भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 763

सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७५३ चिद्भिनाभिन्न परमतत्त्वमें शास्त्रोंका अभिप्राय है। श्रीवल्लभमतविवेचन शुद्धाद्वैतवादी इतनेपर भी सन्तुष्ट नहीं होते! उनका कहना है कि परमतत्त्वसे पृथक् चित्-अचित् किसी तरहसे हैं, तभी आप 'तदधीनस्थिति- प्रवृत्तिमत्त्वेन' इस उपाधिसे अभेद मानते हैं। वस्तुतः विशिष्टाद्वैतवादियोंके समान आपके यहाँ भी अद्वैतवादिनी श्रुति सम्यक् स्वार्थपर्यवसायिनी नहीं होती। इस पक्षमें भेदवादिनी तथा अभेदवादिनी दोनों प्रकारकी श्रुतियाँ अबाधित रहेंगी। भेदाभेदका परस्पर विरोध होनेसे एकत्र सामंजस्य होना भी असम्भव है। परमात्मासे व्यतिरिक्त तत्त्व माननेसे, तत्त्वमें परिच्छेद होनेसे 'निरतिशय पूर्णता' भी बाधित होगी। इस वास्ते विशिष्टत्व-भिन्नत्वादि- शून्य शुद्धसच्चिदानन्द परमात्मा ही श्रुति-सर्वस्व है। इस पक्षमें 'एकोऽहं (बहु स्याम्)' (छान्दोग्य० ६।२।३) इत्यादि श्रुतिशतसिद्ध एकतत्त्वका ही बहुभवन अघटित-घटना-पटीयान् आत्मयोगकी महिमासे सम्यक् सूपपन्न हो जायगा। परमेश्वर समस्त विरुद्ध धर्मोंका आश्रय है। अतः अणोरणीयस्त्व, महतोमहीयस्त्व, सर्वधारकत्व, सर्वसंसर्गरहित्य, स्वाभिन्न सुख-दुःख-मोहात्मक-प्रपंचनिर्मातृत्व, अविकृतपरिणामित्व भी होनेमें कोई आपत्ति नहीं। स्वरूपाभिन्नविचित्र आत्मवैभव ही सर्वसमाधानमें पर्याप्त है; सदंशाश्रित सन्धिनीशक्ति, चिदंशाश्रित संविच्छक्ति, आनन्दाश्रित आह्लादिनी शक्तिके सम्बन्धसे सदादि अंशोंका ही प्रकृति-प्राकृत तथा पक्षत्रयानुमोदित अणुपरिमाणचित्-कणस्वरूप भोक्तृवर्ग एवं ज्ञान आनन्दके प्राधान्याप्राधान्यसे अन्तर्यामी श्रीकृष्ण आदि रूपमें अविकृत परिणाम निर्दुष्ट होनेसे सर्वव्यवहार भी समंजस है। इस पक्षमें कारणांशको लेकर अद्वैतवादिनी और सप्रपंचको लेकर द्वैतवादिनी श्रुतियाँ भी ठीक लग जायँगी। शैवादि विविधमतविवेचन इसी तरह शैवों तथा पाशुपतोंने भी उत्तर-मीमांसापर भाष्य किया है। द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि अंशोंमें वैष्णव भाष्यकारों और शैव भाष्यकारोंमें भेद नहीं है। प्रत्युत सबका यह दावा है कि यह वाद मुख्य रूपसे हमारे ही हैं, दूसरोंने इन्हें चुराया है। वैष्णवमतानुयायियोंका कहना है कि शैव भाष्यकारने वैष्णव विशिष्टाद्वैतको चुराकर अपना रूप-रंग देकर व्यक्त किया है। शैव मतानुयायियोंका कहना है कि वैष्णव विशिष्टाद्वैतियोंने ही शैवविशिष्टाद्वैतियोंके मतको चुराया है। वैष्णव 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (ब्रह्मसूत्र १) इस सूत्रके ब्रह्म पदका विष्णु अर्थ करते हैं, शैव शिव अर्थ करते हैं। वैष्णवोंमें भी परस्पर विवाद है। कोई ब्रह्म शब्दमें श्रीमन्नारायण, कोई रामचन्द्र, कोई श्रीकृष्ण, कुछ लोग श्रीकृष्णके भी द्वारकास्थ, मथुरास्थ, व्रजस्थ, वृन्दावनस्थ, निकुंजस्थ स्वरूपोंमें मतभेद उठाते हैं। शाक्ताद्वैतवादी अनन्त, अखण्ड, प्रकाशात्मक शिव और उसकी स्वभावभूता, उससे अत्यन्त अभिन्न विमर्शशक्तिको शक्ति कहते हैं। वही शक्ति बाह्योन्मुख होकर प्रपंच-व्यंजिका होती है। अन्तर्मुख होकर केवल शिवस्वरूपा ही होती है। इसके बाद अद्वैतवादियोंका कहना है कि आपका भी कहना ठीक है; परंतु पूर्वोक्त सिद्धान्तियोंका भी कहना निर्मूल नहीं। 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५।१५), 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इत्यादि वचनोंसे वेदोंका परम तात्पर्य 'एकमेवाद्वितीयम्' (छान्दोग्य० २।६।२२) इत्यादि श्रुतिसहस्रसिद्ध सजातीय-विजातीय-स्वगत- भेदशून्य, पूर्णप्रज्ञानानन्दघन परमात्मामें ही है। अवान्तर तात्पर्य पारमार्थिक सत्तासे कुछ न्यून सत्तावाले अर्थात् अपरिच्छिन्न पूर्ण परमतत्त्वकी परमार्थ सत्यतासे न्यून सत्तावाले अघटितघटना- पटीयसी अचिन्त्यानिर्व्वाच्य भगवदीय शक्ति एवं तदीयविकास-विविधवैचित्र्योपेत, विश्वजनीनानुभव- निवेदित विश्व-व्यवहारोपयुक्त सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्ध