भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ७५५
देरके लिये बाह्योंको छोड़ भी दें तो भी तत्तद्वा- दाभिमानियोंसे अभिमत तत्तद्देवताओंके अवतारभूत तत्तदाचार्य मात्सर्यादि दोषशून्य ‘प्रमाणं परमं श्रुतिः’ का उद्घोष करते हुए ‘सर्वभूतानुकम्पया’ प्रवृत्त होकर अतात्त्विक निष्प्रयोजन सिद्धान्त-स्थापन क्यों करेंगे ? सुन्दोपसुन्दन्यायकी अप्रसक्ति, किंतु सोपानारोहक्रमकी प्रसक्ति इस वास्ते प्रथम पक्षमें ही कुछ सार प्रतीत होता है। अब प्रश्न यह होता है कि फिर उक्त सिद्धान्तोंमें कौन-सा सिद्धान्त ऐसा है कि जिसमें साक्षात् या परम्परया सभी सिद्धान्तोंका सामंजस्य हो ? क्योंकि द्वैत-अद्वैत अत्यन्त विरोधी सिद्धान्तोंका परस्पर सामंजस्य होना मानो तेज-तिमिर या दहन-तुहिनका ऐक्य- सम्पादन है। इस विषयमें समन्वय-साम्राज्य-पथानुसारी शास्त्र-तात्पर्य-परिशीलन संस्कृत-प्रेक्षावानोंका कहना है कि ‘वेदैकसमधिगम्य’ तत्त्वमें आस्था रखनेवाले सिद्धान्तोंका सामंजस्य तो सिद्ध ही है। विशेष विचारसे तो अदृष्ट कुछ न मानकर एकमात्र दृष्ट पदार्थको माननेवाले बाह्य चार्वाकका भी दृष्टको परमार्थसत्ता कुछ न मानकर केवल अदृश्य, अव्यक्त, अव्यवहार्य परमार्थतत्त्वको ही माननेवाले अद्वैतियोंसे परम्परया अविरोध हो सकता है। अद्वैतमें द्वैतान्तर्भावकी प्रसक्ति इस वास्ते यद्यपि द्वैतमें अद्वैतका अन्तर्भाव नहीं हो सकता तथापि अद्वैतमें द्वैतका अन्तर्भाव हो सकता है। लोकमें देखते ही हैं कि एक वटबीजसे अनन्त वटवृक्ष, एक मृत्तिकासे अनन्त घट-शरावादि पात्र होते हैं। श्रुति भी— ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३) तदात्मानं कुरुत स्वयम्’ (तैत्तिरीयोपनिषद् २।७) —इत्यादि वाक्योंसे एकका ही बहुभवन बतला रही है। द्वैतप्रपंचभगवदाश्रिता अनिर्वचनीयता शक्तिकी अद्भुत चमत्कृति तस्मात् जैसे महासमुद्रमें वायुके योगसे तरंग, फेन, बुद्बुद अनेक विकार-स्वरूपसे समुद्रका ही प्रादुर्भाव होता है, उसी तरह अनिर्वाच्य भगवदीय शक्तिके तादृश योगसे ही अनिर्वाच्य प्रपंच रूपसे निरवयव, निष्क्रिय, प्रज्ञानानन्दघनका अनिर्वाच्य प्रादुर्भाव होना श्रुतिसिद्ध है। भगवच्छक्तिकी अनिर्वचनीयता तथा तत्कृत द्वैतका परमार्थ सत्य अद्वयानन्दब्रह्मके साथ अविरोध दिखा ही चुके हैं। द्रष्टा आत्माकी दृश्यतादात्म्यापत्तिके कारण विविध वादोंकी प्रवृत्ति अस्तु, जैसे प्रदीपशिखा या प्रकाश स्वसन्निहित स्वच्छता तारतम्योपेत बहुसंख्यक काँचके योगसे तत्तदाकाराकारित हो जाती है; क्योंकि प्रकाश्यको प्रकाशता हुआ प्रकाश प्रकाश्याकार हो ही जाता है, ठीक उसी तरह आनन्दमयसे लेकर अन्नमयपर्यन्त ही नहीं, अपितु तत्तद् इन्द्रियोंद्वारा संसृष्ट शब्दाद्यात्मक पुत्रकलत्रादिपर्यन्तके सन्निधानसे तत्तदाकाराकारित विशुद्ध आत्मतत्त्व ही हो जाता है। उपाधिके सम्बन्धसे उपहितकी उपाधिस्वरूपवत्ता स्फटिकादिमें प्रसिद्ध है। अतएव तत्तदुपाधियोंके सम्बन्धसे उनके साथ अभेदभावापन्न आत्माका आनन्द- मय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय तथा पुत्ररूपसे निर्देश श्रुतियोंमें पाया जाता है। इसी वास्ते सकलविभ्रमास्पद परमतत्त्वमें नाना प्रकार वादिविप्रतिपत्ति स्वस्वमतिवैभवानुसार तत्त्वग्रहण यह सभी समंजस है। परोवरीयक्रमके समादरसे समन्वयकी सिद्धि तथा वास्तव आत्माकी समुपलब्धि उन्हीं लोक-बुद्धि-सिद्ध स्वरूपोंका सोपानारोह क्रमसे परमात्मतत्त्व-प्रतिपत्तिके लिये मातृपितृशतादपि हितैषिणी भगवती श्रुति उत्तरोत्तर अनुवाद करती हैं। पुत्रादिसे आत्मभावकी व्यावृत्तिके लिये अन्नमय देहमें आत्मभाव रखनेवाले चार्वाकका भी मत अभिमत होनेसे अद्वैतमें उपयुक्त है। देहसे आत्मभावव्यावृत्त्यर्थ प्राणमयमें भी आत्मभाव अपेक्षित है। प्राणमयसे आत्मबुद्धि हटानेके लिये मनोमयमें आत्मभाव भी ठीक ही है एवं आभासान्वित