भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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निरपेक्ष, स्वतः साक्षात् अपरोक्ष है, वही ब्रह्म है— 'यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' (बृहदारण्यक० ३।४।२)। अन्यथा कोई भी लाखों जन्मोंकी अनन्त तपस्याओंसे भी अतिदुर्गम परम-परोक्ष भगवान्‌में सर्वविज्ञातृता, अन्य-निरपेक्ष परम प्रकाशमानता कैसे सिद्ध कर सकता है? क्या कोई अत्यन्त परोक्ष तटस्थ परमेश्वरको साक्षात् अपरोक्ष कहनेका साहस कर सकता है? यदि यह परमेश्वर सर्व-विज्ञातारूप साक्षात् अपरोक्ष हो तो उसके विषयमें अनेक प्रकारकी अनुपपत्तियाँ एवं विप्रतिपत्तियाँ कैसे हो सकती हैं? जब इन्द्रिय, मन आदिद्वारा पारम्परीण अपरोक्ष घटादिमें भी संशय-विपर्ययादि नहीं होते, तब साक्षात् अपरोक्ष परमात्मामें संशयादि कैसे हो सकते हैं? फिर यदि वह साक्षात् अपरोक्ष है तो उसके बोधके लिये श्रवण-मननादि उपायोपदेश भी व्यर्थ हैं; क्योंकि अनुभव-विरोध स्पष्ट ही है। अतः यदि भगवान्‌में उक्त श्रुतियोंके अनुसार साक्षादपरोक्षत्वरूप स्वप्रकाशता आदिका समर्थन करना है तो अनिच्छयापि कहना पड़ेगा कि भगवान् ही सर्वप्रकाशक, सर्वान्तरात्मा, सर्वसाक्षी, प्रत्यगात्मारूपसे भी विराजमान हैं। उसी रूपसे उनमें साक्षात् अपरोक्षता, स्वप्रकाशरूपता उपपन्न होती है। इसी परमसन्निहित स्वप्रकाश आत्मामें अध्यारोपित अपूर्णता परिच्छिन्नता आदिकी निवृत्तिके लिये श्रवणादि भी सार्थक होते हैं। परोक्ष 'तत्पदार्थ असन्निहित एवं परोक्ष होनेके कारण प्रेमास्पद भी नहीं होता; क्योंकि सन्निहित एवं अपरोक्षमें ही निरतिशय प्रेम हो सकता है। इसलिये निरुपाधिक परमप्रेमास्पद आत्मा ही है। अतएव वही परम आनन्दरूप भी है। परोक्ष परमात्मामें स्वाभाविक निरुपाधिक निरतिशय प्रेम अत्यन्त अप्रसिद्ध एवं अनुभवसे विरुद्ध है। परमात्मामें प्रेम और भक्तिकी अभ्यर्थना की जाती है। 'या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्माप- सर्पतु ॥' (श्रीविष्णुपुराण १।२०। १९) 'हे नाथ! जैसे अविवेकियोंकी विषयोंमें स्वाभाविक प्रीति होती है, वैसी ही आपको स्मरण करते हुए मेरे हृदयमें आपमें अटल प्रीति हो।' अतएव भगवती श्रुतिने भी प्रत्यगात्माको ही सर्वाधिक प्रेमका विषय बतलाया है। 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादान्तरतमं यदयमात्मा' (बृहदारण्यक० १।४। ८) देवताओंमें भी प्रेम आत्म-कल्याणके लिये ही किया जाता है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है। परोक्ष तत्त्व प्रेमका आस्पद नहीं है, वह आनन्द या परमानन्द रूपसे कैसे हो सकता है? अतः जैसे स्वप्रकाशता परोक्ष परमात्मामें असंगत है, वैसे ही परप्रेमास्पदता भी असंगत है। इन उपर्युक्त हेतुओंसे कहना पड़ता है कि वेदान्तवेद्य परात्पर पूर्णतम भगवान् सर्वान्तरतम सर्वप्रत्यगात्मा हैं। अतएव निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद एवं परमानन्दरूप हैं। आनन्द चैतन्य परम-सत्य भगवान् ही सर्वप्रत्यगात्म- रूपसे स्थित हैं। अचिन्त्य-अनन्त-कल्याण-गुण- गण-निलय भगवान् ही सच्चिदानन्दरूप हैं। समस्त गुण-गणोंका पर्यवसान आनन्दमें ही होता है; क्योंकि सर्वगुणोंका उपयोग अनर्थ-निबर्हण, सौख्यातिशय एवं महत्त्वातिशयके आधानमें ही होता है। निरतिशय-सुखस्वरूप एवं निरतिशय-महान् भगवान्‌में सर्वगुणोंकी समाप्ति होती है। कुछ लोग कहते हैं कि सौन्दर्य-माधुर्यादि गुणसम्पन्न सगुण साकार भगवान्‌में ही आनन्द है। अदृश्य अग्राह्य अचिन्त्य निराकार निर्विकार परमात्मा पाषाणरूप है। उसमें सुखका लेश भी नहीं है। परंतु यदि यहाँ विवेचन किया जाय तो यही विदित होता है कि जहाँ-कहीं भी किसी प्रकारके सुखका स्वरूप होता है, वह सभी सुख निराकार ही है। कहीं भी सुखका स्वरूप नील, पीत, हरित या मूर्त नहीं देखा जाता है। चिरकालके विप्रयोगसे सन्तप्त कामुक अपनी प्रियतमा कान्ताके परिरम्भणसे आनन्दका अनुभव करता है, उत्कट पिपासा एवं बुभुक्षासे परिपीड़ित पुरुषको शीतल, मधुर, सुगन्धित जल एवं सौगन्ध्य,