भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 756, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 756

लिये आशयसे अभ्युत्थान है—‘आशेरते कर्मवासना यत्रासावाशयः ।’ आशय शब्दसे अन्तःकरण विवक्षित है, जो कि समस्त कर्मवासनाओंका आलय है। आशय भी पंचकोशका उपलक्षण है अर्थात् श्रीकृष्णप्रेयसी आशयोपलक्षित पंचकोश कंचुकसे समावृत स्वरूपसे प्रिय-सम्मिलनमें त्रुटि समझकर पंचकोश कंचुकसे पृथक् होकर निरावरण रूपसे प्रियतम-सम्मिलनके लिये उठीं। यहाँ पंचकोशातीत ‘त्वं’ पदलक्ष्यार्थ ही जीवका निजी शुद्ध स्वरूप है और ‘तत्’ पदलक्ष्यार्थ व्यापक महाचेतन ही उसका अंशी है। अंश और अंशीका मुख्य सम्बन्ध होता है। जैसे पृथ्वीका अंश लोष्ठ या पाषाण आदि पृथ्वीकी ओर आकर्षित होते हैं, वैसे ही परमात्माके अंश जीवोंका भी उस ओर आकर्षण होता है। जिनके मतमें चन्द्रका शतांश बृहस्पति नक्षत्र है, इस प्रकारका केवल औपचारिक अंशांशिभाव है, उनका आकर्षण भले ही न हो, पर यहाँ तो श्रीकृष्ण-प्रेयसीगण पंचकोश कंचुकसे निरावरण होकर व्यवधानशून्य प्रियतम-सम्मिलनके लिये ही आशयसे अभ्युत्थित हुईं। उन्होंने यह समझा कि जब प्रियतम-व्यवधायक आनन्दोद्रेकजन्य रोमांचकी उद्गति भी असह्य है, तब पंचकोश कंचुकका व्यवधान कैसे सह्य हो सकता है? इस तरह प्रत्यक् चैतन्यसे अभिन्न परब्रह्मके स्वरूपका साक्षात्कार होनेपर ही अज्ञान एवं तत्कार्यरूप व्यवधायक आवरणकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। निरतिशय परप्रेमास्पद प्रत्यगात्माके साथ एकता होनेसे तत्पदार्थ परमात्मामें भी निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पदता व्यक्त होती है और साक्षात् अपरोक्षता परमानन्दरूपता भी स्फुट होती है। इसके विपरीत परमात्माको प्रत्यक् भिन्न पराक् बहिरंग माननेसे स्वयंप्रकाशता, परप्रेमास्पदता तथा परमानन्दास्पदता किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती। अतः साधकको अपने भगवान्‌की पूर्णता, परमानन्दता आदि सिद्धिके लिये स्वात्मसमर्पण करना ही पड़ता है। तारतम्यशून्य अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्वकी निरतिशय बृहद् ब्रह्मरूपता अनात्मज्ञ प्रत्यगात्मासे भिन्न अन्यान्य समस्त प्रपंचोंका भगवान्‌में समर्पण करता है; परंतु प्रत्यगात्माका अस्तित्व पृथक् रखता है। आत्मज्ञ प्रियतमके सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य पूर्णताकी सिद्धिके लिये प्रत्यगात्माको भी भगवान्‌में समर्पित कर देता है। जैसे घटाकाश अपने-आपको महाकाशमें, किंवा तरंग अपने-आपको महासमुद्रमें समर्पण करता है, वैसे ही जीवात्मा अपने-आपको भगवान्‌में समर्पण कर देता है। यही ‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८।६६) आदि भगवदादेशका पालन है। ‘मामेकमद्वितीयं शरणामाश्रयं व्रज निश्चिनु । यथा घटाकाशस्याश्रयो महाकाशः तरङ्गस्याश्रयो महासमुद्रः ॥’ यही निर्विकार अद्वैत चिदात्मा परम तात्त्विक है। इससे भिन्न समस्त नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंच अतात्त्विक असत् है, अतएव गीताने (अध्याय १८) देहात्मज्ञान, भेदज्ञान, ऐकात्म्यज्ञान इत्यादि भेदसे तामस, राजस, सात्त्विक विविध ज्ञानका वर्णन किया है— सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ (गीता १८।२०) जिस शास्त्र तथा आचार्यद्वारा उपदिष्ट ज्ञानसे परस्पर विभक्त समस्त भूतोंमें एक त्रिकालाबाध्य, अव्यय, अधिष्ठानस्वरूप परमात्माका दर्शन होता है, वही सात्त्विक ज्ञान है। जैसे कटक, मुकुट, कुण्डलादि नाना नामरूपवाले अलंकारोंमें सुवर्ण, किंवा सर्प, धारा, माला आदि विकल्पोंमें अधिष्ठान रज्जुखण्ड ही विद्यमान है, वैसे ही अत्यन्त विषम प्रपंचमें अधिष्ठानरूपसे एक स्वप्रकाश सदानन्द परमात्मा विराजमान है। यही अद्वैत ब्रह्मवाद गीतोक्त सात्त्विक ज्ञान है। यही ‘ब्रह्मैवेदं सर्वं, आत्मैवेदं सर्वं’ (नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषत् ७) इत्यादि श्रुतियोंमें कहा गया है। ‘पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्