भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तरससार ७४७ पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि गुण-विशिष्ट परमात्मा, सर्वथा सान्निध्य होनेपर अनन्त राजसम्॥' (गीता १८।२१) जिस भिन्न-भिन्न कल्याण-गुणगण-विशिष्ट भगवान्के रूपमें तत्त्वका पदार्थविषयक ज्ञानसे पृथक् प्रकारके नाना भाव जाने उपलम्भ होता है। इन्हीं लोगोंमें ही मनमानी कल्पना जाते हैं, वह राजस ज्ञान है। करनेवाले कुछ लोग श्रीकृष्णको आदित्यस्थानीय यह भेद-ज्ञान गीतोक्त राजस ज्ञान है। 'सर्वं और ब्रह्मको प्रकाशस्थानीय मानते हैं। कुछ श्रीवृषभानु- परस्परं भिन्नम्' यह ज्ञान श्रुतिमें कहीं भी प्रतिपादित किशोरीके नख-मणि-प्रकाश या नूपुर-प्रकाशको ही नहीं है। औपनिषद परब्रह्म कहते हैं; परंतु वैदिकोंकी दृष्टिमें यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम्। तो वेदोंका महान् तात्पर्य ब्रह्ममें ही है और वही सब अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ तरहसे सर्वोत्कृष्ट है। (गीता १८।२२) संकोचका कारण न होनेसे वृद्ध्यर्थक 'बृहि' देहादि कार्यमें ही आसक्त अतत्त्वार्थविषयक धातुसे निष्पन्न 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ निरतिशय बृहत्तम ज्ञान तामस ज्ञान होता है। तत्त्व होता है। जो देश-काल-वस्तु परिच्छेदवाला श्रीमद्भागवतमें भी सजातीय, विजातीय, हो, वह तो परिच्छिन्न होनेके कारण क्षुद्र ही है, स्वगतभेदरहित, स्वप्रकाश, नित्य-विज्ञानको ही तत्त्व निरतिशय बृहत् नहीं। यदि जड़ हो तो भी दृश्य कहा है— होनेसे अल्प और मर्त्य होगा। अतः अनन्त स्वप्रकाश वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। सदानन्द तत्त्व ही 'ब्रह्म' पदका अर्थ होता है और ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ वही भूमा अमृत है। उससे भिन्न सभीको अल्प (श्रीमद्भा० १।२।११) और मर्त्य ही समझना चाहिये। फिर अनन्त पदके अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वविद् लोग तत्त्व कहते हैं, साथ पठित 'ब्रह्म' शब्दका तो सुतरां यही अर्थ है। उसीको ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् कहा जाता है। उसमें अतिशयताकी कल्पना निर्मूल है। किसी राजाने कुछ लोगोंका कहना है कि यहाँ ब्रह्मसे परमात्मामें ऐसी कहानी सुनना चाहा कि जिसका अन्त ही न और उससे भगवान्में उत्कर्ष विवक्षित है। यदुकुलभूषण हो। एक चतुरने सुनाना प्रारम्भ किया—राजन्! एक श्रीकृष्णकी सभामें बैठे हुए यादवोंने आकाश-मार्गसे वृक्ष था, उसकी अनन्त शाखाएँ थीं, उन शाखाओंमें आते हुए देवर्षि श्रीनारदजीको प्रथम केवल तेजःपुंज अनन्त उपशाखाएँ थीं, उपशाखाओंमें भी अनन्त ही समझा। कुछ समीप आनेपर कोई देहधारी समझा पल्लव थे और उनपर अनन्त पक्षी बैठे थे। कुछ और अधिक समीप होनेपर पुरुष एवं सर्वथा सान्निध्यमें कालमें एक पक्षी उड़ा 'फुर्र'। श्रीनारद समझा। राजाने कहा—आगे कहिये, इसपर उसने कहा— चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा 'दूसरा उड़ा फुर्र'। ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। तब राजाने कहा—और आगे कहिये। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति तब उस चतुरने कहा कि पहले पक्षियोंका क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ उड़ना पूरा हो, तब आगे बढ़ूँ। यहाँ एक-एक (शिशुपालवध १।२) पक्षीका उड़ना समाप्त ही नहीं हो सकता। इसी ठीक उसी तरह तत्त्वसे अति दूर स्थित तरह कल्पनाओंका अन्त ही नहीं है। अतः एक अधिकारीको प्रथम केवल चिन्मात्र ब्रह्मका बोध शब्दमें यही कहा जाता है कि अतिशयताकी कल्पना होता है, कुछ सामीप्य होनेपर योगियोंको कतिपय करते-करते वाचस्पति तथा प्रजापतिकी भी मति