भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मसे भिन्न होकर देश-काल-वस्तु कुछ है ही नहीं। अतः देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म नहीं, अपितु देश-काल-वस्तु ही ब्रह्ममें कल्पित है। इसी वास्ते 'यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥' (श्रीमद्भा० २।९।३४) भगवान्के इस वचनसे यह कहा गया है कि जैसे आकाशादि पंच महाभूत उच्चावच नाना प्रकारके भौतिक प्रपंचोंमें प्रविष्ट होते हुए भी अप्रविष्ट हैं, वैसे ही मैं महाभूतोंमें प्रविष्ट हूँ और अप्रविष्ट भी हूँ। कार्यवर्गमें महाभूतादि कारणोंकी उपलब्धि होती है, अतः प्रवेशकी कल्पना है। वस्तुतः— 'प्रागेव विद्यमानत्वान तेषामिह सम्भवः॥' (श्रीमद्भा० १०।३।१६) प्रथमसे ही जो व्यापक हैं, उनका प्रवेश क्या कहा जाय? इसी अभिप्रायसे— 'मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः' (गीता ९।४) इस वचनसे भगवान्ने ही अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है कि सर्व प्रपंच मुझमें है, मैं प्रपंचमें नहीं हूँ। इससे सिद्ध हुआ कि ब्रह्मसे रहित कोई देश या काल है ही नहीं, जहाँ भगवान्से भिन्न किसी वस्तुकी स्थिति हो। किंतु जब सभी देश और काल ही ब्रह्ममें हैं, तब फिर देशनिष्ठ, कालनिष्ठ वस्तु सुतरां ब्रह्ममें ही पर्यवसित होगी। अब देखना यह है कि देश, काल एवं वस्तु— ये असंग ब्रह्ममें कैसे रहते हैं? श्रुतियोंने ब्रह्मको ही समस्त प्रपंचका उपादान एवं निमित्त कारण भी बतलाया है। यदि थोड़ी देरके लिये प्रकृतिको ही उपादान मान लें तो भी वही प्रश्न उठता है कि प्रकृति कहाँ है—ब्रह्ममें या उससे पृथक्? जब ब्रह्मसे पृथक् देश, काल नहीं तो पृथक् देशमें प्रकृतिकी कल्पना कैसे उठ सकती है? यदि ब्रह्ममें ही प्रकृति है, तब वहाँ भी वही प्रश्न है कि किस सम्बन्धसे ब्रह्ममें प्रकृति रहती है? यदि प्रकृति या जगत्का ब्रह्मके साथ कोई सम्बन्ध मानें तो ब्रह्ममें असंगता नहीं रहती है। साथ ही उपादानको छोड़कर अन्यत्र कार्यकी सत्ता भी नहीं कही जा सकती। जलको छोड़कर वीचि (तरंग) एवं सुवर्णको छोड़कर कुण्डलादि पृथक् कैसे रह सकते हैं? साथ ही प्रपंच तथा भगवान्का स्वभाव भी अत्यन्त विरुद्ध है। ब्रह्म अपरिच्छिन्न, प्रपंच परिच्छिन्न, ब्रह्म अमृत, प्रपंच मर्त्य, ब्रह्म सुख-दुःख-मोहातीत, प्रपंच सुख- दुःख-मोहात्मक तथा ब्रह्म परम-सत्य स्वप्रकाश परमानन्दरूप और प्रपंच अनृत जड़ दुःखरूप है। ब्रह्म निरवयव तथा निष्कल और प्रपंच सावयव, सकल है। अतः ब्रह्म और प्रपंचका सम्बन्ध कैसे और कौन हो सकता है? निर्गुण तथा निष्क्रिय होनेके कारण ब्रह्म द्रव्य नहीं कहा जा सकता। अतएव उसमें संयोग या समवाय दोनों नियामक सम्बन्ध नहीं हो सकते। निष्कल निरवयवमें भी यह सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः केवल आध्यासिक सम्बन्ध मानना उचित है। इसी आशयसे 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥' 'न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥' (गीता ९।४-५) आदि वचन आये हैं, जिनका भाव यह है कि मुझ अव्यक्त-मूर्तिसे समस्त साकाश (आकाशसहित, आकाशपर्यन्त) प्रपंच व्याप्त है, समस्त भूत मुझमें हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ, वास्तवमें तो समस्त प्रपंच मुझमें स्थित भी नहीं हैं। आशय यह है कि बहिर्मुख प्राणियोंकी दृष्टिमें प्रपंच ही स्पष्ट रूपमें विद्यमान है, प्रपंचातीत भगवान्का तो अस्तित्व ही दुर्गम है, अतः प्रथम प्रपंचके कारणरूपसे या आधार तथा भासक सत्ता स्फूर्तिप्रदरूपसे भगवान्के अस्तित्वपर विश्वास होना यह सबसे बड़ी बात है। कुछ अभिज्ञ प्रपंच देखकर उसके आधार या कारणका अन्वेषण करते हैं। यदि भगवान् प्रथम ही यह कह दें कि न मैं प्रपंचमें हूँ, न प्रपंच मुझमें है, तब तो निज दृष्टिसिद्ध प्रपंचके कारणका अन्वेषण करनेवाला साधक भगवान्से