भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 767, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 767

बहुधा विजायते' (मुद्गलोपनिषत् ३), 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (बृहदारण्यक० २।५।१९) 'अथास्य या सहजास्त्यविद्या मूलप्रकृतिर्माया लोहित- शुक्लकृष्णा, तया सहायवान् देवः कृष्णापिङ्गलो ममेश्वर ईष्टे' (शाण्डिल्योपनिषत् २।१) इत्यादि श्रुतियोंसे अजायमानका जायमानत्व, एकका बहुत्व मायासे ही सिद्ध है; क्योंकि परमार्थतः एक ही वस्तुका अजत्व-जायमानत्व, एकत्व-बहुत्व असम्भव है। इस वास्ते वस्तुतः सबाह्याभ्यन्तर अज सजातीय-विजातीय- स्वगतभेदशून्य स्वप्रकाशप्रज्ञानानन्दघनमें ही अचिन्त्यानिर्वाच्य स्वात्मशक्तिके अनिर्वाच्य सम्बन्धसे ही जायमानत्व, बहुत्व स्वीकार करना चाहिये। इसी वास्ते अद्वैतवादी अनिर्वचनीयवादी भी कहलाते हैं। वेदान्तियोंकी ब्रह्ममीमांसाका भिन्न-भिन्न भाष्यकार भिन्न-भिन्न अर्थ करते हैं; परंतु उसका मुख्य तात्पर्य किसमें है, यह निर्णय करना कठिन हो जाता है। कहना न होगा कि महर्षियोंके अभिप्रायोंका ज्ञान महर्षियोंको ही होता है। शुक्रनीतिसारमें शुक्राचार्यके मन्तव्यानुसार वेदान्तका अद्वैतमें ही मुख्य तात्पर्य है। 'ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन, मायिकं सर्वमज्ञाना- द्धाति वेदान्तिनां मतम्।' (शुक्रनीति ४।३।५०) सर्वभेदविवर्जित ब्रह्म ही सब कुछ है, नाना कुछ भी नहीं है। तद्व्यतिरिक्त समस्त प्रपंच मायिक ही है। यही वेदान्तियोंका मत है। इसके सिवा जिन दार्शनिकोंने वेदान्त मतका खण्डन किया है, उन्होंने भी अद्वैतको ही वेदान्त- सिद्धान्त मानकर अनुवादपुरस्सर खण्डन किया है। सांख्यों तथा नैयायिकोंमें पांचरात्र पाशुपतों तथा बौद्धोंने भी अद्वैतको ही वेदान्त मत मानकर खण्डन किया है। अब यहाँ प्रेक्षावानोंको विचार करना चाहिये कि जब क्रमशः उक्त प्रकारसे सभी सिद्धान्त अद्वैतकी ओर (ही) अग्रसर हो रहे हैं और विचार-दृष्टिसे सभीका प्रधान-प्रधान अंशोंमें अविरोध सिद्ध होता है, तब कलहके लिये स्थान कहाँ रह जाता है ? द्वैतसिद्धान्तानुयायियोंका परम तात्पर्य श्रीमद्भगवत्- चरणाम्बुजके अनुरागमें ही है। यह बात अद्वैतवादियोंको भी सम्मत है। यह बात दूसरी है कि कोई भगवान्‌के भूतभावन श्रीसदाशिवरूपमें, कोई श्रीविष्णुरूपमें, कोई पतितपावन श्रीमद्रामभद्ररूपमें, कोई श्रीकृष्ण आनन्दकन्दरूपमें तथा अन्यान्यरूपमें प्रेम रखते हैं। विद्वानोंका कहना है कि जिस प्रकार एक ही गगनस्थ सूर्य-तत्त्व घट, सरोवरादि अनेक उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होकर बिम्ब-प्रतिबिम्ब-भावापन्न होता है, ठीक उसी तरह अनिर्वाच्य मायामय गुणोंके परस्पर विमर्द वैचित्र्य निबन्धन विविध उपाधियोंके योगसे 'माया आभासेन जीवेशौ करोति' (नृसिंहो- त्तरतापनीयोपनिषत् ९) इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनन्तकोटिब्रह्माण्ड तद्गतजीवेशादिरूपसे एक ही परमतत्त्वका प्रादुर्भाव होता है। जैसे परम विशुद्ध गगनस्थ सूर्य ही प्रतिबिम्बापेक्षया बिम्बपदवाच्य होते हुए सर्वथा अविकृत है, वैसे ही अनन्तकोटिब्रह्माण्ड तद्गत जीव एवं अवान्तर तत्तन्नियन्ता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि नियम्यकी अपेक्षा परम विशुद्ध तत्त्व ही अनन्तकोटिब्रह्माण्डके नायक होते हुए भी सर्वथा अविकृत है। जैसे वे ही सूर्य नील-पीत आदि उपनेत्रोंसे नील-पीत आदि अनेक रूपोंमें भासमान होते हैं, वैसे ही एक ही परमतत्त्व विष्णुस्वरूपादि भावनाभावितमनस्कोंको विष्णुरूपमें और सदाशिव भगवान्‌की भावनासे भावित मनस्कोंको सदाशिवरूपमें उपलब्ध होते हैं। अतएव विशिष्टाद्वैत श्रीकण्ठीय शैवभाष्यकी टीका करते हुए श्रीमदप्पयजी दीक्षित कहते हैं कि यद्यपि सकल सच्छास्त्रोंका महातात्पर्य अखण्ड अनन्त विशुद्ध अद्वैत ब्रह्ममें ही है तथापि साम्ब सदाशिवकी भक्तिके बिना प्राणियोंको अद्वैत वासना और निष्ठा नहीं हो सकती—'यद्यप्यद्वैत एव श्रुतिशिखरगिरामागमानाञ्च निष्ठा, साकं सर्वैः पुराणैः स्मृतिनिकरमहाभारतादिप्रबन्धैः। प्रत्नै- राचार्यरत्नैपि परिजगृहे शङ्कराद्यैस्तदेव, तत्रैव ब्रह्मसूत्राण्यपि च विमृशनाभ्भान्ति विश्रान्तिमन्ति॥ तथाप्यनुग्रहादेव तरुणेन्दुशिखामणेः॥ अद्वैतवासना पुंसामविर्भवति नान्यथा।' वही रजस्तमोलेशादिसे अननुविद्ध अचिन्त्यानिर्वाच्य अन्तरंगा आह्लादिनी