भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३० भक्तिसुधा पुनरुत्थान होता है और जीवोंको ही कर्मफल देनेके लिये लीलया भगवान्का भी उत्थान होता है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे जिन लोगोंके अज्ञानरूप बीजकी निवृत्ति होती है, उन निर्बीज ब्रह्मभावापन्नोंका पुनरुत्थान नहीं होता। सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता सबीजसे ही समस्त प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है—जैसे अखण्ड, अनन्त नभोमण्डलमें एक अतिक्षुद्र मेघका अंकुर होता है, उसी तरह अनन्त, अखण्ड, परिपूर्ण, परमानन्द स्वप्रकाश भगवान्के अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्त अचिन्त्य दिव्य महामाया शक्ति होती है। उसके भी अति स्वल्प प्रदेशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-जननी अनन्त अवान्तर शक्तियाँ होती हैं। एक-एक शक्तिमें सत्त्व, रज, तमके प्राधान्याप्राधान्यसे विद्या-अविद्या तामसी प्रकृति आदि अनेक भेद हो जाते हैं। रज और तमके लेशसे भी अनाक्रान्त अतएव विशुद्धसत्त्वप्रधाना शक्तिको माया या विद्या कहते हैं एवं रज तथा तमसे संस्पृष्ट अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना शक्तिको अविद्या कहते हैं और तमःप्रधाना शक्ति तामसी प्रकृति कही जाती है। यद्यपि कहीं-कहीं मूल प्रकृतिमें भी माया और अविद्या पदका प्रयोग होता है, जैसे 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' (श्वेताश्वतर० ४।१०) 'माया स्वाव्यतिरिक्तानि परिपूर्णानि क्षेत्राणि दर्शयित्वा जीवेशावाभासेन करोति माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ९) इत्यादि तथापि उसे कार्य और कारणके अभेदसे औपचारिक समझना चाहिये। जैसे मीमांसक गोविकार पयमें भी गो- पदका प्रयोग उपचारसे मानते हैं, यथा—'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' वैसे ही कहीं कार्यका प्रयोग कारणमें हो जाता है। अतः मूल महाशक्तिकी अवान्तर शक्तियोंके विभागमें विद्या-अविद्या आदि पदोंका प्रयोग शास्त्रसम्मत है। विद्या या मायारूप उपाधिसे उपहित चैतन्य ईश्वर-चैतन्य है और अविद्या उपाधिसे उपहित चैतन्य जीव-चैतन्य है। तामसी प्रकृतिसे भोग्यवर्गका प्रादुर्भाव होता है। इस तामसी प्रकृतियुक्त परमात्मासे महत्तत्त्व एवं महत्तत्त्वसे अहंतत्त्वकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि श्रुतियोंमें 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः।' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि वचनोंद्वारा सीधे परमात्मासे ही आकाशकी उत्पत्ति होना प्रतीत होता है तथापि—'बुद्धेरात्मा महान् परः ॥,' 'महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।' (कठ० १।३।१०-११) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि 'परमात्मा और उनकी शक्ति अव्यक्तके अनन्तर एवं आकाशके पहले महत्तत्त्व तथा अहं तत्त्व नामक पदार्थ भी हैं।' गीताने भी 'महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।' (गीता १३।५) इस श्लोकसे अपंचीकृत (परस्पर असम्मिलित) आकाशादि पृथिव्यन्त पंचमहाभूत एवं अहंकार (अहंतत्त्व), बुद्धि (महत्तत्त्व) तथा 'अव्यक्त तत्त्व' इन आठ प्रकृतियोंके रूपमें उन्हींका वर्णन किया है। उन्हींका 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥' (गीता ७।४) इस श्लोकमें भी वर्णन किया है। इस श्लोकमें मन शब्दसे आकाशके कारण अहंतत्त्वको ही समझना चाहिये, बुद्धि पदसे अहंतत्त्वका कारण महत्तत्वको समझना चाहिये और अहंकारसे महत्तत्त्वका कारण अव्यक्तको समझना चाहिये; क्योंकि ऐसा ही प्रकृति-विकृतिभाव सर्वत्र प्रसिद्ध है। यथाश्रुत मन, बुद्धि एवं अहंकारका कार्य-कारण भाव कहीं भी प्रसिद्ध नहीं है और यहाँ 'भिन्ना प्रकृतिरष्टधा' से भिन्न-भिन्न आठ प्रकृतियाँ विवक्षित हैं। यह तभी सम्भव है, जब भूमिको जलसे, जलका अनल (तेज) से, अनलका वायुसे एवं वायुका आकाशसे, आकाशका अहंतत्त्वसे, उसका महत्तत्त्वसे और महत्तत्त्वका अव्यक्ततत्त्वसे आविर्भाव माना जाय। अतएव 'महाभूतान्यहङ्कारो