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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

प्रतिबिम्ब बिम्ब ही हो जाता है, बिम्बसे पृथक् रहता ही नहीं, अतः उससे किसी प्रकारके अनर्थका सम्बन्ध नहीं होता; ठीक वैसे ही सुषुप्तिमें जीव परमात्मामें मिल जाता है, पृथक् उसका स्वरूप ही नहीं रहता। अतएव किसी प्रकारके अनर्थका योग उस समय उसको नहीं होता। इसीलिये श्रुति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छान्दोग्य० ६।८।१) इत्यादि वचनोंसे उस स्थितिको स्पष्ट सिद्ध कर रही है। (अभिप्राय यह है कि निर्मल, निश्चल तथा निरावरण जलपर सूर्यादिका प्रतिफलन स्फुटरीतिसे होता है। तद्वत् निर्मल, निश्चल और निरावरण चित्तपर चिदात्मतत्त्वका प्रतिफलन भी स्फुटरीतिसे होता है। जैसे मलिन, चंचल तथा सावरण जलपर सूर्यादिके प्रतिफलनका अवरोध होता है; वैसे ही मलिन, चंचल और सावरण अन्तःकरणपर चिदात्मतत्त्वके प्रतिफलनका अवरोध होता है। रजःकण, वायु आदिके आघात और सेवारादिके योगसे जल मलिन, चंचल तथा सावरण होता है। तद्वत् तमस्, रजस् और गाढ़ तमस्‌के योगसे अन्तःकरण मलिन, चंचल और घनीभूत सावरण होता है। मलिन जल ही नहीं, अपितु निर्मल जल भी प्रवाह और वायु आदि निमित्तक आघातके योगसे चंचल होता है। कर्म और वासनात्मक कुत्सित संस्कार एवं मृदु तथा मध्यम तमोगुणके योगसे चित्त मलिन होता है। शुद्ध या अशुद्ध संकल्प-विकल्पके अविरल आघातसे चित्त चंचल होता है। तमोगुणकी प्रगल्भताकी दशामें चित्त मलिन, घनीभूत और निःसंकल्पताके कारण निश्चल होता है। सुषुप्तिमें बीजभावापन्न अवधारणस्वभाव घनीभूत चित्तमें तादात्म्यापन्न चिदात्माकी प्राज्ञ संज्ञा होती है।) जीव जाग्रत् और स्वप्नमें कर्मोंके वश होनेसे अद्वैत निष्प्रपंच परमात्मसुखसे वंचित होकर द्वैतरूप दुःखसागरमें भटकते-भटकते परिश्रान्त हो जाता है और विश्रान्तिके लिये फिर कर्मोंके उपरत होनेपर 'सत्' पदवाच्य सबीज परमात्मामें मिलता है। अतः दृश्यमें, द्वैतमें वस्तुतः सुखका लेश भी नहीं है, केवल अज्ञोंने भ्रान्तिसे उसमें सुखकी कल्पना की है। श्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता लौकिक विषयानन्दमें भी जहाँ जितना भेद- भाव मिटता है, वहाँ उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। चंचल चित्तमें अधिक मात्रामें द्वैतका भान होता है, अतः उस अवस्थामें अधिक दुःख होता है। अभिलषित विषयकी प्राप्तिमें तृष्णाकण्टकके अपगमसे चित्तमें स्वस्थता, एकाग्रता एवं कुछ अन्तर्मुखता होती है, कुछ मात्रामें द्वैत मिटता है, अतएव कुछ मात्रामें आनन्दकी प्राप्ति होती है। समाधिमें द्वैतकी प्रतीति अधिक मिटती है, अतएव वहाँ अधिक आनन्द मिलता है। सौषुप्तसुखके भी उत्कर्षमें द्वैतकी अप्रतीति हेतु है। अतएव वहाँ दृष्टान्त भी उसी ढंगका है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) अर्थात् जैसे प्रियतमासे विप्रयुक्त कोई नायक चिरकालसे अभिलषित अपनी प्रेयसीकी प्राप्ति होनेपर उसके परिरम्भणसे आनन्दोद्रेकमें बाह्य-आभ्यन्तर सर्वविध दृश्यको भूल जाता है; जगत् क्या है, मैं क्या और कहाँ हूँ, इसका उसे ज्ञान ही नहीं रहता, वैसे ही जाग्रत् एवं स्वप्नके द्वैत प्रपंचसे उद्विग्न जीव भी निष्प्रपंच प्राज्ञ परमात्माके परिरम्भणसे दृश्य क्या और कहाँ है और मैं क्या हूँ, इत्यादि आन्तर-बाह्य सब प्रकारके प्रपंचको भूल जाता है। दुःखरूप द्वैतमें केवल अपेक्षाकृत सुखकी कल्पना है। रज-तमके उद्रेकमें तृष्णा, मोह-विषादका विस्तार होता है। उसकी अपेक्षा सत्त्वके उद्रेकसे अन्तर्मुखतामें अर्थात् द्वैत-प्रतीतिकी कमीमें सुखका व्यवहार होता है और तो क्या कहें, अनन्तकोटि

वेदान्तरससार ७२१ ब्रह्माण्डनायक भगवान्‌को भी दृश्यकी प्रतीतिमें सन्ताप ही होना है। अतएव श्रुतिने कहा है कि ‘द्वैतका ज्ञान होना ही परमात्माका तप है’—‘यस्य ज्ञानमयं तपः’ (मुण्डक० १।१।९)। जैसे हम सबके लिये कृच्छ्रादिरूप तप है, वैसे ही परमात्माके लिये द्वैत ज्ञान ही तप है। यह ठीक ही है; क्योंकि जो बात बहिर्मुखोंके लिये नगण्य है, वही अन्तर्मुखोंको और ही प्रकारसे अनुभूत होती है। देखते ही हैं कि और अंगोंमें दण्डके आघातसे भी उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि नेत्रमें ऊर्णा तन्तुके निक्षेपसे होता है। जिन दोषों एवं दृश्य-प्रतीतियोंसे बहिर्मुखोंको कुछ भी सन्ताप नहीं होता, उन्हींसे अन्तर्मुख योगियोंको बहुत विक्षेप होता है। तो फिर योगेश्वर भगवान्‌के लिये दृश्यदर्शन कृच्छ्रादिकोंकी तरह घोर तप हो तो इसमें क्या आश्चर्य है ! कठोरोंके लिये जो कुछ नहीं, वही सुकुमारोंके लिये बहुत है, इसीलिये आचार्योंने कहा है कि— निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ (भामती-मंगलाचरण २) अर्थात् भगवान्‌के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, वीक्षणसे ही पंचभूतोंकी सृष्टि होती है, स्मित (मन्दहास)-से ही सकल चराचर जगत् बन जाता है और प्रभुकी सुषुप्तिमें ही समस्त प्रपंचका प्रलय हो जाता है। प्रभुके वीक्षण एवं मन्दहास (मुसकराहट)-से कितने अद्भुत अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका प्राकट्य होता है। प्रभुके वीक्षणादिमें जैसा अद्भुत प्रभाव है, वैसे ही प्रभुकी सुकुमारता भी अद्भुत है। अतः वीक्षणमें ही उन्हें इतना श्रम तथा कष्ट होता है कि वही तप हो जाता है। बस, वीक्षण और मन्दहासमें ही परिश्रान्त होकर वे विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिमें पहुँच जाते हैं। वीक्षण करके थोड़ा-सा मुस्करा देना और सो जाना, बस इतना ही उनका कार्य है। अब सहृदय महापुरुष कल्पना करें कि अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान्‌को भी जब वीक्षण और मुसकराहटके अनन्तर ही विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिकी आवश्यकता है, तब फिर द्वैतमें सुख है या अद्वैतमें? द्वैतमें चाहे जहाँ भी जितना भी जो कुछ भी सुख है, वह निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखकी अपेक्षा न्यून ही नहीं, अपितु दुःखरूप है। सर्व- सौख्य-सम्पन्न द्वैतदर्शनसे उद्विग्न होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् विश्रान्तिके लिये अद्भुत अद्वैत सुखका समाश्रयण करते हैं, फिर उनके भक्तोंको दुःखरूप द्वैतमें ही आनन्द हो, यह कैसे हो सकता है? अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त जीवों एवं उन सबके नियामक तथा आराध्य भगवान्‌को द्वैतदर्शनमें सुखका लेश भी नहीं है। जो कुछ भी सुखकी कल्पना है, वह केवल राजस-तामस भावोंके उद्रेकसे चांचल्य और द्वैतदर्शनके आधिक्यरूप दुःखकी अपेक्षासे ही है। जितनी-जितनी प्रपंचकी निवृत्ति एवं अन्तर्मुखता होती है, उतने-उतने अंशोंमें सुखकी कल्पना है। सुषुप्तिमें द्वैतदर्शनकी पर्याप्त निवृत्ति होती है, अतः वहाँ सुख भी पर्याप्त होता है। इसीलिये जीव और उनके भगवान् दोनोंकी प्रवृत्ति स्वरूपभूत निष्प्रपंच सुखके लिये होती है। जिस जीवको एक दिन नींद नहीं आती, वह घबरा जाता है और उसे प्रजागर दोष समझकर नींदके लिये सहस्रों उपचार करता है। उस समय चाहे कितनी भी दिव्यातिदिव्य सौख्यसामग्रियाँ क्यों न प्राप्त हों, सब-की-सब बेकार प्रतीत होती हैं, उनकी प्रतीति भी खटकती है, परंतु सब कुछ छोड़कर केवल सोनेके लिये ही जीव व्यग्र हो उठता है। यह क्या निष्प्रपंच अद्वैत सुखकी महत्ता नहीं है? अब कृतप्रज्ञ यह सोच सकते हैं कि जब सावरण निष्प्रपंच अद्वैत सुखमें सबका इतना आकर्षण है, तब निरावरण, निरतिशय, निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखमें सभीका कितना प्रेम होगा? यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि सौषुप्त निष्प्रपंच ब्राह्मसुख सावरण एवं सबीज है, इसीलिये इसे प्राप्तकर भी जीवोंका

७३० भक्तिसुधा पुनरुत्थान होता है और जीवोंको ही कर्मफल देनेके लिये लीलया भगवान्‌का भी उत्थान होता है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे जिन लोगोंके अज्ञानरूप बीजकी निवृत्ति होती है, उन निर्बीज ब्रह्मभावापन्नोंका पुनरुत्थान नहीं होता। सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता सबीजसे ही समस्त प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है—जैसे अखण्ड, अनन्त नभोमण्डलमें एक अतिक्षुद्र मेघका अंकुर होता है, उसी तरह अनन्त, अखण्ड, परिपूर्ण, परमानन्द स्वप्रकाश भगवान्‌के अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्त अचिन्त्य दिव्य महामाया शक्ति होती है। उसके भी अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-जननी अनन्त अवान्तर शक्तियाँ होती हैं। एक-एक शक्तिमें सत्त्व, रज, तमके प्राधान्याप्राधान्यसे विद्या-अविद्या तामसी प्रकृति आदि अनेक भेद हो जाते हैं। रज और तमके लेशसे भी अनाक्रान्त अतएव विशुद्धसत्त्वप्रधाना शक्तिको माया या विद्या कहते हैं एवं रज तथा तमसे संस्पृष्ट अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना शक्तिको अविद्या कहते हैं और तमःप्रधाना शक्ति तामसी प्रकृति कही जाती है। यद्यपि कहीं-कहीं मूल प्रकृतिमें भी माया और अविद्या पदका प्रयोग होता है, जैसे 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' (श्वेताश्वतर० ४।१०) 'माया स्वाव्यतिरिक्तानि परिपूर्णानि क्षेत्राणि दर्शयित्वा जीवेशावाभासेन करोति माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ९) इत्यादि तथापि उसे कार्य और कारणके अभेदसे औपचारिक समझना चाहिये। जैसे मीमांसक गोविकार पयमें भी गो- पदका प्रयोग उपचारसे मानते हैं, यथा—'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' वैसे ही कहीं कार्यका प्रयोग कारणमें हो जाता है। अतः मूल महाशक्तिकी अवान्तर शक्तियोंके विभागमें विद्या-अविद्या आदि पदोंका प्रयोग शास्त्रसम्मत है। विद्या या मायारूप उपाधिसे उपहित चैतन्य ईश्वर-चैतन्य है और अविद्या उपाधिसे उपहित चैतन्य जीव-चैतन्य है। तामसी प्रकृतिसे भोग्यवर्गका प्रादुर्भाव होता है। इस तामसी प्रकृतियुक्त परमात्मासे महत्तत्त्व एवं महत्तत्त्वसे अहंतत्त्वकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि श्रुतियोंमें 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः।' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि वचनोंद्वारा सीधे परमात्मासे ही आकाशकी उत्पत्ति होना प्रतीत होता है तथापि—'बुद्धेरात्मा महान् परः ॥,' 'महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।' (कठ० १।३।१०-११) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि 'परमात्मा और उनकी शक्ति अव्यक्तके अनन्तर एवं आकाशके पहले महत्तत्त्व तथा अहं तत्त्व नामक पदार्थ भी हैं।' गीताने भी 'महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।' (गीता १३।५) इस श्लोकसे अपंचीकृत (परस्पर असम्मिलित) आकाशादि पृथिव्यन्त पंचमहाभूत एवं अहंकार (अहंतत्त्व), बुद्धि (महत्तत्त्व) तथा 'अव्यक्त तत्त्व' इन आठ प्रकृतियोंके रूपमें उन्हींका वर्णन किया है। उन्हींका 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥' (गीता ७।४) इस श्लोकमें भी वर्णन किया है। इस श्लोकमें मन शब्दसे आकाशके कारण अहंतत्त्वको ही समझना चाहिये, बुद्धि पदसे अहंतत्त्वका कारण महत्तत्वको समझना चाहिये और अहंकारसे महत्तत्त्वका कारण अव्यक्तको समझना चाहिये; क्योंकि ऐसा ही प्रकृति-विकृतिभाव सर्वत्र प्रसिद्ध है। यथाश्रुत मन, बुद्धि एवं अहंकारका कार्य-कारण भाव कहीं भी प्रसिद्ध नहीं है और यहाँ 'भिन्ना प्रकृतिरष्टधा' से भिन्न-भिन्न आठ प्रकृतियाँ विवक्षित हैं। यह तभी सम्भव है, जब भूमिको जलसे, जलका अनल (तेज) से, अनलका वायुसे एवं वायुका आकाशसे, आकाशका अहंतत्त्वसे, उसका महत्तत्त्वसे और महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्वसे आविर्भाव माना जाय। अतएव 'महाभूतान्यहङ्कारो

वेदान्तरससार [७३१]

बुद्धिरव्यक्तमेव च' (गीता १३।५) इस गीता- वचनमें स्पष्ट ही अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्वका वर्णन है। इस तरह श्रुति-स्मृतिके तात्पर्य-विवेचनसे स्पष्ट विदित होता है कि साक्षात् परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति नहीं हुई, अपितु महत्तत्त्व आदिके क्रमसे ही हुई है। अतएव जहाँ- कहीं सतत्त्व परमात्मासे सीधे तेजकी ही उत्पत्ति श्रुत है, वहाँ भी आकाश एवं वायुकी उत्पत्तिके अनन्तर आकाश-वायुरूपमें आविर्भूत परमात्मासे तेजकी उत्पत्ति समझनी चाहिये। श्रुतियोंमें जो 'तदैक्षत एकोऽहं बहु स्याम्' (छान्दोग्य० ६।२।३)परमात्माने ईक्षण=निरीक्षण (विचार) किया कि एक मैं बहुत हो जाऊँ इत्यादि रूपसे ईक्षण और अहंका उल्लेख मिलता है, इससे भी अहंतत्त्व एवं महत्तत्त्वका ही द्योतन होता है। किसी कार्यके निर्माणमें ज्ञान एवं अहंकारकी आवश्यकता होती है। व्यष्टिद्वारा ही समष्टि-भाव समझे जाते हैं। समष्टि-तत्त्वको बुद्ध्यारूढ़ करनेके लिये प्रथम व्यक्तिका ही अवलम्बन करना पड़ता है। इसी वास्ते श्रुतिने ही 'स एकाकी न रेमे स द्वितीयमैच्छत्' (उस पुरुषको एकाकी होनेके कारण अरति हुई) इसी कारण अब भी प्राणियोंको अकेले होनेपर रमण, आनन्द नहीं होता। 'तस्मादेकाकी न रमते' (बृहदारण्यक० १।४।३) ऐसा कहा है। यही कारण है कि उपासनाओंमें जैसे प्रत्यक्ष शालग्राममें अप्रत्यक्ष विष्णुकी बुद्धि की जाती है, वैसे ही प्रत्यक्ष व्यष्टि जाग्रत्-अवस्था एवं स्थूल शरीराभिमानी विश्वमें समष्टि स्थूल प्रपंचाभिमानी वैश्वानरकी दृष्टि एवं व्यष्टि, स्वप्नावस्था एवं सूक्ष्म शरीराभिमानी तैजसमें समष्टि सूक्ष्म प्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भकी दृष्टि तथा व्यष्टि सुषुप्ति अवस्था एवं अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी प्राज्ञमें समष्टि-अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी कारण ब्रह्मरूप सर्वान्तर्यामी सर्वेश्वरकी दृष्टि कही गयी है। इससे विपरीत विराट्में विश्व-दृष्टि नहीं कही गयी; क्योंकि समष्टि अप्रत्यक्ष है। आकाशके एक देशमें बादलकी एक छोटी-सी टिकुली देखकर आकाशव्यापी महामेघमण्डलकी कल्पना की जाती है। जैसे स्वल्प परिमाणवाले दीप्तिमान् अग्निको देखकर अखण्ड ब्रह्माण्डव्यापक दीप्तिमान् अग्निकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अनुभूत व्यष्टि अज्ञान एवं ज्ञान तथा अहंकारसे समष्टि अज्ञान तथा महत्तत्त्व एवं अहंतत्त्वका भी बुद्धिमें आरोहण हो सकता है। समस्त तत्त्व क्रमशः परमात्मासे उत्पन्न और उसीमें लीन होते हैं। सुषुप्तिमें भी प्रपंचका लय प्रतीत होता है। हम स्पष्ट रूपसे देखते हैं कि घोर सुषुप्तिमें सोया हुआ पुरुष न कुछ जानता है, न उसे अहंकार होता है और न वह कुछ कार्य कर सकता है; क्योंकि समस्त इन्द्रियगण और अहंकार उस समय अज्ञानमें लीन होते हैं। 'सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते' (श्रीमद्भा० ११।३।३९) इसी वास्ते सुषुप्ति-अवस्थामें रहनेवाला आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा प्रजापतिके उपदेशको सुनकर इन्द्रको यही अनुपपत्ति प्रतीत हुई थी कि सुषुप्तिमें अपने या दूसरे किसीका तो ज्ञान होता नहीं, फिर इसमें पुरुषार्थ ही क्या है ? यहाँ भी अहंकारादिका आत्यन्तिक लय नहीं है; क्योंकि जागरमें उनकी पुनः प्रतीति होती है। अस्तु, यह तो बहुत ही प्रसिद्ध है कि सुषुप्ति दशामें जीवको कुछ भी ज्ञान नहीं होता। परंतु इस बातको भी विज्ञ पुरुष ही समझ सकते हैं कि 'मैं सुखपूर्वक सोया और कुछ भी नहीं जाना।'-इस प्रकारकी जो स्मृति सुषुप्तिसे उत्थित पुरुषको होती है, यह भी बिना अनुभवके असम्भव है; क्योंकि बिना अनुभवके कोई स्मरण नहीं होता। अतः सुषुप्तोत्थ पुरुषके स्मरणसे निश्चय होता है कि सुषुप्तिमें सौषुप्ततम एवं सौषुप्तसुखका प्रकाशक कोई स्वाभाविक अखण्ड नित्य विज्ञान अवश्य था। यहाँ जो लोग यह कहते हैं कि सुषुप्तिमें कोई भावरूप सुख या अज्ञान नहीं होता, किंतु दुःखके अभाव एवं ज्ञानके अभावमें ही

७३२ भक्तिसुधा सुख एवं अज्ञानका व्यवहार होता है, उनको यह बतलाना चाहिये कि ज्ञानाभावका ज्ञान कैसे होगा ? अभावके ज्ञानमें अनुयोगी (अधिकरण) एवं प्रतियोगी (जिसका अभाव हो)-का ज्ञान आवश्यक होता है। जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी (घटाभावके अधिकरण भूतलादि) तथा प्रतियोगी (घट) इन दोनोंका ज्ञान आवश्यक होता है। अन्यथा किसका अभाव कहाँ है, ऐसी जिज्ञासा शान्त नहीं होगी। अनुभवगोचरता और आच्छादकताके कारण अज्ञानकी भावरूपता न कि ज्ञानाभावरूपता यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अधिकरण एवं उसके प्रतियोगीका ज्ञान रहा हो, तब उस ज्ञानके होते हुए वहाँ ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है ? जिस भूतलमें कोई भी घट हो वहाँ घटाभावका व्यवहार कैसे हो सकता है ? यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अनुयोगी एवं प्रतियोगीका ज्ञान नहीं था, तब तो उस ज्ञानाभावकी अनुपलब्धि या प्रत्यक्षद्वारा कथमपि ज्ञान नहीं हो सकता है। अतः आत्मस्वरूपका आवरण करनेवाला अज्ञान पूर्वकथनानुसार भावरूप ही है। जैसे सूर्यके आवरक मेघका प्रकाश सूर्यसे ही होता है, वैसे ही नित्य विज्ञानानन्दघन आत्माके आवरक अज्ञानका प्रकाश साक्षीरूप आत्मासे ही होता है। अस्तु, इस प्रसंगका स्पष्टीकरण अन्यत्र किया जायगा। प्रकृत प्रसंग यही है कि सुषुप्तिदशामें निद्रा या अज्ञानसे समावृत साक्षीद्वारा अज्ञानका प्रकाश होता है। अहंकार आदि वहाँ नहीं होते। सुषुप्तिके अनन्तर प्रथम निद्राकी निवृत्तिमें कुछ ऐसा ज्ञान होता है, जिसमें किसी तरहके विशेष विकल्पका स्फुरण नहीं होता। यहाँ दो स्थितियाँ हैं—विषय-विशेषके स्फुरणके बिना बौद्धज्ञान होता है, जिसे व्यष्टि महत्तत्त्व कह सकते हैं; जिसके अनन्तर अहंकारका उल्लेख होता है, इसीलिये अज्ञानसे ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाती है। सुषुप्तिमें अज्ञान ही होता है और उसके अव्यवहित उत्तर जाग्रत् या स्वप्नमें ही कुछ ज्ञान होता है। समष्टि अज्ञानरूप मायासे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। जैसे अव्यक्तसे व्यक्तका प्रादुर्भाव है, वैसे ही अज्ञानसे ज्ञानका प्रादुर्भाव होना युक्त ही है। उत्पन्न व्यक्त ज्ञानके सिवा निद्राभंगके अनन्तर एक नित्य- सिद्ध निरावरण ब्रह्मरूप अखण्ड बोधकी भी अभिव्यक्ति होती है। तत्परतापूर्वक उसीके साक्षात्कारसे जीव सदाके लिये बन्धनसे मुक्त हो जाता है। विवेकियोंका कहना है कि आत्माके आवरण दो हैं—एक तो दृश्यका स्फुरण और दूसरा अज्ञान। जाग्रत् स्वप्नमें आत्मा विक्षेपरूप दृश्यसे समावृत रहता है और सुषुप्तिमें अज्ञानसे आवृत होता है। जब समाधिमें प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—इन पाँचों वृत्तियोंका निरोध होता है अर्थात् जाग्रत्- स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयावस्थाका आविर्भाव होता है, तब निरावरण विशुद्ध आत्मतत्त्वका दर्शन होता है। अज्ञानादि सब दृश्योंकी जो प्रतीति या उसका भान किंवा प्रकाश है, वही अखण्ड एवं अनन्त आत्मा है। बिना प्रतीति, बिना भान, बिना प्रकाश किसी पदार्थका अस्तित्व ही नहीं सिद्ध होता। जो पदार्थ है, वह अवश्य ही केनचित् क्वचित्कथंचित् अर्थात् किसीसे, कहीं, किसी प्रकार विज्ञात है, इसी वास्ते प्रतीतिके भीतर ही समस्त देश, समस्त काल और समस्त वस्तुएँ हैं। यह सर्वभासक, निर्मल, अखण्ड प्रतीति ही परमात्मस्वरूप है। यह अखण्ड प्रतीति आकाशकी तरह पोली नहीं है, अपितु ठोस है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बका स्फुरण होता है, वैसे ही इस प्रतीतिमें दृश्यका स्फुरण होता है। जैसे बिना दर्पणकी प्रतीतिके प्रतिबिम्बका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही बिना स्वयंप्रकाशकी प्रतीतिके स्फुरण नहीं होता। अतएव श्रुति है—‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतरो० ६।१४) जैसे दर्पण-स्फुरणके पीछे प्रतिबिम्ब-स्फुरण होता है,

वेदान्तरससार ७३३ वैसे ही स्वयंप्रकाश-स्फुरणके अनन्तर दृश्यका स्फुरण होता है। असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, निरवयव, निष्कल परमात्मामें प्रपंचसंसर्गका प्रकार यही है। सभी वादिगण परमात्माको अखण्ड, असंग, निष्कल तथा अनन्तस्वरूप मानते हैं। निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य- सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता ऐसी परिस्थितिमें प्रपंचकी स्थिति कैसे और कहाँ सम्भव है ? या तो प्रपंचको किसी ऐसे देश- कालमें रखें, जहाँ परमात्मा न हों या परमात्माको आकाशकी तरह सावकाश पोला मानें। परंतु ये दोनों ही पक्ष शास्त्रविरुद्ध हैं; क्योंकि शास्त्रोंने परमात्माको ब्रह्म शब्दसे बोधित किया है। ब्रह्म शब्द 'बृहि वृद्धौ' धातुसे बनता है। अतः ब्रह्म शब्दका 'बृहत् या महान्' यह अर्थ होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि किसी बृहत् या महान् वस्तुको ब्रह्म कहते हैं। अब यह विवेचन करना है कि ब्रह्मकी वह बृहत्ता सापेक्ष है या निरपेक्ष, सातिशय है या निरतिशय ? अर्थात् जैसे घट, पट, मठ आदिमें बृहत्ता है और आकाशमें भी, परंतु घट-पट-मठादिमें सापेक्ष बृहत्ता है और आकाशमें निरपेक्ष है, वैसे ब्रह्ममें कैसी बृहत्ता होनी चाहिये? इसपर विज्ञजनोंकी सम्मति यही है कि जब कोई संकोचक पद हो, तब ब्रह्ममें सापेक्ष बृहत्ताकी कल्पना की जाय। जैसे 'सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस वचनमें सर्व पदका संकोच किया जाता है। जहाँ सार्वत्रिक सार्वदेशिक सर्व ब्राह्मणोंका एकत्रीभाव या भोजन असम्भव हो, वहाँ 'निमन्त्रिताः सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस प्रकार सर्वपदका संकोच करके निमन्त्रित सर्व ब्राह्मणका ग्रहण होता है। वैसे यहाँ भी यदि कोई संकोचक प्रमाण होता या निरतिशय बृहत्तामें किसी तरहकी अनुपपत्ति होती, तब तो यह कहा जा सकता था कि 'इस प्रकारके इतने महान्‌को ब्रह्म कहें।' जब किसी प्रकारका कोई संकोचक प्रमाण नहीं है और निरतिशय महत्तामें कोई अनुपपत्ति नहीं है, तब सर्व प्रकार एवं सर्वसे अधिक निरतिशय महान्‌को ही ब्रह्म कहना चाहिये। महत्ताकी अतिशयताकी कल्पना-परम्परा जहाँ विरत हो जाय, जिससे अधिक बृहत्ताकी कल्पना हो ही नहीं सके, उसीको ब्रह्म कहते हैं। फिर भी भगवती श्रुतिने 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय० २।१) इस वचनमें लक्षण या विशेषणरूपमें अनन्त पदका प्रयोग किया है, जिससे निरतिशय बृहत्ताकी और भी पुष्टि हो जाती है। इस तरह सर्व प्रकारसे सिद्ध हुआ कि निरतिशय महान्‌को ही ब्रह्म कहते हैं। जो वस्तु किसी देशमें हो और किसी देशमें न हो, वह तो देश-परिच्छिन्न ही है, उसमें निरतिशय बृहत्ता कैसी ? और जो कभी मिट जाय, वह तो काल-परिच्छिन्न एवं अनित्य है, वह भी अनन्त महान् नहीं हो सकती और यदि किसी दूसरी अन्य वस्तुका अस्तित्व हो, तब तो अन्योन्याभावका प्रतियोगी होनेसे ब्रह्म वस्तु-परिच्छिन्न हो जायगा। अतः फिर भी निरतिशय महत्ता उसमें नहीं हो सकती। इसलिये निरतिशय तथा अनन्त महत्ताके लिये ब्रह्मको सर्व देश-काल-वस्तुसे अतीत एवं अपरिच्छिन्न मानना चाहिये। अर्थात् ऐसा कोई देश-काल या वस्तु नहीं है, जहाँ ब्रह्म न हो, बल्कि 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म है' ऐसा कथन भी औपचारिक ही है। जैसे तन्तु-निर्मित पटमें तन्तुका अस्तित्व, कनक-निर्मित कटक-कुण्डल-मुकुटादिमें कनकका अस्तित्व, तरंगमें जलका अस्तित्व एवं कल्पित सर्पमें अधिष्ठानरूपसे रज्जुका अस्तित्व है, बस उसी प्रकार 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्मका अस्तित्व है' ऐसा व्यवहार प्राकृत, विवेकी पुरुषोंमें हुआ करता है। वस्तुतः जैसे तन्तुओंसे भिन्न होकर पट नामकी कोई तात्त्विक वस्तु नहीं है एवं कनकसे भिन्न कुण्डलादि पृथक् वस्तु नहीं है और जलसे भिन्न तरंग नामका कोई पदार्थान्तर नहीं है, अपितु तन्तु आदिमें ही पटादिकी कल्पना है, ठीक वैसे ही

ब्रह्मसे भिन्न होकर देश-काल-वस्तु कुछ है ही नहीं। अतः देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म नहीं, अपितु देश-काल-वस्तु ही ब्रह्ममें कल्पित है। इसी वास्ते 'यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥' (श्रीमद्भा० २।९।३४) भगवान्‌के इस वचनसे यह कहा गया है कि जैसे आकाशादि पंच महाभूत उच्चावच नाना प्रकारके भौतिक प्रपंचोंमें प्रविष्ट होते हुए भी अप्रविष्ट हैं, वैसे ही मैं महाभूतोंमें प्रविष्ट हूँ और अप्रविष्ट भी हूँ। कार्यवर्गमें महाभूतादि कारणोंकी उपलब्धि होती है, अतः प्रवेशकी कल्पना है। वस्तुतः— 'प्रागेव विद्यमानत्वान तेषामिह सम्भवः॥' (श्रीमद्भा० १०।३।१६) प्रथमसे ही जो व्यापक हैं, उनका प्रवेश क्या कहा जाय? इसी अभिप्रायसे— 'मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः' (गीता ९।४) इस वचनसे भगवान्‌ने ही अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है कि सर्व प्रपंच मुझमें है, मैं प्रपंचमें नहीं हूँ। इससे सिद्ध हुआ कि ब्रह्मसे रहित कोई देश या काल है ही नहीं, जहाँ भगवान्‌से भिन्न किसी वस्तुकी स्थिति हो। किंतु जब सभी देश और काल ही ब्रह्ममें हैं, तब फिर देशनिष्ठ, कालनिष्ठ वस्तु सुतरां ब्रह्ममें ही पर्यवसित होगी। अब देखना यह है कि देश, काल एवं वस्तु— ये असंग ब्रह्ममें कैसे रहते हैं? श्रुतियोंने ब्रह्मको ही समस्त प्रपंचका उपादान एवं निमित्त कारण भी बतलाया है। यदि थोड़ी देरके लिये प्रकृतिको ही उपादान मान लें तो भी वही प्रश्न उठता है कि प्रकृति कहाँ है—ब्रह्ममें या उससे पृथक्? जब ब्रह्मसे पृथक् देश, काल नहीं तो पृथक् देशमें प्रकृतिकी कल्पना कैसे उठ सकती है? यदि ब्रह्ममें ही प्रकृति है, तब वहाँ भी वही प्रश्न है कि किस सम्बन्धसे ब्रह्ममें प्रकृति रहती है? यदि प्रकृति या जगत्‌का ब्रह्मके साथ कोई सम्बन्ध मानें तो ब्रह्ममें असंगता नहीं रहती है। साथ ही उपादानको छोड़कर अन्यत्र कार्यकी सत्ता भी नहीं कही जा सकती। जलको छोड़कर वीचि (तरंग) एवं सुवर्णको छोड़कर कुण्डलादि पृथक् कैसे रह सकते हैं? साथ ही प्रपंच तथा भगवान्‌का स्वभाव भी अत्यन्त विरुद्ध है। ब्रह्म अपरिच्छिन्न, प्रपंच परिच्छिन्न, ब्रह्म अमृत, प्रपंच मर्त्य, ब्रह्म सुख-दुःख-मोहातीत, प्रपंच सुख- दुःख-मोहात्मक तथा ब्रह्म परम-सत्य स्वप्रकाश परमानन्दरूप और प्रपंच अनृत जड़ दुःखरूप है। ब्रह्म निरवयव तथा निष्कल और प्रपंच सावयव, सकल है। अतः ब्रह्म और प्रपंचका सम्बन्ध कैसे और कौन हो सकता है? निर्गुण तथा निष्क्रिय होनेके कारण ब्रह्म द्रव्य नहीं कहा जा सकता। अतएव उसमें संयोग या समवाय दोनों नियामक सम्बन्ध नहीं हो सकते। निष्कल निरवयवमें भी यह सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः केवल आध्यासिक सम्बन्ध मानना उचित है। इसी आशयसे 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥' 'न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥' (गीता ९।४-५) आदि वचन आये हैं, जिनका भाव यह है कि मुझ अव्यक्त-मूर्तिसे समस्त साकाश (आकाशसहित, आकाशपर्यन्त) प्रपंच व्याप्त है, समस्त भूत मुझमें हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ, वास्तवमें तो समस्त प्रपंच मुझमें स्थित भी नहीं हैं। आशय यह है कि बहिर्मुख प्राणियोंकी दृष्टिमें प्रपंच ही स्पष्ट रूपमें विद्यमान है, प्रपंचातीत भगवान्‌का तो अस्तित्व ही दुर्गम है, अतः प्रथम प्रपंचके कारणरूपसे या आधार तथा भासक सत्ता स्फूर्तिप्रदरूपसे भगवान्‌के अस्तित्वपर विश्वास होना यह सबसे बड़ी बात है। कुछ अभिज्ञ प्रपंच देखकर उसके आधार या कारणका अन्वेषण करते हैं। यदि भगवान् प्रथम ही यह कह दें कि न मैं प्रपंचमें हूँ, न प्रपंच मुझमें है, तब तो निज दृष्टिसिद्ध प्रपंचके कारणका अन्वेषण करनेवाला साधक भगवान्‌से

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निराश होकर परमाणु, प्रकृति या अन्य किसीको प्रपंचके कारणरूपसे निश्चय करेगा। अतः भगवान् प्राणिकल्याणार्थ प्रथम यही कहते हैं कि 'मैं ही जगत्का कारण हूँ। यदि तत्त्वतः विवेचन किया जाय, तब तो जगत् नामका कोई पदार्थ ही नहीं है; परंतु यदि अज्ञबुद्धिसिद्ध व्यावहारिक जगत् है तो मुझमें ही है। मैं ही इसके भीतर, बाहर, मध्यमें तथा मैं ही इसका भासक हूँ।' जब इस तरह प्रभुके उपदेशसे प्राणीको प्रपंचसे भिन्न एक भगवान्‌पर विश्वास हो जाता है, तब फिर ठीक-ठीक तत्त्वका उपदेश किया जाता है कि वस्तुतः मुझसे भिन्न होकर प्रपंच है ही नहीं; जो कुछ है वह बस, एक मैं ही हूँ। वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता जैसे भ्रान्तिसे किसीको अमृतसागरमें क्षारसागरकी कल्पना हो, ठीक वैसे ही एक अखण्ड आनन्दसागरमें ही भवसागरकी कल्पना है। आनन्दसागर ही भ्रान्तिसे भवसागरके रूपमें भासित होता है। आनन्दसागरसे भिन्न होकर भवसागर नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। भीतर, बाहर, सर्वत्र अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड संवित्सुखसागरका भान हो रहा है, इसीलिये गोस्वामीजी कहते हैं—'आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) अतः भगवान् सर्वकारण, सर्वाधार, सर्वभूत होकर भी असंग और सर्वरहित हैं। आनन्दसागर और भवसागरका संयोग समवाय आदि सम्बन्ध तो बनता नहीं। अतः केवल आध्यासिक ही सम्बन्ध है अर्थात् आध्यासिक सम्बन्धसे प्रपंच देश-काल- वस्तुकृत परिच्छेदशून्य निर्गुण निष्क्रिय असंग ब्रह्ममें रह सकता है। इसे यों भी समझ सकते हैं, जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल एवं नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि नाना प्रकारके दृश्य प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देते हैं—वस्तुतः हैं ही नहीं, केवल प्रतीत होते हैं, ठीक वैसे ही महाप्रतीतिरूप (स्वप्रकाश) दर्पणमें यह समस्त चराचरप्रपंच देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और अज्ञान—ये सभी प्रतिबिम्बके समान न होते हुए भी प्रतीत होते हैं। समस्त देश एवं क्षण, प्रहर, दिवस, पक्ष, मास, अब्द, युग, कल्प तथा गत-आगत नाना प्रकारके काल—ये सभी अखण्ड अनन्त निर्मल असंग प्रतीतिरूप (भानस्वरूप) दर्पणमें ठीक प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीत हो रहे हैं। जैसे रूपादि-ग्रहणके लिये प्रवृत्त भी चक्षु सौरादि आलोकका (सूर्यादिके प्रकाश) ग्रहण करता है, पीछे आलोकावभासित रूपका ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही सर्वभासिका प्रतीतिका (संवित्) स्फुरण पहले होता है। तदनन्तर प्रतीति-प्रकाशित अहंकारादि दृश्यका स्फुरण होता है। किंवा जैसे पहले दर्पणका ग्रहण होता है, पीछे दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, वैसे ही पहले चिद्धातुरूप दर्पणकी प्रतीति होती है। तदनन्तर प्रतिबिम्बभूत जगत्की प्रतीति होती है। यही—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।३।१५) इस श्रुतिका आशय है। परमात्म- प्रकाशके पीछे सर्वदृश्यका प्रकाश होता है और परमात्म-प्रकाशसे ही सकल दृश्य प्रकाशित होता है। चक्षुरादि इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार—ये सभी अपने-अपने प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन करनेवाले हैं, अतः ज्योति हैं, परंतु इन ज्योतियोंका भी प्रकाशन करनेवाला विशुद्ध भावरूप परमात्मा ज्योतियोंका भी ज्योति है। तमोरूप अज्ञानका भी प्रकाश वही है— 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।' (गीता १३।१७) अतः 'देशः स्फुरति देशोऽस्ति। कालो भाति कालोऽस्ति। वस्तूनि स्फुरन्ति वस्तूनि सन्ति' इत्यादि रूपसे 'देशकी प्रतीति, कालकी प्रतीति, वस्तुओंकी प्रतीति एवं देश है, काल है, वस्तु है', इस प्रकार

७३६ भक्तिसुधा देश-काल-वस्तुकी सत्ता अत्यन्त स्पष्ट है। जैसे डालनेसे प्रतिबिम्ब नहीं दिखायी देता, वैसे ही दर्पणसे प्रतिबिम्ब कवलित है, दर्पणके बिना उसकी निर्दृश्य चितिरूप नित्यदृक्पर दृष्टि डालनेपर दृश्य, प्रतीति ही नहीं हो सकती, वैसे ही देश, काल तथा दर्शन और साभास-अहमर्थरूप अनित्य द्रष्टा-इन समस्त वस्तुएँ अबाधित सत्ता एवं अखण्ड अनन्त सभीका अत्यन्ताभाव हो जाता है। प्रतीतिसे कवलित हैं। अतः बिना प्रतीति और प्रतिबिम्बमें जब दृष्टि आसक्त होती है, उस सत्ताके देशादिकी सिद्धि हो ही नहीं सकती। सत्ता समय भी यद्यपि दर्पणका दर्शन होता है; क्योंकि और स्फूर्तिसे विहीन देशादि असत् तथा निःस्फूर्ति बिना दर्पणके दर्शन तो प्रतिबिम्बका दर्शन हो ही हो जाते हैं। नहीं सकता तथापि शुद्ध निष्प्रतिबिम्ब दर्पणका दर्शन यद्यपि प्रतिबिम्बसे भिन्न बिम्ब दर्पणसे पृथक् नहीं होता। उसी समय दृश्यादि दृष्टिकालमें भी हुआ करता है, परंतु यहाँ तो सत्ता और प्रतीतिरूप दृश्यके अधिष्ठानभूत अखण्ड स्फुरणरूप भगवान्‌का दर्पणसे भिन्न कोई देश ही नहीं, जहाँ बिम्बकी तरह भान है ही; क्योंकि बिना स्फुरण किसी भी दृश्यकी किसी पृथक् वस्तुकी स्थिति हो सकती हो। इसी सिद्धि नहीं होती तथापि स्पष्ट शुद्ध अनन्त भान नहीं वास्ते हम भी जगत्‌को प्रतिबिम्ब न कहकर व्यक्त होता है। उसके लिये ही वैराग्यपूर्वक दृश्यकी प्रतिबिम्बके समान कहते हैं। वस्तुतत्त्वके बुद्ध्यारोहणके ओरसे दृष्टिको व्यावर्तित करके केवल निर्दृश्य लिये दृष्टान्तका उपादान किया जाता है। दृष्टान्त विशुद्ध अखण्ड भानपर दृष्टि स्थिर करना होता है। इतने ही अंशमें है कि जैसे दर्पणमें न होकर भी उसी तरह अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेपर फिर प्रतिबिम्ब स्पष्टरूपसे दर्पणमें प्रतीत होता है, उसी केवल जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तभीतक तरह ब्रह्ममें न होता हुआ भी प्रपंच अत्यन्त स्पष्ट व्युत्थान-कालमें दृश्यका स्फुरण होता है। प्रारब्ध रूपसे प्रतीत होता है। यह दूसरी बात है कि क्षय होनेपर सदाके लिये दृश्य मिट जाता है प्रतिबिम्बाधार दर्पणसे भिन्न भी देश है और वहाँ और अखण्ड आनन्द परिपूर्ण भगवान् ही अवशिष्ट प्रतिबिम्बका निमित्त बिम्ब भी है, परंतु यहाँ रहते हैं। दृश्याधार अखण्ड ब्रह्मरूप दर्पणसे भिन्न कोई देश जबतक यह स्थिति नहीं मिलती, तबतक नहीं, अतएव यहाँ बिम्बके समान कोई सत्य वस्तु सुषुप्तिमें सावरण ही ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति होती है। निमित्त भी नहीं, किंतु एकमात्र अनिर्वचनीय शक्तिके जैसे मेघसे समावृत मेघका अवभासक सूर्य है, बस, अद्भुत माहात्म्यसे प्रतिबिम्बकी तरह वस्तुतः वैसे ही अज्ञानसे समावृत अज्ञानका प्रकाशक निष्प्रपंच अत्यन्तासत् दृश्य प्रपंचकी प्रतीति होती है। वह अद्वैत स्वप्रकाशानन्दरूप आत्मा सुषुप्तिमें जीवको शक्ति ही जैसे सर्वदृश्यकी कल्पनाका मूल है, वैसे मिलता है। जैसे घोर निद्रासे किसी तरह अकस्मात् ही अपनी कल्पनाका भी मूल वह स्वयं ही है। जैसे जागनेपर विशेष विकल्प विस्फुरणके बिना कुछ भेद ही घट-पटका भेदक है और वही घट-पटसे ज्ञान होता है, विवेकीजन वैसे ही ब्रह्मानुभवका अपना भी भेद सिद्ध करता है, किंवा जैसे अनुभव प्रकार बतलाते हैं। घोर निद्रासे जागनेके पश्चात् एवं ही अपने विषयोंका और अपने भी व्यवहारका द्वैत-प्रतीतिका प्रथम निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह जनक है तथा नैयायिकोंका आत्मा ही सर्वज्ञेयका शुद्ध, निर्दृश्य, निरावरण, चिदात्मक प्रकाश ब्रह्मका तथा अपना भी ज्ञाता है, वैसे ही वह शक्ति ब्रह्मको दर्शन होता है, वैसे ही जागरणके अन्तमें और ही सर्वदृश्यरूपमें तथा अपने भी रूपमें प्रतिभासित सुषुप्तिके पूर्वमें भी निरावरण तत्त्वकी उपलब्धि करती है। जैसे निष्प्रतिबिम्ब दर्पणमात्रपर दृष्टि होती है, जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणरूप कमलकी

वेदान्तरससार (पृष्ठ ७३७)

वृत्तिरूप पंखुरियाँ विकसित होती हैं। इसी वास्ते द्वैत दृश्यका सम्यक् स्फुरण हुआ करता है। अन्तःकरणके विकास या चांचल्यमें ही द्वैतका दर्शन होता है, इसीलिये भगवत्पादशंकराचार्यने कहा है— चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा। तकारो विषयाध्यासः जपारागो मणौ यथा॥ (सदाचारानुसन्धानम् ३१।३१।१-२) ‘चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा।’ चित्तमें जबतक द्वितीय ‘तकार’ का योग है तबतक वह दृश्य है; ‘तकार’ संसर्गरहित होते ही वह केवल ‘चित्’ परमात्मा ही हो जाता है। चित् ही किंचित् मननी शक्तिको धारण करके मन हो जाता है। जैसे मृत्तिकाके होनेमें ही घटकी उपलब्धि होती है और उसके न होनेपर नहीं होती, ठीक वैसे ही चित्तकी चंचलतामें ही अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नमें दृश्य दिखायी देते हैं। मूर्च्छा, समाधि या सुषुप्तिमें चित्तका चांचल्य नहीं होता, अतएव वहाँ द्वैत-दर्शन भी नहीं होता। अतः जैसे घट मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही द्वैत-दृश्य भी चित्तरूप ही है। विषय-चिन्तनरूप चित्तका चांचल्य मिटनेपर दृश्यकी भी समाप्ति हो जाती है। चैत्यानुपातरहितं सामान्येन च सर्वगम्। यच्चित्तमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः॥ (महोपनिषत् ४।११८) इस तरह क्रमशः जब सुषुप्तिकी ओर जीवकी प्रवृत्ति होने लगती है, तब चित्तकी वृत्तियाँ संकुचित होने लगती हैं। जैसे-जैसे उनका संकोच होता है, वैसे-वैसे दृश्यका दर्शन न्यून होने लगता है। जब अन्तःकरण-कमल अत्यन्त मुकुलित हो जाता है, तब दृश्य-दर्शन बिलकुल बन्द हो जाता है। कुछ क्षणके अनन्तर तामसी निद्रासे वह समावृत हो जाता है, फिर घोर तम छा जाता है। इसी तरह जब निद्रा भंग होती है, तब पहले तामसी निद्रा दूर होती है। फिर कुछ क्षणके अनन्तर निद्रारूप आवरणसे रहित मुकुलित अन्तःकरण- कमल शनैः-शनैः पुनः विकसित होकर सम्यक् रूपमें द्वैतका दर्शन करने लगता है। इस तरहसे मनोव्यापारस्वरूप प्रयत्नसे द्वैत व्यक्त होता है। निर्व्यापाररूप विश्रान्तिमें स्वाभाविक अद्वैत व्यक्त होता है। जो वस्तु प्रयत्नसे, परिश्रमसे सिद्ध की जाती है, वह कृत्रिम, अनित्य तथा असत्य होती है और जो बिना व्यापार, बिना परिश्रम, नित्यसिद्ध हो, वही स्वाभाविक एवं सत्य है। मूल श्रुति भी परिश्रमरहित निर्व्यापार दशाका वर्णन अद्वैत-रूपसे ही करती है ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्।’ (छान्दोग्य० ६।२।१) और ईक्षण, कामना, तप तथा संकल्परूप परिश्रमसे बहुभवनका वर्णन करती है—‘तदैक्षत (एकोऽहम्) बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत्’ (बृहदारण्यक० १।४।१७), ‘सोऽकामयत्। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत’ (तैत्तिरीय० २।६) इत्यादि। जाग्रत्के अन्त एवं सुषुप्तिके पूर्वमें तथा सुषुप्तिके अन्त एवं जाग्रत्के पूर्वमें कुछ क्षण निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह शुद्ध निर्दृश्य चिद्रूप अखण्ड भानका दर्शन होता है, परंतु अति सूक्ष्म होनेके कारण सर्वसाधारणकी समझमें नहीं आता। जैसे हम सदा ही उत्तराभिमुख होकर नक्षत्र- राशियोंपर दृष्टि डालनेपर ध्रुवका दर्शन करते हैं तथापि ‘अयं ध्रुवः’ इत्याकारक स्पष्ट विवेकपूर्वक ध्रुवको नहीं पहचानते; कुछ लोगोंके न पहचाननेमें तो लक्षणका अज्ञान ही हेतु है और कुछ लोगोंको ‘अमुक-अमुक नक्षत्रोंके सन्निधानमें तथा उत्तर दिशामें सदा अचल रूपसे स्थिर रहनेवाले नक्षत्रका नाम ध्रुव है’ इस प्रकारसे लक्षणका ज्ञान है तथापि वे लक्षणको लक्ष्यमें समन्वित करके ध्रुवको पहचाननेके लिये तत्पर नहीं होते, इसीलिये उन्हें प्रतिदिन ध्रुवको देखनेपर भी उसकी पहचान नहीं होती। अतः लक्षण-ज्ञान एवं परिचयके लिये अन्य दृश्यकी ओरसे दृष्टिव्यावर्तनपूर्वक तत्परतासे ही प्रयत्न करनेपर

स्पष्टरूपेण ध्रुवका परिचयपूर्वक दर्शन होता है। ठीक इसी तरह सदा ही सुषुप्ति एवं जाग्रत्के अन्तमें यद्यपि सभीको निर्दृश्य शुद्ध दृक्-रूप स्वयंप्रकाश अखण्ड भानका दर्शन होता है तथापि परिचयपूर्वक स्पष्ट साक्षात्कार नहीं होता। एक विषयके अनन्तर अन्य विषयमें चित्तके जानेपर मध्यदशामें चिन्तनरहित चित्तकी स्थिति स्वरूपस्थिति है— अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये तु या स्थितिः। सा ध्वस्तमननाकारा स्वरूपस्थितिरुच्यते॥ (महोपनिषत् ५।५) सदा स्वप्रकाशरूपसे भासमानमें भी जो 'नास्ति' (नहीं है) और 'न भाति' (नहीं प्रतीत होता है) इत्याकारक व्यवहार-योग्यता है, वही आवरण- शक्तिका विलक्षण चमत्कार है; और स्वप्रकाश अनन्त अद्वैतमें जड़ परिच्छिन्न द्वैत प्रपंचका भान करा देना, यही विक्षेप-शक्तिका विलक्षण चमत्कार है। इसीकी निवृत्तिके लिये आचार्य-परम्परासे वेदान्तोंका श्रवण तथा मनन करके अद्वितीय परमात्माके लक्षणोंका संस्कार अन्तःकरणमें स्थिर करना चाहिये। किसी भी वस्तुको जाननेके लिये अन्य विषयोंसे चित्तको व्यावर्तित करने और तत्परतापूर्वक परिचय करनेकी आवश्यकता होती है, परंतु यहाँ तो श्रवण-मननादिजन्य स्वरूपके संस्कार ही परिचय, प्रयत्नके स्थानमें अपेक्षित हैं; क्योंकि जैसे छायाके पीछे चलनेसे छायाका ग्रहण नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्नसे शुद्ध वस्तुकी उपलब्धि नहीं हो सकती— 'कारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते।' निर्व्यापार होनेपर ही वस्तुबोध हो सकता है; परंतु केवल निर्व्यापारता योगियोंकी भी होती है, उन्हें अद्वैत ब्रह्मका अपरोक्ष्य फिर भी नहीं होता। इसका कारण यह है कि स्वरूपपरिचयानुकूल श्रवणादिद्वारा संस्कार वहाँ सम्पादित नहीं किये गये हैं। आत्मापर प्राथमिक आवरण अनिर्वचनीय अज्ञान और द्वितीय विक्षेपरूप द्वैत, तृतीय अर्धनिद्रापूर्वक स्वप्न और चतुर्थ पूर्ण निद्रा या सुषुप्ति है। मेघाच्छन्न भाद्रपद अमावास्याकी रात्रिकी तरह सुषुप्तिमें आत्माका अत्यन्त अप्रकाश रहता है। मेघरहित रात्रिके समान स्वप्नमें किंचित्प्रकाश होता है। चान्द्रमसी रात्रिकी तरह जाग्रत्में पर्याप्त प्रकाश होता है। मेघाच्छन्न दिवसकी तरह समाधिमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण सूर्यकी तरह तत्त्वसाक्षात्कारमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण ब्रह्मस्वरूप साक्षात्कारके लिये देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादिका अत्यन्त निरोध और वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार—इन दोनोंकी आवश्यकता है। जैसे—'गोसदृशो गवयः' इत्याकारक वाक्यजन्य दृढ़तर संस्कारवाले पुरुषको 'नेत्र' और 'गवय' का सन्निकर्ष होते ही 'अयं गवयः' ऐसा बोध हो जाता है, वहाँ विचारकी आवश्यकता नहीं होती और गवयका नेत्रोंसे सम्बन्ध होनेपर भी 'यह गवय है' ऐसा बोध नहीं होता, जबतक कि 'गौके सदृश गवय होता है' ऐसा ज्ञान नहीं होता। अतः जहाँ सन्निकर्ष होनेपर भी 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके बिना 'अयं गवयः' इत्याकारक साक्षात्कारमें विलम्ब हो, वहाँ यह 'गवय' है, इस ज्ञानमें वाक्य ही हेतु है, इन्द्रिय-सन्निकर्ष सहकारीमात्र है एवं जहाँ 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके संस्कार होनेपर भी नेत्र-सन्निकर्ष बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ सन्निकर्ष ही मुख्य हेतु है और वाक्य सहकारी है। ठीक इसी तरह योगियोंको निरोध समाधि होनेपर भी वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है। अतः वहाँ ब्रह्मसाक्षात्कारमें वेदान्त-वाक्य ही मुख्य कारण है, निरोध सहकारी है। जहाँ वेदान्ताभ्यास होनेपर भी निरोध बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ निरोधकी ही मुख्य हेतुता है, वाक्य सहकारी है। इसी अभिप्रायसे आचार्योंने कहीं वेदान्तोंको, कहीं संस्कृतनिरुद्ध मनको ब्रह्म-साक्षात्कारमें हेतु माना है और कहीं महावाक्यको ही मुख्य हेतु कहा है। इससे सिद्ध

वेदान्तरससार ७३९ होता है कि वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसे युक्त निरुद्ध अन्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मका साक्षात् होता है। जैसे पूर्णिमाके किसी अवस्था-विशेष-विशिष्ट चन्द्रमापर ही राहुका प्राकट्य होता है, वैसे ही निर्वृत्तिक निरुद्ध मनपर ही ब्रह्मस्वरूपका प्राकट्य होता है। 'असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते।' असत्य काल्पनिक मार्गपर स्थित होकर सत्यवस्तुकी प्राप्तिका प्रयत्न किया जाता है। अप्राकृत भगवान्की मंगलमयी मूर्तिको प्राकृत कमल, महेन्द्र नीलमणि प्रभृति उपमानोंसे उपमित किया जाता है। क्या कोई भी आस्तिक सर्वांशमें भगवान्में इन उपमानोंको मान सकता है? ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता 'तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यात्' (रुद्र- हृदयोपनिषत् २७) एकके विज्ञानमें सर्व-विज्ञानकी प्रतिज्ञाका समर्थन करनेके लिये श्रुतिने यह दृष्टान्त दिया है कि जैसे एक मिट्टीके विज्ञानमें समस्त मृण्मय पदार्थका 'यह सब मिट्टी ही है' इस प्रकार विज्ञान हो जाता है, वैसे ही एक परमात्माके विज्ञानसे समस्त परमात्म- कार्यका विज्ञान हो जाता है, परंतु यहाँ भी तो मृत्तिका सावयव एवं परिणामिनी है तो फिर निरवयव कूटस्थ अपरिणामी भगवान्का प्रपंच- रूपमें परिणाम कैसे सम्भव है? और परमात्माके विज्ञानमें समस्त प्रपंचका विज्ञान भी होना कैसे सम्भव है? ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो केवल जैसे कारणसे भिन्न कार्यकी सत्ता नहीं; कारणकी ही सत्तासे कार्यमें सत्ता और स्फूर्तिमत्ता प्रतीत होती है, वैसे ही परमात्मासे भिन्न प्रपंचकी सत्ता नहीं; एक परमात्माकी ही सत्ता और स्फूर्तिसे प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्तिकी प्रतीति होती है। इतने ही अंशमें दृष्टान्त है। इसी प्रकार घटसे ही महाकाशमें देशकी कल्पना और उससे ही महाकाशमें घटाकाश- व्यवहार और घटके गमनमें घटाकाशके गमनकी प्रतीति होती है। वस्तुतः न तो महाकाशसे भिन्न घटाकाश है और न उसका गमन ही होता है, वैसे ही अनन्त अखण्ड शुद्ध भगवान्में उपाधियोगसे ही भेद और गति (गमन), उत्क्रान्ति (उत्क्रमण) आदिकी प्रतीति होती है, वस्तुतः कुछ नहीं है। उपाधि-विरहित देशमें उपाधिके जानेसे वहाँ नवीन जीवभावकी कल्पना हो जाती है। यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि देशकी कल्पना भी तो उपाधिके ही अधीन है। इसके अतिरिक्त ऐसी कल्पनासे अधिष्ठानमें तो कोई हानि ही नहीं है। यों तो समस्त प्रपंच ही उसीमें कल्पित है; परंतु इससे क्या वह बद्ध समझा जाता है? क्या कल्पित जलसे मरुभूमि आर्द्र होती है? जब निरवयव निष्प्रदेश निष्कलमें काल्पनिक उपाधिद्वारा ही काल्पनिक प्रदेशका व्यवहार होता है, तब तत्त्वतः प्रदेश या उसके बन्ध और मोक्षकी कल्पना तात्त्विकी कैसी? यदि पूछा जाय कि फिर किसका बन्ध-मोक्ष तात्त्विक है तो इसका उत्तर यही है कि किसीका नहीं। अतएव 'न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥' (आत्मोपनिषद् ३१), (अवधूतोपनिषत् ८) अज्ञानसंज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२६) सत्यज्ञानानन्दात्मक भगवान्से भिन्न होकर बन्ध- मोक्ष नामके कोई पदार्थ नहीं हैं। केवल अज्ञानसे बन्ध और मोक्ष—ये दो संज्ञाएँ होती हैं, अतः केवल कल्पित उपाधिसे कल्पित प्रदेशमें कल्पित ही गमनागमन और कल्पित ही बन्ध-मोक्ष होते हैं। कल्पितोपाधिका अनुगामी जो कल्पित प्रदेश है, वही कल्पित बन्धसे पीड़ित और कल्पित मोक्षसे मुक्त होता है। यदि बन्ध सत्य हो, तभी मोक्ष भी सत्य हो सकता है। अधिष्ठानावशेषके अभिप्रायसे

७४० भक्तिसुधा भगवत्प्राप्ति, मोक्ष या निरावरण भगवान् ही सत्य हैं। इसी तरह— एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटो यथा। घटो नीयेत नाकाशं तथा जीवो नभोपमः॥ (त्रिपुरातापिन्युपनिषत् ५।१२।१३) 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्' इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंमें परमात्माके जीवरूपसे प्रवेशमें दृष्टान्त-रूपसे यह आया है कि जैसे एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न जलमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होता है, वैसे ही परमात्मा भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होते हैं। ऐसे ही 'घटे भिन्ने यथावकाश आकाशः स्याद् यथा पुरा।' (श्रीमद्भा० १२।५।५) घटे नष्टे व्योम व्योमै

वेदान्तरससार ७४१ सर्व-पदसे विवक्षित प्रपंच बाधित या मिथ्या हो जाता है। अतः जिस ब्रह्मका विज्ञान होनेमें प्रपंचका बाध होना निश्चित है, उस ब्रह्मके ज्ञानमें सर्व प्रपंचका विज्ञान कैसे कहा जा सकता है? तथापि यहाँ श्रुतिका आशय गम्भीर है। जैसे 'शत्रु-गृह' का भोजन करूँ या न करूँ? बालकके ऐसे प्रश्नपर जननी कहती है—'विषं भुङ्क्ष्व'। इस वाक्यका अनभिमत प्रातीतिक अर्थ यही है कि 'विष खा' परंतु क्या पुत्रवत्सला जननी अपने शिशुको विष- भोजनका आदेश दे सकती है? यदि नहीं तो यही कहना होगा कि इस वाक्यका अभिप्राय शत्रु-गृह- भोजन-निवृत्तिमें है—'शत्रुगृहभोजनाद्वरं विषभोजनं, अतो मा भुङ्क्ष्वेति।' ठीक वैसे ही भगवती श्रुतिका परमात्म-विज्ञानसे जड़ दुःखमय प्रपंचके निरर्थक विज्ञानके प्रतिपादनमें तात्पर्य नहीं हो सकता; किंतु मधुरतम भगवान्‌के ज्ञानसे पहले यद्यपि सर्वपद वाच्य प्रपंचके बोधमें कुछ पुरुषार्थ-बुद्धि होती है तथापि परमानन्दस्वरूप भगवान्‌का बोध होनेपर तो नीरस प्रपंचका बोध अत्यन्त निरर्थक हो जाता है। अतः अपुरुषार्थ होनेसे परमात्म-विज्ञानमें सर्व- विज्ञान विवक्षित नहीं है, अपितु प्रपंचका बाध ही अनर्थ-निवृत्तिरूप होनेसे विवक्षित हो सकता है। पुत्रवत्सला जननीकी तरह परम हितैषिणी भगवती श्रुति यह समझकर कि प्रपंच विज्ञानके लिये व्यग्र जीव प्रपंचातीत ब्रह्मज्ञानके लिये कैसे प्रयत्नशील हो, ब्रह्मके विज्ञानमें सर्वविज्ञानका प्रलोभन देकर अधिकारियोंके हृदयमें ब्रह्मजिज्ञासा उत्पन्न करना चाहती है। साधारणतया प्राणियोंकी उत्सुकता अनेक प्रकारके भूतभौतिक पदार्थोंके विज्ञानमें ही होती है। एक-एक भौतिक भावको जाननेमें बहुत धन, जन तथा शक्तियोंका क्षय किया जाता है। नाना प्रकारके पार्थिव, आप्त (वारुण), तैजस, वायव्य-विशिष्ट तत्त्वोंका बोध होनेपर भी अभीतक इयत्ता निश्चित नहीं हो सकी है। एक नगण्य तृणकी भी समस्त विशेषताएँ क्या सहस्रों जीवनमें भी जानी जा सकेंगी? तब भी पदार्थविज्ञानकी उत्सुकता प्राणियोंके हृदयसे निकलती नहीं है। इस तरह निरर्थक पदार्थविज्ञानमें उत्सुकता एवं आसक्तिके निवारण और परम सार्थक भगवत्तत्त्व-विज्ञानसे बहिर्मुख जीवोंके हृदयमें भगवत्तत्त्व-विविदिषा उत्पादन करनेके लिये भगवती श्रुति कहती है कि 'हे शिशुओ! यह तुम समझते ही हो कि जिन भौतिक तत्त्वोंकी विशेषताओंको जाननेके लिये तुम व्यग्र हो, उनका सामस्त्येन बोध लक्ष कल्पोंमें भी होना कठिन है। अच्छा, यदि तुम्हें सर्वप्रपंचका ही तत्त्व जानना है तो तुम ब्रह्मका विज्ञान सम्पादन करो। बस, एक ब्रह्मके ही विज्ञानमें सबका विज्ञान हो जायगा।' इस तरह सर्वविज्ञानके प्रलोभनमें आकर यदि प्राणी ब्रह्म-विज्ञानके लिये उत्सुक हुआ और उसने उचित साधनानुष्ठानपूर्वक ब्रह्मका विज्ञान सम्पादन कर लिया, तब तो जिस प्रपंच-विज्ञानके लिये प्रथम वह अत्यन्त व्यग्र था, उत्सुक था, वही प्रपंच जब रज्जु- सर्पके समान या स्वप्नकी तरह बाधित हो जाता है, तब उसे निस्तत्त्व समझकर उस प्रपंचकी जिज्ञासा ही प्रशान्त हो जाती है। जिज्ञासा-निवृत्तिको ही ज्ञान कहते हैं। इस तरह ब्रह्मके विज्ञानमें प्रपंचकी जिज्ञासाका ही मिट जाना प्रपंचका विज्ञान है। परमात्मतत्त्वसे भिन्न यदि किसी भी तत्त्वका अस्तित्व है, तब तो उसकी जिज्ञासा भी अनिवार्य होगी। इसलिये अज्ञलोक-बुद्धि-सिद्ध प्रपंचकी प्रसक्त निमित्त एवं उपादानरूप द्विविध कारणता भी परमतत्त्वमें ही समर्थन की जाती है; क्योंकि केवल निमित्त या केवल उपादानके विज्ञानमें सर्वका विज्ञान नहीं हो सकता। मृत्तिकाके विज्ञानमें घटादि मृण्मय पदार्थोंका यद्यपि विज्ञान हो सकता है तथापि निमित्त-कारणरूप दण्ड, कुलालादिका ज्ञान नहीं होता एवं दण्ड, कुलालादिके ज्ञानमें मृत्तिका या उसके घटादिका ज्ञान नहीं हो सकता। ऐसी स्थितिमें एकके विज्ञानमें सर्वका विज्ञान तभी हो सकता है, जब एक ही

परमतत्त्व समस्त प्रपंचका उपादान तथा निमित्त दोनों ही कारण हो। इसीलिये प्रपंचकी—निमित्त, उपादान— उभय-कारणता परमात्मामें ही समर्थन की जाती है। अधिष्ठान-स्वरूप परमात्माके विज्ञानमें जब प्रपंच-बुद्धि बाधित हो जाती है, तब उपादानता निमित्तता भी परमात्मामें बाधित हो जाती है। ऐसी स्थितिमें कार्य-कारणतीत शुद्ध रूपकी स्थिति होती है। प्रपंचके प्रतीति-कालमें ही तमःप्रधान प्रकृति- युक्त सच्चिदानन्दमें उपादानता और सत्त्व-प्रधान प्रकृति- युक्त सच्चिदानन्दमें निमित्तता उपपन्न होती है। तम आवरक है, अतः उससे सावरण सच्चिदानन्दमें जड़ प्रपंचके अनुरूप जड़ता भासित होती है। प्रकाशात्मक सत्त्वके योगसे निरावरण स्वप्रकाशात्मक सच्चिदानन्दमें कुलालादि निमित्त-कारणके अनुरूप सर्वविज्ञान होता है। दोनों ही प्रकारकी प्रकृतिके अन्तर्गत है और मूल प्रकृति भी ब्रह्ममें परिकल्पित है। अधिष्ठानके बोधसे प्रकृति तत्कार्यात्मक प्रपंचका बाध हो जाता है। भोग्य-वर्गका बाध स्वरूपसे ही होता है। परंतु भोक्तृवर्गका बाध उपाधि तत्संसर्गके बाधाभिप्रायसे ही होता है। इसी अभिप्रायसे ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि स्थलोंमें ‘योऽयं स्थाणुः पुमानेषः’ की तरह बाध- सामानाधिकरणसे सर्व पदार्थका ब्रह्मके साथ अभेद बोधन किया जाता है। और ‘तत्त्वमसि’ (छान्दोग्य० ६।८।७) इत्यादि स्थलोंमें ‘सोऽयं देवदत्तः’ की तरह भाग-त्याग लक्षणाके द्वारा मुख्य सामानाधिकरण्यसे ‘त्वं’ पदार्थ जीवका ‘तत्’ पदार्थ ब्रह्मके साथ अभेद बोधित होता है। ‘त्वं’ पदार्थ जीवके साथ अभेद बिना ‘तत्’ पदार्थ परमात्मामें निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पदता, परमानन्दरूपता, स्वप्रकाशता आदि ही नहीं सिद्ध हो सकती; क्योंकि जो पदार्थ अत्यन्त सन्निहित है, वही स्वतः अपरोक्ष अर्थात् अन्यनिरपेक्ष स्वप्रकाश होता है, और वही परम अन्तरंग एवं अत्यन्त परिचित स्वप्रकाश होनेके कारण निरतिशय प्रेमका आस्पद होता है। निरतिशय प्रेमास्पद ही परमानन्दरूप हुआ करता है। यदि तत्पदार्थ परमात्मा जीवसे भिन्न एवं तटस्थ हो तो उसमें उपर्युक्त सब बातें नहीं बन सकतीं। पृथिवी, आकाशादि बाह्य एवं देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि आन्तर समस्त दृश्य पदार्थोंका द्रष्टा सर्वप्रकाशक ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ साक्षी ही होता है। अहंकार, बुद्धि आदि सभी उसकी अपेक्षा असन्निहित, बहिरंग, परतःप्रकाश, सातिशय, सोपाधिक प्रेमके आस्पद ही हैं। ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ सर्वद्रष्टा साक्षी ही सबसे अन्तरंग सन्निहित है। जैसे अन्यान्य पदार्थ सूर्यादिके प्रकाश-सम्बन्धसे प्रकाशमान होते हैं, परंतु सूर्यादि स्वतःप्रकाशमान होते हैं, वैसे ही बुद्धि, अहंकारादि अन्यान्य दृश्य-पदार्थ इस साक्षीके सम्बन्धसे प्रकाशमान होते हैं और यह साक्षी स्वतःप्रकाश होता है। यह ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ स्वात्मा ही सर्वान्तरंग है। यहाँ ही परम-सान्निध्यका भी पर्यवसान होता है; क्योंकि अपनेसे परम-सन्निहित अपना अन्तरात्मा ही हो सकता है। अन्य पदार्थोंमें कुछ-न-कुछ देश, वस्तु आदिका व्यवधान रहनेसे पूर्ण सान्निध्य नहीं बन सकता। देह, इन्द्रियादिकी अपेक्षा कुछ सन्निहित (समीप होनेवाले) मन, बुद्धि, अहंकार, ज्ञान, अज्ञान, सुखादि भी अप्रकाशमान होकर नहीं रहते; किंतु ये जब कभी रहते हैं, तब स्वप्रकाश साक्षीके संसर्गसे भासमान होकर ही रहते हैं। सुख-दुःखादि हों और भासमान न हों, ऐसा कदापि नहीं होता, तब फिर अत्यन्त सन्निहित स्वान्तरात्मा अप्रकाशमान हो—यह कैसे हो सकता है? ‘जो सर्वद्रष्टा सर्वभासक होता है, वह सदा- सर्वदा अन्य प्रकाशसे निरपेक्ष स्वतःप्रकाशमान होता है’ इसी अभिप्रायसे श्रुतिने कहा है कि जो सबको जाननेवाला है, उसे किससे जानें—‘विज्ञातारमरे! केन विजानीयात्’? (बृहदारण्यक० २।४।१४) यदि भगवान् ही प्रत्यगात्मरूपसे भी विराजमान हैं, तब तो उनमें उक्त श्रुतिके अनुसार स्वप्रकाशता बन सकती है। जो व्यवधानरहित, अन्य प्रकाश-

निरपेक्ष, स्वतः साक्षात् अपरोक्ष है, वही ब्रह्म है— 'यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' (बृहदारण्यक० ३।४।२)। अन्यथा कोई भी लाखों जन्मोंकी अनन्त तपस्याओंसे भी अतिदुर्गम परम-परोक्ष भगवान्‌में सर्वविज्ञातृता, अन्य-निरपेक्ष परम प्रकाशमानता कैसे सिद्ध कर सकता है? क्या कोई अत्यन्त परोक्ष तटस्थ परमेश्वरको साक्षात् अपरोक्ष कहनेका साहस कर सकता है? यदि यह परमेश्वर सर्व-विज्ञातारूप साक्षात् अपरोक्ष हो तो उसके विषयमें अनेक प्रकारकी अनुपपत्तियाँ एवं विप्रतिपत्तियाँ कैसे हो सकती हैं? जब इन्द्रिय, मन आदिद्वारा पारम्परीण अपरोक्ष घटादिमें भी संशय-विपर्ययादि नहीं होते, तब साक्षात् अपरोक्ष परमात्मामें संशयादि कैसे हो सकते हैं? फिर यदि वह साक्षात् अपरोक्ष है तो उसके बोधके लिये श्रवण-मननादि उपायोपदेश भी व्यर्थ हैं; क्योंकि अनुभव-विरोध स्पष्ट ही है। अतः यदि भगवान्‌में उक्त श्रुतियोंके अनुसार साक्षादपरोक्षत्वरूप स्वप्रकाशता आदिका समर्थन करना है तो अनिच्छयापि कहना पड़ेगा कि भगवान् ही सर्वप्रकाशक, सर्वान्तरात्मा, सर्वसाक्षी, प्रत्यगात्मारूपसे भी विराजमान हैं। उसी रूपसे उनमें साक्षात् अपरोक्षता, स्वप्रकाशरूपता उपपन्न होती है। इसी परमसन्निहित स्वप्रकाश आत्मामें अध्यारोपित अपूर्णता परिच्छिन्नता आदिकी निवृत्तिके लिये श्रवणादि भी सार्थक होते हैं। परोक्ष 'तत्पदार्थ असन्निहित एवं परोक्ष होनेके कारण प्रेमास्पद भी नहीं होता; क्योंकि सन्निहित एवं अपरोक्षमें ही निरतिशय प्रेम हो सकता है। इसलिये निरुपाधिक परमप्रेमास्पद आत्मा ही है। अतएव वही परम आनन्दरूप भी है। परोक्ष परमात्मामें स्वाभाविक निरुपाधिक निरतिशय प्रेम अत्यन्त अप्रसिद्ध एवं अनुभवसे विरुद्ध है। परमात्मामें प्रेम और भक्तिकी अभ्यर्थना की जाती है। 'या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्माप- सर्पतु ॥' (श्रीविष्णुपुराण १।२०। १९) 'हे नाथ! जैसे अविवेकियोंकी विषयोंमें स्वाभाविक प्रीति होती है, वैसी ही आपको स्मरण करते हुए मेरे हृदयमें आपमें अटल प्रीति हो।' अतएव भगवती श्रुतिने भी प्रत्यगात्माको ही सर्वाधिक प्रेमका विषय बतलाया है। 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादान्तरतमं यदयमात्मा' (बृहदारण्यक० १।४। ८) देवताओंमें भी प्रेम आत्म-कल्याणके लिये ही किया जाता है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है। परोक्ष तत्त्व प्रेमका आस्पद नहीं है, वह आनन्द या परमानन्द रूपसे कैसे हो सकता है? अतः जैसे स्वप्रकाशता परोक्ष परमात्मामें असंगत है, वैसे ही परप्रेमास्पदता भी असंगत है। इन उपर्युक्त हेतुओंसे कहना पड़ता है कि वेदान्तवेद्य परात्पर पूर्णतम भगवान् सर्वान्तरतम सर्वप्रत्यगात्मा हैं। अतएव निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद एवं परमानन्दरूप हैं। आनन्द चैतन्य परम-सत्य भगवान् ही सर्वप्रत्यगात्म- रूपसे स्थित हैं। अचिन्त्य-अनन्त-कल्याण-गुण- गण-निलय भगवान् ही सच्चिदानन्दरूप हैं। समस्त गुण-गणोंका पर्यवसान आनन्दमें ही होता है; क्योंकि सर्वगुणोंका उपयोग अनर्थ-निबर्हण, सौख्यातिशय एवं महत्त्वातिशयके आधानमें ही होता है। निरतिशय-सुखस्वरूप एवं निरतिशय-महान् भगवान्‌में सर्वगुणोंकी समाप्ति होती है। कुछ लोग कहते हैं कि सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणसम्पन्न सगुण साकार भगवान्‌में ही आनन्द है। अदृश्य अग्राह्य अचिन्त्य निराकार निर्विकार परमात्मा पाषाणरूप है। उसमें सुखका लेश भी नहीं है। परंतु यदि यहाँ विवेचन किया जाय तो यही विदित होता है कि जहाँ-कहीं भी किसी प्रकारके सुखका स्वरूप होता है, वह सभी सुख निराकार ही है। कहीं भी सुखका स्वरूप नील, पीत, हरित या मूर्त नहीं देखा जाता है। चिरकालके विप्रयोगसे सन्तप्त कामुक अपनी प्रियतमा कान्ताके परिरम्भणसे आनन्दका अनुभव करता है, उत्कट पिपासा एवं बुभुक्षासे परिपीड़ित पुरुषको शीतल, मधुर, सुगन्धित जल एवं सौगन्ध्य,

७४४ भक्तिसुधा सौरस्य, माधुर्यसम्पन्न पक्वान्नके मिलनेपर आनन्द होता है। यहाँ विवेचन करना चाहिये कि यह जो आनन्द है, उसका क्या रूप है ? नील या पीत, लघु या गुरु, बृहत्परिमाण-परिमित या मध्यमपरिमाण- परिमित है ? यहाँ यह कहना न होगा कि शीतल सुमधुर जल, पक्वान्न या कामिनी स्वयं आनन्दरूप नहीं हैं; क्योंकि बुभुक्षा, पिपासा तथा काम-व्यथाकी निवृत्ति इनके सेवनसे अवश्य मान्य है, परंतु समुद्भूत आनन्द सर्वत्र ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अगन्ध, अदृश्य तथा निराकार ही है। प्रेमास्पदमें प्रेमके उद्रेकसे आनन्दका उद्रेक होता है। आनन्दके उद्रेकमें आन्तर-बाह्य सर्व दृश्य जगत्का विस्मरण होता है, तभी चिरकालतक कामिनीके परिरम्भणजन्य आनन्दके उद्रेकमें आन्तर-बाह्य दृश्यका विस्मरण होता है। ऐसे ही सुषुप्ति-कालमें प्राज्ञ परमात्माके सम्मिलनजन्य आनन्दसे प्रपंचका विस्मरण होता है। सप्रपंच ब्रह्ममें सातिशय प्रेम होता है। अतएव वहाँ सातिशय आनन्द तथा प्रपंच-विस्मरण भी कुछ मात्रामें ही होता है। सर्वोपाधिविनिर्मुक्त भगवान् ही निरावरण होनेके कारण निरतिशय प्रेमके आस्पद हैं। उन्हींके सम्मिलनमें निरतिशय आनन्द होता है और तभी सम्पूर्ण रूपसे सर्वदृश्यका अत्यन्ताभाव होता है। अधिष्ठानसाक्षात्कारद्वारा जबतक आवरण निवृत्ति नहीं होती, तबतक जीवको पूर्णरूपेण ब्रह्मका परिष्वंग नहीं होता। जितना व्यवधान-शून्य प्रियतम-परिष्वंग होता है, उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। सृष्टि या प्रबोध-कालमें भोग्य और भोक्ता सभी अपने महाकारणसे दूर हो जाते हैं। प्रलय तथा सुषुप्तिमें वे सभी अपने कारणके सन्निधानमें पहुँच जाते हैं। यद्यपि जैसे तरंग किसी अवस्थामें भी सागरसे वियुक्त नहीं होते; किंतु सदा सागरके अंकमें ही उनकी स्थिति होती है, महासागरसे फेन, बुद्बुद, तरंगकी तरह परमानन्दसुधासागरसे उत्पन्न होनेवाले समस्त तत्त्वोंकी स्थिति प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें ही है तथापि भ्रममूलक भेद और वियोग इतना स्पष्ट व्यक्त हो रहा है कि स्वाभाविक अभेद एवं सम्बन्ध अत्यन्त तिरोहित हो गया है। विस्मृत कण्ठमणिका अन्वेषण तथा महासागरके अन्तर्गत होनेवाले हिम-उपलकी पिपासा इस विषयके पोषक सुन्दर उदाहरण हैं। महाप्रलयके समय समस्त प्रपंच क्रमेण सबीज ब्रह्ममें लीन होता है। समस्त वन, पर्वत, नगर, ग्रामादि पार्थिव प्रपंच पृथिवीमें विलीन हो जाते हैं। पृथिवी जलमें लीन होती है। जल तेजमें, तेज वायुमें एवं वायु आकाशमें लय हो जाता है। सृष्टिकालमें जैसे महाकारण कार्योन्मुख विकसित होकर सविशेषभावको प्राप्त होता है, वैसे ही प्रलय- कालमें समस्त कार्य कारणोन्मुख संकुचित होकर निर्विशेष भावको प्राप्त होता है। तन्तुमें अंगप्रावरण, शीतापनयनादि कार्य-करण- क्षमता नहीं होती; परंतु पटमें होती है। यद्यपि वह तन्तुओंसे भिन्न कोई स्वतन्त्र पदार्थ न होकर केवल आतानवितानात्मक तन्तुरूप ही है तथापि उसमें अंग प्रावरण तथा शीतापनयन करनेका सामर्थ्य होता है। तन्तुमें वह सामर्थ्य नहीं है, वैसे ही घटमें जलानयनका सामर्थ्य है; किंतु मृत्तिकामें नहीं। मृत्तिका जलानयनकर्तृत्वविशेषरहित होनेसे निर्विशेष है। घट जलानयनकर्तृत्वयुक्त होनेसे सविशेष होता है। पटमें शीतापनयनकार्यकारितारूप विशेष है। अतः वह सविशेष है। तन्तु उससे हीन होनेके कारण निर्विशेष है। यद्यपि विवेचन करनेपर उपादान कारणसे भिन्न कार्य कुछ होता नहीं तथापि कारणकी अपेक्षा कार्यमें कुछ अनिर्वचनीय विलक्षणता अवश्य होती है। मृत्तिका घटरूपमें व्यक्त होकर सविशेष होती है। घटके मृत्तिकामें लीन होनेपर घटकी अपेक्षा वह निर्विशेष और मृत्तिकाकी अपेक्षा घट सविशेष होता है। जल निर्गन्ध है, पर उसका कार्य पृथिवी गन्धवती है। नीरस तेजसे रसवान् जल एवं नीरूप वायुसे रूपयुक्त तेजकी उत्पत्ति होती है। कारणकी अपेक्षा कार्य सविशेष एवं कार्यकी अपेक्षा कारण

वेदान्तरससार ७४५ निर्विशेष होता है। आकाशमें शब्द होता है। आकाशको भी 'अहंतत्त्व' (अहंकार)-में एवं अहंकारको 'महत्तत्त्व' (समष्टिज्ञान)-में, 'महत्तत्त्व' को 'अव्यक्त'-में लय चिन्तन करनेसे अत्यन्त निर्विशेषता होती है। महानिद्रा, तम, सुषुप्तिमें सर्वदृश्यका परमात्मामें लय होता है। सुषुप्ति या प्रलयमें जिस भगवत्स्वरूपमें सर्व भोग्य एवं भोक्ताका लय होता है, वह भी विश्वशक्ति-विशिष्ट ही है। यहाँ सबीज ब्रह्ममें ही कार्य-प्रपंचका विलयन होता है। अतएव पार्थक्य भी सूक्ष्म रूपसे विद्यमान ही रहता है। क्षीर-नीरके सम्मिश्रणमें एकता-सी हो जाती है; परंतु वस्तुतः क्षीर-नीरके अवयव पृथक्-पृथक् ही रहते हैं। इसीलिये हंस उनका विवेचन कर लेता है। महासमुद्रमें नाना निर्झर-निर्झरिणी एवं महानदियोंका संगम होता है। स्थूलदर्शियोंकी दृष्टिमें यद्यपि समुद्रके साथ सबकी एकता हो जाती है; परंतु अभिज्ञ जन समझते हैं कि महासमुद्रमें सभी निर्झर और सरिताओंके जल पृथक्-पृथक् विद्यमान हैं। सर्वज्ञकल्प योगिजन एवं सर्वज्ञशिरोमणि भगवान् उन सबका विवेचन एवं पृथक्करण कर सकते हैं। ठीक इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्ड-जननी महाशक्ति- विशिष्ट भगवान्में अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड एवं तदन्तर्गत जीव तथा उनके अनन्त कर्म और सभी भोग्य प्रपंच विलीन होते हैं। अत्यन्त सूक्ष्म दशामें पहुँचनेके कारण यद्यपि जीवोंके लिये उनका विवेचन एवं पृथक्करण अशक्य है तथापि सर्वान्तरात्मा सर्वेश्वर भगवान् सभीका विवेचन एवं पृथक्करण कर सकते हैं। अनन्त ब्रह्माण्ड, अनन्त जीव एवं उनके अनन्त कर्मों तथा उनके फलोंको जानकर यथायोग्य विवेचन, नियोजन—यही परमेश्वरका विशेष कार्य है। किन-किन ब्रह्माण्डोंके, किन-किन जीवोंके, किन-किन जन्मोंके, किन-किन कर्मोंका फल किन- किन देशों एवं कालोंमें, किस तरह प्रदान करना चाहिये—यह ज्ञान कर्म एवं जीव इन दोनोंहीके लिये अशक्य है। न तो कर्म ही अपने अनन्त स्वरूपों एवं फलोंको जान सकते हैं और न जीवोंको ही अनन्त कर्म एवं तत्फलोंका ज्ञान है। यदि हो भी तो फलसम्पादनकी शक्ति नहीं है; क्योंकि परमेश्वरके सिवा सभीकी शक्तियाँ क्षुद्र ही हैं। यदि जीवको कर्म एवं उनके फलोंका ज्ञान तथा फल-सम्पादनकी शक्ति भी हो तो भी जीव अपने शुभ कर्मोंके शुभ फलोंके ही सम्पादनमें रुचि रख सकता है। अशुभ कर्म एवं तत्फलोंके सम्पादनमें उसकी कथमपि रुचि एवं प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् भगवान्के बिना अन्यत्र सर्व ब्रह्माण्डान्तर्गत सर्व जीव तथा उनके कर्म तथा फलोंका ज्ञान और कर्म-फलदानकी शक्तिका होना असम्भव है। इस तरह अविद्याकामकर्मविशिष्ट जीवका ही सुषुप्ति-अवस्थामें सबीज ब्रह्मके साथ सायुज्य (ऐक्य) होता है। ब्रह्म-सम्मिलनमें जीवको अद्भुत आनन्दकी प्राप्ति होती है; परंतु सुषुप्तिमें सावरण जीवका सावरण ब्रह्मके साथ सम्मिलन होता है, इसलिये व्यवधानका अवशेष रहता है। व्यवधानरहित ब्रह्म-सम्मिलन तो तभी हो सकता है, जब जीव स्वयं निरावरण होकर निरावरण ब्रह्मके साथ सम्मिलन प्राप्त करे। इस आवरणनिवृत्तिके लिये स्वधर्मानुष्ठान, भगवदाराधन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन, अधिष्ठानभूत भगवान्का साक्षात्कार किया जाता है। अज्ञानरूप आवरणकी निवृत्तिसे ही जीवको व्यवधान-शून्य ब्रह्मका सम्मिलन प्राप्त होता है। जिस समय श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हस्तिनापुरसे श्रीद्वारका पधारे, उस समय प्रोषितभर्तृका द्वारकास्थ श्रीकृष्णपट्टमहिषीगण प्रियतमका आगमन सुनकर प्रियसम्मिलनके लिये आसनसे एवं आशयसे उठीं—'उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात्।' (श्रीमद्भा० १।११।३१) यहाँ देशकृत व्यवधान निराकरणके लिये श्रीकृष्ण-प्रेयसीवर्गका आसनसे अभ्युत्थान हुआ। वस्तुकृत व्यवधानके निवारणके

लिये आशयसे अभ्युत्थान है—‘आशेरते कर्मवासना यत्रासावाशयः ।’ आशय शब्दसे अन्तःकरण विवक्षित है, जो कि समस्त कर्मवासनाओंका आलय है। आशय भी पंचकोशका उपलक्षण है अर्थात् श्रीकृष्णप्रेयसी आशयोपलक्षित पंचकोश कंचुकसे समावृत स्वरूपसे प्रिय-सम्मिलनमें त्रुटि समझकर पंचकोश कंचुकसे पृथक् होकर निरावरण रूपसे प्रियतम-सम्मिलनके लिये उठीं। यहाँ पंचकोशातीत ‘त्वं’ पदलक्ष्यार्थ ही जीवका निजी शुद्ध स्वरूप है और ‘तत्’ पदलक्ष्यार्थ व्यापक महाचेतन ही उसका अंशी है। अंश और अंशीका मुख्य सम्बन्ध होता है। जैसे पृथ्वीका अंश लोष्ठ या पाषाण आदि पृथ्वीकी ओर आकर्षित होते हैं, वैसे ही परमात्माके अंश जीवोंका भी उस ओर आकर्षण होता है। जिनके मतमें चन्द्रका शतांश बृहस्पति नक्षत्र है, इस प्रकारका केवल औपचारिक अंशांशिभाव है, उनका आकर्षण भले ही न हो, पर यहाँ तो श्रीकृष्ण-प्रेयसीगण पंचकोश कंचुकसे निरावरण होकर व्यवधानशून्य प्रियतम-सम्मिलनके लिये ही आशयसे अभ्युत्थित हुईं। उन्होंने यह समझा कि जब प्रियतम-व्यवधायक आनन्दोद्रेकजन्य रोमांचकी उद्गति भी असह्य है, तब पंचकोश कंचुकका व्यवधान कैसे सह्य हो सकता है? इस तरह प्रत्यक् चैतन्यसे अभिन्न परब्रह्मके स्वरूपका साक्षात्कार होनेपर ही अज्ञान एवं तत्कार्यरूप व्यवधायक आवरणकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। निरतिशय परप्रेमास्पद प्रत्यगात्माके साथ एकता होनेसे तत्पदार्थ परमात्मामें भी निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पदता व्यक्त होती है और साक्षात् अपरोक्षता परमानन्दरूपता भी स्फुट होती है। इसके विपरीत परमात्माको प्रत्यक् भिन्न पराक् बहिरंग माननेसे स्वयंप्रकाशता, परप्रेमास्पदता तथा परमानन्दास्पदता किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती। अतः साधकको अपने भगवान्‌की पूर्णता, परमानन्दता आदि सिद्धिके लिये स्वात्मसमर्पण करना ही पड़ता है। तारतम्यशून्य अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्वकी निरतिशय बृहद् ब्रह्मरूपता अनात्मज्ञ प्रत्यगात्मासे भिन्न अन्यान्य समस्त प्रपंचोंका भगवान्‌में समर्पण करता है; परंतु प्रत्यगात्माका अस्तित्व पृथक् रखता है। आत्मज्ञ प्रियतमके सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य पूर्णताकी सिद्धिके लिये प्रत्यगात्माको भी भगवान्‌में समर्पित कर देता है। जैसे घटाकाश अपने-आपको महाकाशमें, किंवा तरंग अपने-आपको महासमुद्रमें समर्पण करता है, वैसे ही जीवात्मा अपने-आपको भगवान्‌में समर्पण कर देता है। यही ‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८।६६) आदि भगवदादेशका पालन है। ‘मामेकमद्वितीयं शरणामाश्रयं व्रज निश्चिनु । यथा घटाकाशस्याश्रयो महाकाशः तरङ्गस्याश्रयो महासमुद्रः ॥’ यही निर्विकार अद्वैत चिदात्मा परम तात्त्विक है। इससे भिन्न समस्त नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंच अतात्त्विक असत् है, अतएव गीताने (अध्याय १८) देहात्मज्ञान, भेदज्ञान, ऐकात्म्यज्ञान इत्यादि भेदसे तामस, राजस, सात्त्विक विविध ज्ञानका वर्णन किया है— सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ (गीता १८।२०) जिस शास्त्र तथा आचार्यद्वारा उपदिष्ट ज्ञानसे परस्पर विभक्त समस्त भूतोंमें एक त्रिकालाबाध्य, अव्यय, अधिष्ठानस्वरूप परमात्माका दर्शन होता है, वही सात्त्विक ज्ञान है। जैसे कटक, मुकुट, कुण्डलादि नाना नामरूपवाले अलंकारोंमें सुवर्ण, किंवा सर्प, धारा, माला आदि विकल्पोंमें अधिष्ठान रज्जुखण्ड ही विद्यमान है, वैसे ही अत्यन्त विषम प्रपंचमें अधिष्ठानरूपसे एक स्वप्रकाश सदानन्द परमात्मा विराजमान है। यही अद्वैत ब्रह्मवाद गीतोक्त सात्त्विक ज्ञान है। यही ‘ब्रह्मैवेदं सर्वं, आत्मैवेदं सर्वं’ (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषत् ७) इत्यादि श्रुतियोंमें कहा गया है। ‘पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्

वेदान्तरससार ७४७ पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि गुण-विशिष्ट परमात्मा, सर्वथा सान्निध्य होनेपर अनन्त राजसम्॥' (गीता १८।२१) जिस भिन्न-भिन्न कल्याण-गुणगण-विशिष्ट भगवान्‌के रूपमें तत्त्वका पदार्थविषयक ज्ञानसे पृथक् प्रकारके नाना भाव जाने उपलम्भ होता है। इन्हीं लोगोंमें ही मनमानी कल्पना जाते हैं, वह राजस ज्ञान है। करनेवाले कुछ लोग श्रीकृष्णको आदित्यस्थानीय यह भेद-ज्ञान गीतोक्त राजस ज्ञान है। 'सर्वं और ब्रह्मको प्रकाशस्थानीय मानते हैं। कुछ श्रीवृषभानु- परस्परं भिन्नम्' यह ज्ञान श्रुतिमें कहीं भी प्रतिपादित किशोरीके नख-मणि-प्रकाश या नूपुर-प्रकाशको ही नहीं है। औपनिषद परब्रह्म कहते हैं; परंतु वैदिकोंकी दृष्टिमें यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम्। तो वेदोंका महान् तात्पर्य ब्रह्ममें ही है और वही सब अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ तरहसे सर्वोत्कृष्ट है। (गीता १८।२२) संकोचका कारण न होनेसे वृद्ध्यर्थक 'बृहि' देहादि कार्यमें ही आसक्त अतत्त्वार्थविषयक धातुसे निष्पन्न 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ निरतिशय बृहत्तम ज्ञान तामस ज्ञान होता है। तत्त्व होता है। जो देश-काल-वस्तु परिच्छेदवाला श्रीमद्भागवतमें भी सजातीय, विजातीय, हो, वह तो परिच्छिन्न होनेके कारण क्षुद्र ही है, स्वगतभेदरहित, स्वप्रकाश, नित्य-विज्ञानको ही तत्त्व निरतिशय बृहत् नहीं। यदि जड़ हो तो भी दृश्य कहा है— होनेसे अल्प और मर्त्य होगा। अतः अनन्त स्वप्रकाश वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। सदानन्द तत्त्व ही 'ब्रह्म' पदका अर्थ होता है और ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ वही भूमा अमृत है। उससे भिन्न सभीको अल्प (श्रीमद्भा० १।२।११) और मर्त्य ही समझना चाहिये। फिर अनन्त पदके अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वविद् लोग तत्त्व कहते हैं, साथ पठित 'ब्रह्म' शब्दका तो सुतरां यही अर्थ है। उसीको ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् कहा जाता है। उसमें अतिशयताकी कल्पना निर्मूल है। किसी राजाने कुछ लोगोंका कहना है कि यहाँ ब्रह्मसे परमात्मामें ऐसी कहानी सुनना चाहा कि जिसका अन्त ही न और उससे भगवान्‌में उत्कर्ष विवक्षित है। यदुकुलभूषण हो। एक चतुरने सुनाना प्रारम्भ किया—राजन्! एक श्रीकृष्णकी सभामें बैठे हुए यादवोंने आकाश-मार्गसे वृक्ष था, उसकी अनन्त शाखाएँ थीं, उन शाखाओंमें आते हुए देवर्षि श्रीनारदजीको प्रथम केवल तेजःपुंज अनन्त उपशाखाएँ थीं, उपशाखाओंमें भी अनन्त ही समझा। कुछ समीप आनेपर कोई देहधारी समझा पल्लव थे और उनपर अनन्त पक्षी बैठे थे। कुछ और अधिक समीप होनेपर पुरुष एवं सर्वथा सान्निध्यमें कालमें एक पक्षी उड़ा 'फुर्र'। श्रीनारद समझा। राजाने कहा—आगे कहिये, इसपर उसने कहा— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा 'दूसरा उड़ा फुर्र'। ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। तब राजाने कहा—और आगे कहिये। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति तब उस चतुरने कहा कि पहले पक्षियोंका क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ उड़ना पूरा हो, तब आगे बढ़ूँ। यहाँ एक-एक (शिशुपालवध १।२) पक्षीका उड़ना समाप्त ही नहीं हो सकता। इसी ठीक उसी तरह तत्त्वसे अति दूर स्थित तरह कल्पनाओंका अन्त ही नहीं है। अतः एक अधिकारीको प्रथम केवल चिन्मात्र ब्रह्मका बोध शब्दमें यही कहा जाता है कि अतिशयताकी कल्पना होता है, कुछ सामीप्य होनेपर योगियोंको कतिपय करते-करते वाचस्पति तथा प्रजापतिकी भी मति