भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार ७२७ समाश्रयण करता है, वैसे ही नाना प्रकारके कर्मोंसे परतन्त्र होकर जीव जाग्रत् एवं स्वप्नकी अवस्थाओंमें स्वाश्रयभूत प्रभुसे वियुक्त होकर भिन्न-भिन्न विषयोंमें भटकता है। जाग्रत् एवं स्वप्नके हेतुभूत अविद्या, काम कर्मोंके क्षीण होनेपर वह पुनः विश्रान्तिके लिये भगवान्का ही अवलम्बन करता है। श्रुतियोंमें जीवको प्रभुका अंश बतलाया है और कहा है कि जैसे अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारी)-का निर्गम होता है, उसी तरह परमात्मासे जीवोंका निर्गम होता है। 'यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति।' (बृहदारण्यक० २।१।२०) अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता निष्कल, निरवयव, अखण्ड, अनन्त परमात्मामें छेदन-भेदनादिद्वारा किसी तरहसे भी खण्ड होना असम्भव होनेसे मुख्य अंश-अंशिभाव तो सम्पन्न नहीं होता। अतः काल्पनिक अंश-अंशिभाव लोग मानते हैं। अन्यान्य लोग कहते हैं कि जैसे चन्द्रमाका शतांश गुरु है, वैसे ही परमात्माका अंश जीव है। इनके मतमें 'तत्सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वम्' यही अंश-कथनका आशय है। परंतु अद्वैतवादियोंका कहना है कि चन्द्रमाका और गुरुका अंश-अंशिभाव बहुत बाह्य एवं औपचारिक है। अतएव शुक्रका चन्द्रमासे उद्गम न होनेसे उसके साथ शुक्रका कोई विशेष सम्बन्ध होना सिद्ध नहीं होता, किंतु परमात्मासे उद्गम और उससे विशेष सम्बन्ध रखनेवाले जीवका अंश-अंशिभाव अन्तरंग ही होना चाहिये। अतः जैसे घटोपाधिसे घटाकाश महाकाशका अंश कहा जाता है, वायु उपाधिसे तरंग महासमुद्रका अंश है, उसी तरह अविद्या या अन्तःकरण उपाधिसे जीव परमात्माका अंश कहा जाता है। उपाधियोंके विक्षोभमें उपहितका अनुपहितसे पार्थक्य और उनकी उपशान्तिमें उपहितका अनुपहितसे ऐक्य होता है। जिस समय आकाशसे वायु-जलादि क्रमेण घट उत्पन्न होता है, उस समय घटाकाशकी उत्पत्ति एवं महाकाशसे उसके पार्थक्यकी प्रतीति होती है। घटका विलयन होनेपर घटाकाशका महाकाशके साथ सम्मिलन प्रतीत होता है। वायुके स्पन्दनकालमें महासमुद्रसे तरंगकी उत्पत्ति एवं उसकी समुद्रसे भिन्नता प्रतीत होती है और वायुके निःस्पन्दनकालमें तरंगका विलयन प्रतीत होता है। निरावरण तथा द्रवीभूत जलकी अभिव्यक्तिमें बिम्बसे प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति एवं बिम्बसे भिन्नता प्रतीत होती है और जलके सावरण होनेपर या शैत्ययोगसे घनीभूत होनेपर प्रतिबिम्बकी बिम्बभावापत्ति होती है। इन सभी उदाहरणोंसे केवल यही बात दिखलायी जाती है कि जैसे स्वभावसे घटाकाश, तरंग तथा प्रतिबिम्ब महाकाश एवं महासमुद्र बिम्बसे पृथक् नहीं हैं, उनसे भिन्नता एवं विलक्षणता उपाधियोगसे प्रतीत होती है, वैसे ही जीव स्वभावतः ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसमें भिन्नता एवं परमात्मासे विलक्षणता केवल उपाधियोंसे प्रतीत होती है। जैसे महाप्रलयमें समस्त प्रपंच समष्टि सबीज ब्रह्ममें विलीन होता है, वैसे ही सुषुप्तिमें भी समस्त प्रपंचका विलयन श्रुतिने कहा है। 'सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति।' (कैवल्योपनिषत् १३) अतः सुषुप्तिमें उपाधियोंके विलीन होनेपर तमस्से अभिभूत जीव परमात्मासे मिलता है। जबतक जल मलिन एवं द्रुत रहता है, तबतक उसकी मलिनता एवं चंचलतासे प्रतिबिम्ब भी मलिन एवं चंचल प्रतीत होता है। ऐसे ही अन्तःकरण जबतक मलिन एवं चंचल-स्वरूपेण व्यक्त रहता है, तबतक उसमें प्रतिबिम्बित चिदानन्दतत्त्व भी उसकी मलिनता तथा चंचलतासे मलिन तथा चंचल रहता है। यही बात 'ध्यायतीव लेलायतीव' (बृहदारण्यक० ४।३।७) इस श्रुतिमें कही गयी है। परंतु जिस समय अविद्यापरिणाम अन्तःकरण अविद्यामें विलीन हो जाय या निद्रारूप गाढ़ आवरणसे आवृत हो जाय, उस समय जैसे जलके सावरण एवं घनीभावमें