भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार [पृ. ७३५]
निराश होकर परमाणु, प्रकृति या अन्य किसीको प्रपंचके कारणरूपसे निश्चय करेगा। अतः भगवान् प्राणिकल्याणार्थ प्रथम यही कहते हैं कि 'मैं ही जगत्का कारण हूँ। यदि तत्त्वतः विवेचन किया जाय, तब तो जगत् नामका कोई पदार्थ ही नहीं है; परंतु यदि अज्ञबुद्धिसिद्ध व्यावहारिक जगत् है तो मुझमें ही है। मैं ही इसके भीतर, बाहर, मध्यमें तथा मैं ही इसका भासक हूँ।' जब इस तरह प्रभुके उपदेशसे प्राणीको प्रपंचसे भिन्न एक भगवान्पर विश्वास हो जाता है, तब फिर ठीक-ठीक तत्त्वका उपदेश किया जाता है कि वस्तुतः मुझसे भिन्न होकर प्रपंच है ही नहीं; जो कुछ है वह बस, एक मैं ही हूँ। वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता जैसे भ्रान्तिसे किसीको अमृतसागरमें क्षारसागरकी कल्पना हो, ठीक वैसे ही एक अखण्ड आनन्दसागरमें ही भवसागरकी कल्पना है। आनन्दसागर ही भ्रान्तिसे भवसागरके रूपमें भासित होता है। आनन्दसागरसे भिन्न होकर भवसागर नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। भीतर, बाहर, सर्वत्र अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड संवित्सुखसागरका भान हो रहा है, इसीलिये गोस्वामीजी कहते हैं—'आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) अतः भगवान् सर्वकारण, सर्वाधार, सर्वभूत होकर भी असंग और सर्वरहित हैं। आनन्दसागर और भवसागरका संयोग समवाय आदि सम्बन्ध तो बनता नहीं। अतः केवल आध्यासिक ही सम्बन्ध है अर्थात् आध्यासिक सम्बन्धसे प्रपंच देश-काल- वस्तुकृत परिच्छेदशून्य निर्गुण निष्क्रिय असंग ब्रह्ममें रह सकता है। इसे यों भी समझ सकते हैं, जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल एवं नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि नाना प्रकारके दृश्य प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देते हैं—वस्तुतः हैं ही नहीं, केवल प्रतीत होते हैं, ठीक वैसे ही महाप्रतीतिरूप (स्वप्रकाश) दर्पणमें यह समस्त चराचरप्रपंच देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और अज्ञान—ये सभी प्रतिबिम्बके समान न होते हुए भी प्रतीत होते हैं। समस्त देश एवं क्षण, प्रहर, दिवस, पक्ष, मास, अब्द, युग, कल्प तथा गत-आगत नाना प्रकारके काल—ये सभी अखण्ड अनन्त निर्मल असंग प्रतीतिरूप (भानस्वरूप) दर्पणमें ठीक प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीत हो रहे हैं। जैसे रूपादि-ग्रहणके लिये प्रवृत्त भी चक्षु सौरादि आलोकका (सूर्यादिके प्रकाश) ग्रहण करता है, पीछे आलोकावभासित रूपका ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही सर्वभासिका प्रतीतिका (संवित्) स्फुरण पहले होता है। तदनन्तर प्रतीति-प्रकाशित अहंकारादि दृश्यका स्फुरण होता है। किंवा जैसे पहले दर्पणका ग्रहण होता है, पीछे दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है, वैसे ही पहले चिद्धातुरूप दर्पणकी प्रतीति होती है। तदनन्तर प्रतिबिम्बभूत जगत्की प्रतीति होती है। यही—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।३।१५) इस श्रुतिका आशय है। परमात्म- प्रकाशके पीछे सर्वदृश्यका प्रकाश होता है और परमात्म-प्रकाशसे ही सकल दृश्य प्रकाशित होता है। चक्षुरादि इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार—ये सभी अपने-अपने प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन करनेवाले हैं, अतः ज्योति हैं, परंतु इन ज्योतियोंका भी प्रकाशन करनेवाला विशुद्ध भावरूप परमात्मा ज्योतियोंका भी ज्योति है। तमोरूप अज्ञानका भी प्रकाश वही है— 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।' (गीता १३।१७) अतः 'देशः स्फुरति देशोऽस्ति। कालो भाति कालोऽस्ति। वस्तूनि स्फुरन्ति वस्तूनि सन्ति' इत्यादि रूपसे 'देशकी प्रतीति, कालकी प्रतीति, वस्तुओंकी प्रतीति एवं देश है, काल है, वस्तु है', इस प्रकार