भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 760

७५० भक्तिसुधा नाशेसे उस चैतन्यका नाश हो जाता है। इसलिये चैतन्यविशिष्ट देह ही आत्मा है। प्रत्यक्ष प्रमाणसे अतिरिक्त अनुमान, आगम आदि प्रमाणोंकी इस मतमें मान्यता नहीं है। कामिनी-परिरम्भणजन्य सुख ही स्वर्ग है, कण्टकादि-व्यथा-जन्य दुःख ही नरक है। लोकसिद्ध राजा ही परमेश्वर है, देहका नाश ही मुक्ति है। 'मैं स्थूल हूँ, कृश हूँ' इस अनुभवसे स्पष्ट है कि देह ही आत्मा है। 'मेरा देह है' यह अनुभव 'राहोः शिरः' के समान औपचारिक है। बौद्धमतविवेचन इसपर बौद्धोंका कहना है कि बिना अनुमान- प्रमाणको स्वीकार किये काम नहीं चल सकता। पशुकी भी प्रवृत्ति-निवृत्ति बिना अनुमानकी नहीं होती। हाथमें हरी घास लिये पुरुषको देखकर पशुकी उस ओर प्रवृत्ति और दण्डोद्यतकर पुरुषको देखकर उस ओरसे निवृत्ति होती है। यह सब इष्ट-अनिष्टका हेतु समझे बिना नहीं हो सकता। इसके सिवा अनुमान प्रमाण नहीं है। यह वचनप्रयोग भी वहीं सार्थक है, जहाँ अनुमान प्रमाण है, ऐसा अज्ञान सन्देह या भ्रम हो, कारण, इन्हींकी (अज्ञानादिकी) निवृत्तिके लिये वाक्यप्रयोगकी आवश्यकता होती है; परंतु दूसरेके अज्ञान, सन्देह, भ्रम आदिका निश्चय दूसरेको प्रत्यक्ष नहीं, अतः आकृति आदिसे उनका अनुमान या वचन प्रमाणसे निर्णय करना होगा। यह सब बिना किये यदि जिस किसीके प्रति अनुमान प्रमाण नहीं है, ऐसा कहने लग जायें तो एक तरहका उन्माद ही समझा जायगा। अनुमानसे स्पष्ट ही विदित होता है कि अचेतन देहसे भिन्न आत्मा है। बौद्धमतप्रभेद मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत् योगाचारमते तु सन्ति मतयस्तासां विवर्तोऽखिलः। अर्थोऽस्ति क्षणिकस्त्वसावनुमिती बुद्धयेति सौत्रान्तिकः प्रत्यक्षं क्षणभङ्गुरं च सकलं वैभाषिको भासते॥ मुख्य माध्यमिक शून्यवादीके मतमें जगत्‌की सत्ता प्रातिभासिक है और शून्यकी सत्ता पारमार्थिक है। सम्पूर्ण जगत् शून्यका विवर्त है। योगाचार विज्ञानवादियोंके मतमें सम्पूर्ण जगत् चित्तसंज्ञक विज्ञानका विवर्त है। चित्रपटपर चित्रित, दर्पणमें प्रतिफलित दृश्यानुभूतिसे बाह्यार्थकी अनुमिति होती है। ऐसा सौत्रान्तिकोंका पक्ष है। बाह्यार्थ क्षणभंगुर किंतु प्रत्यक्ष हैं, ऐसा वैभाषिक मानते हैं। इन बौद्धोंमें चार भेद हैं—माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक। उनका कहना है कि जो सत् है, वह क्षणिक है, जैसे दीपशिखा या बादलोंका समूह। अर्थक्रियाकारिता ही पदार्थोंका सत्त्व है, वह सबमें है। अतः क्षणिकत्व भी सबमें है। उनके मतमें बुद्ध ही देव हैं और समस्त विश्व क्षणभंगुर है। वैभाषिकके मतमें बाह्य शब्दादि अर्थ और आन्तर ज्ञान दोनों ही प्रत्यक्ष ग्राह्य हैं। परंतु सौत्रान्तिक आन्तर अर्थात् ज्ञानको ही प्रत्यक्ष और बाह्य अर्थको अनुमेय मानता है। उसका कहना है कि एकाकार ज्ञानमें शब्द-ज्ञान, स्पर्श- ज्ञान, रूप-ज्ञान इस तरह जो अनेक विलक्षणताओंकी प्रतीति होती है, वह बिना बाह्य अर्थके नहीं बन सकती। अतः ज्ञानकी विलक्षणताके उपपादकरूपसे बाह्य अर्थोंका अस्तित्व अनुमानगम्य है। योगाचार सविकल्प-बुद्धिको ही तत्त्व मानता है। वह बाह्य अर्थका अस्तित्व नहीं स्वीकार करता। माध्यमिक सर्वशून्य ही मानता है। कहा जाता है कि बुद्धदेवका परम तात्पर्य सर्वशून्यतामें ही था। विज्ञानवादी प्रवृत्तिविज्ञान (नीलादिज्ञान)-को मिटाकर आलयविज्ञानधारा 'अहं-अहं' इत्याकारकको ही मुक्ति मानता है। जैनमतनिरूपण इसपर जैनोंका कहना है कि बिना किसी स्थायी आत्माको स्वीकार किये ऐहलौकिक-पारलौकिक फल साधनोंका सम्पादन व्यर्थ है। यदि आत्मा क्षणिक ही है तो कर्मकालमें आत्मा अन्य और भोगकालमें अन्य ही हुआ। परंतु यह कथमपि संगत नहीं,