कोटि कल्पके समान प्रतीत होता था। परमार्थ दृष्टिसे तो प्रियतमका वियोग होते ही प्रेमीका स्वरूप ही नहीं रह सकता। क्या बिम्बसे वियुक्त होकर प्रतिबिम्बका और महाकाशसे वियुक्त होकर घटाकाशका एवं महासमुद्रसे वियुक्त होकर तरंगका स्वरूप रह सकता है ? इनमें तो कहनेके लिये भेद है, वस्तुतः भेद नहीं है। इसीलिये श्रीगोस्वामीजीने श्रीराम और जनकनन्दिनीमें जल और बीचिका दृष्टान्त रखकर अभेद सिद्ध किया है- 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) फिर कोई भी तत्त्व भगवान्की सत्ता और स्फूर्तिसे वियुक्त होकर अपना स्वरूप कैसे रखे; क्योंकि सत्ता- स्फूर्तिसम्बन्धशून्य होनेपर सभी तत्त्व निःसत्त्व और निःस्फूर्ति हो जाते हैं। स्फूर्ति और सत्तारहित पदार्थका स्वरूप ही क्या हो सकता है, अतः जिन पदार्थोंको परमार्थ सद्रूप, स्वयंप्रकाश, स्फूर्तिरूप भगवान्से भिन्न समझा जाता है, उन्हें मानो उनके प्रियतमसे वियुक्त किया जाता है। उन्हें सत्तास्फूर्तिविहीन तथा निःसत्त्व, निःस्फूर्ति बनाकर अपमानित किया जाता है। अतः वे पदार्थ उन भिन्नदर्शीको स्वार्थसे प्रच्युत कर देते हैं। इन्हीं श्रुति-स्मृति-सिद्ध-पारमार्थिक अभेद और काल्पनिक व्यवहारमें आनेवाले व्यावहारिक भेदको सिद्ध करनेके लिये वेदान्तोंमें बिम्ब-प्रतिबिम्ब, घटाकाश-महाकाश, समुद्र-तरंग आदि अनेक दृष्टान्त जीव और भगवान्के स्वरूपमें रखे गये हैं। दृष्टान्त एकदेशी हुआ करते हैं। उनका सर्वांश दाष्ट्रान्तिकमें नहीं संगत हुआ करता। इसी वास्ते जैसे घटके गमनमें, जिस आकाशके साथ घट-सम्बन्ध विच्छिन्न हुआ, वह महाकाश हुआ और जो महाकाश था, वही घटके संसर्गसे घटाकाश हो गया। इसी तरह अन्तःकरणके गमनमें पूर्वदेशस्थ अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य मुक्त हो गया एवं उत्तर-देशस्थ अन्तःकरणा- वच्छिन्न अपूर्व चेतन बद्ध हो गया। जब नीरूप निरवयव पदार्थ न प्रतिबिम्बित होता है और न प्रतिबिम्बका आधार होता है। फिर आत्मा और अन्तःकरण ये दोनों ही नीरूप एवं निरवयव हैं। आत्माका प्रतिबिम्ब कैसे होगा एवं अन्तःकरणकी प्रतिबिम्बाधारता कैसे होगी इत्यादि शंकाएँ निर्मूल हैं, कारण कि अलौकिक अर्थमें लौकिक पदार्थ पूर्णरूपसे दृष्टान्त नहीं हुआ करते। केवल विवक्षित अंशमें दृष्टान्त-दाष्ट्रान्तिकी समता होती है। यहाँ केवल उपाधिद्वारा उपहितमें काल्पनिक भेद तथा उपाधिगत दूषण या भूषणका भान होना और परमार्थतः अभेद तथा सर्वोपाधिदोषादिविवर्जित होना-इतना ही अंश विवक्षित है। जैसे घटाकाशका
वेदान्तरससार ७१९ महाकाशसे भेद और उसमें गमनागमनादि नाना प्रकारकी कार्यकारणक्षमता यह सब घटोपाधिकृत हैं, जैसे महासमुद्रसे तरंगका भेद और उसका चांचल्यादि वायुरूप उपाधिसे जन्य है, जैसे प्रतिबिम्बमें बिम्बका भेद एवं मलिनता, चंचलता आदि जलदर्पणादि उपाधिजन्य है, उसी तरह जीवमें निर्विकार, परमचैतन्यतानन्द, रसात्मक भगवान्से भिन्नता कर्तृत्व- भोक्तृत्व, सुखित्व-दुःखित्वादि नाना अनर्थोंका योग एवं अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिकृत है। उपाधिके विलयनमें एक परमानन्द भगवान् ही अवशेष रहता है। इस प्रकारसे तत्त्वकी अद्वितीयता, अनन्तता और लोकसिद्ध व्यवहारकी उपपत्ति दिखलानेके लिये अनेक प्रकारके दृष्टान्तोंका उपपादन है। जिसकी बुद्धिमें जिस दृष्टान्तसे पारमार्थिक अभेद और व्यावहारिक भेद बुद्ध्यारूढ़ हो, उसके लिये वही दृष्टान्त प्राधान्येन उपादेय है; क्योंकि शास्त्रोंका किसी दृष्टान्तमें तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य तो केवल व्यावहारिक भेदोपपादनपूर्वक पारमार्थिकाद्वैत-बोधनमें ही है। इस प्रकार यही सिद्ध होता है कि परमानन्द- रसात्मक भगवान् ही चिदानन्दमयी जीवशक्तिके भीतर, बाहर तथा मध्यमें भरपूर हैं। किं बहुना जीवशक्ति विशुद्धस्वरूप भगवान् ही है। आनन्दसुधासिन्धु भगवान्की लहरीरूप जीवशक्ति भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) ही है। जैसे बर्फकी पुतली सिन्धुके बीचमें रहकर प्यासकी रटन रटे, किंवा जैसे निखिल रसामृतसिन्धुसारसर्वस्व कृष्णसुधामें अहर्निश सर्वांगीण संश्लेषरूप अवगाहन करती हुई भी कृष्णप्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी अधिरूढ़ महाभावकी विलक्षण अवस्था-विशेष परवश होकर 'हा प्राणवल्लभ, कहाँ हो?' इस प्रकार मिलनके लिये व्यग्र होती हैं—'अङ्कस्थितेऽपि दयिते किमपि प्रलापं हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात्' (राधासुधा ४६) वैसे ही प्रियतमकी मोहिनीमायाशक्तिसे परमानन्दरसार्णव भगवान्में बर्फ पुतलीकी तरह निमग्न जीव-शक्ति, प्रियतमको भूलकर, अनन्त संतापोंमें निमग्न सन्तप्त हो रही है। शास्त्र तथा आगमोंके प्रबोधनसे ही अज्ञानजन्य विस्मरण तथा विभ्रमकी निवृत्ति होती है—'आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) 'सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥' (रा०च०मा० ७।१११।६) तू वही है, तुझमें-उसमें किंचित् भी भेद नहीं है, जैसे जल और बीचिका भेद 'कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) कहनेको भिन्न है, वस्तुतः अभिन्न ही है। श्रीमद्भागवतके पुरंजन और पुरंजनीके आख्यानमें, जिस समय जीवरूप पुरंजन मायावश अपने परम अन्तरंग प्रियतम सखाको भूलकर बुद्धिरूपा पुरंजनीका अत्यन्त अनुरागी होकर अनवरत पुरंजनीके चिन्तनमें तन्मय हो गया, उस समय पुण्यपरिपाकसे, पतिरूप गुरुकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर श्रीहंसरूपधारी भगवान्ने प्रकट होकर पूछा कि तुम हमें जानती हो? पुरंजनीने कहा— 'प्रभो! मैं आपको नहीं जानती।' इसपर भगवान्ने कहा—'ठीक है, मेरे विस्मरणका ही तो यह फल है। मुझे भूलनेसे ही अनेकानर्थमूल संसृतिचक्रमें प्राणियोंको भटकना पड़ता है। देखो—'अहं भवान् न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः। न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि॥' (श्रीमद्भा० ४।२८।६२) मैं ही तुम्हारा पारमार्थिक स्वरूप हूँ, तुम मुझसे पृथक् नहीं हो। मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ। इस भावको गम्भीरतासे देखो। कवि लोग हमारे और तुम्हारेमें कभी किंचिन्मात्र भी भेद नहीं देखते।' श्रीपरीक्षित्की भी अन्तमें 'अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्माहं परमं पदम्।' (श्रीमद्भा० १२।५।११) ऐसी ही दृढ़ धारणा हुई। अन्यान्य वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंकी भी ऐसी धारणा है—'अहं वै भगवो देवते त्वमसि त्वं वै भगवो देवते अहमस्मि।' हे भगवन्! मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ; क्योंकि जो लोग प्रेम करते हैं तो उन्हें यही
७२० भक्तिसुधा कहना पड़ता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिये, केवल प्रभुप्रेममें या प्रभुस्वरूपके सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासमा- स्वादनमें मुझे लोकोत्तर रस आता है। ऐसी स्थितिमें विवेकी जनोंको स्पष्ट हो जाता है कि वह प्रेमी अपने आनन्दके लिये ही प्रभुमें प्रेम करता है, प्रभु-स्वरूप- सम्बन्धी सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतके आस्वादनसे ही उसकी आत्माको आनन्द होता है। इसीलिये जिनके ऐसे भी भाव हैं कि प्रियतम मुझसे अनुकूल हों या प्रतिकूल, सर्वगुणसम्पन्न हों या सर्वगुणरहित, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हों या सौन्दर्य-माधुर्य-विहीन, सब प्रकारसे हमारे ध्येय, ज्ञेय, प्रियतम प्रभु ही हैं— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्ममायम्॥ (उज्ज्वलनीलमणि-स्थायिभाव २९) उनकी आत्माको सुख और शान्ति सब प्रकारसे प्रभुसमाश्रयणमें ही होता है। इसलिये ये समस्त भाव आत्माके लिये हुए। प्रभुके लिये लोक- परलोक सब प्रकारकी सुखशान्तिका, किं बहुना प्राणादि समस्त प्रियतम वस्तुओंका त्याग किया जाता है। यहाँपर भी सूक्ष्म रूपसे देखनेपर यही विदित होता है कि उस प्रेमीकी आत्माको ऐसा ही करनेपर सुख मिलता है, अतः यह सब कुछ आत्माके लिये ही है। भगवत्तत्त्वकी आत्मरूपता लोकमें कोई धार्मिक पुरुष धर्म-रक्षाके लिये आत्माकी आहुति दे देते हैं। वेदोंमें भी एक यज्ञ ऐसा है, जिसमें यजमान अपना सर्वस्व ब्राह्मणोंको देकर स्वयं अपनेको अग्निकुण्डमें समर्पण कर देता है। परंतु इन सभी स्थलोंमें इस प्रकारके उत्कट त्याग और तपस्याओंका लक्ष्य अन्तरात्माकी अनन्त शान्तिमें ही है। इसी प्रकारके भावोंको लक्ष्यमें रखकर आत्माके औपाधिक चिदाभासस्वरूपके बाधके लिये साधिष्ठान चिदाभाससे ही प्रयत्न किया जाता है। इसीलिये भगवती श्रुतिने स्पष्ट निर्णय करके यहाँ भी सर्वोपप्लव- विवर्जित, परमानन्दरूप चिदात्माका शेष रहना लक्ष्य रखा है—'आत्मानमेव प्रियमूपासीत।' (बृहदारण्यक० १।४।८) अर्थात् प्रिय रूपसे आत्माकी ही उपासना करनी चाहिये। 'योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीति' (बृहदारण्यक० १।४।८) आत्मासे भिन्नको जो प्रिय कहता है, उसे प्रियके लिये रुदन करना पड़ता है। जब ब्रह्माने श्रीकृष्णके गोवत्सों और वत्सपालोंका हरण किया, तब एक वर्षपर्यन्त श्रीकृष्ण ही वत्स और वत्सपालके रूपमें व्यक्त हुए। उस समय समस्त गौओंको अपने-अपने बछड़ोंमें और व्रजदेवियोंको अपने-अपने शिशुओंमें ऐसा अभूतपूर्व लोकोत्तर प्रेम हुआ, जैसा कभी अपने मुख्य अंगजोंमें नहीं हुआ था। इस बातको श्रीशुकदेवके मुखारविन्दसे श्रवण करके जब श्रीपरीक्षित्जीने आश्चर्य प्रकट करते हुए इसका कारण पूछा, तब श्रीशुकदेवजीने यही कहा कि राजन्! संसारमें समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा आत्मा ही प्रिय होता है; तदितर पुत्र, वित्त, कलत्रादि आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं, देहको ही आत्मा माननेवाले जो देहात्मवादी हैं, उन्हें भी जितना देह प्रिय है, उतने देह-सम्बन्धी पुत्रादि नहीं। श्रीकृष्ण समस्त जीवोंके अन्तरात्मा हैं, अतः समस्त प्राणियोंके निरतिशय एवं निरूपाधिक प्रेमके आस्पद हैं, उनमें अपने आत्मजोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम होना युक्त ही है। सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव वल्लभः। इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि॥ 'देहात्मवादिनां पुंसामपि राजन्यसत्तम।' 'कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।५०, ५२, ५५) जिसमें प्रेम किसी दूसरेके लिये होता है, उसमें कभी प्रेमका अभाव भी हो जाता है; क्योंकि वह औपाधिक प्रेम होता है। अतएव अनित्य एवं सातिशय होता है, जैसे अनुष्ण जलमें उष्णता अग्निके संसर्गसे होती है, स्वतः नहीं, अतएव
जलमें औपाधिक उष्णता अनित्य एवं सातिशय है, परंतु जिस अग्निके संसर्गसे जलमें उष्णता व्यक्त हुई, उस अग्निमें तो उष्णता नित्य एवं निरतिशय है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम आत्माके संसर्गसे ही होता है। वित्त, क्षेत्र, साम्राज्यादिमें प्राणियोंको प्रेम नहीं होता; क्योंकि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें, साम्राज्यादि अनेक प्रकारके अभ्युदयसम्बन्धी साधन हैं ही। मान लीजिये कि हम और हमारा देश किसी राष्ट्रके बिल्कुल परतन्त्र हो, हमारा सर्वस्व किसीने अपहरण कर लिया हो तो भी सम्पत्ति और राष्ट्र या साम्राज्य आक्रमणकारी अपहर्ताके पास तो हैं ही, उसमें हमें सन्तोष क्यों नहीं होता ? यहाँ विज्ञसम्मत हेतु यही हो सकता है कि यद्यपि कहीं-न-कहीं तो सब कुछ है सही तथापि वह हमारा तो नहीं है। वित्त, क्षेत्र, राष्ट्र या साम्राज्यमात्रमें ही हमारा प्रेम नहीं होता, किंतु हमारा 'अपने' वित्त, क्षेत्र, राष्ट्रादिमें प्रेम होता है। इस तरह स्वसम्बन्धसे ही स्वदेश, स्वराज्य, स्ववित्त, स्वक्षेत्रमें प्राणियोंको अधिक प्रेम होता है। सुन्दर पुत्रकलत्रमें भी स्वसम्बन्ध होनेसे ही प्रेम होता है। सुन्दरी कामिनीमें भी 'यह मुझे मिले, मेरी हो जाय' इस तरह स्वसम्बन्धित्वापादनकी ही रुचि होती है। इसी तरह 'उच्च-से-उच्च ऐश्वर्य मुझे, मेरे देशको, मेरे सम्बन्धियोंको हो' इस प्रकार स्वसम्बन्धीमें ही, स्वानुकूलमें ही, प्रेम दृष्टिगोचर होता है। किंबहुना अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् ही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र एवं श्रीकृष्णचन्द्रस्वरूपमें प्रकट होते हैं, परंतु उनमें भी स्वसम्बन्धसे प्रेमका तारतम्य देखा जाता है। जो अपने इष्टदेव हैं, उनके सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य एवं चरित्रादिमें जितना प्रेम, जितना आकर्षण होता है, उतना अन्यमें नहीं। और तो क्या, कृष्णस्वरूपमें ही महानुभावोंने पाँच भेदोंकी कल्पनाकर डाली है। वे द्वारकास्थ, मथुरास्थ कृष्णके अतिरिक्त 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' के अनुसार पूर्ण, पूर्णतर, पूर्णतम भेदसे व्रजस्थ, वृन्दावनस्थ, लीलानिकुञ्जस्थ श्रीकृष्णमें भेद स्वीकारकर पूर्णतम लीलानिकुञ्जनायक श्रीकृष्णमें ही अपना हृदय आसक्त करते हैं। अन्यके स्वरूपसौन्दर्यादिमें उनके चित्त आकर्षित नहीं होते हैं। अतएव एक बार लीलया किसी निकुंजमें छिपे हुए श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाएँ जब मनमोहनके पास पहुँच गयीं, तब श्रीकृष्णने शीघ्र ही विष्णुस्वरूपमें प्रकट होकर अपने उस व्रजराजकुमारस्वरूपको छिपा लिया और अपने-आपको सर्वगुणसमलंकृत श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट किया; पर श्रीव्रजांगनाओंका मन उस रूपमें किंचित् भी आकर्षित नहीं हुआ, किंतु उन्हें प्रणामकर वे 'हे देव ! हमारे प्रियतमको मिला दो' यह कहकर वहाँसे अपने प्रियतमको ढूँढती हुई आगे चली गयीं। वस्तुके उत्कर्षसे उसमें प्रेम नहीं होता है, किंतु स्वसम्बन्धसे ही वस्तुकी उत्कृष्टता भी व्यक्त होती है। अतएव 'गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा' इत्यादि वचनोंसे पहले ही कह आये हैं कि 'अनन्त गुणसमलंकृत हो या सर्वगुणविहीन हो, जो अपना है, वही सर्वस्व है।' पूर्णतम होनेके कारण ही उनकी ओर सभीका चित्त आकर्षित नहीं होता है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) जिसमें स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता हो गयी, वही सर्वस्व है। जिसमें जितनी-जितनी स्वानुकूलता है, उसमें ही प्रेमकी उतनी अधिकता होती है और जिसमें जितनी स्वप्रतिकूलता है, उसमें ही द्वेषकी उतनी अधिकता होती है। कोई व्यापारी बहुत दिनोंके बाद अपने घरको लौट रहा था। मार्गमें किसी सरायमें उसने निवास किया। दैवात् उसी सरायमें रातको उसकी स्त्री अपने अत्यन्त रुग्ण पुत्रको लेकर आयी। रुग्ण बालक दुःखसे घबराकर, चीख मारकर रो रहा था। उस व्यापारीने अपनी
नींदमें बाधक समझकर बालक और उसकी माँको रोषके साथ खरी-खोटी सुनायी। परंतु प्रातःकाल होनेपर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि यह तो मेरी ही स्त्री और मेरा ही पुत्र है, तब तो उनके साथ ही वह अपने-आप भी रोने लगा। इस तरह विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि निकृष्ट-से-निकृष्ट वस्तुमें भी आत्माके स्वसम्बन्धकी घनिष्ठतासे प्रेमकी अतिशयता और अत्यन्त उत्कृष्ट वस्तुमें भी स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता न होनेसे प्रेमकी न्यूनता होती है। इतना ही नहीं, दूसरेकी उत्कृष्ट वस्तुमें द्वेष या ईर्ष्या-पर्यन्तका संचार हो जाता है। तभी तो ये कट्टर नवीन शैव-वैष्णव परस्पर एक-दूसरेके इष्टका उत्कर्ष नहीं सहन कर सकते हैं। अब सोचनेकी बात है कि जिसके सम्बन्धसे निकृष्टमें भी लोकोत्तर प्रेम और जिसके सम्बन्धके बिना परम उत्कृष्टमें भी द्वेष या ईर्ष्या होती है, वह निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है कि नहीं। जब शर्कराके सम्बन्धसे स्वभावतः माधुर्य-शून्य पदार्थोंमें भी मधुरिमाका अनुभव होता है, तब क्या शर्करामें मधुरिमाका अभाव कहा जा सकता है? जब स्वस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे प्रेमके अयोग्य पदार्थोंमें भी प्रेम होता है, तब क्या आत्मामें अन्यशेषता या प्रेमकी अपकर्षता कही जा सकती है? प्रत्युत स्पष्ट रूपसे यही कहा जा सकता है कि आत्माके सन्निहितमें प्रेमका आधिक्य और विप्रकृष्टमें प्रेमकी न्यूनता होती है। तभी देखते हैं कि प्रियतम, कलत्र एवं पुत्रकी रक्षाके लिये अनेकानेक प्रयत्नसे उपार्जन की हुई रत्नादि सम्पत्तियोंको त्याग देनेमें विलम्ब नहीं होता, किंतु कलत्र, पुत्र प्रभृति यदि अपने शरीरके प्रतिकूल प्रतीत होते हैं तो अप्रिय ही नहीं, अपितु शत्रु समझे जाते हैं। किसी गृहमें अग्नि लग रही है, पता चलता है कि अत्यन्त प्रिय पुत्र गृहके भीतर रह गया है। गृहपति अत्यन्त व्याकुल होता है, रुदन करता है, लोगोंसे कहता है—'भाई, चाहे कोई हमारा समस्त धन-धान्य रत्नादि ले ले, परंतु हमारे प्रिय पुत्रको जलते हुए भवनसे निकाल लाये।' यह सब कुछ होते हुए भी अपना शरीर इतना प्रिय है कि कोई अत्यन्त धनके लोभसे भी उसका नाश नहीं सहन कर सकता। जिसका प्रिय पुत्र है, वह स्वयं जलते हुए घरमें प्रवेश नहीं करता; केवल बाहर दूर खड़ा तड़फड़ाता है। ठीक ही है, संसारके समस्त नाते इस देहके ही साथ हैं, उसके नष्ट होनेपर समस्त नाते मिट जाते हैं। नहीं तो इस अपार संसारमें अनन्त जन्मके देह-सम्बन्धियोंका यदि स्मरण रहे तब कितनी माताएँ, कितने पिता और कितने पुत्र- कलत्रादि कुटुम्बी कहाँ-कहाँ हैं, उन सभीके सुख- दुःखमें कितना सुख-दुःख देखना (भोगना) पड़े। एक ही जन्मके कुटुम्बियोंके सम्बन्धमें क्या दशा हो रही है। अस्तु, देहके नष्ट होते ही स्त्री, पुत्र, धन- धान्य तथा अखण्ड साम्राज्यसे सम्बन्ध छूट जाता है। कदाचित् दूसरे जन्ममें किसीको स्मरण भी रहे कि यह साम्राज्य और विशाल धवलधाम सब मेरे ही हैं। पर अब बिना वर्तमान अधिपतिकी आज्ञाके उसे अपने ही निर्मित उस धवलधाममें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है और गत जन्ममें उसके नियुक्त भृत्य ही उसे प्रवेश नहीं करने देते हैं। ठीक है, देहतक ही समस्त सांसारिक सम्बन्ध हैं। अतः समस्त पुत्र, कलत्रादि बहिरंग पदार्थोंकी अपेक्षा देह प्रिय होती है। ऐसे ही देहकी अपेक्षा इन्द्रियाँ, उनकी अपेक्षा मन, मनकी अपेक्षा बुद्धि एवं बुद्धिसे भी अहमर्थ और उससे भी अन्तरंग विशुद्ध चिदात्मा प्रिय है। इन्द्रिय-शक्तिके बिना शरीर मृतकप्राय हो जानेके कारण भाररूप हो जाता है। जब मन किन्हीं कांचन, कामिनी प्रभृति विषयोंकी ओर खिंच जाता है, तब प्राणी मनःसन्तोषार्थ देह और इन्द्रियोंकी भी परवाह नहीं करते। किसी प्रकारकी अकीर्ति आदिसे यदि मनको उद्वेग होता है, तब देहादि-त्यागके लिये विष या शस्त्रका प्रयोग किया जाता है। जब प्राणी
मनकी चंचलतासे संतप्त होता है, तब उसके भी निग्रहका उपाय ढूँढता है और निश्चयात्मिका बुद्धि- द्वारा संकल्प-विकल्पात्मक मनका भी निग्रह करता है। जब प्राणीको मन आदि करणग्रामके निरोध या उसकी निर्व्यापारताका आनन्द अनुभव होने लगता है, तब तो वह दुःखात्मक दृश्यके प्रतीति-निरोधके लिये बुद्धिको भी निगृहीत करनेकी चेष्टा करने लगता है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इस रीतिसे क्रमशः आत्माके सन्निहित अतएव अन्तरंग बुद्ध्यादिके उद्वेग-निराकरण एवं अनुकूलता- सम्पादन करनेके लिये बहिरंग करणोंका निग्रह किया जाता है। शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता अध्यात्मशास्त्रोंमें मनोनाश वासनाक्षय प्रसिद्ध ही है। यहाँतक कि जो यह 'अहं' पदका वाच्यार्थ है, वह भी अन्तःकरणके अहंकारांशसे उपहित आत्माका औपाधिक रूप है। अतः वह भी असह्य होनेके कारण निर्ग्राह्य हो जाता है; क्योंकि 'अहं' पदका लक्ष्यार्थरूप जो निरुपाधिक शुद्ध स्वरूप है, वही मन, बुद्धि एवं अहमर्थ और उसके सुखित्व, दुःखित्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि सर्व दृश्यका भासक और मिथ्याभूत समस्त भास्यके बाधका साक्षी, वस्तुतः भास्यभासकातीत, सर्वोपप्लव-विवर्जित, त्रिकालाबाध्य, स्वप्रकाश परमानन्द चिदात्मा है। उसके स्वाभाविक अखण्डानन्दकी अभिव्यक्तिमें 'अहमर्थ' भी प्रतिबन्धक ही है। अभिप्राय यह है कि यद्यपि कुछ दार्शनिकोंके मतमें 'अहं' का वाच्यार्थ ही आत्मा है, जो कि 'अहं कर्ता', 'अहं भोक्ता' 'अहं सुखी', 'अहं दुःखी' इस रूपसे अनुभवमें आ रहा है, अतः उसका नाश आत्माका ही नाश है। मेरी देह, मेरी इन्द्रियाँ, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार—इस प्रकार जो ममताके आस्पद हैं, वे अनात्मा हैं और मेरी बुद्धि सुस्थिर है, मैं अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको निगृहीत करूँगा, इस प्रकार जो 'अहंता' का आस्पद 'अहमर्थ' है, वही शुद्ध आत्मा है। उससे परे जीवका अपना कोई स्वरूप नहीं है, अतः 'अहमर्थ' का नाश करना आत्माका ही नाश करना है। तथापि अभिज्ञ वेदान्तीका सिद्धान्त है कि 'अहं' का वाच्यार्थ आत्मा नहीं है, किंतु लक्ष्यार्थ ही आत्मा है अर्थात् जैसे अग्निके सम्बन्धसे अग्निकी दाहकता, प्रकाशकता आदि शक्तियोंसे युक्त होनेसे लौहपिण्डमें अग्निका भ्रममात्र होता है, शुद्ध निरुपाधिक अग्नि लौहपिण्डसे पृथक् है, वैसे ही आत्माके घनिष्ठ संसर्गसे अहमर्थ (मैं)-में प्रेमास्पदता और चेतनता अधिक प्रतीत होती है, अतएव उसमें आत्माकी भ्रान्तिमात्रता है। वस्तुतस्तु मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा सुख, मेरा दुःख, मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी या केवल मैं, ये सभी भास्य हैं, इनकी प्रतीति होती है, इनका सुस्पष्ट भान होता है। भास्यसे भासक या भान पृथक् ही है। जिस रीतिसे चार्वाक प्रभृतिको देहमें ही आत्मबुद्धि हुई; क्योंकि आत्माके ही पारम्परीण सम्बन्धसे देहमें भी किंचित् चेतनता, इष्टता या प्रेमास्पदता भासित होती है और उसीसे उन अत्यन्त अज्ञ, लौकिक, पामर एवं चार्वाकोंको देह-नाशमें ही आत्म-नाशकी बुद्धि हुई, उसी प्रकार 'अहमर्थनाश' में 'आत्मनाश' की बुद्धि इतर दार्शनिकोंको भी हुई। 'अहं श्यामो', 'अहं गौरः' मैं काला हूँ, मैं गौर हूँ, स्थूल हूँ, कृश हूँ—इस तरह स्थौल्यादि धर्मवान् देहमें जैसे अहमर्थके अभेदका अध्यास होता है, वैसे ही चिज्जडग्रन्थि अहमर्थमें चैतन्यान्दघन भगवान्का अभेदाध्यास होता है। इसी वास्ते सर्वस्पर्शविहीन ('स्पृश्यन्ते इति स्पर्शाः विषयाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार समस्त दृश्य ही स्पर्श हैं) अर्थात् सर्वदृश्यविहीन, परम सूक्ष्म, सर्वावभासक, स्वप्रकाश, चैतन्यान्दघन, परम
७२४ भक्तिसुधा अभय भगवान्में अज्ञोंको भय होता है। देखा जाता है कि प्राणियोंको स्थूल पदार्थोंका ही आधिक्येन भान होता है, इसीलिये नील, पीत, हरित रूपोंकी जैसी स्फुट प्रतीति होती है; वैसी अनेक रूपोंका प्रकाश करनेवाली प्रभाकी स्फुटता नहीं होती। प्रभाका प्रकाश करनेवाले नेत्रालोकका विज्ञान उससे भी अधिक दुर्लभ है। कोई ही यह समझता है कि जैसे प्रभाके न होनेपर रूपका प्रकाश नहीं हुआ और प्रभाके होनेपर रूपका प्रकाश हुआ, अतः प्रभा रूपसे पृथक् है, वैसे ही नेत्र-निमीलन-कालमें प्रभाका भी भान नहीं था और नेत्रोन्मीलन-कालमें प्रभाकी प्रतीति हुई, अतः नेत्रके उन्मीलन-कालमें एक अति सूक्ष्म नेत्रालोक ही प्रभापर व्याप्त होकर प्रभाका प्रकाशन करता है। अस्तु, इसके उपरान्त भी नेत्रालोककी मन्दता और पटुताका प्रकाश करनेवाला मानसालोक (मानस-प्रकाश) नेत्रालोकसे पृथक् ही है, जिससे कि मेरी नेत्र-ज्योति मन्द है या तीव्र है, यह जाना जाता है। मनुष्य मनके काम, संकल्प, संशय आदि अनेक विकारोंको जानकर निश्चयात्मिका बुद्धिसे निश्चय करता है कि मैं स्थिर बुद्धिसे मन और उसके विकारोंको निरुद्ध करूँगा। यहाँ स्पष्टतया तीनों अंशोंकी प्रतीति होती है—जिसका निरोध या नाश करेंगे, वह मन और उसके संशयादि विकार, जिससे निरोध करेंगे, वह साधनरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि जिसके विषयमें उसकी बुद्धि मन्द या अत्यन्त सूक्ष्म है, इस तरहके अनुभव होते हैं और जो बुद्धिद्वारा मनका निरोध करनेवाला है, वह 'अहं' अर्थात् 'मैं'। इसी प्रकारसे 'अहं बुद्ध्या मनः संयच्छामि' (मैं बुद्धिसे मनका नियन्त्रण करूँगा) ऐसे अनुभवमें 'मैं', 'बुद्धि' और 'मन' इन तीनोंकी प्रतीति होती है। अतः ये सभी तो प्रतीतिके विषय हो गये, इनकी प्रतीति या भान इनसे अवश्य पृथक् है; क्योंकि एकमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकता। इसीलिये प्रकाश्यसे प्रकाशक भिन्न होता है, यह बात लोकमें प्रसिद्ध है। प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान 'स्वयंप्रकाश' कहा जाता है। मन, बुद्धि और 'मैं' का भासक, अकेला शुद्ध भान तो भास्य न होनेसे स्वयंप्रकाश है। अतः यह भान ही सर्वदा प्रकाशान्तर-निरपेक्ष भासमान होकर स्थिर है और तदतिरिक्त सभी भास्य अस्थिर हैं। इसीलिये जाग्रत् और स्वप्नमें 'अहं' और 'बुद्धि' एवं 'मन' यद्यपि उपलब्ध होते हैं, परंतु सुषुप्तिमें इन सबका अभाव हो जाता है। उस समय भी जाग्रत् और स्वप्नमें सकल दृश्यके भावका और सुषुप्तिमें समस्त व्यक्त दृश्यके अभावका प्रकाश करनेवाला एवं सर्व दृश्यके विलयनका आधारभूत, सुषुप्ति एवं गाढ़ निद्रा या अज्ञानका भासन करनेवाला, कूटस्थ भानरूप आत्मा ही विराजमान रहता है। इसीका संकेत भागवतमें इस तरह किया है— सन्ने यदीन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ (श्रीमद्भा० १२।३।३२) स्वयं श्रुतिने इस तथ्यका प्रकाश किया है— 'नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्य- यमहमस्मीति।' (छान्दोग्य० ८।११।१) इस प्रकार अखण्ड, अनन्त, परमसूक्ष्म वस्तुका बोध अत्यन्त दुर्लभ है। जिन स्थूल पदार्थोंका बोध प्राणियोंको है, उनके नाशमें सर्वनाश या आत्मनाशकी प्रतीति होनी युक्त ही है। इसीलिये श्रीगौडपादाचार्य भगवान् कहते हैं कि—'अस्पर्शयोगो वै नामैष दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः। योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः॥' (माण्डुक्य० ३९) सर्वस्पर्श, सर्वदृश्य- सम्बन्धसे रहित, भास्य-विवर्जित, परमसूक्ष्म, अखण्डानन्दरूप काल्पनिक सर्वभाव तथा अभावोंका भासक, कूटस्थ भानस्वरूप आत्मा तत्त्वज्ञसे भिन्न समस्त योगियोंके लिये दुर्दर्श है; क्योंकि दृश्य ही जिनका सर्वस्व है, दृश्यसे भिन्न स्वप्रकाश अखण्डानन्द द्रष्टापर जिनकी कभी दृष्टि गयी ही नहीं, उन्हें दृश्यके नाशसे परमानन्दसुधासिन्धुके सर्वतोभावेन
भरपूर होनेपर भी सर्वस्वनाश होनेकी ही प्रतीति होती है। किसी भिक्षुकीके सौन्दर्यपर मुग्ध होकर किसी सम्राट्ने उसे साम्राज्ञी होनेको कहा; किंतु भिक्षुकी यह समझकर कि हमारी भिक्षा माँगनेकी सामग्री और भिक्षाका आनन्द चला जायगा, साम्राज्ञी बननेसे डर गयी। कारण कि साम्राज्ञीके सुखकी कल्पना कभी उसकी दृष्टिमें हुई ही नहीं, उसे तो भिक्षा और उसके ही आनन्दका सर्वदा संस्कार रहा। ठीक इसी तरह जिन्हें कभी अखण्डानन्दमय, निर्विकार दृक्के अनन्त सौख्यकी अनुभूति हुई ही नहीं, केवल कटु दृश्यके ही अक्षुण्ण संस्कार प्राप्त हो रहे हैं, उनको दृश्य ही सरस प्रतीत होता है। परमात्मस्वरूप उन्हें उद्वेजक प्रतीत होता है। जैसे सेंधा नमकका ढेला पानीमें मिल जानेसे नष्ट हुआ कहा जाता है, वास्तवमें उपाधिके साथ संसर्ग मिटनेसे केवल उसका औपाधिक रूप ही मिटता है, वैसे ही पंचकोशादि उपाधि मिटनेसे चेतनमें तत्कृत अवच्छेद ही मिटता है, आत्मतत्त्व शुद्ध निर्विकार भानरूपमें तो विद्यमान ही रहता है। जैसे नीमके कीड़ेको नीममें ही स्वाद आता है और मिसरी या चीनीमें उसे उद्वेग होता है, वैसे ही दृश्य-रागीको अत्यन्त कटु दृश्यमें ही प्रीति होती है। सर्व दृश्य- रूप उपद्रवसे रहित, परमानन्दघन भगवान्से उसे घबराहट होती है। जैसे पुत्र कलत्रादि कुटुम्बके अनुरागी विषयी प्राणियोंको स्वर्ग या वैकुण्ठ भी रुचिकर प्रतीत नहीं होता, वैसे ही सप्रपंच सुखके रागियोंको निरावरण अद्वैतानन्दमें रुचि नहीं होती। इसीलिये वे अद्वैत, अखण्ड, अनन्त, ब्रह्मानन्दरूप मुक्तिसे घबराते हैं। किसी-किसीका तो यहाँतक कथन है कि चाहे वृन्दावनमें शृगाल भले ही हो जायें, परंतु अद्वैतियोंका निर्विशेष मोक्ष हमें नहीं चाहिये। ठीक ही है, विषयीका तो सर्वस्व विषय ही है। अतः जहाँ विषयका अत्यन्त अभाव हो, ऐसे ब्रह्म या मोक्षसे उसका क्या सम्बन्ध ? जिस मोक्षमें नृत्य, वादित्र, गीत और सरस रूप एवं मधुररसकी अनुभूति नहीं, ऐसे नीरस, निर्विषय मोक्षमें उन्हें शुष्क पाषाण-बुद्धि क्यों न हो? वस्तुतः यह उनके संस्कारोंका ही दोष है। सप्रपंच, सातिशय, क्षुद्र साधन-परतन्त्र सुखका ही उन्हें अनुभव है। उन्हींमें उन्हें संस्कार या राग है तो फिर तद्विलक्षण, निष्प्रपंच, निरतिशय, अनन्त, स्वतन्त्र, आनन्दाम्बुधिकी कल्पना भी उनके मनमें कैसे हो? ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता अति स्वल्प भी विवेचन करनेपर विवेकियोंको निरायास, निष्प्रपंच, अपरिच्छिन्न आनन्दकी महत्ताका ज्ञान हो जाता है। जब किसी रसिकको अत्यन्त अभिलषित रसमय पदार्थ एवं रसमयी कान्ताकी प्राप्ति होती है, तब किंचित् काल उसे अत्यन्त हर्ष होता है। परंतु अन्तमें उसे छोड़कर वही पुरुष सोनेके लिये प्रवृत्त होता है। क्यों? यह क्या बात है? जिस प्रियतमा कान्ताके मिलनके लिये पहले उसे इतनी व्यग्रता, इतनी व्याकुलता थी, आज उसी प्रेयसीके सम्मिलनमें केवल उसीमें उसकी तल्लीनता होनी चाहिये, पर अब वह निद्राको बुलाता है। मनुष्यकी तो कौन कहे, ब्रह्मा और विष्णुकी भी जिनके सन्निधानमें दिव्यातिदिव्य रमण-सामग्रियाँ विद्यमान हैं, द्वैत प्रपंचमें जितनी भी उच्च-से-उच्च कोटिकी सौख्य-सामग्रियाँ हैं, वे सभी वहाँ विद्यमान हैं, फिर भी उन अद्भुत सप्रपंच सौख्योंको छोड़कर सुषुप्तिमें क्यों प्रवृत्ति होती है? इसीलिये कि वहाँ निष्प्रपंच, अद्वैत सुखकी अनुभूति होती है, जिनकी एक छायामात्र ही सातिशय प्रपंच सुखमें परिलक्षित होती है। किं बहुना भगवद्भावापन्न, अत्यन्त उच्च कोटिके अनुरागी, जिन्हें अपने प्रियतम प्राणधनके वियोगमें मरणसे भी अनन्त कोटि गुणित संताप होता है; जिनके क्षणमात्रके प्रियतम-वियोगजन्य तीव्र तापको निरीक्षण करके अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त पाप यह सोचकर संतापसे दुर्बल हो जाते हैं कि हम सभी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त प्राणियोंके
अनन्त पाप एकत्रित होकर भी, अनन्त कल्पोंमें भी रौरवादि महानरकोंद्वारा इतना सन्ताप नहीं सम्पादन कर सके, जितना सन्ताप (कष्ट) इन्हें एक क्षणके प्रियतम-वियोग-जन्य तीव्र तापमें हुआ है। जिन प्रेमियोंको केवल ध्यानमें प्राप्त प्रियतमके मानस आलिंगनमें ऐसा अद्भुत आनन्द होता है, जिसे देखकर अनन्त ब्रह्माण्डके पुण्यपुंज यह सोचकर क्षीण हो जाते हैं कि हम सभी पुण्य मिलकर भी क्या अनन्त कल्पोंमें किसीको इतना आनन्द दे सकते हैं, जितना आनन्द इन्हें अपने प्रियतमके मानस परिष्वंगसे एक क्षणमें हुआ है? वे ही प्रेमी सौभाग्यवश जब अपने प्रियतमके चिर अभिलषित उस मंगलमय धाममें पहुँच जाते हैं, जहाँ-कहीं मरकतमयी भूमिपर सुवर्णवर्णा लतावल्ली एवं अद्भुत अनन्त ज्योतिर्मय वृक्ष हैं। कहीं कनकमयी भूमिपर मरकतमयी लताप्रतान एवं परम मनोहर श्यामल दूर्वाएँ हैं। अपनी दिव्य दीप्तियोंसे सूर्य-चन्द्रकी दीप्तियोंको भी तिरस्कार करनेवाले मणि तथा रत्न प्रकाश कर रहे हैं, हंस, सारस, कारण्डव, पिकादि कलरव कर रहे हैं; कहीं नाना प्रकारके अद्भुत खग-मृग विचरते हैं। कहीं मरकत मणियोंके समान वृक्षोंपर कनकमयी वल्लियाँ शोभायमान हो रही हैं, कहीं कनकमय मंजुल-कुंजोंपर मरकतमयी लताएँ विराजमान हैं, कहीं पद्मराग मणिके वृक्ष स्फटिकमयी लताओंसे परिवेष्टित हैं और अनेक प्रकारकी विचित्र मणिमयी शाखाओंसे शोभित हो रहे हैं। प्रत्येक शाखा अद्भुत अनन्त रंगोंके विचित्र मणिमय पल्लवोंसे भूषित है। प्रत्येक पल्लव नाना रंगोंके पुष्पस्तबकोंसे शोभायमान है तथा प्रत्येक पुष्पपर नाना प्रकारके सौगन्ध्यमधुलुब्ध भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे दीप्यमान प्रकट पुष्पोंसे शोभित मधुमयी मनोरम लताएँ विलक्षण शोभा फैलाती हैं। समस्त वृक्ष और लताएँ एक कालमें ही मुकुलित, प्रफुल्लित, फलित एवं पक्व फलोंसे भी युक्त हो रहे हैं। वहाँके अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्यादि गुणोंका वर्णन शारदाके लिये भी अशक्य है। ऐसे मंगलमय धाममें प्रेमी अपने सर्वस्व चिराभिलषित प्रियतमका परिष्वंग करके फूले नहीं समाते हैं। परंतु यदि प्रियतम और उनकी मंगलमयी लीलाकी मंजु सामग्री अखण्ड अनन्त आनन्दस्वरूप ही है, तब तो उस अपरिमित रसके आस्वादनसे उनको विरति नहीं हो सकती; क्योंकि वह अद्वैत आनन्दैकरस ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं। यदि वस्तुतः पारमार्थिक अखण्डैकरस अद्वैत आनन्दसे पृथक् है, तब तो वही बात हुई कि जैसे लोकमें किसीको दुष्प्राप्य धवलधाम और मनोहर उद्यान देखकर उनकी प्राप्तिके लिये बड़ी उत्कण्ठा होती है और उनके मिलनेपर कुछ क्षण बड़ा हर्ष भी होता है, परंतु कुछ ही कालमें चित्त अन्य विषयोंके चिन्तनमें व्यग्र हो जाता है और वे समस्त सौख्य-सामग्रियाँ सामने होनेपर भी अपना प्रभाव उसके चित्तपर नहीं डाल सकतीं। फिर तो वह और ही चिन्तामें ग्रस्त हो जाता है। दूसरेकी दृष्टिमें वह बहुत सुखी होनेपर भी अपनी दृष्टिमें दुःखी होता है। ठीक वैसे ही थोड़ी देरमें नाना प्रकारके रसास्वादनके अनन्तर मन कुछ और चाहने लगता है। वहाँ भी यदि नींदमें बाधा पड़ी, तब तो प्रजागर दोष समझा जाने लगता है। कहनेका आशय यही है कि प्रियतमासे मिलकर भी प्रेमीकी सोनेके लिये प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः जिनके पास जितनी अधिक भोग-सामग्री है, वे उतना ही अधिक सोनेमें प्रवृत्त होते हैं। यह सब इसीलिये कि चाहे कितना ही सुख क्यों न हो, परंतु वह दुःखरूप ही है। दृश्यदर्शनमें श्रम है, अतः उससे परिश्रान्त होकर प्राणी निरायास, अखण्ड, आनन्द ब्रह्ममें विश्रान्ति चाहता है। वास्तवमें सभी तत्त्व अपने अधिष्ठानभूत परमात्मासे वियुक्त होकर संतप्त होते हैं। जैसे किसी सूत्रमें बँधा हुआ कोई पक्षी प्रतिदिशामें भ्रमण करनेसे परिश्रान्त होकर विश्रान्तिके लिये बन्धनसूत्रके आश्रय काष्ठका ही
वेदान्तरससार ७२७ समाश्रयण करता है, वैसे ही नाना प्रकारके कर्मोंसे परतन्त्र होकर जीव जाग्रत् एवं स्वप्नकी अवस्थाओंमें स्वाश्रयभूत प्रभुसे वियुक्त होकर भिन्न-भिन्न विषयोंमें भटकता है। जाग्रत् एवं स्वप्नके हेतुभूत अविद्या, काम कर्मोंके क्षीण होनेपर वह पुनः विश्रान्तिके लिये भगवान्का ही अवलम्बन करता है। श्रुतियोंमें जीवको प्रभुका अंश बतलाया है और कहा है कि जैसे अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारी)-का निर्गम होता है, उसी तरह परमात्मासे जीवोंका निर्गम होता है। 'यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति।' (बृहदारण्यक० २।१।२०) अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता निष्कल, निरवयव, अखण्ड, अनन्त परमात्मामें छेदन-भेदनादिद्वारा किसी तरहसे भी खण्ड होना असम्भव होनेसे मुख्य अंश-अंशिभाव तो सम्पन्न नहीं होता। अतः काल्पनिक अंश-अंशिभाव लोग मानते हैं। अन्यान्य लोग कहते हैं कि जैसे चन्द्रमाका शतांश गुरु है, वैसे ही परमात्माका अंश जीव है। इनके मतमें 'तत्सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वम्' यही अंश-कथनका आशय है। परंतु अद्वैतवादियोंका कहना है कि चन्द्रमाका और गुरुका अंश-अंशिभाव बहुत बाह्य एवं औपचारिक है। अतएव शुक्रका चन्द्रमासे उद्गम न होनेसे उसके साथ शुक्रका कोई विशेष सम्बन्ध होना सिद्ध नहीं होता, किंतु परमात्मासे उद्गम और उससे विशेष सम्बन्ध रखनेवाले जीवका अंश-अंशिभाव अन्तरंग ही होना चाहिये। अतः जैसे घटोपाधिसे घटाकाश महाकाशका अंश कहा जाता है, वायु उपाधिसे तरंग महासमुद्रका अंश है, उसी तरह अविद्या या अन्तःकरण उपाधिसे जीव परमात्माका अंश कहा जाता है। उपाधियोंके विक्षोभमें उपहितका अनुपहितसे पार्थक्य और उनकी उपशान्तिमें उपहितका अनुपहितसे ऐक्य होता है। जिस समय आकाशसे वायु-जलादि क्रमेण घट उत्पन्न होता है, उस समय घटाकाशकी उत्पत्ति एवं महाकाशसे उसके पार्थक्यकी प्रतीति होती है। घटका विलयन होनेपर घटाकाशका महाकाशके साथ सम्मिलन प्रतीत होता है। वायुके स्पन्दनकालमें महासमुद्रसे तरंगकी उत्पत्ति एवं उसकी समुद्रसे भिन्नता प्रतीत होती है और वायुके निःस्पन्दनकालमें तरंगका विलयन प्रतीत होता है। निरावरण तथा द्रवीभूत जलकी अभिव्यक्तिमें बिम्बसे प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति एवं बिम्बसे भिन्नता प्रतीत होती है और जलके सावरण होनेपर या शैत्ययोगसे घनीभूत होनेपर प्रतिबिम्बकी बिम्बभावापत्ति होती है। इन सभी उदाहरणोंसे केवल यही बात दिखलायी जाती है कि जैसे स्वभावसे घटाकाश, तरंग तथा प्रतिबिम्ब महाकाश एवं महासमुद्र बिम्बसे पृथक् नहीं हैं, उनसे भिन्नता एवं विलक्षणता उपाधियोगसे प्रतीत होती है, वैसे ही जीव स्वभावतः ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसमें भिन्नता एवं परमात्मासे विलक्षणता केवल उपाधियोंसे प्रतीत होती है। जैसे महाप्रलयमें समस्त प्रपंच समष्टि सबीज ब्रह्ममें विलीन होता है, वैसे ही सुषुप्तिमें भी समस्त प्रपंचका विलयन श्रुतिने कहा है। 'सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति।' (कैवल्योपनिषत् १३) अतः सुषुप्तिमें उपाधियोंके विलीन होनेपर तमस्से अभिभूत जीव परमात्मासे मिलता है। जबतक जल मलिन एवं द्रुत रहता है, तबतक उसकी मलिनता एवं चंचलतासे प्रतिबिम्ब भी मलिन एवं चंचल प्रतीत होता है। ऐसे ही अन्तःकरण जबतक मलिन एवं चंचल-स्वरूपेण व्यक्त रहता है, तबतक उसमें प्रतिबिम्बित चिदानन्दतत्त्व भी उसकी मलिनता तथा चंचलतासे मलिन तथा चंचल रहता है। यही बात 'ध्यायतीव लेलायतीव' (बृहदारण्यक० ४।३।७) इस श्रुतिमें कही गयी है। परंतु जिस समय अविद्यापरिणाम अन्तःकरण अविद्यामें विलीन हो जाय या निद्रारूप गाढ़ आवरणसे आवृत हो जाय, उस समय जैसे जलके सावरण एवं घनीभावमें
प्रतिबिम्ब बिम्ब ही हो जाता है, बिम्बसे पृथक् रहता ही नहीं, अतः उससे किसी प्रकारके अनर्थका सम्बन्ध नहीं होता; ठीक वैसे ही सुषुप्तिमें जीव परमात्मामें मिल जाता है, पृथक् उसका स्वरूप ही नहीं रहता। अतएव किसी प्रकारके अनर्थका योग उस समय उसको नहीं होता। इसीलिये श्रुति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छान्दोग्य० ६।८।१) इत्यादि वचनोंसे उस स्थितिको स्पष्ट सिद्ध कर रही है। (अभिप्राय यह है कि निर्मल, निश्चल तथा निरावरण जलपर सूर्यादिका प्रतिफलन स्फुटरीतिसे होता है। तद्वत् निर्मल, निश्चल और निरावरण चित्तपर चिदात्मतत्त्वका प्रतिफलन भी स्फुटरीतिसे होता है। जैसे मलिन, चंचल तथा सावरण जलपर सूर्यादिके प्रतिफलनका अवरोध होता है; वैसे ही मलिन, चंचल और सावरण अन्तःकरणपर चिदात्मतत्त्वके प्रतिफलनका अवरोध होता है। रजःकण, वायु आदिके आघात और सेवारादिके योगसे जल मलिन, चंचल तथा सावरण होता है। तद्वत् तमस्, रजस् और गाढ़ तमस्के योगसे अन्तःकरण मलिन, चंचल और घनीभूत सावरण होता है। मलिन जल ही नहीं, अपितु निर्मल जल भी प्रवाह और वायु आदि निमित्तक आघातके योगसे चंचल होता है। कर्म और वासनात्मक कुत्सित संस्कार एवं मृदु तथा मध्यम तमोगुणके योगसे चित्त मलिन होता है। शुद्ध या अशुद्ध संकल्प-विकल्पके अविरल आघातसे चित्त चंचल होता है। तमोगुणकी प्रगल्भताकी दशामें चित्त मलिन, घनीभूत और निःसंकल्पताके कारण निश्चल होता है। सुषुप्तिमें बीजभावापन्न अवधारणस्वभाव घनीभूत चित्तमें तादात्म्यापन्न चिदात्माकी प्राज्ञ संज्ञा होती है।) जीव जाग्रत् और स्वप्नमें कर्मोंके वश होनेसे अद्वैत निष्प्रपंच परमात्मसुखसे वंचित होकर द्वैतरूप दुःखसागरमें भटकते-भटकते परिश्रान्त हो जाता है और विश्रान्तिके लिये फिर कर्मोंके उपरत होनेपर 'सत्' पदवाच्य सबीज परमात्मामें मिलता है। अतः दृश्यमें, द्वैतमें वस्तुतः सुखका लेश भी नहीं है, केवल अज्ञोंने भ्रान्तिसे उसमें सुखकी कल्पना की है। श्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता लौकिक विषयानन्दमें भी जहाँ जितना भेद- भाव मिटता है, वहाँ उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। चंचल चित्तमें अधिक मात्रामें द्वैतका भान होता है, अतः उस अवस्थामें अधिक दुःख होता है। अभिलषित विषयकी प्राप्तिमें तृष्णाकण्टकके अपगमसे चित्तमें स्वस्थता, एकाग्रता एवं कुछ अन्तर्मुखता होती है, कुछ मात्रामें द्वैत मिटता है, अतएव कुछ मात्रामें आनन्दकी प्राप्ति होती है। समाधिमें द्वैतकी प्रतीति अधिक मिटती है, अतएव वहाँ अधिक आनन्द मिलता है। सौषुप्तसुखके भी उत्कर्षमें द्वैतकी अप्रतीति हेतु है। अतएव वहाँ दृष्टान्त भी उसी ढंगका है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) अर्थात् जैसे प्रियतमासे विप्रयुक्त कोई नायक चिरकालसे अभिलषित अपनी प्रेयसीकी प्राप्ति होनेपर उसके परिरम्भणसे आनन्दोद्रेकमें बाह्य-आभ्यन्तर सर्वविध दृश्यको भूल जाता है; जगत् क्या है, मैं क्या और कहाँ हूँ, इसका उसे ज्ञान ही नहीं रहता, वैसे ही जाग्रत् एवं स्वप्नके द्वैत प्रपंचसे उद्विग्न जीव भी निष्प्रपंच प्राज्ञ परमात्माके परिरम्भणसे दृश्य क्या और कहाँ है और मैं क्या हूँ, इत्यादि आन्तर-बाह्य सब प्रकारके प्रपंचको भूल जाता है। दुःखरूप द्वैतमें केवल अपेक्षाकृत सुखकी कल्पना है। रज-तमके उद्रेकमें तृष्णा, मोह-विषादका विस्तार होता है। उसकी अपेक्षा सत्त्वके उद्रेकसे अन्तर्मुखतामें अर्थात् द्वैत-प्रतीतिकी कमीमें सुखका व्यवहार होता है और तो क्या कहें, अनन्तकोटि
वेदान्तरससार ७२१ ब्रह्माण्डनायक भगवान्को भी दृश्यकी प्रतीतिमें सन्ताप ही होना है। अतएव श्रुतिने कहा है कि ‘द्वैतका ज्ञान होना ही परमात्माका तप है’—‘यस्य ज्ञानमयं तपः’ (मुण्डक० १।१।९)। जैसे हम सबके लिये कृच्छ्रादिरूप तप है, वैसे ही परमात्माके लिये द्वैत ज्ञान ही तप है। यह ठीक ही है; क्योंकि जो बात बहिर्मुखोंके लिये नगण्य है, वही अन्तर्मुखोंको और ही प्रकारसे अनुभूत होती है। देखते ही हैं कि और अंगोंमें दण्डके आघातसे भी उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि नेत्रमें ऊर्णा तन्तुके निक्षेपसे होता है। जिन दोषों एवं दृश्य-प्रतीतियोंसे बहिर्मुखोंको कुछ भी सन्ताप नहीं होता, उन्हींसे अन्तर्मुख योगियोंको बहुत विक्षेप होता है। तो फिर योगेश्वर भगवान्के लिये दृश्यदर्शन कृच्छ्रादिकोंकी तरह घोर तप हो तो इसमें क्या आश्चर्य है ! कठोरोंके लिये जो कुछ नहीं, वही सुकुमारोंके लिये बहुत है, इसीलिये आचार्योंने कहा है कि— निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ (भामती-मंगलाचरण २) अर्थात् भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, वीक्षणसे ही पंचभूतोंकी सृष्टि होती है, स्मित (मन्दहास)-से ही सकल चराचर जगत् बन जाता है और प्रभुकी सुषुप्तिमें ही समस्त प्रपंचका प्रलय हो जाता है। प्रभुके वीक्षण एवं मन्दहास (मुसकराहट)-से कितने अद्भुत अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका प्राकट्य होता है। प्रभुके वीक्षणादिमें जैसा अद्भुत प्रभाव है, वैसे ही प्रभुकी सुकुमारता भी अद्भुत है। अतः वीक्षणमें ही उन्हें इतना श्रम तथा कष्ट होता है कि वही तप हो जाता है। बस, वीक्षण और मन्दहासमें ही परिश्रान्त होकर वे विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिमें पहुँच जाते हैं। वीक्षण करके थोड़ा-सा मुस्करा देना और सो जाना, बस इतना ही उनका कार्य है। अब सहृदय महापुरुष कल्पना करें कि अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान्को भी जब वीक्षण और मुसकराहटके अनन्तर ही विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिकी आवश्यकता है, तब फिर द्वैतमें सुख है या अद्वैतमें? द्वैतमें चाहे जहाँ भी जितना भी जो कुछ भी सुख है, वह निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखकी अपेक्षा न्यून ही नहीं, अपितु दुःखरूप है। सर्व- सौख्य-सम्पन्न द्वैतदर्शनसे उद्विग्न होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् विश्रान्तिके लिये अद्भुत अद्वैत सुखका समाश्रयण करते हैं, फिर उनके भक्तोंको दुःखरूप द्वैतमें ही आनन्द हो, यह कैसे हो सकता है? अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त जीवों एवं उन सबके नियामक तथा आराध्य भगवान्को द्वैतदर्शनमें सुखका लेश भी नहीं है। जो कुछ भी सुखकी कल्पना है, वह केवल राजस-तामस भावोंके उद्रेकसे चांचल्य और द्वैतदर्शनके आधिक्यरूप दुःखकी अपेक्षासे ही है। जितनी-जितनी प्रपंचकी निवृत्ति एवं अन्तर्मुखता होती है, उतने-उतने अंशोंमें सुखकी कल्पना है। सुषुप्तिमें द्वैतदर्शनकी पर्याप्त निवृत्ति होती है, अतः वहाँ सुख भी पर्याप्त होता है। इसीलिये जीव और उनके भगवान् दोनोंकी प्रवृत्ति स्वरूपभूत निष्प्रपंच सुखके लिये होती है। जिस जीवको एक दिन नींद नहीं आती, वह घबरा जाता है और उसे प्रजागर दोष समझकर नींदके लिये सहस्रों उपचार करता है। उस समय चाहे कितनी भी दिव्यातिदिव्य सौख्यसामग्रियाँ क्यों न प्राप्त हों, सब-की-सब बेकार प्रतीत होती हैं, उनकी प्रतीति भी खटकती है, परंतु सब कुछ छोड़कर केवल सोनेके लिये ही जीव व्यग्र हो उठता है। यह क्या निष्प्रपंच अद्वैत सुखकी महत्ता नहीं है? अब कृतप्रज्ञ यह सोच सकते हैं कि जब सावरण निष्प्रपंच अद्वैत सुखमें सबका इतना आकर्षण है, तब निरावरण, निरतिशय, निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखमें सभीका कितना प्रेम होगा? यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि सौषुप्त निष्प्रपंच ब्राह्मसुख सावरण एवं सबीज है, इसीलिये इसे प्राप्तकर भी जीवोंका
७३० भक्तिसुधा पुनरुत्थान होता है और जीवोंको ही कर्मफल देनेके लिये लीलया भगवान्का भी उत्थान होता है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे जिन लोगोंके अज्ञानरूप बीजकी निवृत्ति होती है, उन निर्बीज ब्रह्मभावापन्नोंका पुनरुत्थान नहीं होता। सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता सबीजसे ही समस्त प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है—जैसे अखण्ड, अनन्त नभोमण्डलमें एक अतिक्षुद्र मेघका अंकुर होता है, उसी तरह अनन्त, अखण्ड, परिपूर्ण, परमानन्द स्वप्रकाश भगवान्के अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्त अचिन्त्य दिव्य महामाया शक्ति होती है। उसके भी अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-जननी अनन्त अवान्तर शक्तियाँ होती हैं। एक-एक शक्तिमें सत्त्व, रज, तमके प्राधान्याप्राधान्यसे विद्या-अविद्या तामसी प्रकृति आदि अनेक भेद हो जाते हैं। रज और तमके लेशसे भी अनाक्रान्त अतएव विशुद्धसत्त्वप्रधाना शक्तिको माया या विद्या कहते हैं एवं रज तथा तमसे संस्पृष्ट अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना शक्तिको अविद्या कहते हैं और तमःप्रधाना शक्ति तामसी प्रकृति कही जाती है। यद्यपि कहीं-कहीं मूल प्रकृतिमें भी माया और अविद्या पदका प्रयोग होता है, जैसे 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' (श्वेताश्वतर० ४।१०) 'माया स्वाव्यतिरिक्तानि परिपूर्णानि क्षेत्राणि दर्शयित्वा जीवेशावाभासेन करोति माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ९) इत्यादि तथापि उसे कार्य और कारणके अभेदसे औपचारिक समझना चाहिये। जैसे मीमांसक गोविकार पयमें भी गो- पदका प्रयोग उपचारसे मानते हैं, यथा—'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' वैसे ही कहीं कार्यका प्रयोग कारणमें हो जाता है। अतः मूल महाशक्तिकी अवान्तर शक्तियोंके विभागमें विद्या-अविद्या आदि पदोंका प्रयोग शास्त्रसम्मत है। विद्या या मायारूप उपाधिसे उपहित चैतन्य ईश्वर-चैतन्य है और अविद्या उपाधिसे उपहित चैतन्य जीव-चैतन्य है। तामसी प्रकृतिसे भोग्यवर्गका प्रादुर्भाव होता है। इस तामसी प्रकृतियुक्त परमात्मासे महत्तत्त्व एवं महत्तत्त्वसे अहंतत्त्वकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि श्रुतियोंमें 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः।' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि वचनोंद्वारा सीधे परमात्मासे ही आकाशकी उत्पत्ति होना प्रतीत होता है तथापि—'बुद्धेरात्मा महान् परः ॥,' 'महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।' (कठ० १।३।१०-११) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि 'परमात्मा और उनकी शक्ति अव्यक्तके अनन्तर एवं आकाशके पहले महत्तत्त्व तथा अहं तत्त्व नामक पदार्थ भी हैं।' गीताने भी 'महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।' (गीता १३।५) इस श्लोकसे अपंचीकृत (परस्पर असम्मिलित) आकाशादि पृथिव्यन्त पंचमहाभूत एवं अहंकार (अहंतत्त्व), बुद्धि (महत्तत्त्व) तथा 'अव्यक्त तत्त्व' इन आठ प्रकृतियोंके रूपमें उन्हींका वर्णन किया है। उन्हींका 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥' (गीता ७।४) इस श्लोकमें भी वर्णन किया है। इस श्लोकमें मन शब्दसे आकाशके कारण अहंतत्त्वको ही समझना चाहिये, बुद्धि पदसे अहंतत्त्वका कारण महत्तत्वको समझना चाहिये और अहंकारसे महत्तत्त्वका कारण अव्यक्तको समझना चाहिये; क्योंकि ऐसा ही प्रकृति-विकृतिभाव सर्वत्र प्रसिद्ध है। यथाश्रुत मन, बुद्धि एवं अहंकारका कार्य-कारण भाव कहीं भी प्रसिद्ध नहीं है और यहाँ 'भिन्ना प्रकृतिरष्टधा' से भिन्न-भिन्न आठ प्रकृतियाँ विवक्षित हैं। यह तभी सम्भव है, जब भूमिको जलसे, जलका अनल (तेज) से, अनलका वायुसे एवं वायुका आकाशसे, आकाशका अहंतत्त्वसे, उसका महत्तत्त्वसे और महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्वसे आविर्भाव माना जाय। अतएव 'महाभूतान्यहङ्कारो
वेदान्तरससार [७३१]
बुद्धिरव्यक्तमेव च' (गीता १३।५) इस गीता- वचनमें स्पष्ट ही अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्वका वर्णन है। इस तरह श्रुति-स्मृतिके तात्पर्य-विवेचनसे स्पष्ट विदित होता है कि साक्षात् परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति नहीं हुई, अपितु महत्तत्त्व आदिके क्रमसे ही हुई है। अतएव जहाँ- कहीं सतत्त्व परमात्मासे सीधे तेजकी ही उत्पत्ति श्रुत है, वहाँ भी आकाश एवं वायुकी उत्पत्तिके अनन्तर आकाश-वायुरूपमें आविर्भूत परमात्मासे तेजकी उत्पत्ति समझनी चाहिये। श्रुतियोंमें जो 'तदैक्षत एकोऽहं बहु स्याम्' (छान्दोग्य० ६।२।३)परमात्माने ईक्षण=निरीक्षण (विचार) किया कि एक मैं बहुत हो जाऊँ इत्यादि रूपसे ईक्षण और अहंका उल्लेख मिलता है, इससे भी अहंतत्त्व एवं महत्तत्त्वका ही द्योतन होता है। किसी कार्यके निर्माणमें ज्ञान एवं अहंकारकी आवश्यकता होती है। व्यष्टिद्वारा ही समष्टि-भाव समझे जाते हैं। समष्टि-तत्त्वको बुद्ध्यारूढ़ करनेके लिये प्रथम व्यक्तिका ही अवलम्बन करना पड़ता है। इसी वास्ते श्रुतिने ही 'स एकाकी न रेमे स द्वितीयमैच्छत्' (उस पुरुषको एकाकी होनेके कारण अरति हुई) इसी कारण अब भी प्राणियोंको अकेले होनेपर रमण, आनन्द नहीं होता। 'तस्मादेकाकी न रमते' (बृहदारण्यक० १।४।३) ऐसा कहा है। यही कारण है कि उपासनाओंमें जैसे प्रत्यक्ष शालग्राममें अप्रत्यक्ष विष्णुकी बुद्धि की जाती है, वैसे ही प्रत्यक्ष व्यष्टि जाग्रत्-अवस्था एवं स्थूल शरीराभिमानी विश्वमें समष्टि स्थूल प्रपंचाभिमानी वैश्वानरकी दृष्टि एवं व्यष्टि, स्वप्नावस्था एवं सूक्ष्म शरीराभिमानी तैजसमें समष्टि सूक्ष्म प्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भकी दृष्टि तथा व्यष्टि सुषुप्ति अवस्था एवं अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी प्राज्ञमें समष्टि-अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी कारण ब्रह्मरूप सर्वान्तर्यामी सर्वेश्वरकी दृष्टि कही गयी है। इससे विपरीत विराट्में विश्व-दृष्टि नहीं कही गयी; क्योंकि समष्टि अप्रत्यक्ष है। आकाशके एक देशमें बादलकी एक छोटी-सी टिकुली देखकर आकाशव्यापी महामेघमण्डलकी कल्पना की जाती है। जैसे स्वल्प परिमाणवाले दीप्तिमान् अग्निको देखकर अखण्ड ब्रह्माण्डव्यापक दीप्तिमान् अग्निकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अनुभूत व्यष्टि अज्ञान एवं ज्ञान तथा अहंकारसे समष्टि अज्ञान तथा महत्तत्त्व एवं अहंतत्त्वका भी बुद्धिमें आरोहण हो सकता है। समस्त तत्त्व क्रमशः परमात्मासे उत्पन्न और उसीमें लीन होते हैं। सुषुप्तिमें भी प्रपंचका लय प्रतीत होता है। हम स्पष्ट रूपसे देखते हैं कि घोर सुषुप्तिमें सोया हुआ पुरुष न कुछ जानता है, न उसे अहंकार होता है और न वह कुछ कार्य कर सकता है; क्योंकि समस्त इन्द्रियगण और अहंकार उस समय अज्ञानमें लीन होते हैं। 'सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते' (श्रीमद्भा० ११।३।३९) इसी वास्ते सुषुप्ति-अवस्थामें रहनेवाला आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा प्रजापतिके उपदेशको सुनकर इन्द्रको यही अनुपपत्ति प्रतीत हुई थी कि सुषुप्तिमें अपने या दूसरे किसीका तो ज्ञान होता नहीं, फिर इसमें पुरुषार्थ ही क्या है ? यहाँ भी अहंकारादिका आत्यन्तिक लय नहीं है; क्योंकि जागरमें उनकी पुनः प्रतीति होती है। अस्तु, यह तो बहुत ही प्रसिद्ध है कि सुषुप्ति दशामें जीवको कुछ भी ज्ञान नहीं होता। परंतु इस बातको भी विज्ञ पुरुष ही समझ सकते हैं कि 'मैं सुखपूर्वक सोया और कुछ भी नहीं जाना।'-इस प्रकारकी जो स्मृति सुषुप्तिसे उत्थित पुरुषको होती है, यह भी बिना अनुभवके असम्भव है; क्योंकि बिना अनुभवके कोई स्मरण नहीं होता। अतः सुषुप्तोत्थ पुरुषके स्मरणसे निश्चय होता है कि सुषुप्तिमें सौषुप्ततम एवं सौषुप्तसुखका प्रकाशक कोई स्वाभाविक अखण्ड नित्य विज्ञान अवश्य था। यहाँ जो लोग यह कहते हैं कि सुषुप्तिमें कोई भावरूप सुख या अज्ञान नहीं होता, किंतु दुःखके अभाव एवं ज्ञानके अभावमें ही
७३२ भक्तिसुधा सुख एवं अज्ञानका व्यवहार होता है, उनको यह बतलाना चाहिये कि ज्ञानाभावका ज्ञान कैसे होगा ? अभावके ज्ञानमें अनुयोगी (अधिकरण) एवं प्रतियोगी (जिसका अभाव हो)-का ज्ञान आवश्यक होता है। जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी (घटाभावके अधिकरण भूतलादि) तथा प्रतियोगी (घट) इन दोनोंका ज्ञान आवश्यक होता है। अन्यथा किसका अभाव कहाँ है, ऐसी जिज्ञासा शान्त नहीं होगी। अनुभवगोचरता और आच्छादकताके कारण अज्ञानकी भावरूपता न कि ज्ञानाभावरूपता यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अधिकरण एवं उसके प्रतियोगीका ज्ञान रहा हो, तब उस ज्ञानके होते हुए वहाँ ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है ? जिस भूतलमें कोई भी घट हो वहाँ घटाभावका व्यवहार कैसे हो सकता है ? यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अनुयोगी एवं प्रतियोगीका ज्ञान नहीं था, तब तो उस ज्ञानाभावकी अनुपलब्धि या प्रत्यक्षद्वारा कथमपि ज्ञान नहीं हो सकता है। अतः आत्मस्वरूपका आवरण करनेवाला अज्ञान पूर्वकथनानुसार भावरूप ही है। जैसे सूर्यके आवरक मेघका प्रकाश सूर्यसे ही होता है, वैसे ही नित्य विज्ञानानन्दघन आत्माके आवरक अज्ञानका प्रकाश साक्षीरूप आत्मासे ही होता है। अस्तु, इस प्रसंगका स्पष्टीकरण अन्यत्र किया जायगा। प्रकृत प्रसंग यही है कि सुषुप्तिदशामें निद्रा या अज्ञानसे समावृत साक्षीद्वारा अज्ञानका प्रकाश होता है। अहंकार आदि वहाँ नहीं होते। सुषुप्तिके अनन्तर प्रथम निद्राकी निवृत्तिमें कुछ ऐसा ज्ञान होता है, जिसमें किसी तरहके विशेष विकल्पका स्फुरण नहीं होता। यहाँ दो स्थितियाँ हैं—विषय-विशेषके स्फुरणके बिना बौद्धज्ञान होता है, जिसे व्यष्टि महत्तत्त्व कह सकते हैं; जिसके अनन्तर अहंकारका उल्लेख होता है, इसीलिये अज्ञानसे ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाती है। सुषुप्तिमें अज्ञान ही होता है और उसके अव्यवहित उत्तर जाग्रत् या स्वप्नमें ही कुछ ज्ञान होता है। समष्टि अज्ञानरूप मायासे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। जैसे अव्यक्तसे व्यक्तका प्रादुर्भाव है, वैसे ही अज्ञानसे ज्ञानका प्रादुर्भाव होना युक्त ही है। उत्पन्न व्यक्त ज्ञानके सिवा निद्राभंगके अनन्तर एक नित्य- सिद्ध निरावरण ब्रह्मरूप अखण्ड बोधकी भी अभिव्यक्ति होती है। तत्परतापूर्वक उसीके साक्षात्कारसे जीव सदाके लिये बन्धनसे मुक्त हो जाता है। विवेकियोंका कहना है कि आत्माके आवरण दो हैं—एक तो दृश्यका स्फुरण और दूसरा अज्ञान। जाग्रत् स्वप्नमें आत्मा विक्षेपरूप दृश्यसे समावृत रहता है और सुषुप्तिमें अज्ञानसे आवृत होता है। जब समाधिमें प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—इन पाँचों वृत्तियोंका निरोध होता है अर्थात् जाग्रत्- स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयावस्थाका आविर्भाव होता है, तब निरावरण विशुद्ध आत्मतत्त्वका दर्शन होता है। अज्ञानादि सब दृश्योंकी जो प्रतीति या उसका भान किंवा प्रकाश है, वही अखण्ड एवं अनन्त आत्मा है। बिना प्रतीति, बिना भान, बिना प्रकाश किसी पदार्थका अस्तित्व ही नहीं सिद्ध होता। जो पदार्थ है, वह अवश्य ही केनचित् क्वचित्कथंचित् अर्थात् किसीसे, कहीं, किसी प्रकार विज्ञात है, इसी वास्ते प्रतीतिके भीतर ही समस्त देश, समस्त काल और समस्त वस्तुएँ हैं। यह सर्वभासक, निर्मल, अखण्ड प्रतीति ही परमात्मस्वरूप है। यह अखण्ड प्रतीति आकाशकी तरह पोली नहीं है, अपितु ठोस है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बका स्फुरण होता है, वैसे ही इस प्रतीतिमें दृश्यका स्फुरण होता है। जैसे बिना दर्पणकी प्रतीतिके प्रतिबिम्बका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही बिना स्वयंप्रकाशकी प्रतीतिके स्फुरण नहीं होता। अतएव श्रुति है—‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतरो० ६।१४) जैसे दर्पण-स्फुरणके पीछे प्रतिबिम्ब-स्फुरण होता है,