भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४४ भक्तिसुधा सौरस्य, माधुर्यसम्पन्न पक्वान्नके मिलनेपर आनन्द होता है। यहाँ विवेचन करना चाहिये कि यह जो आनन्द है, उसका क्या रूप है ? नील या पीत, लघु या गुरु, बृहत्परिमाण-परिमित या मध्यमपरिमाण- परिमित है ? यहाँ यह कहना न होगा कि शीतल सुमधुर जल, पक्वान्न या कामिनी स्वयं आनन्दरूप नहीं हैं; क्योंकि बुभुक्षा, पिपासा तथा काम-व्यथाकी निवृत्ति इनके सेवनसे अवश्य मान्य है, परंतु समुद्भूत आनन्द सर्वत्र ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अगन्ध, अदृश्य तथा निराकार ही है। प्रेमास्पदमें प्रेमके उद्रेकसे आनन्दका उद्रेक होता है। आनन्दके उद्रेकमें आन्तर-बाह्य सर्व दृश्य जगत्का विस्मरण होता है, तभी चिरकालतक कामिनीके परिरम्भणजन्य आनन्दके उद्रेकमें आन्तर-बाह्य दृश्यका विस्मरण होता है। ऐसे ही सुषुप्ति-कालमें प्राज्ञ परमात्माके सम्मिलनजन्य आनन्दसे प्रपंचका विस्मरण होता है। सप्रपंच ब्रह्ममें सातिशय प्रेम होता है। अतएव वहाँ सातिशय आनन्द तथा प्रपंच-विस्मरण भी कुछ मात्रामें ही होता है। सर्वोपाधिविनिर्मुक्त भगवान् ही निरावरण होनेके कारण निरतिशय प्रेमके आस्पद हैं। उन्हींके सम्मिलनमें निरतिशय आनन्द होता है और तभी सम्पूर्ण रूपसे सर्वदृश्यका अत्यन्ताभाव होता है। अधिष्ठानसाक्षात्कारद्वारा जबतक आवरण निवृत्ति नहीं होती, तबतक जीवको पूर्णरूपेण ब्रह्मका परिष्वंग नहीं होता। जितना व्यवधान-शून्य प्रियतम-परिष्वंग होता है, उतना ही अधिक आनन्द व्यक्त होता है। सृष्टि या प्रबोध-कालमें भोग्य और भोक्ता सभी अपने महाकारणसे दूर हो जाते हैं। प्रलय तथा सुषुप्तिमें वे सभी अपने कारणके सन्निधानमें पहुँच जाते हैं। यद्यपि जैसे तरंग किसी अवस्थामें भी सागरसे वियुक्त नहीं होते; किंतु सदा सागरके अंकमें ही उनकी स्थिति होती है, महासागरसे फेन, बुद्बुद, तरंगकी तरह परमानन्दसुधासागरसे उत्पन्न होनेवाले समस्त तत्त्वोंकी स्थिति प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें ही है तथापि भ्रममूलक भेद और वियोग इतना स्पष्ट व्यक्त हो रहा है कि स्वाभाविक अभेद एवं सम्बन्ध अत्यन्त तिरोहित हो गया है। विस्मृत कण्ठमणिका अन्वेषण तथा महासागरके अन्तर्गत होनेवाले हिम-उपलकी पिपासा इस विषयके पोषक सुन्दर उदाहरण हैं। महाप्रलयके समय समस्त प्रपंच क्रमेण सबीज ब्रह्ममें लीन होता है। समस्त वन, पर्वत, नगर, ग्रामादि पार्थिव प्रपंच पृथिवीमें विलीन हो जाते हैं। पृथिवी जलमें लीन होती है। जल तेजमें, तेज वायुमें एवं वायु आकाशमें लय हो जाता है। सृष्टिकालमें जैसे महाकारण कार्योन्मुख विकसित होकर सविशेषभावको प्राप्त होता है, वैसे ही प्रलय- कालमें समस्त कार्य कारणोन्मुख संकुचित होकर निर्विशेष भावको प्राप्त होता है। तन्तुमें अंगप्रावरण, शीतापनयनादि कार्य-करण- क्षमता नहीं होती; परंतु पटमें होती है। यद्यपि वह तन्तुओंसे भिन्न कोई स्वतन्त्र पदार्थ न होकर केवल आतानवितानात्मक तन्तुरूप ही है तथापि उसमें अंग प्रावरण तथा शीतापनयन करनेका सामर्थ्य होता है। तन्तुमें वह सामर्थ्य नहीं है, वैसे ही घटमें जलानयनका सामर्थ्य है; किंतु मृत्तिकामें नहीं। मृत्तिका जलानयनकर्तृत्वविशेषरहित होनेसे निर्विशेष है। घट जलानयनकर्तृत्वयुक्त होनेसे सविशेष होता है। पटमें शीतापनयनकार्यकारितारूप विशेष है। अतः वह सविशेष है। तन्तु उससे हीन होनेके कारण निर्विशेष है। यद्यपि विवेचन करनेपर उपादान कारणसे भिन्न कार्य कुछ होता नहीं तथापि कारणकी अपेक्षा कार्यमें कुछ अनिर्वचनीय विलक्षणता अवश्य होती है। मृत्तिका घटरूपमें व्यक्त होकर सविशेष होती है। घटके मृत्तिकामें लीन होनेपर घटकी अपेक्षा वह निर्विशेष और मृत्तिकाकी अपेक्षा घट सविशेष होता है। जल निर्गन्ध है, पर उसका कार्य पृथिवी गन्धवती है। नीरस तेजसे रसवान् जल एवं नीरूप वायुसे रूपयुक्त तेजकी उत्पत्ति होती है। कारणकी अपेक्षा कार्य सविशेष एवं कार्यकी अपेक्षा कारण