भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्ब बिम्ब ही हो जाता है, बिम्बसे पृथक् रहता ही नहीं, अतः उससे किसी प्रकारके अनर्थका सम्बन्ध नहीं होता; ठीक वैसे ही सुषुप्तिमें जीव परमात्मामें मिल जाता है, पृथक् उसका स्वरूप ही नहीं रहता। अतएव किसी प्रकारके अनर्थका योग उस समय उसको नहीं होता। इसीलिये श्रुति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छान्दोग्य० ६।८।१) इत्यादि वचनोंसे उस स्थितिको स्पष्ट सिद्ध कर रही है। (अभिप्राय यह है कि निर्मल, निश्चल तथा निरावरण जलपर सूर्यादिका प्रतिफलन स्फुटरीतिसे होता है। तद्वत् निर्मल, निश्चल और निरावरण चित्तपर चिदात्मतत्त्वका प्रतिफलन भी स्फुटरीतिसे होता है। जैसे मलिन, चंचल तथा सावरण जलपर सूर्यादिके प्रतिफलनका अवरोध होता है; वैसे ही मलिन, चंचल और सावरण अन्तःकरणपर चिदात्मतत्त्वके प्रतिफलनका अवरोध होता है। रजःकण, वायु आदिके आघात और सेवारादिके योगसे जल मलिन, चंचल तथा सावरण होता है। तद्वत् तमस्, रजस् और गाढ़ तमस्के योगसे अन्तःकरण मलिन, चंचल और घनीभूत सावरण होता है। मलिन जल ही नहीं, अपितु निर्मल जल भी प्रवाह और वायु आदि निमित्तक आघातके योगसे चंचल होता है। कर्म और वासनात्मक कुत्सित संस्कार एवं मृदु तथा मध्यम तमोगुणके योगसे चित्त मलिन होता है। शुद्ध या अशुद्ध संकल्प-विकल्पके अविरल आघातसे चित्त चंचल होता है। तमोगुणकी प्रगल्भताकी दशामें चित्त मलिन, घनीभूत और निःसंकल्पताके कारण निश्चल होता है। सुषुप्तिमें बीजभावापन्न अवधारणस्वभाव घनीभूत चित्तमें तादात्म्यापन्न चिदात्माकी प्राज्ञ संज्ञा होती है।) जीव जाग्रत् और स्वप्नमें कर्मोंके वश होनेसे अद्वैत निष्प्रपंच परमात्मसुखसे वंचित होकर द्वैतरूप दुःखसागरमें भटकते-भटकते परिश्रान्त हो जाता है और विश्रान्तिके लिये फिर कर्मोंके उपरत होनेपर 'सत्' पदवाच्य सबीज परमात्मामें मिलता है। अतः दृश्यमें, द्वैतमें वस्तुतः सुखका लेश भी नहीं है, केवल अज्ञोंने भ्रान्तिसे उसमें सुखकी कल्पना की है। श्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता लौकिक विषयानन्दमें भी जहाँ जितना भेद- भाव मिटता है, वहाँ उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। चंचल चित्तमें अधिक मात्रामें द्वैतका भान होता है, अतः उस अवस्थामें अधिक दुःख होता है। अभिलषित विषयकी प्राप्तिमें तृष्णाकण्टकके अपगमसे चित्तमें स्वस्थता, एकाग्रता एवं कुछ अन्तर्मुखता होती है, कुछ मात्रामें द्वैत मिटता है, अतएव कुछ मात्रामें आनन्दकी प्राप्ति होती है। समाधिमें द्वैतकी प्रतीति अधिक मिटती है, अतएव वहाँ अधिक आनन्द मिलता है। सौषुप्तसुखके भी उत्कर्षमें द्वैतकी अप्रतीति हेतु है। अतएव वहाँ दृष्टान्त भी उसी ढंगका है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) अर्थात् जैसे प्रियतमासे विप्रयुक्त कोई नायक चिरकालसे अभिलषित अपनी प्रेयसीकी प्राप्ति होनेपर उसके परिरम्भणसे आनन्दोद्रेकमें बाह्य-आभ्यन्तर सर्वविध दृश्यको भूल जाता है; जगत् क्या है, मैं क्या और कहाँ हूँ, इसका उसे ज्ञान ही नहीं रहता, वैसे ही जाग्रत् एवं स्वप्नके द्वैत प्रपंचसे उद्विग्न जीव भी निष्प्रपंच प्राज्ञ परमात्माके परिरम्भणसे दृश्य क्या और कहाँ है और मैं क्या हूँ, इत्यादि आन्तर-बाह्य सब प्रकारके प्रपंचको भूल जाता है। दुःखरूप द्वैतमें केवल अपेक्षाकृत सुखकी कल्पना है। रज-तमके उद्रेकमें तृष्णा, मोह-विषादका विस्तार होता है। उसकी अपेक्षा सत्त्वके उद्रेकसे अन्तर्मुखतामें अर्थात् द्वैत-प्रतीतिकी कमीमें सुखका व्यवहार होता है और तो क्या कहें, अनन्तकोटि