भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 748

स्पष्टरूपेण ध्रुवका परिचयपूर्वक दर्शन होता है। ठीक इसी तरह सदा ही सुषुप्ति एवं जाग्रत्के अन्तमें यद्यपि सभीको निर्दृश्य शुद्ध दृक्-रूप स्वयंप्रकाश अखण्ड भानका दर्शन होता है तथापि परिचयपूर्वक स्पष्ट साक्षात्कार नहीं होता। एक विषयके अनन्तर अन्य विषयमें चित्तके जानेपर मध्यदशामें चिन्तनरहित चित्तकी स्थिति स्वरूपस्थिति है— अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये तु या स्थितिः। सा ध्वस्तमननाकारा स्वरूपस्थितिरुच्यते॥ (महोपनिषत् ५।५) सदा स्वप्रकाशरूपसे भासमानमें भी जो 'नास्ति' (नहीं है) और 'न भाति' (नहीं प्रतीत होता है) इत्याकारक व्यवहार-योग्यता है, वही आवरण- शक्तिका विलक्षण चमत्कार है; और स्वप्रकाश अनन्त अद्वैतमें जड़ परिच्छिन्न द्वैत प्रपंचका भान करा देना, यही विक्षेप-शक्तिका विलक्षण चमत्कार है। इसीकी निवृत्तिके लिये आचार्य-परम्परासे वेदान्तोंका श्रवण तथा मनन करके अद्वितीय परमात्माके लक्षणोंका संस्कार अन्तःकरणमें स्थिर करना चाहिये। किसी भी वस्तुको जाननेके लिये अन्य विषयोंसे चित्तको व्यावर्तित करने और तत्परतापूर्वक परिचय करनेकी आवश्यकता होती है, परंतु यहाँ तो श्रवण-मननादिजन्य स्वरूपके संस्कार ही परिचय, प्रयत्नके स्थानमें अपेक्षित हैं; क्योंकि जैसे छायाके पीछे चलनेसे छायाका ग्रहण नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्नसे शुद्ध वस्तुकी उपलब्धि नहीं हो सकती— 'कारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते।' निर्व्यापार होनेपर ही वस्तुबोध हो सकता है; परंतु केवल निर्व्यापारता योगियोंकी भी होती है, उन्हें अद्वैत ब्रह्मका अपरोक्ष्य फिर भी नहीं होता। इसका कारण यह है कि स्वरूपपरिचयानुकूल श्रवणादिद्वारा संस्कार वहाँ सम्पादित नहीं किये गये हैं। आत्मापर प्राथमिक आवरण अनिर्वचनीय अज्ञान और द्वितीय विक्षेपरूप द्वैत, तृतीय अर्धनिद्रापूर्वक स्वप्न और चतुर्थ पूर्ण निद्रा या सुषुप्ति है। मेघाच्छन्न भाद्रपद अमावास्याकी रात्रिकी तरह सुषुप्तिमें आत्माका अत्यन्त अप्रकाश रहता है। मेघरहित रात्रिके समान स्वप्नमें किंचित्प्रकाश होता है। चान्द्रमसी रात्रिकी तरह जाग्रत्में पर्याप्त प्रकाश होता है। मेघाच्छन्न दिवसकी तरह समाधिमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण सूर्यकी तरह तत्त्वसाक्षात्कारमें आत्माका प्रकाश होता है। निरावरण ब्रह्मस्वरूप साक्षात्कारके लिये देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादिका अत्यन्त निरोध और वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार—इन दोनोंकी आवश्यकता है। जैसे—'गोसदृशो गवयः' इत्याकारक वाक्यजन्य दृढ़तर संस्कारवाले पुरुषको 'नेत्र' और 'गवय' का सन्निकर्ष होते ही 'अयं गवयः' ऐसा बोध हो जाता है, वहाँ विचारकी आवश्यकता नहीं होती और गवयका नेत्रोंसे सम्बन्ध होनेपर भी 'यह गवय है' ऐसा बोध नहीं होता, जबतक कि 'गौके सदृश गवय होता है' ऐसा ज्ञान नहीं होता। अतः जहाँ सन्निकर्ष होनेपर भी 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके बिना 'अयं गवयः' इत्याकारक साक्षात्कारमें विलम्ब हो, वहाँ यह 'गवय' है, इस ज्ञानमें वाक्य ही हेतु है, इन्द्रिय-सन्निकर्ष सहकारीमात्र है एवं जहाँ 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्यके संस्कार होनेपर भी नेत्र-सन्निकर्ष बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ सन्निकर्ष ही मुख्य हेतु है और वाक्य सहकारी है। ठीक इसी तरह योगियोंको निरोध समाधि होनेपर भी वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कार बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है। अतः वहाँ ब्रह्मसाक्षात्कारमें वेदान्त-वाक्य ही मुख्य कारण है, निरोध सहकारी है। जहाँ वेदान्ताभ्यास होनेपर भी निरोध बिना साक्षात्कारमें विलम्ब है, वहाँ निरोधकी ही मुख्य हेतुता है, वाक्य सहकारी है। इसी अभिप्रायसे आचार्योंने कहीं वेदान्तोंको, कहीं संस्कृतनिरुद्ध मनको ब्रह्म-साक्षात्कारमें हेतु माना है और कहीं महावाक्यको ही मुख्य हेतु कहा है। इससे सिद्ध