भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार [७३१]
बुद्धिरव्यक्तमेव च' (गीता १३।५) इस गीता- वचनमें स्पष्ट ही अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्वका वर्णन है। इस तरह श्रुति-स्मृतिके तात्पर्य-विवेचनसे स्पष्ट विदित होता है कि साक्षात् परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति नहीं हुई, अपितु महत्तत्त्व आदिके क्रमसे ही हुई है। अतएव जहाँ- कहीं सतत्त्व परमात्मासे सीधे तेजकी ही उत्पत्ति श्रुत है, वहाँ भी आकाश एवं वायुकी उत्पत्तिके अनन्तर आकाश-वायुरूपमें आविर्भूत परमात्मासे तेजकी उत्पत्ति समझनी चाहिये। श्रुतियोंमें जो 'तदैक्षत एकोऽहं बहु स्याम्' (छान्दोग्य० ६।२।३)परमात्माने ईक्षण=निरीक्षण (विचार) किया कि एक मैं बहुत हो जाऊँ इत्यादि रूपसे ईक्षण और अहंका उल्लेख मिलता है, इससे भी अहंतत्त्व एवं महत्तत्त्वका ही द्योतन होता है। किसी कार्यके निर्माणमें ज्ञान एवं अहंकारकी आवश्यकता होती है। व्यष्टिद्वारा ही समष्टि-भाव समझे जाते हैं। समष्टि-तत्त्वको बुद्ध्यारूढ़ करनेके लिये प्रथम व्यक्तिका ही अवलम्बन करना पड़ता है। इसी वास्ते श्रुतिने ही 'स एकाकी न रेमे स द्वितीयमैच्छत्' (उस पुरुषको एकाकी होनेके कारण अरति हुई) इसी कारण अब भी प्राणियोंको अकेले होनेपर रमण, आनन्द नहीं होता। 'तस्मादेकाकी न रमते' (बृहदारण्यक० १।४।३) ऐसा कहा है। यही कारण है कि उपासनाओंमें जैसे प्रत्यक्ष शालग्राममें अप्रत्यक्ष विष्णुकी बुद्धि की जाती है, वैसे ही प्रत्यक्ष व्यष्टि जाग्रत्-अवस्था एवं स्थूल शरीराभिमानी विश्वमें समष्टि स्थूल प्रपंचाभिमानी वैश्वानरकी दृष्टि एवं व्यष्टि, स्वप्नावस्था एवं सूक्ष्म शरीराभिमानी तैजसमें समष्टि सूक्ष्म प्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भकी दृष्टि तथा व्यष्टि सुषुप्ति अवस्था एवं अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी प्राज्ञमें समष्टि-अज्ञानरूप कारणशरीराभिमानी कारण ब्रह्मरूप सर्वान्तर्यामी सर्वेश्वरकी दृष्टि कही गयी है। इससे विपरीत विराट्में विश्व-दृष्टि नहीं कही गयी; क्योंकि समष्टि अप्रत्यक्ष है। आकाशके एक देशमें बादलकी एक छोटी-सी टिकुली देखकर आकाशव्यापी महामेघमण्डलकी कल्पना की जाती है। जैसे स्वल्प परिमाणवाले दीप्तिमान् अग्निको देखकर अखण्ड ब्रह्माण्डव्यापक दीप्तिमान् अग्निकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अनुभूत व्यष्टि अज्ञान एवं ज्ञान तथा अहंकारसे समष्टि अज्ञान तथा महत्तत्त्व एवं अहंतत्त्वका भी बुद्धिमें आरोहण हो सकता है। समस्त तत्त्व क्रमशः परमात्मासे उत्पन्न और उसीमें लीन होते हैं। सुषुप्तिमें भी प्रपंचका लय प्रतीत होता है। हम स्पष्ट रूपसे देखते हैं कि घोर सुषुप्तिमें सोया हुआ पुरुष न कुछ जानता है, न उसे अहंकार होता है और न वह कुछ कार्य कर सकता है; क्योंकि समस्त इन्द्रियगण और अहंकार उस समय अज्ञानमें लीन होते हैं। 'सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते' (श्रीमद्भा० ११।३।३९) इसी वास्ते सुषुप्ति-अवस्थामें रहनेवाला आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा प्रजापतिके उपदेशको सुनकर इन्द्रको यही अनुपपत्ति प्रतीत हुई थी कि सुषुप्तिमें अपने या दूसरे किसीका तो ज्ञान होता नहीं, फिर इसमें पुरुषार्थ ही क्या है ? यहाँ भी अहंकारादिका आत्यन्तिक लय नहीं है; क्योंकि जागरमें उनकी पुनः प्रतीति होती है। अस्तु, यह तो बहुत ही प्रसिद्ध है कि सुषुप्ति दशामें जीवको कुछ भी ज्ञान नहीं होता। परंतु इस बातको भी विज्ञ पुरुष ही समझ सकते हैं कि 'मैं सुखपूर्वक सोया और कुछ भी नहीं जाना।'-इस प्रकारकी जो स्मृति सुषुप्तिसे उत्थित पुरुषको होती है, यह भी बिना अनुभवके असम्भव है; क्योंकि बिना अनुभवके कोई स्मरण नहीं होता। अतः सुषुप्तोत्थ पुरुषके स्मरणसे निश्चय होता है कि सुषुप्तिमें सौषुप्ततम एवं सौषुप्तसुखका प्रकाशक कोई स्वाभाविक अखण्ड नित्य विज्ञान अवश्य था। यहाँ जो लोग यह कहते हैं कि सुषुप्तिमें कोई भावरूप सुख या अज्ञान नहीं होता, किंतु दुःखके अभाव एवं ज्ञानके अभावमें ही