भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

वेदान्तरससार ७४५ निर्विशेष होता है। आकाशमें शब्द होता है। आकाशको भी 'अहंतत्त्व' (अहंकार)-में एवं अहंकारको 'महत्तत्त्व' (समष्टिज्ञान)-में, 'महत्तत्त्व' को 'अव्यक्त'-में लय चिन्तन करनेसे अत्यन्त निर्विशेषता होती है। महानिद्रा, तम, सुषुप्तिमें सर्वदृश्यका परमात्मामें लय होता है। सुषुप्ति या प्रलयमें जिस भगवत्स्वरूपमें सर्व भोग्य एवं भोक्ताका लय होता है, वह भी विश्वशक्ति-विशिष्ट ही है। यहाँ सबीज ब्रह्ममें ही कार्य-प्रपंचका विलयन होता है। अतएव पार्थक्य भी सूक्ष्म रूपसे विद्यमान ही रहता है। क्षीर-नीरके सम्मिश्रणमें एकता-सी हो जाती है; परंतु वस्तुतः क्षीर-नीरके अवयव पृथक्-पृथक् ही रहते हैं। इसीलिये हंस उनका विवेचन कर लेता है। महासमुद्रमें नाना निर्झर-निर्झरिणी एवं महानदियोंका संगम होता है। स्थूलदर्शियोंकी दृष्टिमें यद्यपि समुद्रके साथ सबकी एकता हो जाती है; परंतु अभिज्ञ जन समझते हैं कि महासमुद्रमें सभी निर्झर और सरिताओंके जल पृथक्-पृथक् विद्यमान हैं। सर्वज्ञकल्प योगिजन एवं सर्वज्ञशिरोमणि भगवान् उन सबका विवेचन एवं पृथक्करण कर सकते हैं। ठीक इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्ड-जननी महाशक्ति- विशिष्ट भगवान्में अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड एवं तदन्तर्गत जीव तथा उनके अनन्त कर्म और सभी भोग्य प्रपंच विलीन होते हैं। अत्यन्त सूक्ष्म दशामें पहुँचनेके कारण यद्यपि जीवोंके लिये उनका विवेचन एवं पृथक्करण अशक्य है तथापि सर्वान्तरात्मा सर्वेश्वर भगवान् सभीका विवेचन एवं पृथक्करण कर सकते हैं। अनन्त ब्रह्माण्ड, अनन्त जीव एवं उनके अनन्त कर्मों तथा उनके फलोंको जानकर यथायोग्य विवेचन, नियोजन—यही परमेश्वरका विशेष कार्य है। किन-किन ब्रह्माण्डोंके, किन-किन जीवोंके, किन-किन जन्मोंके, किन-किन कर्मोंका फल किन- किन देशों एवं कालोंमें, किस तरह प्रदान करना चाहिये—यह ज्ञान कर्म एवं जीव इन दोनोंहीके लिये अशक्य है। न तो कर्म ही अपने अनन्त स्वरूपों एवं फलोंको जान सकते हैं और न जीवोंको ही अनन्त कर्म एवं तत्फलोंका ज्ञान है। यदि हो भी तो फलसम्पादनकी शक्ति नहीं है; क्योंकि परमेश्वरके सिवा सभीकी शक्तियाँ क्षुद्र ही हैं। यदि जीवको कर्म एवं उनके फलोंका ज्ञान तथा फल-सम्पादनकी शक्ति भी हो तो भी जीव अपने शुभ कर्मोंके शुभ फलोंके ही सम्पादनमें रुचि रख सकता है। अशुभ कर्म एवं तत्फलोंके सम्पादनमें उसकी कथमपि रुचि एवं प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् भगवान्के बिना अन्यत्र सर्व ब्रह्माण्डान्तर्गत सर्व जीव तथा उनके कर्म तथा फलोंका ज्ञान और कर्म-फलदानकी शक्तिका होना असम्भव है। इस तरह अविद्याकामकर्मविशिष्ट जीवका ही सुषुप्ति-अवस्थामें सबीज ब्रह्मके साथ सायुज्य (ऐक्य) होता है। ब्रह्म-सम्मिलनमें जीवको अद्भुत आनन्दकी प्राप्ति होती है; परंतु सुषुप्तिमें सावरण जीवका सावरण ब्रह्मके साथ सम्मिलन होता है, इसलिये व्यवधानका अवशेष रहता है। व्यवधानरहित ब्रह्म-सम्मिलन तो तभी हो सकता है, जब जीव स्वयं निरावरण होकर निरावरण ब्रह्मके साथ सम्मिलन प्राप्त करे। इस आवरणनिवृत्तिके लिये स्वधर्मानुष्ठान, भगवदाराधन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन, अधिष्ठानभूत भगवान्का साक्षात्कार किया जाता है। अज्ञानरूप आवरणकी निवृत्तिसे ही जीवको व्यवधान-शून्य ब्रह्मका सम्मिलन प्राप्त होता है। जिस समय श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हस्तिनापुरसे श्रीद्वारका पधारे, उस समय प्रोषितभर्तृका द्वारकास्थ श्रीकृष्णपट्टमहिषीगण प्रियतमका आगमन सुनकर प्रियसम्मिलनके लिये आसनसे एवं आशयसे उठीं—'उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात्।' (श्रीमद्भा० १।११।३१) यहाँ देशकृत व्यवधान निराकरणके लिये श्रीकृष्ण-प्रेयसीवर्गका आसनसे अभ्युत्थान हुआ। वस्तुकृत व्यवधानके निवारणके