भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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७४० भक्तिसुधा भगवत्प्राप्ति, मोक्ष या निरावरण भगवान् ही सत्य हैं। इसी तरह— एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटो यथा। घटो नीयेत नाकाशं तथा जीवो नभोपमः॥ (त्रिपुरातापिन्युपनिषत् ५।१२।१३) 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोनुगच्छन्' इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंमें परमात्माके जीवरूपसे प्रवेशमें दृष्टान्त-रूपसे यह आया है कि जैसे एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न जलमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होता है, वैसे ही परमात्मा भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें प्रविष्ट होकर अनेकधा भासमान होते हैं। ऐसे ही 'घटे भिन्ने यथावकाश आकाशः स्याद् यथा पुरा।' (श्रीमद्भा० १२।५।५) घटे नष्टे व्योम व्योमै