भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 758

७४८ भक्तिसुधा जब विरत हो जाय और जिससे आगे कभी भी कोई कल्पना कर ही न सके, तब उसी अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश, परमानन्दघन भगवान्‌को वेदान्ती ब्रह्म कहते हैं। उसीका 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि व्याससूत्रोंसे विचार किया गया है। खद्योतादिके प्रकाशकी अपेक्षा आदित्यमें जिस अतिशयताकी कल्पना की जाती है, उससे भी अनन्तकोटि-गुणित अतिशयताकी कल्पनाके पश्चात् जिस अन्तिम निरतिशय सर्व बृहत् पदार्थकी सिद्धि हो, उसमें भी देश-काल-वस्तुके परिच्छेदोंको मिटाकर, परिच्छिन्न या एकदेशिता आदि दूषणोंका अत्यन्ताभाव सम्पादन करके, तब उसे ब्रह्म शब्दका अर्थ जानना चाहिये। इसीको 'तत्त्व' कहा जाता है। इसका ही लक्षण है—'तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।' (श्रीमद्भा० १।२।११) इसीका नाम ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् है। लक्षणके भेदसे लक्ष्य-भेद हो सकता है, नाम- भेदसे नहीं। जैसे कम्बुग्रीवादिमत्त्व घटका एक लक्षण है। अतएव घट-कुम्भ-कलशादि नामसे उसका भेद नहीं है। हाँ, ब्रह्म अनेक हैं—कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म, कार्यकारणातीतब्रह्म। ऐसी स्थितिमें यह हो सकता है कि कार्यकारणातीत वेदान्तवेद्य शुद्ध-ब्रह्मरूप भगवान्‌के प्रकाशस्थानमें कार्यब्रह्म या कारणब्रह्म हो। प्रायः यह भी कहा जाता है कि निर्गुण ब्रह्म भगवान्‌का धाम है। यद्यपि धामका अर्थ ऐसे स्थलोंमें स्वरूपभूत आत्मज्योतिका ही बोधक होता है—'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।' (गीता १०।१२) हे नाथ! आप परमात्मा हैं, परम प्रकाश परम ज्योति और परम पवित्र हैं तथापि कुछ अविवेकियोंकी यही अटल धारणा है कि धामके माने निवासस्थान ही होता है। अस्तु, वे लोग अव्यक्तरूप कारण-ब्रह्मको ही वेदान्तवेद्य ब्रह्म मान बैठते हैं। कार्यकारणातीत तत्त्वतक उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। इस कारण यदि ब्रह्मको धाम भी मान लें तो भी सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पड़ती। यह भेद वेदान्तियोंको इष्ट ही है कि स्थूल कार्यब्रह्मके ऊपर सूक्ष्म कार्यरूप ब्रह्म, उसके ऊपर कारणब्रह्म और इस अव्यक्त कारणब्रह्मके ऊपर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म स्थित है। यह अन्तिम तत्त्व ही अद्वितीय अनन्त शुद्ध बोधरूप है। इसका ही विवर्त समस्त चराचर प्रपंच है। यदि सर्वाधिष्ठान होनेके कारण इसे सर्वधाम, सर्वनिवास-स्थान भी कहें तो भी कोई हानि नहीं। इसी अंशका स्पष्टीकरण भागवतके इन श्लोकोंमें किया गया है*— (क) ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम्। अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा॥ (श्रीमद्भा० ३।३२।२८) (ख) विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम्। सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम्॥ (श्रीमद्भा० २।६।३९) (ग) ज्ञानमात्रं परं ब्रह्म परमात्मेश्वरः पुमान्। दृश्यादिभिः पृथग्भावैर्भगवानेक ईयते॥ (श्रीमद्भा० ३।३२।२६) एक अद्वितीय नित्य बोध ही भ्रान्त जनोंको अविद्याप्रत्युपस्थापित बहिर्मुख इन्द्रियों तथा मन-बुद्धि आदिद्वारा शब्दादिधर्मक प्रपंचरूपसे भासित होता है।

  • (क) ब्रह्म एक है, ज्ञानस्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्य-वृत्तियोंवाली इन्द्रियोंके द्वारा भ्रान्तिवश शब्दादि धर्मोंवाले विभिन्न पदार्थोंके रूपमें भास रहा है। (ख) वे मायाके लेशसे रहित, केवल ज्ञानस्वरूप हैं और अन्तरात्माके रूपमें एकरस स्थित हैं। वे तीनों कालमें सत्य एवं परिपूर्ण हैं; न उनका आदि है न अन्त। वे तीनों गुणोंसे रहित, सनातन एवं अद्वितीय हैं। (ग) वही ज्ञानस्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है।