भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 743

वेदान्तरससार ७३३ वैसे ही स्वयंप्रकाश-स्फुरणके अनन्तर दृश्यका स्फुरण होता है। असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, निरवयव, निष्कल परमात्मामें प्रपंचसंसर्गका प्रकार यही है। सभी वादिगण परमात्माको अखण्ड, असंग, निष्कल तथा अनन्तस्वरूप मानते हैं। निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य- सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता ऐसी परिस्थितिमें प्रपंचकी स्थिति कैसे और कहाँ सम्भव है ? या तो प्रपंचको किसी ऐसे देश- कालमें रखें, जहाँ परमात्मा न हों या परमात्माको आकाशकी तरह सावकाश पोला मानें। परंतु ये दोनों ही पक्ष शास्त्रविरुद्ध हैं; क्योंकि शास्त्रोंने परमात्माको ब्रह्म शब्दसे बोधित किया है। ब्रह्म शब्द 'बृहि वृद्धौ' धातुसे बनता है। अतः ब्रह्म शब्दका 'बृहत् या महान्' यह अर्थ होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि किसी बृहत् या महान् वस्तुको ब्रह्म कहते हैं। अब यह विवेचन करना है कि ब्रह्मकी वह बृहत्ता सापेक्ष है या निरपेक्ष, सातिशय है या निरतिशय ? अर्थात् जैसे घट, पट, मठ आदिमें बृहत्ता है और आकाशमें भी, परंतु घट-पट-मठादिमें सापेक्ष बृहत्ता है और आकाशमें निरपेक्ष है, वैसे ब्रह्ममें कैसी बृहत्ता होनी चाहिये? इसपर विज्ञजनोंकी सम्मति यही है कि जब कोई संकोचक पद हो, तब ब्रह्ममें सापेक्ष बृहत्ताकी कल्पना की जाय। जैसे 'सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस वचनमें सर्व पदका संकोच किया जाता है। जहाँ सार्वत्रिक सार्वदेशिक सर्व ब्राह्मणोंका एकत्रीभाव या भोजन असम्भव हो, वहाँ 'निमन्त्रिताः सर्वे ब्राह्मणा भोजनीयाः' इस प्रकार सर्वपदका संकोच करके निमन्त्रित सर्व ब्राह्मणका ग्रहण होता है। वैसे यहाँ भी यदि कोई संकोचक प्रमाण होता या निरतिशय बृहत्तामें किसी तरहकी अनुपपत्ति होती, तब तो यह कहा जा सकता था कि 'इस प्रकारके इतने महान्‌को ब्रह्म कहें।' जब किसी प्रकारका कोई संकोचक प्रमाण नहीं है और निरतिशय महत्तामें कोई अनुपपत्ति नहीं है, तब सर्व प्रकार एवं सर्वसे अधिक निरतिशय महान्‌को ही ब्रह्म कहना चाहिये। महत्ताकी अतिशयताकी कल्पना-परम्परा जहाँ विरत हो जाय, जिससे अधिक बृहत्ताकी कल्पना हो ही नहीं सके, उसीको ब्रह्म कहते हैं। फिर भी भगवती श्रुतिने 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय० २।१) इस वचनमें लक्षण या विशेषणरूपमें अनन्त पदका प्रयोग किया है, जिससे निरतिशय बृहत्ताकी और भी पुष्टि हो जाती है। इस तरह सर्व प्रकारसे सिद्ध हुआ कि निरतिशय महान्‌को ही ब्रह्म कहते हैं। जो वस्तु किसी देशमें हो और किसी देशमें न हो, वह तो देश-परिच्छिन्न ही है, उसमें निरतिशय बृहत्ता कैसी ? और जो कभी मिट जाय, वह तो काल-परिच्छिन्न एवं अनित्य है, वह भी अनन्त महान् नहीं हो सकती और यदि किसी दूसरी अन्य वस्तुका अस्तित्व हो, तब तो अन्योन्याभावका प्रतियोगी होनेसे ब्रह्म वस्तु-परिच्छिन्न हो जायगा। अतः फिर भी निरतिशय महत्ता उसमें नहीं हो सकती। इसलिये निरतिशय तथा अनन्त महत्ताके लिये ब्रह्मको सर्व देश-काल-वस्तुसे अतीत एवं अपरिच्छिन्न मानना चाहिये। अर्थात् ऐसा कोई देश-काल या वस्तु नहीं है, जहाँ ब्रह्म न हो, बल्कि 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्म है' ऐसा कथन भी औपचारिक ही है। जैसे तन्तु-निर्मित पटमें तन्तुका अस्तित्व, कनक-निर्मित कटक-कुण्डल-मुकुटादिमें कनकका अस्तित्व, तरंगमें जलका अस्तित्व एवं कल्पित सर्पमें अधिष्ठानरूपसे रज्जुका अस्तित्व है, बस उसी प्रकार 'देश-काल-वस्तुमें ब्रह्मका अस्तित्व है' ऐसा व्यवहार प्राकृत, विवेकी पुरुषोंमें हुआ करता है। वस्तुतः जैसे तन्तुओंसे भिन्न होकर पट नामकी कोई तात्त्विक वस्तु नहीं है एवं कनकसे भिन्न कुण्डलादि पृथक् वस्तु नहीं है और जलसे भिन्न तरंग नामका कोई पदार्थान्तर नहीं है, अपितु तन्तु आदिमें ही पटादिकी कल्पना है, ठीक वैसे ही

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