भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ भक्तिसुधा देश-काल-वस्तुकी सत्ता अत्यन्त स्पष्ट है। जैसे डालनेसे प्रतिबिम्ब नहीं दिखायी देता, वैसे ही दर्पणसे प्रतिबिम्ब कवलित है, दर्पणके बिना उसकी निर्दृश्य चितिरूप नित्यदृक्पर दृष्टि डालनेपर दृश्य, प्रतीति ही नहीं हो सकती, वैसे ही देश, काल तथा दर्शन और साभास-अहमर्थरूप अनित्य द्रष्टा-इन समस्त वस्तुएँ अबाधित सत्ता एवं अखण्ड अनन्त सभीका अत्यन्ताभाव हो जाता है। प्रतीतिसे कवलित हैं। अतः बिना प्रतीति और प्रतिबिम्बमें जब दृष्टि आसक्त होती है, उस सत्ताके देशादिकी सिद्धि हो ही नहीं सकती। सत्ता समय भी यद्यपि दर्पणका दर्शन होता है; क्योंकि और स्फूर्तिसे विहीन देशादि असत् तथा निःस्फूर्ति बिना दर्पणके दर्शन तो प्रतिबिम्बका दर्शन हो ही हो जाते हैं। नहीं सकता तथापि शुद्ध निष्प्रतिबिम्ब दर्पणका दर्शन यद्यपि प्रतिबिम्बसे भिन्न बिम्ब दर्पणसे पृथक् नहीं होता। उसी समय दृश्यादि दृष्टिकालमें भी हुआ करता है, परंतु यहाँ तो सत्ता और प्रतीतिरूप दृश्यके अधिष्ठानभूत अखण्ड स्फुरणरूप भगवान्का दर्पणसे भिन्न कोई देश ही नहीं, जहाँ बिम्बकी तरह भान है ही; क्योंकि बिना स्फुरण किसी भी दृश्यकी किसी पृथक् वस्तुकी स्थिति हो सकती हो। इसी सिद्धि नहीं होती तथापि स्पष्ट शुद्ध अनन्त भान नहीं वास्ते हम भी जगत्को प्रतिबिम्ब न कहकर व्यक्त होता है। उसके लिये ही वैराग्यपूर्वक दृश्यकी प्रतिबिम्बके समान कहते हैं। वस्तुतत्त्वके बुद्ध्यारोहणके ओरसे दृष्टिको व्यावर्तित करके केवल निर्दृश्य लिये दृष्टान्तका उपादान किया जाता है। दृष्टान्त विशुद्ध अखण्ड भानपर दृष्टि स्थिर करना होता है। इतने ही अंशमें है कि जैसे दर्पणमें न होकर भी उसी तरह अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेपर फिर प्रतिबिम्ब स्पष्टरूपसे दर्पणमें प्रतीत होता है, उसी केवल जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तभीतक तरह ब्रह्ममें न होता हुआ भी प्रपंच अत्यन्त स्पष्ट व्युत्थान-कालमें दृश्यका स्फुरण होता है। प्रारब्ध रूपसे प्रतीत होता है। यह दूसरी बात है कि क्षय होनेपर सदाके लिये दृश्य मिट जाता है प्रतिबिम्बाधार दर्पणसे भिन्न भी देश है और वहाँ और अखण्ड आनन्द परिपूर्ण भगवान् ही अवशिष्ट प्रतिबिम्बका निमित्त बिम्ब भी है, परंतु यहाँ रहते हैं। दृश्याधार अखण्ड ब्रह्मरूप दर्पणसे भिन्न कोई देश जबतक यह स्थिति नहीं मिलती, तबतक नहीं, अतएव यहाँ बिम्बके समान कोई सत्य वस्तु सुषुप्तिमें सावरण ही ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति होती है। निमित्त भी नहीं, किंतु एकमात्र अनिर्वचनीय शक्तिके जैसे मेघसे समावृत मेघका अवभासक सूर्य है, बस, अद्भुत माहात्म्यसे प्रतिबिम्बकी तरह वस्तुतः वैसे ही अज्ञानसे समावृत अज्ञानका प्रकाशक निष्प्रपंच अत्यन्तासत् दृश्य प्रपंचकी प्रतीति होती है। वह अद्वैत स्वप्रकाशानन्दरूप आत्मा सुषुप्तिमें जीवको शक्ति ही जैसे सर्वदृश्यकी कल्पनाका मूल है, वैसे मिलता है। जैसे घोर निद्रासे किसी तरह अकस्मात् ही अपनी कल्पनाका भी मूल वह स्वयं ही है। जैसे जागनेपर विशेष विकल्प विस्फुरणके बिना कुछ भेद ही घट-पटका भेदक है और वही घट-पटसे ज्ञान होता है, विवेकीजन वैसे ही ब्रह्मानुभवका अपना भी भेद सिद्ध करता है, किंवा जैसे अनुभव प्रकार बतलाते हैं। घोर निद्रासे जागनेके पश्चात् एवं ही अपने विषयोंका और अपने भी व्यवहारका द्वैत-प्रतीतिका प्रथम निष्प्रतिबिम्ब दर्पणकी तरह जनक है तथा नैयायिकोंका आत्मा ही सर्वज्ञेयका शुद्ध, निर्दृश्य, निरावरण, चिदात्मक प्रकाश ब्रह्मका तथा अपना भी ज्ञाता है, वैसे ही वह शक्ति ब्रह्मको दर्शन होता है, वैसे ही जागरणके अन्तमें और ही सर्वदृश्यरूपमें तथा अपने भी रूपमें प्रतिभासित सुषुप्तिके पूर्वमें भी निरावरण तत्त्वकी उपलब्धि करती है। जैसे निष्प्रतिबिम्ब दर्पणमात्रपर दृष्टि होती है, जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणरूप कमलकी