भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 747, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 747

वेदान्तरससार (पृष्ठ ७३७)

वृत्तिरूप पंखुरियाँ विकसित होती हैं। इसी वास्ते द्वैत दृश्यका सम्यक् स्फुरण हुआ करता है। अन्तःकरणके विकास या चांचल्यमें ही द्वैतका दर्शन होता है, इसीलिये भगवत्पादशंकराचार्यने कहा है— चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा। तकारो विषयाध्यासः जपारागो मणौ यथा॥ (सदाचारानुसन्धानम् ३१।३१।१-२) ‘चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा।’ चित्तमें जबतक द्वितीय ‘तकार’ का योग है तबतक वह दृश्य है; ‘तकार’ संसर्गरहित होते ही वह केवल ‘चित्’ परमात्मा ही हो जाता है। चित् ही किंचित् मननी शक्तिको धारण करके मन हो जाता है। जैसे मृत्तिकाके होनेमें ही घटकी उपलब्धि होती है और उसके न होनेपर नहीं होती, ठीक वैसे ही चित्तकी चंचलतामें ही अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नमें दृश्य दिखायी देते हैं। मूर्च्छा, समाधि या सुषुप्तिमें चित्तका चांचल्य नहीं होता, अतएव वहाँ द्वैत-दर्शन भी नहीं होता। अतः जैसे घट मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही द्वैत-दृश्य भी चित्तरूप ही है। विषय-चिन्तनरूप चित्तका चांचल्य मिटनेपर दृश्यकी भी समाप्ति हो जाती है। चैत्यानुपातरहितं सामान्येन च सर्वगम्। यच्चित्तमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः॥ (महोपनिषत् ४।११८) इस तरह क्रमशः जब सुषुप्तिकी ओर जीवकी प्रवृत्ति होने लगती है, तब चित्तकी वृत्तियाँ संकुचित होने लगती हैं। जैसे-जैसे उनका संकोच होता है, वैसे-वैसे दृश्यका दर्शन न्यून होने लगता है। जब अन्तःकरण-कमल अत्यन्त मुकुलित हो जाता है, तब दृश्य-दर्शन बिलकुल बन्द हो जाता है। कुछ क्षणके अनन्तर तामसी निद्रासे वह समावृत हो जाता है, फिर घोर तम छा जाता है। इसी तरह जब निद्रा भंग होती है, तब पहले तामसी निद्रा दूर होती है। फिर कुछ क्षणके अनन्तर निद्रारूप आवरणसे रहित मुकुलित अन्तःकरण- कमल शनैः-शनैः पुनः विकसित होकर सम्यक् रूपमें द्वैतका दर्शन करने लगता है। इस तरहसे मनोव्यापारस्वरूप प्रयत्नसे द्वैत व्यक्त होता है। निर्व्यापाररूप विश्रान्तिमें स्वाभाविक अद्वैत व्यक्त होता है। जो वस्तु प्रयत्नसे, परिश्रमसे सिद्ध की जाती है, वह कृत्रिम, अनित्य तथा असत्य होती है और जो बिना व्यापार, बिना परिश्रम, नित्यसिद्ध हो, वही स्वाभाविक एवं सत्य है। मूल श्रुति भी परिश्रमरहित निर्व्यापार दशाका वर्णन अद्वैत-रूपसे ही करती है ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्।’ (छान्दोग्य० ६।२।१) और ईक्षण, कामना, तप तथा संकल्परूप परिश्रमसे बहुभवनका वर्णन करती है—‘तदैक्षत (एकोऽहम्) बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत्’ (बृहदारण्यक० १।४।१७), ‘सोऽकामयत्। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत’ (तैत्तिरीय० २।६) इत्यादि। जाग्रत्के अन्त एवं सुषुप्तिके पूर्वमें तथा सुषुप्तिके अन्त एवं जाग्रत्के पूर्वमें कुछ क्षण निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह शुद्ध निर्दृश्य चिद्रूप अखण्ड भानका दर्शन होता है, परंतु अति सूक्ष्म होनेके कारण सर्वसाधारणकी समझमें नहीं आता। जैसे हम सदा ही उत्तराभिमुख होकर नक्षत्र- राशियोंपर दृष्टि डालनेपर ध्रुवका दर्शन करते हैं तथापि ‘अयं ध्रुवः’ इत्याकारक स्पष्ट विवेकपूर्वक ध्रुवको नहीं पहचानते; कुछ लोगोंके न पहचाननेमें तो लक्षणका अज्ञान ही हेतु है और कुछ लोगोंको ‘अमुक-अमुक नक्षत्रोंके सन्निधानमें तथा उत्तर दिशामें सदा अचल रूपसे स्थिर रहनेवाले नक्षत्रका नाम ध्रुव है’ इस प्रकारसे लक्षणका ज्ञान है तथापि वे लक्षणको लक्ष्यमें समन्वित करके ध्रुवको पहचाननेके लिये तत्पर नहीं होते, इसीलिये उन्हें प्रतिदिन ध्रुवको देखनेपर भी उसकी पहचान नहीं होती। अतः लक्षण-ज्ञान एवं परिचयके लिये अन्य दृश्यकी ओरसे दृष्टिव्यावर्तनपूर्वक तत्परतासे ही प्रयत्न करनेपर