भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार ७२१ ब्रह्माण्डनायक भगवान्को भी दृश्यकी प्रतीतिमें सन्ताप ही होना है। अतएव श्रुतिने कहा है कि ‘द्वैतका ज्ञान होना ही परमात्माका तप है’—‘यस्य ज्ञानमयं तपः’ (मुण्डक० १।१।९)। जैसे हम सबके लिये कृच्छ्रादिरूप तप है, वैसे ही परमात्माके लिये द्वैत ज्ञान ही तप है। यह ठीक ही है; क्योंकि जो बात बहिर्मुखोंके लिये नगण्य है, वही अन्तर्मुखोंको और ही प्रकारसे अनुभूत होती है। देखते ही हैं कि और अंगोंमें दण्डके आघातसे भी उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि नेत्रमें ऊर्णा तन्तुके निक्षेपसे होता है। जिन दोषों एवं दृश्य-प्रतीतियोंसे बहिर्मुखोंको कुछ भी सन्ताप नहीं होता, उन्हींसे अन्तर्मुख योगियोंको बहुत विक्षेप होता है। तो फिर योगेश्वर भगवान्के लिये दृश्यदर्शन कृच्छ्रादिकोंकी तरह घोर तप हो तो इसमें क्या आश्चर्य है ! कठोरोंके लिये जो कुछ नहीं, वही सुकुमारोंके लिये बहुत है, इसीलिये आचार्योंने कहा है कि— निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ (भामती-मंगलाचरण २) अर्थात् भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, वीक्षणसे ही पंचभूतोंकी सृष्टि होती है, स्मित (मन्दहास)-से ही सकल चराचर जगत् बन जाता है और प्रभुकी सुषुप्तिमें ही समस्त प्रपंचका प्रलय हो जाता है। प्रभुके वीक्षण एवं मन्दहास (मुसकराहट)-से कितने अद्भुत अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका प्राकट्य होता है। प्रभुके वीक्षणादिमें जैसा अद्भुत प्रभाव है, वैसे ही प्रभुकी सुकुमारता भी अद्भुत है। अतः वीक्षणमें ही उन्हें इतना श्रम तथा कष्ट होता है कि वही तप हो जाता है। बस, वीक्षण और मन्दहासमें ही परिश्रान्त होकर वे विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिमें पहुँच जाते हैं। वीक्षण करके थोड़ा-सा मुस्करा देना और सो जाना, बस इतना ही उनका कार्य है। अब सहृदय महापुरुष कल्पना करें कि अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक श्रीभगवान्को भी जब वीक्षण और मुसकराहटके अनन्तर ही विश्रान्तिके लिये सुषुप्तिकी आवश्यकता है, तब फिर द्वैतमें सुख है या अद्वैतमें? द्वैतमें चाहे जहाँ भी जितना भी जो कुछ भी सुख है, वह निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखकी अपेक्षा न्यून ही नहीं, अपितु दुःखरूप है। सर्व- सौख्य-सम्पन्न द्वैतदर्शनसे उद्विग्न होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् विश्रान्तिके लिये अद्भुत अद्वैत सुखका समाश्रयण करते हैं, फिर उनके भक्तोंको दुःखरूप द्वैतमें ही आनन्द हो, यह कैसे हो सकता है? अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त जीवों एवं उन सबके नियामक तथा आराध्य भगवान्को द्वैतदर्शनमें सुखका लेश भी नहीं है। जो कुछ भी सुखकी कल्पना है, वह केवल राजस-तामस भावोंके उद्रेकसे चांचल्य और द्वैतदर्शनके आधिक्यरूप दुःखकी अपेक्षासे ही है। जितनी-जितनी प्रपंचकी निवृत्ति एवं अन्तर्मुखता होती है, उतने-उतने अंशोंमें सुखकी कल्पना है। सुषुप्तिमें द्वैतदर्शनकी पर्याप्त निवृत्ति होती है, अतः वहाँ सुख भी पर्याप्त होता है। इसीलिये जीव और उनके भगवान् दोनोंकी प्रवृत्ति स्वरूपभूत निष्प्रपंच सुखके लिये होती है। जिस जीवको एक दिन नींद नहीं आती, वह घबरा जाता है और उसे प्रजागर दोष समझकर नींदके लिये सहस्रों उपचार करता है। उस समय चाहे कितनी भी दिव्यातिदिव्य सौख्यसामग्रियाँ क्यों न प्राप्त हों, सब-की-सब बेकार प्रतीत होती हैं, उनकी प्रतीति भी खटकती है, परंतु सब कुछ छोड़कर केवल सोनेके लिये ही जीव व्यग्र हो उठता है। यह क्या निष्प्रपंच अद्वैत सुखकी महत्ता नहीं है? अब कृतप्रज्ञ यह सोच सकते हैं कि जब सावरण निष्प्रपंच अद्वैत सुखमें सबका इतना आकर्षण है, तब निरावरण, निरतिशय, निष्प्रपंच अद्वैत ब्रह्मसुखमें सभीका कितना प्रेम होगा? यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि सौषुप्त निष्प्रपंच ब्राह्मसुख सावरण एवं सबीज है, इसीलिये इसे प्राप्तकर भी जीवोंका