भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 761

विज्ञानधारामें तो कार्य-कारणभाव Line 12: है; परंतु दूसरी विज्ञानधाराके साथ दूसरी विज्ञानधाराका Line 13: कार्य-कारणभाव नहीं है। जैसे कर्षित भूमिमें बोये Line 14: हुए मधुर रससे भावित आम्र-बीजोंकी मधुरिमा Line 15: अंकुर, काण्ड, स्कन्ध, शाखा, पल्लवादिद्वारा फलमें Line 16: भी पहुँचती है, जैसे लाक्षारससे सींचे हुए कार्पास- Line 17: बीजोंकी रक्तता अंकुरादि परम्परासे कपासमें पहुँचती Line 18: है, वैसे ही जिस विज्ञान-सन्तानमें कर्म और कर्म- Line 19: वासना आहित होती है, उसीमें फल भी होता है। Line 20: यह भी ठीक नहीं है। कारण दोनों ही Line 21: दृष्टान्तोंमें बीजोंका निरन्वय नाश नहीं होता है; Line 22: किंतु बीजके ही सूक्ष्म अवयव भिन्न-भिन्न भावनासे Line 23: भावित होकर फलादिरूपमें पूर्ण विकसित होते हैं; Line 24: परंतु क्षणिकवादीके मतसे तो विज्ञानका निरन्वय Line 25: नाश होता है। इसके सिवा जैसे पिपीलिकाओंसे Line 26: भिन्न होकर उनकी पङ्क्ति नामकी कोई वस्तु नहीं Line