भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनन्त पाप एकत्रित होकर भी, अनन्त कल्पोंमें भी रौरवादि महानरकोंद्वारा इतना सन्ताप नहीं सम्पादन कर सके, जितना सन्ताप (कष्ट) इन्हें एक क्षणके प्रियतम-वियोग-जन्य तीव्र तापमें हुआ है। जिन प्रेमियोंको केवल ध्यानमें प्राप्त प्रियतमके मानस आलिंगनमें ऐसा अद्भुत आनन्द होता है, जिसे देखकर अनन्त ब्रह्माण्डके पुण्यपुंज यह सोचकर क्षीण हो जाते हैं कि हम सभी पुण्य मिलकर भी क्या अनन्त कल्पोंमें किसीको इतना आनन्द दे सकते हैं, जितना आनन्द इन्हें अपने प्रियतमके मानस परिष्वंगसे एक क्षणमें हुआ है? वे ही प्रेमी सौभाग्यवश जब अपने प्रियतमके चिर अभिलषित उस मंगलमय धाममें पहुँच जाते हैं, जहाँ-कहीं मरकतमयी भूमिपर सुवर्णवर्णा लतावल्ली एवं अद्भुत अनन्त ज्योतिर्मय वृक्ष हैं। कहीं कनकमयी भूमिपर मरकतमयी लताप्रतान एवं परम मनोहर श्यामल दूर्वाएँ हैं। अपनी दिव्य दीप्तियोंसे सूर्य-चन्द्रकी दीप्तियोंको भी तिरस्कार करनेवाले मणि तथा रत्न प्रकाश कर रहे हैं, हंस, सारस, कारण्डव, पिकादि कलरव कर रहे हैं; कहीं नाना प्रकारके अद्भुत खग-मृग विचरते हैं। कहीं मरकत मणियोंके समान वृक्षोंपर कनकमयी वल्लियाँ शोभायमान हो रही हैं, कहीं कनकमय मंजुल-कुंजोंपर मरकतमयी लताएँ विराजमान हैं, कहीं पद्मराग मणिके वृक्ष स्फटिकमयी लताओंसे परिवेष्टित हैं और अनेक प्रकारकी विचित्र मणिमयी शाखाओंसे शोभित हो रहे हैं। प्रत्येक शाखा अद्भुत अनन्त रंगोंके विचित्र मणिमय पल्लवोंसे भूषित है। प्रत्येक पल्लव नाना रंगोंके पुष्पस्तबकोंसे शोभायमान है तथा प्रत्येक पुष्पपर नाना प्रकारके सौगन्ध्यमधुलुब्ध भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे दीप्यमान प्रकट पुष्पोंसे शोभित मधुमयी मनोरम लताएँ विलक्षण शोभा फैलाती हैं। समस्त वृक्ष और लताएँ एक कालमें ही मुकुलित, प्रफुल्लित, फलित एवं पक्व फलोंसे भी युक्त हो रहे हैं। वहाँके अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्यादि गुणोंका वर्णन शारदाके लिये भी अशक्य है। ऐसे मंगलमय धाममें प्रेमी अपने सर्वस्व चिराभिलषित प्रियतमका परिष्वंग करके फूले नहीं समाते हैं। परंतु यदि प्रियतम और उनकी मंगलमयी लीलाकी मंजु सामग्री अखण्ड अनन्त आनन्दस्वरूप ही है, तब तो उस अपरिमित रसके आस्वादनसे उनको विरति नहीं हो सकती; क्योंकि वह अद्वैत आनन्दैकरस ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं। यदि वस्तुतः पारमार्थिक अखण्डैकरस अद्वैत आनन्दसे पृथक् है, तब तो वही बात हुई कि जैसे लोकमें किसीको दुष्प्राप्य धवलधाम और मनोहर उद्यान देखकर उनकी प्राप्तिके लिये बड़ी उत्कण्ठा होती है और उनके मिलनेपर कुछ क्षण बड़ा हर्ष भी होता है, परंतु कुछ ही कालमें चित्त अन्य विषयोंके चिन्तनमें व्यग्र हो जाता है और वे समस्त सौख्य-सामग्रियाँ सामने होनेपर भी अपना प्रभाव उसके चित्तपर नहीं डाल सकतीं। फिर तो वह और ही चिन्तामें ग्रस्त हो जाता है। दूसरेकी दृष्टिमें वह बहुत सुखी होनेपर भी अपनी दृष्टिमें दुःखी होता है। ठीक वैसे ही थोड़ी देरमें नाना प्रकारके रसास्वादनके अनन्तर मन कुछ और चाहने लगता है। वहाँ भी यदि नींदमें बाधा पड़ी, तब तो प्रजागर दोष समझा जाने लगता है। कहनेका आशय यही है कि प्रियतमासे मिलकर भी प्रेमीकी सोनेके लिये प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः जिनके पास जितनी अधिक भोग-सामग्री है, वे उतना ही अधिक सोनेमें प्रवृत्त होते हैं। यह सब इसीलिये कि चाहे कितना ही सुख क्यों न हो, परंतु वह दुःखरूप ही है। दृश्यदर्शनमें श्रम है, अतः उससे परिश्रान्त होकर प्राणी निरायास, अखण्ड, आनन्द ब्रह्ममें विश्रान्ति चाहता है। वास्तवमें सभी तत्त्व अपने अधिष्ठानभूत परमात्मासे वियुक्त होकर संतप्त होते हैं। जैसे किसी सूत्रमें बँधा हुआ कोई पक्षी प्रतिदिशामें भ्रमण करनेसे परिश्रान्त होकर विश्रान्तिके लिये बन्धनसूत्रके आश्रय काष्ठका ही