भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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७५४ भक्तिसुधा


[स्तम्भ १]

पदार्थोंमें भी है। अघटितघटनापटीयान् आत्मवैभव हम भी मानते हैं, पर उसे अनिर्वाच्य स्वभाव और मानना चाहिये ? क्योंकि यदि उसे परमात्मतत्त्वसे व्यतिरिक्त परमार्थ सत्य मानें तो अद्वैतप्रतिपादक श्रुतियाँ विरुद्ध होती हैं। असत् खपुष्पादिवत् मानें तो प्रपंचनिर्माणपटीयस्त्व नहीं बनता। परमार्थसत् परंतु परमतत्त्वसे अत्यन्त अभिन्न मानें तो तद्वत् ही अविकारी कूटस्थ होनेसे उसमें सुख-दुःख-मोहात्मक प्रपंचकी हेतुता नहीं बनती। भेदाभेद सत्त्वासत्त्व विकृतत्वाविकृतत्व समान सत्तासे एक जगह हो नहीं सकते। अन्यथा विरोधमात्र ही दत्तांजलि हो जायगा। यदि श्रुतिप्रामाण्यात् ऐसा मानें सो भी नहीं; क्योंकि शास्त्र अज्ञात-ज्ञापक होते हैं; न कि अकृतकर्तृ। अर्थात् जो वस्तु जैसी है, शास्त्र उसके स्वरूपको वैसा ही बतलाते हैं। वस्तु-स्वभावको अन्यथा नहीं करते। इस वास्ते जैसे पट अन्वय- व्यतिरेकादि युक्ति तथा वाचारम्भणादि श्रुतियोंके विचारसे तन्तु-व्यतिरिक्त नहीं होता; अपितु आतानवितानात्मक तन्तु ही पट है तथापि अंगप्रावरण, शीतापनयनादि कार्य तन्तुओंसे नहीं होता, किंतु पटसे ही होता है। अतः विलक्षण अर्थ-क्रिया-निर्वाहक होनेसे सर्वथा अभिन्न भी नहीं कह सकते। ठीक वैसे ही 'अघटित- घटनापटीयान्' आत्मयोग भी परमतत्त्वापेक्षया न्यून- सत्ताक अनिर्वाच्य मानना चाहिये। ऐसा माननेमें विषम सत्ता होनेसे द्वैताद्वैतका विरोध भी नहीं होगा। क्योंकि समान सत्तावाले भावाभावोंका ही परस्पर विरोध होता है; न कि विषम सत्तावालोंका भी। व्यावहारिक सत्ताके रूप्याभाववान् शुक्तितत्त्वमें प्रातिभासिक सत्तासे रूप्यभाव होनेमें कोई आपत्ति नहीं। तद्वत् परमार्थ सत्तासे अद्वैत तदपेक्षया न्यून अर्थात् व्यावहारिक सत्तासे द्वैत होनेमें कोई विरोध नहीं। इस पक्षमें व्यावहारिक अर्थात् व्यवहारकालमें आकाशादिवत् अबाध्यक्रियादिनिर्वाहक सत्यतासम्पन्न द्वैतको लेकर समस्त लौकिक-वैदिक व्यवहार तथा अद्वैतवादिनी श्रुतियोंका अवान्तर तात्पर्यके विषयभूत


[स्तम्भ २]

द्वैतमें सामंजस्य भी पूर्वोक्त सिद्धान्तियोंके अनुसार सम्पन्न होगा तथा त्रिकालाबाध्य व्यवहारातीत परमार्थ सत्य स्वप्रकाशात्मक परमतत्त्वके अभिप्रायसे अद्वैतवादिनी श्रुति ही नहीं, अपितु समस्त श्रुतियाँ भी अपने महातात्पर्यके विषयभूत अनन्तानन्दात्मक तत्त्वमें पर्यवसित हो जायँगी। इन सिद्धान्तोंके सिवा स्वाभाविक भेदाभेद, सोपाधिक भेदाभेद, चिदचिद्विभक्ताद्वैत आदि अनेक सिद्धान्त हैं; परंतु प्रायः उक्त मतोंसे मिलते-जुलते या गतार्थ हो जाते हैं। इनमें वैसे तो प्रायः परस्पर सभी अन्योन्यका खण्डन तथा स्वमतमण्डन करते हैं; परंतु कुछ तो सिद्धान्तमात्रमें विवाद करते हुए भी स्वाभिमत तत्त्वप्राप्त्यर्थ ही प्रयत्न करते हैं; इस वास्ते उनके यहाँ अधिक संघर्ष नहीं प्रवेश करने पाता; परंतु कुछ लोगोंकी तो सिद्धान्त या स्वाभिमत तत्त्वप्राप्त्यर्थ प्रयत्न करनेसे तत्परता छूटकर परमत- खण्डन या परकीय इष्टदेव तथा आचार्योंके दोष प्रकट करनेमें ही प्रवृत्ति होती है। जैसे 'शैव' या 'वैष्णव' लोगोंकी कट्टरता प्रसिद्ध है; सुना जाता है कि शिवकांची, विष्णुकांची आदि परमपुण्य स्थलोंमें प्रथम ऐसी दशा थी कि एक-दूसरोंके देवताके उत्सव या रथयात्रा आदि कालमें 'अभद्र' अर्थात् शोकके चिह्न एवं अवहेलनाका भाव प्रदर्शित किया करते थे। विष्णुभक्त शिवकी निन्दा और शिवभक्त विष्णुकी निन्दा करते थे। भस्म, रुद्राक्ष, ऊर्ध्वपुण्ड्र, तप्तमुद्रा, कण्ठी आदि विषयोंपर ही अतिगर्हणीय कलह करते थे। सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार प्रज्ञाका तत्त्व-पक्षपात होना स्वभाव है— 'तत्त्वपक्षपातो हि स्वभावो धियाम्।' जरा ध्यान देकर विचारिये कि क्या उक्त समस्त सिद्धान्त सोपानारोहक्रमसे किसी सिद्धान्तभूत परमार्थ सत्य परमतत्त्वमें पर्यवसित होते हैं अथवा परस्पर-विरुद्ध होनेसे सुन्दोपसुन्दन्यायसे निर्मूल हो जाते हैं ? द्वितीय पक्ष तो ठीक नहीं मालूम पड़ता; क्योंकि भला थोड़ी