भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७४९ सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै विवादसंवादभुवो भवन्ति। कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ (श्रीमद्भा० ६।४।३१) महेश्वरकी महाशक्ति और उसकी अद्भुत चमत्कृति यह बात विदितवेदितव्य महानुभावोंसे तिरोहित नहीं है कि अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डगत विविधवैचित्र्योपेत, भोग्यभोक्तृकर्तृकरणादिनिर्माणपटीयसी, अचिन्त्या- निर्वाच्यकार्यानुमेयस्वानुरूपरूपा, श्रुतिसमधिगम्य-यथा- तथ्यभावा, अवान्तरानन्तशक्ति-केन्द्रभूता महाशक्ति जिन प्रत्यस्तमिताशेषविशेषमनोवचनातीत प्रज्ञाना- नन्दघन स्वमहिमप्रतिष्ठ भगवान्‌के आश्रित होकर उन्हींकी महिमासे सत्ता स्फूर्ति प्राप्त करके सावधानीसे जगन्नाट्यनियन्त्री होती हुई भी प्रभुकी भ्रुकुटि- विलासानुविधायिनी होती है, उन सकल कल्याणगुण- गणप्रत्यनीक-निखिल-कल्याण-गुण-गण-निलय, अचिन्त्यानन्तसौन्दर्यमाधुर्यसुधासिन्धु नटनागरमें समस्त परस्पर-विरुद्ध धर्मोंका सामंजस्य होते हुए भी स्वमति-प्रभव-तर्क एवं स्वाभिमत-शास्त्र तदर्थ विवेचनादिद्वारा नाना प्रकारका विकल्प कुछ कालसे ही नहीं, वरन् अनादिकालसे करते हुए परीक्षक- दार्शनिक-वृन्द श्रवणया दृष्टिगोचर होते आये हैं। वैदिक तथा अवैदिक दर्शनप्रभेद उन दार्शनिकोंके पारस्परिक अनेक प्रभेद होते हुए भी भारतीय भाषामें वैदिक तथा अवैदिक शब्दसे निर्देश किया जाता है। वेद-तन्मूलशास्त्रानपेक्ष- व्यक्तिविशेषनिर्मित शास्त्र एवं स्वमतिप्रभव तर्कादि- द्वारा तत्त्वोंको निर्धारण करनेवाले अवैदिक कहलाते हैं। तद्विपरीत भ्रमप्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटवादि पुरुष स्वभावसुलभदोषसंसर्गरहित अपौरुषेय वेद तन्मूल- शास्त्र तथा तत्संस्कार-संस्कृत प्रज्ञातन्त्र तत्त्व निर्धारण एवं तत्प्राप्त्यर्थ प्रयत्न करनेवाले वैदिक कहलाते हैं। यद्यपि 'भूतं भव्यं च सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति' इस अभियुक्तोक्तिसे तथा सूत्ररूपसे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमयाद्यात्मवाद, शून्यवाद इत्यादि वेदोंमें पाये जाते हैं तथापि न तो वे वाद सर्वथा सिद्धान्तरूपसे वेदोंमें माने ही गये हैं और न तत्तद्वादाभिमानी अपने वादोंके वैदिकत्वमें आग्रह करते या गौरव ही मानते हैं। अतः उनके वैदिकत्वावैदिकत्वमें कोई विवाद नहीं। वैदिक सिद्धान्तियोंका भी जबकि अंशभेदमें प्राधान्याप्राधान्य-भावसे वैमत्य ही नहीं, प्रत्युत बाह्योंसे भी अधिक पारस्परिक संघर्ष है, तब एक श्रृंखला- सम्बन्धशून्य परस्पर स्वतन्त्र विचारपद्धतिको समाश्रयण करनेवालोंमें मतभेद तथा संघर्ष होना स्वाभाविक ही है; परंतु इतना होनेपर भी क्या सभी सिद्धान्त सर्वांशमें नितान्त भ्रममूलक तथा अनिष्टप्रद हैं अथवा सर्वांशमें सभी प्रमामूलक एवं पुरुषार्थप्रद हैं, यह बात कोई भी बतलानेका साहस नहीं करता। यह सत्य है कि स्वसिद्धान्तातिरिक्त सभी प्रायः भ्रममूलक एवं परमपुरुषार्थसे च्युतिके हेतु हैं। ऐसे स्वगोष्ठीसिद्धसिद्धान्ताभिमानी आज भी कम नहीं हैं। एक वस्तु-विषयक प्रमाज्ञान एक ही होता है, नानाज्ञान अयथार्थ होते हैं। एक वस्तु-विषयक अनेक प्रतिपत्तियाँ अवश्य ही प्राणियोंको भ्रममें छोड़ती हैं। चार्वाकमत-प्रतिपादन चार्वाकोंका कहना है कि जबतक जीये सुख- पूर्वक जीये। देहके भस्म हो जानेपर कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता। इनके मतमें नीति और काम- शास्त्रके अनुसार अर्थ और काम—ये दो ही पुरुषार्थ हैं। अन्य कोई पारलौकिक धर्म या मोक्ष नामका कोई पुरुषार्थ नहीं है। पृथिवी, जल, तेज, वायु—ये चार ही भूत हैं। ये ही जब देहके आकारमें परिणत होते हैं, तब उनसे चैतन्यशक्ति उसी तरह उत्पन्न हो जाती है, जैसे अन्न-कण आदिसे मादक शक्ति उत्पन्न होती है, किंवा हरिद्रा और चूनासे एक तीसरा लाल रंग पैदा हो जाता है। अतएव देहके

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