भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 749

वेदान्तरससार ७३९ होता है कि वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसे युक्त निरुद्ध अन्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मका साक्षात् होता है। जैसे पूर्णिमाके किसी अवस्था-विशेष-विशिष्ट चन्द्रमापर ही राहुका प्राकट्य होता है, वैसे ही निर्वृत्तिक निरुद्ध मनपर ही ब्रह्मस्वरूपका प्राकट्य होता है। 'असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते।' असत्य काल्पनिक मार्गपर स्थित होकर सत्यवस्तुकी प्राप्तिका प्रयत्न किया जाता है। अप्राकृत भगवान्की मंगलमयी मूर्तिको प्राकृत कमल, महेन्द्र नीलमणि प्रभृति उपमानोंसे उपमित किया जाता है। क्या कोई भी आस्तिक सर्वांशमें भगवान्में इन उपमानोंको मान सकता है? ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता 'तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यात्' (रुद्र- हृदयोपनिषत् २७) एकके विज्ञानमें सर्व-विज्ञानकी प्रतिज्ञाका समर्थन करनेके लिये श्रुतिने यह दृष्टान्त दिया है कि जैसे एक मिट्टीके विज्ञानमें समस्त मृण्मय पदार्थका 'यह सब मिट्टी ही है' इस प्रकार विज्ञान हो जाता है, वैसे ही एक परमात्माके विज्ञानसे समस्त परमात्म- कार्यका विज्ञान हो जाता है, परंतु यहाँ भी तो मृत्तिका सावयव एवं परिणामिनी है तो फिर निरवयव कूटस्थ अपरिणामी भगवान्का प्रपंच- रूपमें परिणाम कैसे सम्भव है? और परमात्माके विज्ञानमें समस्त प्रपंचका विज्ञान भी होना कैसे सम्भव है? ऐसी बात नहीं है, यहाँ तो केवल जैसे कारणसे भिन्न कार्यकी सत्ता नहीं; कारणकी ही सत्तासे कार्यमें सत्ता और स्फूर्तिमत्ता प्रतीत होती है, वैसे ही परमात्मासे भिन्न प्रपंचकी सत्ता नहीं; एक परमात्माकी ही सत्ता और स्फूर्तिसे प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्तिकी प्रतीति होती है। इतने ही अंशमें दृष्टान्त है। इसी प्रकार घटसे ही महाकाशमें देशकी कल्पना और उससे ही महाकाशमें घटाकाश- व्यवहार और घटके गमनमें घटाकाशके गमनकी प्रतीति होती है। वस्तुतः न तो महाकाशसे भिन्न घटाकाश है और न उसका गमन ही होता है, वैसे ही अनन्त अखण्ड शुद्ध भगवान्में उपाधियोगसे ही भेद और गति (गमन), उत्क्रान्ति (उत्क्रमण) आदिकी प्रतीति होती है, वस्तुतः कुछ नहीं है। उपाधि-विरहित देशमें उपाधिके जानेसे वहाँ नवीन जीवभावकी कल्पना हो जाती है। यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि देशकी कल्पना भी तो उपाधिके ही अधीन है। इसके अतिरिक्त ऐसी कल्पनासे अधिष्ठानमें तो कोई हानि ही नहीं है। यों तो समस्त प्रपंच ही उसीमें कल्पित है; परंतु इससे क्या वह बद्ध समझा जाता है? क्या कल्पित जलसे मरुभूमि आर्द्र होती है? जब निरवयव निष्प्रदेश निष्कलमें काल्पनिक उपाधिद्वारा ही काल्पनिक प्रदेशका व्यवहार होता है, तब तत्त्वतः प्रदेश या उसके बन्ध और मोक्षकी कल्पना तात्त्विकी कैसी? यदि पूछा जाय कि फिर किसका बन्ध-मोक्ष तात्त्विक है तो इसका उत्तर यही है कि किसीका नहीं। अतएव 'न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥' (आत्मोपनिषद् ३१), (अवधूतोपनिषत् ८) अज्ञानसंज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२६) सत्यज्ञानानन्दात्मक भगवान्से भिन्न होकर बन्ध- मोक्ष नामके कोई पदार्थ नहीं हैं। केवल अज्ञानसे बन्ध और मोक्ष—ये दो संज्ञाएँ होती हैं, अतः केवल कल्पित उपाधिसे कल्पित प्रदेशमें कल्पित ही गमनागमन और कल्पित ही बन्ध-मोक्ष होते हैं। कल्पितोपाधिका अनुगामी जो कल्पित प्रदेश है, वही कल्पित बन्धसे पीड़ित और कल्पित मोक्षसे मुक्त होता है। यदि बन्ध सत्य हो, तभी मोक्ष भी सत्य हो सकता है। अधिष्ठानावशेषके अभिप्रायसे