भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणिकबुद्धि वृत्तिसन्ततिमें तथा सन्ततिक्षयरूपमें विज्ञान तथा शून्यताका अभिमान रखनेवाले विज्ञानवादी एवं शून्यवादी बौद्धोंका भी मत परमतत्त्वप्रतिपत्तिमें क्रमशः पूर्वप्रतिपन्न आत्मभाव-व्यावृत्तिके लिये उपयुक्त हो सकता है। संघात-व्यतिरिक्त शरीर परिमाण आत्मा माननेवाला 'अर्हत' सिद्धान्त भी संघाताभिमान- व्यावृत्तिके लिये उपादेय ही है। नैयायिक, वैशेषिक भी व्यवहारोपयुक्त पदार्थ अनुमानादि प्रमाण संघातातिरिक्त विभु आत्मा सिद्धकर परमतत्त्व प्रतिपत्तिके परम उपकारक हैं। सांख्य प्रकृति पुरुषका क्षीर-नीरसे भी घनिष्ठ सम्मिश्रण मिटाकर असंग, चेतन, विभु आत्माको सिद्ध करते हैं। योगी तद्व्यतिरिक्त नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव परमेश्वर सिद्धकर परम पुरुषार्थभूत भगवदाराधनके साधक हो जाते हैं। मीमांसकोंने भी भगवदाराधनका परम हेतु वर्णाश्रमानुसार वैदिक कर्मोंका स्वरूप निर्णयकर अत्यन्त उपकार किया, जिनका कि भगवान् 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः' (गीता १८।४५) इत्यादि वचनोंद्वारा परमतत्त्व- प्रतिपत्तिसे घनिष्ठ सम्बन्ध सिद्ध करते हैं। तदभिमतविषयविशेषकी उपादेयता तथा तदतिरिक्तकी उपेक्षा— समन्वयकी स्वरूप-विधा यहाँसे अब उत्तर-मीमांसकोंकी आवश्यकता देखनी चाहिये; परंतु इसके पहले यह बात समझ लेनी चाहिये कि उक्त अथवा वक्ष्यमाण दार्शनिकोंका विषय-विशेषमें प्राधान्य तदितरमें गौण अभिप्राय मानकर ही समन्वय किया जा सका है। अन्यथा सर्वांशमें प्राधान्य होनेसे विरोध अनिवार्य होगा, इस वास्ते तत्तत् दार्शनिकोंके प्रधान अंश उपयुक्त होनेसे ग्राह्य एवं अविरुद्ध हैं। जैसा कि विद्वानोंमें न्याय, वैशेषिक सर्वांशको प्रतिपादन करते हुए भी प्रमाण शास्त्र ही कहलाते हैं। पूर्वोत्तर-मीमांसा वाक्यशास्त्र कही जाती है। व्याकरण पदशास्त्र कहा जाता है। इन उक्तियोंका अभिप्राय यही है कि उक्त शास्त्रोंका प्रधान विषय प्रमाणादि ही है, अन्य गौण। अतः गौण अंशमें विरोध होते हुए भी प्रधानांश सर्वमान्य हैं। अभिप्राय यह है कि जो दार्शनिक जितने अंशमें पूर्ण तत्त्वप्राप्तिके उपयोगी जो बात कहते हैं, उनका वही अंश ग्राह्य है, तदितर अग्राह्य है। जो लोग जितने अंशमें पुरुषार्थ मानते हैं, उसीके हेतुका निर्णय करते हैं। निद्रालस्यादि तामस भावोंकी अपेक्षा राजस विषयोपभोगादि श्रेष्ठ पुरुषार्थ तथा अन्वयव्यतिरेक सिद्ध तत्साधन माननेवाले चार्वाक भी अंशतः अभिज्ञ ही हैं। जो विचारक दृष्टादृष्ट-भेदसे जितने पुरुषार्थ जिन-जिन प्रमाणोंसे मानते हैं, वे उन्हीं- उन्हीं प्रमाणोंसे उनके साधनोंका भी निश्चय करते हैं। महर्षि लोगोंने भी जिस विषयके अन्वेषणमें समाधिद्वारा असाधारण प्रयत्न किये हैं, उस विषयमें उनकी असाधारण मान्यता होती है। जैसे महर्षि पाणिनिकी शाब्दीकी व्यवस्थामें जिन विषयोंमें प्राधान्य नहीं, उन विषयोंमें विरोध अनिवार्य है। अस्तु, उत्तर-मीमांसाके द्वैत सिद्धान्तपरक भाष्यकार 'भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः।' (गीता १८।५५) इत्यादि भगवद्वाक्यानुसार परमतत्त्व साक्षात्कारका असाधारण कारण भगवद्भक्ति एवं तदुपयुक्त अनन्त कल्याण-गुण-गणाश्रय उपास्य स्वरूप तद्भिन्न उपासक स्वरूप-निर्णय करते हैं। विशिष्टाद्वैतियोंने परमेश्वरके साथ जीवका कुछ असाधारण सम्बन्धपूर्वक भक्तिके आधिक्य एवं अद्वैतवादिनी श्रुतियोंका निरादर हटानेका प्रयत्न किया। द्वैताद्वैतवादियोंने 'अन्योऽसावहमन्योऽस्मीति न स वेद' (बृहदारण्यक० १।४।१०) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उपासनामें उपास्योपासकके अभेद ज्ञानकी आवश्यकता समझते हुए भेदाभेदका बराबर आदर सिद्ध किया। शुद्धाद्वैतियोंने भगवत्तत्त्वसे व्यतिरिक्त तत्त्व माननेमें वस्तुकी पूर्णतामें बाधा समझकर शुद्धाद्वैत तत्त्वका स्थापन किया। यद्यपि शुद्धाद्वैत सिद्धान्तमें उक्त भगवदीय आत्मवैभवसे ही एकका बहुभवन सिद्ध होनेसे लौकिक- वैदिक समस्त व्यवस्था सूपपन्न है तथापि 'अजायमानो