भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 751, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार ७४१ सर्व-पदसे विवक्षित प्रपंच बाधित या मिथ्या हो जाता है। अतः जिस ब्रह्मका विज्ञान होनेमें प्रपंचका बाध होना निश्चित है, उस ब्रह्मके ज्ञानमें सर्व प्रपंचका विज्ञान कैसे कहा जा सकता है? तथापि यहाँ श्रुतिका आशय गम्भीर है। जैसे 'शत्रु-गृह' का भोजन करूँ या न करूँ? बालकके ऐसे प्रश्नपर जननी कहती है—'विषं भुङ्क्ष्व'। इस वाक्यका अनभिमत प्रातीतिक अर्थ यही है कि 'विष खा' परंतु क्या पुत्रवत्सला जननी अपने शिशुको विष- भोजनका आदेश दे सकती है? यदि नहीं तो यही कहना होगा कि इस वाक्यका अभिप्राय शत्रु-गृह- भोजन-निवृत्तिमें है—'शत्रुगृहभोजनाद्वरं विषभोजनं, अतो मा भुङ्क्ष्वेति।' ठीक वैसे ही भगवती श्रुतिका परमात्म-विज्ञानसे जड़ दुःखमय प्रपंचके निरर्थक विज्ञानके प्रतिपादनमें तात्पर्य नहीं हो सकता; किंतु मधुरतम भगवान्के ज्ञानसे पहले यद्यपि सर्वपद वाच्य प्रपंचके बोधमें कुछ पुरुषार्थ-बुद्धि होती है तथापि परमानन्दस्वरूप भगवान्का बोध होनेपर तो नीरस प्रपंचका बोध अत्यन्त निरर्थक हो जाता है। अतः अपुरुषार्थ होनेसे परमात्म-विज्ञानमें सर्व- विज्ञान विवक्षित नहीं है, अपितु प्रपंचका बाध ही अनर्थ-निवृत्तिरूप होनेसे विवक्षित हो सकता है। पुत्रवत्सला जननीकी तरह परम हितैषिणी भगवती श्रुति यह समझकर कि प्रपंच विज्ञानके लिये व्यग्र जीव प्रपंचातीत ब्रह्मज्ञानके लिये कैसे प्रयत्नशील हो, ब्रह्मके विज्ञानमें सर्वविज्ञानका प्रलोभन देकर अधिकारियोंके हृदयमें ब्रह्मजिज्ञासा उत्पन्न करना चाहती है। साधारणतया प्राणियोंकी उत्सुकता अनेक प्रकारके भूतभौतिक पदार्थोंके विज्ञानमें ही होती है। एक-एक भौतिक भावको जाननेमें बहुत धन, जन तथा शक्तियोंका क्षय किया जाता है। नाना प्रकारके पार्थिव, आप्त (वारुण), तैजस, वायव्य-विशिष्ट तत्त्वोंका बोध होनेपर भी अभीतक इयत्ता निश्चित नहीं हो सकी है। एक नगण्य तृणकी भी समस्त विशेषताएँ क्या सहस्रों जीवनमें भी जानी जा सकेंगी? तब भी पदार्थविज्ञानकी उत्सुकता प्राणियोंके हृदयसे निकलती नहीं है। इस तरह निरर्थक पदार्थविज्ञानमें उत्सुकता एवं आसक्तिके निवारण और परम सार्थक भगवत्तत्त्व-विज्ञानसे बहिर्मुख जीवोंके हृदयमें भगवत्तत्त्व-विविदिषा उत्पादन करनेके लिये भगवती श्रुति कहती है कि 'हे शिशुओ! यह तुम समझते ही हो कि जिन भौतिक तत्त्वोंकी विशेषताओंको जाननेके लिये तुम व्यग्र हो, उनका सामस्त्येन बोध लक्ष कल्पोंमें भी होना कठिन है। अच्छा, यदि तुम्हें सर्वप्रपंचका ही तत्त्व जानना है तो तुम ब्रह्मका विज्ञान सम्पादन करो। बस, एक ब्रह्मके ही विज्ञानमें सबका विज्ञान हो जायगा।' इस तरह सर्वविज्ञानके प्रलोभनमें आकर यदि प्राणी ब्रह्म-विज्ञानके लिये उत्सुक हुआ और उसने उचित साधनानुष्ठानपूर्वक ब्रह्मका विज्ञान सम्पादन कर लिया, तब तो जिस प्रपंच-विज्ञानके लिये प्रथम वह अत्यन्त व्यग्र था, उत्सुक था, वही प्रपंच जब रज्जु- सर्पके समान या स्वप्नकी तरह बाधित हो जाता है, तब उसे निस्तत्त्व समझकर उस प्रपंचकी जिज्ञासा ही प्रशान्त हो जाती है। जिज्ञासा-निवृत्तिको ही ज्ञान कहते हैं। इस तरह ब्रह्मके विज्ञानमें प्रपंचकी जिज्ञासाका ही मिट जाना प्रपंचका विज्ञान है। परमात्मतत्त्वसे भिन्न यदि किसी भी तत्त्वका अस्तित्व है, तब तो उसकी जिज्ञासा भी अनिवार्य होगी। इसलिये अज्ञलोक-बुद्धि-सिद्ध प्रपंचकी प्रसक्त निमित्त एवं उपादानरूप द्विविध कारणता भी परमतत्त्वमें ही समर्थन की जाती है; क्योंकि केवल निमित्त या केवल उपादानके विज्ञानमें सर्वका विज्ञान नहीं हो सकता। मृत्तिकाके विज्ञानमें घटादि मृण्मय पदार्थोंका यद्यपि विज्ञान हो सकता है तथापि निमित्त-कारणरूप दण्ड, कुलालादिका ज्ञान नहीं होता एवं दण्ड, कुलालादिके ज्ञानमें मृत्तिका या उसके घटादिका ज्ञान नहीं हो सकता। ऐसी स्थितिमें एकके विज्ञानमें सर्वका विज्ञान तभी हो सकता है, जब एक ही