भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(जुगनू) प्रकाश-अप्रकाश उभयरूप होता है, वैसे ही आत्मा चेतन-अचेतन उभयात्मक है। वेद-विहित कर्मोंके द्वारा वह शुभ सुखज्ञान-रूपसे परिणामी होता है। वेदप्रतिषिद्ध कर्मोंद्वारा दुःखादिज्ञानाकारसे परिणत होता है। उनके मतमें वेद अनादि, अपौरुषेय, अतएव स्वतःप्रमाण हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमानके अतिरिक्त अर्थापत्ति, अनुपलब्धि प्रमाणद्वारा भी पदार्थोंका निर्णय किया जाता है। वेदान्तमतप्रभेदप्रतिपादन उत्तर-मीमांसकोंमें तो बहुत मतभेद है; क्योंकि प्रायः भारतीयोंका अधिक तत्त्वान्वेषी समाज उसमें आदर रखता है। इसीसे शाक्तागम, शैवागम, वैष्णवागम, सौरागम, गणपत्यागमपन्थानूयायियोंकी दृष्टिमें अपने आगमोंका प्राधान्य होते हुए भी महर्षि बादरायण- प्रणीत वैदिक-तात्पर्य-निर्णायक चतुर्लक्षणी उत्तर- मीमांसासे अनुमत स्वसिद्धान्त होनेसे गौरव मानना उनके लिये अनिवार्य हो गया। इसीलिये अनेक महानुभावोंने उसे अपनाया और उसपर स्वाभिमत भाष्य टीका-टिप्पणियाँ कीं। एक ही शास्त्रमें नहीं, एक ही सूत्रमें सहस्रों भावपूर्ण गम्भीर व्याख्यान हों ! क्या उस शास्त्र-सूत्र-निर्माता या सदाचारभूत वेदभगवान्की महत्ता साधारण बुद्धिके बाह्यका विषय नहीं है? अस्तु, उत्तर-मीमांसा- भाष्यकारोंका अतिसंक्षिप्त प्रधान विषय दिखलाते हैं। श्रीमाध्वमतनिरूपण द्वैतवादी प्रकृति, पुरुष तथा परमेश्वर इत्यादि श्रुति-सूत्र-प्रतिपाद्य विषय मानते हैं। उनके मतमें अद्वैतप्रतिपादक श्रुतिसूत्र प्रथम तो हैं ही नहीं, यदि हैं तो भी वे गौणार्थक हैं अर्थात् उनका स्वार्थमें कुछ तात्पर्य नहीं है। ध्यानमें रखना चाहिये कि पूर्व-मीमांसकसे लेकर उत्तरोत्तर सभी सिद्धान्तियोंका 'प्रमाणं परमं श्रुतिः' परमप्रमाण श्रुति है—ऐसा उद्घोष है। श्रीरामानुजमतनिरूपण विशिष्टाद्वैतवादियोंका कहना है कि अद्वैत नहीं है, यह कहना केवल धृष्टता है। जबकि अद्वैतवादिनी श्रुति विद्यमान हैं, तब उनका तात्पर्य अद्वैतमें नहीं है—यह भी कैसे कहा जा सकता है ? अतः चित्-अचित् उभयविशेषण-विशिष्ट परमतत्त्व अद्वितीय है और वही जगत्का निमित्त तथा उपादान दोनोंही कारण है, केवल निमित्त ही नहीं। 'नीलमुत्पलम्' तथा शरीर-शरीरीके समान विशेषण-विशेष्यका पारस्परिक भेद होते हुए भी अभेद या अद्वैत सूपपन्न है। इस पक्षमें भेदवादिनी तथा अभेदवादिनी दोनों ही प्रकारकी श्रुतियोंका सामंजस्य हो जायगा। श्रीनिम्बार्कमतनिरूपण इस सिद्धान्तके अनन्तर द्वैताद्वैतवादी कहते हैं कि विशिष्टाद्वैत भी ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्षमें विशेषण-विशेष्यका वस्तुतः भेद ही मानते हो, तब अद्वैत कैसे हो सकता है? विशिष्टाद्वैत केवल प्रयोग-चातुर्य है। अतः इस पक्षमें भी अद्वैतवादिनी श्रुतियाँ निरालम्बन ही रह जाती हैं। इस वास्ते चिदचिद्भिन्नाभिन्न परमतत्त्व जगत्का उपादान तथा निमित्त कारण है और वही श्रुति-सूत्रके तात्पर्यका विषय है। जैसे 'सुवर्णं कुण्डलं' ऐसे प्रयोग तथा विचारसे भी सुवर्ण स्वरूप ही कुण्डल है। इस वास्ते सुवर्ण कुण्डलका अभेद एवं सुवर्ण जाननेपर भी 'किमिदम्' ऐसी कुण्डलविषयिणी जिज्ञासा होती है, इसीलिये दोनोंका भेद भी है। पयोव्रती दधि नहीं भक्षण करता, दधिव्रती पयसे बचता है; गोरसव्रती दोनोंका ही भक्षण करता है। इस तरह गोरसत्वेन अभेद होनेपर भी पयस्त्वेन और दधित्वेन व्यवहारपार्थक्यसे भेद होता है। 'तदधीनस्थितिप्रवृत्तिमत्त्वेन' अर्थात् सुवर्णादि कारणके अधीन ही कार्यकी स्थिति एवं प्रवृत्ति होती है। अतः अभेद भी है। ठीक ऐसे ही चित् भोक्तृ-वर्ग, परमतत्त्वके अधीन ही स्थिति प्रवृत्तिवाले हैं। अतः परमतत्त्वसे अभिन्न हैं; व्यवहारमें विरुद्ध धर्म देखनेमें आता है, अतः भिन्न हैं। इस वास्ते चिद-